पिछले सप्ताह हुई UGC-NET परीक्षा को लेकर सामने आए गंभीर आरोप बेहद चौंकाने वाले हैं।
NEET पेपर लीक के कुछ ही हफ्तों बाद अब खबरें आ रही हैं कि -
- UGC-NET परीक्षा से ठीक पहले 100 पन्नों की एक PDF प्रसारित हुई।
- यह PDF उस question paper setting की है, जो सिर्फ़ NTA के पास उपलब्ध होती है।
- PDF के लगभग 90 सवाल Sociology के असली प्रश्नपत्र से मेल खाते हैं।
- वही प्रश्नपत्र ₹2.25 लाख में बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में बेचा जा रहा था।
- इसी नेटवर्क ने CSIR-NET, HTET और ADA जैसी आगामी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने का भी दावा किया।
NEET और NET में बार-बार सामने आए घोटालों के बाद भी मोदी सरकार आंखें मूंदकर सो रही है, क्योंकि लाखों छात्रों की रात-रात जागकर की गई सालों की मेहनत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।
सारा देश जानता है कि प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री से किसी भी तरह की जवाबदेही या कार्रवाई की उम्मीद बेकार है - न जांच होगी, न छात्रों को न्याय मिलेगा।
बदलाव का एकमात्र औज़ार हमारी सम्मिलित आवाज़ है - देश भर के छात्रों की गूंज, जो भारत में शिक्षा revolution लाकर रहेगी।
🧬Possibly one of the most important genetics preprints of 2026 has just been published: the flagship paper of the Vertebrate Genomes Project.
An ambitious effort to generate near-complete and near-error-free reference genomes for all living vertebrate species.
The authors present 816 high-quality reference genomes covering around 95% of major vertebrate evolutionary lineages. Most assemblies are at chromosome-level quality and some are fully diploid telomere-to-telomere genomes.
Using this resource the authors reconstructed the genome of the last common ancestor of vertebrates, studied the evolution of sex chromosomes, explored 3D genome organization and compared epigenetic landscapes across hundreds of species.
This dataset will likely become a foundational platform for evolutionary biology and comparative genomics.
https://t.co/MuwxZD5bZd
#VGP #evolution #ComparativeGenomics #vertebrates #genomes
अब ये स्वीकारा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर में 6 भारतीय सैनिक शहीद हुए
पर सुनिए
संसद में 28 जुलाई 2025 को जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष को ललकारते हुए कहा था
“आपको प्रश्न पूछना है तो यह पूछिए की क्या इस ऑपरेशन में हमारे जवान सैनिकों को कोई क्षति हुई? तो उसका उत्तर है नहीं”
और इस पर सत्ता पक्ष ने जमकर ताली बजायी थी… मेज़ थपथपाई थी
मौत के अगले दिन इनमे से एक शहीद सैनिक के भाई ने ट्विटर डीएम में सम्पर्क किया था।
नाम, लाश की कॉफिन में फ़ोटो और छोड़ने आये फौजी दल की तस्वीरे दी। उस वक्त देश के रक्षा मंत्री संसद में बयान दे रहे थे कि ऑपरेशन सिंदूर में कोई भारतीय सैनिक नही मरा।
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शहीद के भाई चाहते थे कि इस पर पोस्ट लिखूं, सबको बताऊं। मगर जब देश युद्ध मे हो, तो वह वक्त फौज और नेतृत्व से, डिस्प्यूट करने का नही होता।
तो यदि वे इस मौत को छुपाना चाहते हैं,
तो यही सही।
मैंने वह पोस्ट नही लिखी। मगर हृदय में बोझ रहा। आज सरकार ने एक नही, 6 मौते कबूल ली हैं। देर सवेर गिरे विमानों की सँख्या भी पब्लिक डोमेन में आ जायेगी।
पर आर्मी सर्कल्स में तो पहले पता होगा सबको। क्या बीती होगी फौजियों के दिलों पर। हम मरें, और शहादत की कृतज्ञता तक यह देश नही दिखाता।
जब यह सरकार जाएगी तो उनके मेमोयर्स भी आएंगे। जाने क्या क्या खुलासे हों। जो भी होगा, शॉकिंग होगा। शर्मनाक होगा।
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मगर जनता के लिए इसके फौरी तौर पर अर्थ समझिए। पहलगाम अटैक, पुलवामा अटैक के बाद हुआ। दोनों ही मामलों में इसके कलप्रिट पकड़े नही जा सके। हां, पाकिस्तान पर चटपट हमला कर दिया गया।
पहली बार, बालाकोट स्ट्राइक एक सरप्राइज थी। क्योंकि क्रॉस बॉर्डर एरियल अटैक के उदाहरण पहले नही थे। सिन्दूर के समय यह सरप्राइज खत्म हो चुका था।
अबकी बार दुश्मन तैयार था।
चीनी के दिये सेटेलाइट सपोर्ट और मिसाइलों के साथ... (जो आगे भी रहेगा)
हमारे लोग मरे, विमान खोए। कुछ हासिल किए बिना युद्ध विराम कर लिया। शहादते बेकार हो गयी। उनके नाम छुपाए।
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आतंकी खत्म हो गए हैं, या उनकी हिम्मत टूट गयी,ऐसा कहना बचपना होगा। ये लोग, आतंकी हमले रोक पाते नही, कलप्रिट्स को पकड़ पाते नही। यह हुआ इंटेलिजेंस का, इन्वेस्टिगेशन का फेलियर..
अब भविष्य में आतंकी हमला हुआ, तो एडे बेड़े कराची पे हमला करने की हिम्मत भी ये नही कर सकेंगे। याने सैन्य विकल्प खत्म..
वैश्विक कूटनीति के स्तर पर मामला पहले खत्म है।सिन्दूर के बाद थरूर सहित तमाम दल देश दुनिया घूमें। और नतीजा सिफर रहा। ईरान युद्ध के बाद पाकिस्तान ऊंचे लेवल पर बैठा है। । तो कूटनीति भी नहीं जीरो।
क्या बचा??
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बन्द मुट्ठी लाख की होती है।
उसका भय होता है।
हर कवच विदीर्ण है। सारी मुट्ठियाँ खोल दी गई, अब वे खाक की हैं। पाकिस्तान पहले से ज्यादा निर्भय है। और भारत-
तथ्य और सत्य छुपाने वाला निर्बल देश।
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इन बहादुरों की शहादत छुपाकर रखने वाले लोगो को लानत देना बेकार है।
उन्हें चुनने वालो को जरूर लानत दें। जिन गालीबाज बड़बोलों के हाथों इस देश, सेना और भारत की अस्मिता मलिन हो चुकी है।
अभी तो हमे और जलील होना है।
फिलहाल आइये, इन शहीदों के लिए 2 मिनट का मौन रखें। इनके परिवारों को हमारी (विलम्बित) सांत्वना पहुँचे।
देश के इन शहीदों को कोटि कोटि प्रणाम।
🙏
THIS IS NOT LIMITED TO AAJ TAK
The same faces appear across News18 India, India TV and other debate shows too.
BJP-friendly audience plants are being passed off as neutral public voices, then amplified by these channels to attack the opposition and protect BJP.
This is BJP toolkit with a microphone.
विज्ञान में यही अच्छाई है कि कोई ना कोई झूट और बेईमानी पकड़ ही लेता है:
Cyriac Abby Philips, known as
@TheLiverDoc
, reviewed the July 2025 study from IIT researchers that analyzed urine from eight cow breeds and touted compounds like phenols for uses in disinfectants and drugs. Funded by nearly $37,000 from India's SUTRA-PIC program, the paper drew fire for lab contaminants misread as natural metabolites, implausible toxins in samples, missing stats, and graph oddities suggesting manipulation. Springer Nature launched an investigation after Philips's alert, amid wider questions on public funds for cow product research versus core science like AI.
Good morning. This is urgent, for public information.
The second paper on cow research funded using India's public money under the SUTRA-PIC (Scientific Utilization through Research Augmentation - Prime Products from Indigenous Cows program) has undergone exhaustive post-publication peer review.
The paper was published in Applied Biochemistry and Biotechnology last year. The authors are from Indian Institute of Technology (IIT) BHU-Varanasi and Birla Institute of Technology (BITS)-Pilani.
This is the paper: https://t.co/InN4H9safh
This study was done in Uttar Pradesh and the total amount of public money given was INR 31,04,162. The authors studied cow urine of different breeds and found "special" components in the cow urine that they claim will have major use applications in healthcare, technology and engineering.
They are wrong. The paper is a third-rate publication with poorly performed and grossly misinterpreted and falsified results of basic analytical chemistry. An official email for Expression of Concern and investigation into scientific integrity has been mailed to: @SpringerNature Ethics Team and Journal Editors-in-Chief (personal email) - Matthew P. DeLisa PhD
at Cornell University, Ye Ni PhD at Jiangnan University and Benedict Okeke PhD at Auburn University.
Here is the lay summary of the paper's forensic analysis:
Lab contamination has been (un)intentionally ignored by authors. The researchers mistook common lab contaminants, like plastic chemicals and solvents, for natural cow urine compounds. They failed to run basic control tests to catch these obvious errors.
Impossible chemicals claimed to be found in cow urine by authors. The paper claims to have found impossible synthetic chemicals in the urine, such as a banned pesticide, human prescription drugs, and toxic metals. This shows the authors blindly trusted computer software without checking if the results even made biological sense.
Fake health claims made by the authors. The authors boast about the amazing health benefits of over twenty different chemicals, claiming they fight cancer and bacteria. However, none of these specific chemicals were actually found anywhere in their own data or in the urine of various cows they tested.
Contradictory results are all over the place. The written text of the paper directly contradicts its own data tables. The researchers claim to have found certain groups of chemicals, like steroids, that are completely missing from their actual results.
Terrible referencing throughout the paper. The study's citations are completely mismatched, scrambled, and duplicated. They even cite unrelated plant studies and reviews on toxic chemicals to support their claims about the "benefits" of cow urine.
Zero statistics and flawed setup degrade the conclusions. The study lacks basic statistical analysis, sometimes testing as few as one cow per breed. They also failed to separate the cow's breed from its age, diet, or location, making their "breed-specific" conclusions totally invalid.
Misleading graphs are plastered all over. The graphs that are supposed to show specific, individual chemicals actually show messy mixtures of dozens of different compounds. These graphs look suspiciously identical to each other, raising serious concerns about image manipulation.
Thanks to the Government for destroying the scientific fabric and the rational temperament of its science instituitions. We wont forget.
क्रूड ऑयल का दाम $80 से नीचे आ चुका है। लेकिन पेट्रोल-डीजल का दाम अब कम नहीं होगा। कल ही झारखंड में विधायक खरीदे हैं, महाराष्ट्र वाले सांसदों का अभी हिसाब करना है।
इससे अच्छा चंपत राय हमारे प्रधानमंत्री होते तो ईरान से तेल चुरा-चुराकर आधे दाम पर बेचते बाजार में।
भारत की शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है।
ज़रा सोचिए - देशभर के परिवार जितना पैसा सिर्फ़ NEET की तैयारी पर ख़र्च करते हैं, वो भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट के बराबर है।
आज कोटा से, और देश के हर कोने से, लाखों युवा एक सुर में कह रहे हैं - इस व्यवस्था ने हमारे साथ अन्याय किया है।
हर युवा अलग है, पर सबकी कहानी एक - या तो सपने देखने नहीं दिए गए, या देखे हुए सपने तोड़ दिए गए।
‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ़ अभियान नहीं - एक क्रांति है। हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी है जो आपको बड़े सपने देखने का हक़ दे और आपकी ज़िंदगी गिरवी रखे बिना, उन्हें पूरा करने में आपका साथ दे।
#ChhatronKiGoonj
कभी नही आएगा..
सिवाय एक सूरत के!!
पहले यह समझ लें, की चिल्ला चिल्ला कर POK -POK बोलने से आपका अधिकार प्रमाणित नही होता। क्योंकि उधर पाकिस्तान भी, चीख चीख भारतीय कश्मीर को IOK बोलता है- इंडियन ऑक्युपाईड कश्मीर..
इस शब्दावली से यह तो प्रमाणित नही होता ना कि हमने कश्मीर कब्जा कर रखा है।
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दुनिया एक हिस्से को इंडियन एडमिनिस्टर्ड कश्मीर कहती है, और दूसरे को पाकिस्तान एडमिनिस्टर्ड कश्मीर तीसरा हिस्सा भी है वहां- चाइना एडमिनिस्टर्ड कश्मीर...
COK- जिसके बारे में नेताजी के मुंह से बोल नही फूटता। चीन पांच गुना बड़ी इकॉनमी जो है।
इन्हीं महाशय ने बोला था न
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आइए, कश्मीर पर दोनों देशो के क्लेम का परीक्षण करें।
हम कहते है, कि हमारे पास राजा का एक्सेशन पेपर है। यह बात सही है। लेकिन वो कहते है, कि गिलगित बाल्टिस्तान की जनता ने खुद राजा से विद्रोह करके, पाकिस्तान में मिलना चाहा था।
और यह भी सही है।
गिलगित रेबेलियन गूगल कीजिये।
अब आज की दुनिया यह मानती है कि जनता जो कहे, वह फैसला मान्य होगा। न कि राजा जो चाहे। इसलिए तो जूनागढ़ और सिक्किम में हमने भी रेफरेंडम करवाया।
कश्मीर में नही करवाना चाहते। जर्रे जर्रे में विकास इंजेक्ट कर देने के बावजूद।।
तो गिलगित की जनता का रेबेलियन करके, पाकिस्तान से मिलना, ज्यादा स्ट्रांग क्लेम है- बनिस्पत राजा द्वारा साइन किये गए एक्सेशन पत्र के। (मुझे गाली ना दो भाई, मैं वर्ल्डव्यू बता रहा हूँ, मेरा व्यू नही)
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बाकी रहा- "लड़ के लेंगे POK.."
नही ले सकते। 250 आतंकी 1999 में करगिल में आकर बैठ गए। 14 लाख की सेना, एटमिक पॉवर, ताकतवर एयरफोर्स, गनगनाती तोप, मिसाईल- सब था। धरा रह गया।
सेना को 6 महीने लगे दर्जन भर पहाड़ी जीतने में। 500+ फौजी मरे।
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दरअसल "POK जीत लेंगे" के दम के पीछे 1971 की जीत है। ठीक वैसे ही जैसे COK पर कोई दावा मुंह से नही फूटता- क्योकि वहां 1962 की हार है।
लेकिन 1971 की जीत बंगाल के मैदानी इलाकों में हुई थी, कश्मीर के पहाड़ों में नही। अरे, हम तो 1965 में भी कश्मीर के पहाड़ों में लगभग हार गए थे।
तब जाकर पंजाब में मोर्चा खोलना पड़ा- लाहौर तक पहुँच गए। पाकिस्तान को ताशकंद में समझौता करना पड़ा।
यह जीत भी तो मैदानों में थी।
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तो जब 250 आतंकी, दर्जन भर पहाड़ में हम तमाम संसाधनों के बावजूद छह माह लगा गए, हजारो पहाड़ी और लाखों स्क्वेयर किलोमीटर का एरिया, एक प्रोफेशनल आर्मी से, एटॉमिक नेशन लड़कर जीत लेंगे..
ऐसा स्वप्न मत देखा करो भईया।
और यहाँ सवाल हमारी सेना की सक्षमता का नही, टेरेन का है। हम नीचे है, वे ऊपर। वहां पहाड़ बैठे 10 लोग, एक छोटी तोप, एक पूरी बटालियन को निपटा सकते हैं।
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तो युद्ध से POK नही आएगा। कांग्रेसी या भाजपाई चाहे जितना गाल बजा लें, और संसद में प्रस्ताव प्रस्ताव खेलते रहें।
वहां युद्ध लड़ के आप पाकिस्तानी कश्मीर ले नही सकते। जनता को इन बातों में आकर मूर्ख बनने से बचना चाहिए।
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लड़ाई जीतने की सूरत तब बने जब आप नीचे से कराची, सिंध, पंजाब जीत लें। और फिर नेगोसिएशन में कश्मीर मांग लें।
तब आप बहुत बड़े मूर्ख होंगे।
जो जीता हुआ कराची, पंजाब छोड़, सूखी पहाड़ियां ले रहे हों। सरदार पटेल ने भी यही कहा था। वे हैदराबाद के बदले कश्मीर खुशी खुशी छोड़ने को राजी थे।
लियाकत को पत्र लिख रहे थे।
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एक और सूरत है।
सुंदर स्वप्न है।
कि भारत पाक, रेडक्लिफ लाइन मिटाकर वापस वैसे ही एक हो जाएं, जैसे बर्लिन की दीवार गिराकर जर्मन एक हो गए।
लेकिन उसके लिए, सीमा के दोनों ओर- जनता में एक होने को तड़प चाहिए।
हेल्मुट कोल जैसा लीडर चाहिए। जो इंश्योर करे कि नए देश मे दोनों तरफ की जनता, राजनेता, फौज, धर्म, जाति, हर तबके को बराबरी मिलेगी।
सम्मान मिलेगा, अवसर मिलेगा।
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वह तो हम अपने ही देश के लोगो को नही दे पा रहे। यहां राज्य सरकारों में मुल्ले टाइट करने की प्रतियोगिता चल रही है। तो पाकिस्तान के मुल्ले काहे इसमे मिलेंगे।
और यदि पाकिस्तान, भारत का हिस्सा नही होगा, तो उसका POK भी कभी आपका नही होगा। यह बात गांठ बांध लीजिये।
और इन लेगिंग्स छाप फ़ुस्सी बमो और लेजर लाइटों के बयानों को सीरियस न लीजिये। और कृपा करके अपने काम धंधे पर ध्यान दीजिए।
मेरे युवा और Gen Z साथियों,
एक बात मेरे मन में साफ़ है और आप भी इसे दिल में बैठा लीजिए: भारत के हर युवा का भविष्य सुरक्षित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है।
पर ज़िम्मेदारी और ईमानदारी - दोनों मोदी सरकार की सोच से परे हैं।
पेपर लीक, परीक्षा कुप्रबंधन, रद्द होती भर्तियाँ, आसमान छूती फीस, निजीकरण, घोटाले - इन्हीं औज़ारों से वो हर दिन करोड़ों सपने तोड़ रही है।
याद रखिए, युवा का भविष्य ही देश का भविष्य तय करेगा। यही सब आपसे विस्तार से कहना है। इसलिए मैं आपको बुला रहा हूँ - देश की हर गली, हर कस्बे, हर शहर से उठती ‘छात्रों की गूंज’ को, आइए कोटा में हुंकार बनाएँ।
🗓️ 17 जून | छात्रों की गूंज | कोटा महारैली
#ChhatronKiGoonj
अमेरिकी हमलों में तीन भारतीय नाविकों की हत्या के चंद दिन बाद - न अफ़सोस, न माफ़ी। उल्टा, अमेरिका ने आदेश देना जारी रखा है।
उनके शब्द पढ़िए: “अमेरिकी सेना के आदेश तुरंत मानें।” कोई उल्लंघन “बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
एक आज़ाद देश इस तरह की भाषा कभी नहीं सहेगा। लेकिन हमारे Compromised PM? चुप। एक आज्ञाकारी नौकर की तरह सुनते हैं, और आदेश मान लेते हैं।
Compromised PM देश के सम्मान की रक्षा नहीं करेगा - क्योंकि जो देश का अपमान करते हैं, वो उन्हीं के वश में हैं।
Compromised PM के राज में एक भारतीय होने का मतलब दुर्गति है।
विदेशी ताकत हमारे नागरिकों को मारती है। हमारी सरकार एक आज्ञाकारी नौकर की तरह चुप-चाप आदेश मान लेती है - और हमारे नागरिक सड़ने के लिए छोड़ दिए जाते हैं।
इस भारतीय को घर लाइए। अभी।
Why is Adani's News agency @ians_india sending its reporters to get a video byte from Shia Cleric when there were reports of stone pelting on a train in which RSS chief Mohan Bhagwat was traveling? What are they trying to achieve by doing so?
Police gave a statement that they arrested 3 minors ( rag pickers) for stone pelting. Police haven't mentioned the names of the accused because they are Minors. According to sources in the Police, The minors are not Muslims.
(This is important to mention because many are implying that it was a planned conspiracy)
असम में वायुसेना की विमान दुर्घटना में हमारे पाँच वीर जवानों के शहीद होने का समाचार अत्यंत दुःखद है।
इस दुख की घड़ी में मेरी गहरी संवेदनाएं शहीदों के शोकाकुल परिजनों के साथ हैं। देश इन बहादुर जवानों का सर्वोच्च बलिदान हमेशा याद रखेगा।
अमेरिका हमारे तीन इंडियन को होर्मुज में हमले में मार देता है! तीन दिन में तीन हमला! अभी भी कुछ लोग गायब हैं! इन लोगों की अपील के बाबजूद अमेरिका हमला करता है! हमले के बाद अमेरिका गलती तो नहीं हो मानता है बल्कि इसे सही ठहराते हुए उसका वीडियो जारी करता है।
लेकिन इस घटना के बाद भारत की चुप्पी बहुत ही शमर्नाक है! औपचारिक टाइप रोष जताकर मामला समाप्त कर दिया है! खुद को राष्ट्रवादी बताने वाली सरकार मामले पर आक्रोश दिखाने की जगह इसे हलके में ले रही है! ईरान तक ने भारत के पक्ष में बयान दिया!
लेकिन एक न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर तो लम्बा चौड़ा पोस्ट लिखकर इस एक्ट को जस्टिफाय तक कर दे रहे हैं!
कहाँ गया गुस्सा ? क्या सारा गुस्सा अब अपने ही लोगों को नीचे दिखाने के लिए रखने लगे हैं?
याद कीजिये जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तो किस तरह हमारे एक अधिकारी के साथ अमेरिका ने गलत किया था हमने उनके दूतावास से साडी सुरक्षा वापस ले ली थी!
भारत को इस मामले में बहुत कड़ा स्टैंड लेना चाहिए था! और आप टीवी मीडिया से तो अब कोई उम्मीद नहीं कर सकते हैं की वे आमजन के लिए खड़ा हो! या आप इसे ही बड़ी बात कह सकते हैं की दूरदर्शन या कोई दूसरे कुछ लोगों मरे भारतीय को पाकिस्तान से मिला हुआ नहीं बताया! इसके लिए आप इन्हें धन्यवाद दे सकते हैं। हमारी मीडिया अभी अपनी जनता नहीं ईरान के लोगों के रोटी को गिनने में लगी है। इसीलिए उनसे कोई उम्मीद न रखें!