छत्रपती शिवाजी महाराज यांच्या जयंतीनिमित्त, दूरदर्शी नेते, कुशल प्रशासक, विलक्षण रणनीतीकार आणि स्वराज्याचे पुरस्कर्ते अशा महान व्यक्तिमत्त्वाला आम्ही साष्टांग नमन करतो.
त्यांचे शौर्य आपल्याला प्रेरणा देईल, त्यांचे सुशासन आपल्यासाठी मार्गदर्शक ठरेल आणि न्याय व स्वाभिमानाची त्यांची भावना आपल्या समाजाला अधिक सक्षम करेल.
Today my neighbour talked about her son, 25–26.... preparing for govt exams. For years, his life has been limited to the library and home.
Over time...he stopped meeting people and stayed stuck in one more attempt, one more year...sunk cost makes stepping back feel impossible
And this isn’t just his story. It’s the story of many students who keep trying sincerely while life quietly stays on hold.
Life shouldn’t be put on hold for an exam.
At what point does it become too much?
माननीय कोलेजियम के जज साहब का मानना है कि भेदभाव के ख़िलाफ़ क़ानून बनाया गया तो उसका दुरुपयोग हो सकता है, इसलिए ऐसा क़ानून नहीं होना चाहिए। अब कह रहे हैं कि अगर न्यूनतम मज़दूरी तय कर दी गई, तो लोग काम पर रखना बंद कर देंगे—इसलिए शोषण चलता रहना चाहिए।
क़ानून के दुरुपयोग की आशंका कभी भी क़ानून न बनाने का आधार नहीं हो सकती। अगर ऐसा होता, तो श्रम क़ानून, महिला सुरक्षा क़ानून या मानवाधिकार क़ानून कभी बने ही नहीं होते।
यह सोच न्याय की नहीं, बल्कि मौजूदा असमानता और जातीय प्रिवलेज को बचाए रखने की सोच है। इनकी तथाकथित “मेरिट” और न्याय की समझ आधुनिक संवैधानिक मूल्यों और वैश्विक न्याय की समझ से मेल नहीं खाती, जहाँ न्याय का मतलब कमज़ोर को सुरक्षा देना होता है, न कि ताक़तवर की सुविधा बनाए रखना।