Rajiv Gandhi was an Illegal Prime Minister: Rajiv Gandhi’s victory in the 1984 Lok Sabha elections was illegal. On the one hand, there was a wave of sympathy following Indira Gandhi’s assassination; on the other, booth capturing and electoral irregularities across the country also played a major role in Rajiv Gandhi’s victory. Take a look at the electoral situation in Haryana at the time. (Source: National Archives of India)
So, Rahul Gandhi should apologise to the country for his family’s every electoral victory, because their victories were totally illegal. From Indira Gandhi to Rajiv Gandhi, all became Prime Ministers through illegitimate means.
दिल्ली में पुलिस के साथ बदतमीजी करने वाले बीबीसी के पत्रकार दिलनवाज पाशा का ऑडियो सामने आया.
ऑडियो में वो गंदी गंदी गालियां दे रहे हैं. पिटाई की धमकी और लाहौर तक कनेक्शन की बात कर रहे हैं
एक्शन में आई यूपी पुलिस..Fir दर्ज.
इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने अपनी खुफिया रिपोर्ट में यह खुलासा किया है:
काक्रोच ध्रुव राठी, जो हिंदू बनकर मोदी-विरोधी, भाजपा-विरोधी, आरएसएस-विरोधी और सनातन-विरोधी अभियान चला रहा है, असल में मुसलमान है! उसका असली नाम बदरु राशिद है, पूरा नाम बदरुद्दीन राशिद लाहौरी है। उसका जन्म लाहौर, पाकिस्तान में हुआ था।
उसकी पत्नी जूली (जिसका नाम ईसाई धर्म से मिलता-जुलता है) भी पाकिस्तानी मुसलमान है, जिसका असली नाम जुलेखा है। वे कुख्यात वैश्विक गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम के कराची स्थित गुप्त अलीशान बंगले में रहते हैं, जहां उन्हें आईएसआई और पाकिस्तानी सेना की वाई+ और जेड+ सुरक्षा प्रदान की जाती है।
बदरु राशिद (ध्रुव राठी) को पाकिस्तान, चीन, दुबई, मालदीव, कनाडा, रूस, तुर्की और पेंडोरा से धन मिलता है। कभी-कभी जॉर्ज सोरोस के खाते के माध्यम से भी। लेकिन अब इस हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी तत्व का भंडाफोड़ हो गया है।
सभी सनातनियों से अनुरोध है कि वे इस खुलासे को जितना हो सके साझा करें और हमारे देश के हित में बदरु राशिद/ध्रुव राठी की सच्चाई को उजागर करें।🇮🇳
आनंद रंगनाथन जी की wall से साभार।
देश को रक्त स्नान कराने के सपने देख रहा प्रशांत भूषण और उसके बाप की कट्टर ईमानदारी की सच्ची कहानी....
(2008–2009) में नोएडा प्राधिकरण ने सेक्टर-128 और सेक्टर-131 आदि क्षेत्रों में फार्महाउस के लिए बड़े भूखंडों (न्यूनतम 10,000 वर्ग मीटर) की खुली योजना निकाली थी।
* आवंटन की शर्तें और दर:
इन भूखंडों की आरक्षित दर (Reserved Price) लगभग 3,500 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय की गई थी। इसके तहत 10,000 वर्ग मीटर के एक फार्महाउस प्लॉट की कुल कीमत करीब 3.5 करोड़ रुपये बैठती थी। आवंटन की शर्तों में कुल राशि का केवल 10% (करीब 35 लाख रुपये) अग्रिम भुगतान करना था और शेष राशि 16 किस्तों में चुकानी थी।
इस योजना के तहत पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण और उनके छोटे बेटे जयंत भूषण (वरिष्ठ वकील) दोनों को 10,000-10,000 वर्ग मीटर के दो अलग-अलग फार्महाउस प्लॉट आवंटित किए गए थे।
जिस समय नोएडा में ज़मीन के सर्किल और बाज़ार भाव बहुत ऊंचे थे, उस समय मायावती सरकार ने फार्महाउस स्कीम के नाम पर प्रभावशाली हस्तियों को औने-पौने दामों पर ज़मीन बांटी।
* साथ ही यह भी पता चला कि जयंत भूषण नोएडा में मायावती के महत्वाकांक्षी 'नोएडा पार्क प्रोजेक्ट' (दलित प्रेरणा स्थल) के खिलाफ अदालत में पैरवी कर रहे थे, ऐसे में यह आवंटन 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (हितों के टकराव) का मामला था।
विवाद उठने पर शांति भूषण और जयंत भूषण ने कहा कि यह आवंटन किसी 'मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोटे' (Discretionary Quota) से नहीं हुआ था, बल्कि एक सार्वजनिक योजना में आवेदन और इंटरव्यू/ड्रॉ प्रक्रिया के तहत हुआ था।
जयंत भूषण ने स्पष्ट किया कि उन्होंने आवेदन 2008 में किया था, जबकि मायावती पार्क का मुकदमा वे 2009 में लड़े थे।
लेकिन दिसंबर 2021 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की गई कैग (CAG) की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में
CAG ने पाया कि औद्योगिक और शहरी विकास के नाम पर किसानों से 'अर्जेंसी क्लॉज' (आपात धारा) लगाकर अधिग्रहीत की गई बेशकीमती जमीन को रसूखदार नेताओं, उद्योगपतियों, अफसरों और वकीलों को विलासिता (फार्महाउस) के लिए कौड़ियों के दाम आवंटित कर दिया गया।
CAG ने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित किया कि इस खुली लूट/अनियमितता के कारण नोएडा प्राधिकरण और सरकारी खजाने को लगभग 2,833 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ था।
विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद शांति भूषण और जयंत भूषण को आवंटित इन भूखंडों पर लीज डीड (रजिस्ट्री) और भौतिक कब्जा (Physical Possession) की प्रक्रिया रुक गई थी। भूखंडों पर निर्माण या फार्महाउस का विकास नहीं हो सका।
CAG की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद पूरे 150 से अधिक फार्महाउस आवंटनों की जांच उत्तर प्रदेश सरकार के सतर्कता/प्रशासनिक दायरे में आ गई। प्राधिकरण द्वारा कई आवंटनों में बकाया भुगतान, पर्यावरणीय उल्लंघनों (हिंडन डूब क्षेत्र) और नियमों के उल्लंघन के आधार पर नोटिस व रद्दीकरण की प्रक्रियाएं शुरू की गईं।
विवाद और बाद में जांच प्रक्रियाओं के चलते यह मामला लंबे समय से अधर में लटका रहा। शांति भूषण का जनवरी 2023 में निधन हो चुका है, और मायावती काल का यह संपूर्ण फार्महाउस आवंटन घोटाला आज भी नोएडा प्राधिकरण के सबसे विवादास्पद नीतिगत फैसलों में गिना जाता है।
😈😈Abhijit Dipke - The real face 😈😈
He us just not an anti-national
But he us purest evil's form on earth
Listen to this person who studied in the same Boston university - who has met him during a party & spoken to him is sharing his experience....
Unimaginably evil 😈 he is ...
RT - make it Viral
🚨Revealing Fraudster Saurav 🚨
My Son, Saurav and AAP have planted Norwegian journalist Helle Lyng in press conference to heckle in press conference of Prime Minister Modi Ji May 26
INR 0.61 Cr was given to her as reward for her heckling.
you want more data?
जब BBC ने इंदिरा गांधी से यह सवाल पूछा कि "आपने मोरारजी देसाई को जेल में क्यों डाला", तो उनका जवाब इस क्लिप में है। अगर मोदी अभी यही जवाब दें तो क्या होगा?
Who scripted India’s “non-violent” CEC protests?
Norway-based Oslo Freedom Forum, run by Human Rights Foundation (HRF). In Feb 2026 HRF branded India “hybrid authoritarian” over SIR
Its mentor is CANVAS’s Srđja Popović, who inspired Yogendra Yadav for non-violent movements
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इसको ध्यान से पढ़ें
दुख की बात है की बात है कि अपने आप को गर्व से राष्ट्रवादी की श्रेणी में रखने वाले कुछ लोग भी इन्हीं के सुर में राग अलापने लगते हैं,..
वक्त की नजाकत नहीं समझ पाते ऐसे लोग जब बाहर से अटैक हो रहे हो तो घर के भीतर से सबको मिलकर उसे अटैक का सामना करना चाहिए
ना की आक्रमणकारियों का साथ देना घर के लोग भी चालू कर दे..
मोदी
और
मोहम्मद मोसादेग
ईरान 1951
और
भारत 2025 -
क्या कोई समानताएं हैं?
क्या आपने कभी सोचा है कि ईरानी अमेरिका को "शैतानों की धरती" क्यों कहते हैं?
एक समय था, जब ईरान की तेल इंडस्ट्री पर ब्रिटेन का पूरा कंट्रोल था; 84% प्रॉफिट इंग्लैंड को जाता था और सिर्फ़ 16% ईरान को।
1951 में, एक सच्चे देशभक्त, मोहम्मद मोसादेग, ईरान के प्राइम मिनिस्टर बने। वह नहीं चाहते थे कि विदेशी कंपनियां ईरान के तेल रिसोर्स पर कंट्रोल करें। 15 मार्च, 1951 को, मोसादेग ने तेल इंडस्ट्री को नेशनलाइज़ करने के लिए एक बिल पेश किया, जो भारी बहुमत से पास हुआ। टाइम मैगज़ीन ने उन्हें 1951 में "मैन ऑफ़ द ईयर" का नाम दिया!
लेकिन इस फ़ैसले से ब्रिटिश फ़ायदों को नुकसान हुआ। उसने रिश्वत, हत्या की कोशिश और मिलिट्री तख्तापलट के ज़रिए मोसादेग को हटाने की कोशिश की, लेकिन उसकी दूर की सोच और पॉपुलैरिटी ने उसकी सारी कोशिशें नाकाम कर दीं। जब ब्रिटेन नाकाम रहा, तो उसने मदद के लिए अमेरिका से संपर्क किया। CIA ने मोसादेग को सत्ता से हटाने के लिए $1 बिलियन डॉलर मंज़ूर किए।
इस प्लान में लोगों में नाराज़गी पैदा करना, मीडिया और धार्मिक नेताओं को खरीदना और आखिर में भ्रष्ट MPs के ज़रिए सरकार गिराना शामिल था।
जर्नल, एडिटर और मौलवियों को मोसादेग के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए $631 मिलियन दिए गए। हज़ारों लोगों को नकली विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए पैसे दिए गए। ग्लोबल मीडिया ने भी अमेरिका का साथ देना शुरू कर दिया। कार्टून का इस्तेमाल मोसादेग पर पर्सनल हमले करने के लिए किया गया, ठीक वैसे ही जैसे आज मोदी की पर्सनल ज़िंदगी पर हमले हो रहे हैं।
मोसादेग को डिक्टेटर कहा गया। जब उसे एहसास हुआ कि उसकी सरकार पार्लियामेंट गिरा देगी, तो उसने पार्लियामेंट भंग कर दी। US ने शाह पर मोसादेग को हटाने का दबाव डाला और नकली विरोध प्रदर्शनों के बाद मोसादेग ने सरेंडर कर दिया। उन्हें जेल में डाल दिया गया और बाद में हाउस अरेस्ट कर लिया गया।
इसके बाद, ईरान का तेल US (40%), इंग्लैंड (40%), और दूसरे यूरोपियन देशों (20%) के बीच बंट गया।
कट्टरपंथी खोमैनी सत्ता में आए और आम ईरानियों की हालत खराब हो गई।
मोसादेग का गुनाह यह था कि वह चाहते थे कि ईरान के रिसोर्स पर विदेशियों के बजाय ईरान की अपनी कंपनियां कंट्रोल करें। अगर मोसादेग को सपोर्ट मिला होता, तो ईरान 1955 तक पूरी तरह से डेमोक्रेटिक देश बन सकता था। लेकिन पत्रकारों, एडिटर्स, MPs और प्रोटेस्टर्स ने पैसे के लिए अपने देश का भविष्य बेच दिया। इसीलिए अमेरिकियों को "शैतानों की धरती" कहा जाता है।
*अब, भारत भी ऐसे ही मोड़ पर है। नकली मुद्दे, नकली आंदोलन, नकली आंकड़े और लोगों को जाति और धर्म के आधार पर बांटना - यह सब भारत को फिर से विदेशी कंट्रोल में लाने की एक गहरी साज़िश का हिस्सा है।
अब समय आ गया है कि हम सावधान रहें और करप्ट मीडिया के प्रोपेगैंडा का शिकार न हों। हर देशभक्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। नहीं तो भारत का भविष्य भी ईरान जैसा हो सकता है।*
आज, कई ग्लोबल इंटेलिजेंस एजेंसियां मोदी सरकार को हटाने के लिए भारतीय नेताओं को अपने एजेंट के तौर पर भर्ती करने की कोशिश कर रही हैं। हमारा भविष्य हमारे हाथ में है। बस हमें समय रहते यह समझने की ज़रूरत है।
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने मोसादेग को तानाशाह कहा था। आज, टाइम मैगज़ीन मोदी को "डिवाइडर-इन-चीफ" कहती है। क्या यह सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक है? नहीं, यह एक स्ट्रैटेजी है। सोचो, समझो और जागरूक बनो।
जय हिंद।
ज्ञानेश कुमार तो सिर्फ एक बहाना है दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठियों को बचाना है।
और यही कारण है कि बांग्लादेश से भारत के विपक्ष को पूर्ण समर्थन मिल रहा है। उनके समर्थन में वहां रैलियां निकाली जा रही हैं।क्योंकि वह जानते हैं कि भारत का विपक्ष बांग्लादेशियों को बचाने के लिए सड़क पर उतरा है।
Editor in Chief of Financial Times is Roula Khalaf
She is from Lebanon and lives in London
She is very close to Soros family. She organised 'Lunch with Alex Soros's last year and declared George Soros 'Person of the Year' in 2018
Color revolution playbook in India, same as elsewhere.
Oslo Freedom Forum, Human Rights Foundation, local names like Saurabh Das and Supriya Sharma, money and training from abroad, then the usual script about dictatorship and persecution. This is not some spontaneous student thing. It’s the standard external package when a big country starts acting too independently.
You see the same pattern in Nepal, Bangladesh, Indonesia, Hong Kong 2019. Find or create proxies, fund the infrastructure, turn every grievance into an existential fight, push the human rights language, and create pressure. India is large and has real weight in the multipolar space, so of course the network shows up.
FCRA is the Indian law that controls foreign money going to NGOs and associations. You need registration, the money has to come through proper accounts, you have to report it, and you can’t just pass it around freely. It’s basically a check on external funding that can be used to shape domestic politics. That’s why some groups dislike the stricter rules. When foreign networks are trying to build local capacity and narratives at scale, unrestricted money becomes leverage. Sovereign countries that actually want to stay sovereign usually keep an eye on these pipelines.
Nothing new here. Just the usual playbook.
🚨 BIG QUESTIONS OVER PAKISTAN-LINKED MEDIA PLATFORM OPERATING IN INDIA!
Journalists associated with @HumanOnlineNews are roaming around protest sites in Delhi and covering demonstrations, while claims have emerged that the platform’s social media handles are operated from Pakistan.
Who owns this platform? Is it legally authorised to operate in India? And are Indian authorities aware of its operations?
Tagging @GoI_MeitY@PIB_India to investigate its ownership, operational base and compliance with Indian laws.
What you think, who is behind this platform?
वामियों का भारत में टूलकिट: जीन द्रेज़
गेल ओमवेट को याद करो। अमेरिका से आई, भारत की नागरिकता ली, दलित आंदोलन के नाम पर यहीं शादी की, और जिंदगी भर भारत में जाति को हथियार बनाकर हिंदू समाज को तोड़ने का थ्योरी लिखती रही। बाहर से चेहरा - गरीबों की मसीहा, अंदर से एजेंडा ब्रेकिंग इंडिया और डिस्मेंटल हिंदुत्व का है।
जीन द्रेज़ उसी का दूसरा वर्जन है, बस पैकेजिंग नई है।
बेल्जियम से आया, भारत की नागरिकता ली 2002 में, यहीं शादी की - बेला भाटिया से, जो खुद नक्सल बेल्ट मे काम करने वाली एक्टिविस्ट है। फिर झारखंड के गांव में झोपड़ी डाल ली। फटा कुर्ता, साइकिल, नंगे पैर। ताकि कोई सवाल ही न पूछे - कि भाई तेरा खर्चा चलता कहाँ से है?
किताबें बिकती नहीं, नौकरी करता नहीं, खेती करता नहीं। फिर भी दिल्ली से रांची, रांची से हार्वर्ड, हार्वर्ड से लंदन तक के टिकट, सेमिनार, होटल, वकील सबका पैसा कहाँ से आता है?
यहीं पर एम्मा रोथ्सचाइल्ड वाला जिगरी दोस्त वाला नेटवर्क काम आता है। यह अमर्त्य सेन की बीवी एम्मा का पालतू दोस्त है।
अमर्त्य सेन के साथ रहो तो हार्वर्ड बुलावा भेजता है। हार्वर्ड बुलावा भेजता है, तो फोर्ड फाउंडेशन, रोथ्सचाइल्ड फाउंडेशन जैसी तिजोरियां खुलती हैं। वही पैसा फिर भारत में एनजीओ बनकर आता है, आंदोलन खड़ा होता है, और हर आंदोलन का आखिरी नारा एक ही होता है - भारत का स्टेट गरीबों का दुश्मन है, हिंदुत्व गरीबों का दुश्मन है।
गेल ओमवेट ने जाति के नाम पर तोड़ा, द्रेज़ गरीबी के नाम पर तोड़ रहा है।
तरीका क्या है इसे समझते हैं। पहले एक विदेशी को भारतीय बनाओ। फिर उससे भारतीयों को ही सिखाओ कि तुम्हारा धर्म, तुम्हारी व्यवस्था कितनी खराब है। फिर उसी रिपोर्ट को विदेश में ले जाकर भारत को बदनाम करो कि देखो यहाँ ह्यूमन राइट्स का उल्लंघन हो रहा है। और उसी बदनामी पर अगली फंडिंग ले आओ।
ये गरीबी हटाने का मॉडल नहीं है, ये गरीबी बचाकर रखने का मॉडल है। गरीब रहेगा तो द्रेज़ की दुकान चलेगी, द्रेज़ की दुकान चलेगी तो सेन के सेमिनार चलेंगे, सेन के सेमिनार चलेंगे तो रोथ्सचाइल्ड सर्कल में भारत को लेकर चिंता जताई जाती रहेगी।
इसी को डिस्मेंटल हिंदुत्व और ब्रेकिंग इंडिया का इकोसिस्टम कहते हैं। चेहरा देसी, खर्चा विदेशी, और निशाना सिर्फ एक - हिंदू समाज को अपराधबोध में डुबोकर रखो।
एक बात और स्पष्ट कर दूं द्रेज़ का मनरेगा फूड राइट का किस्सा मुखौटा है। यह नंगे पैर रहने का नाटक करता है और दो लाख का गैजेट लेकर चलता है।