क्या -40 नंबर से कोई डॉक्टर बन सकता है ?
क्या बिना सारे सेमेस्टर एग्जाम पास किए , सारे प्रैक्टिकल वाइवा पास किए, किसी को डिग्री मिल सकती है ? क्या इसके बिना किसी डॉक्टर को लाइसेंस मिल सकता है ? सेमेस्टर एग्जाम में कोई आरक्षण नहीं होता है सबके साथ एक ही तरह से सबको पास करना होता है। डिग्री सबको एक प्रोसेस से ही मिलती है।
प्रवेश परीक्षा सिर्फ प्रवेश यानी एडमिशन के लिए है, एससी/एसटी केटेगरी के मार्क्स को बोल रहे हो, लेकिन EWS के मार्क्स से कोई समस्या नहीं ? और मैनेजमेंट कोटे से जो लाखो करोड़ो की सीट खरीद लेते है उनके मार्क्स नहीं पूछते और ना ही आपको पता होंगे।
क्यूँकि हमारे देश में पर्याप्त सीट नहीं है, और दूसरी तरह की नौकरियों में इस तरह के पैसे और अवसर नहीं है इसलिए इस प्रवेश परीक्षा में इतनी मारामारी होती है। बहुत से देशों में तो इसकी प्रवेश परीक्षा भी नहीं होती जिसको रुचि होती है वो सीधा प्रवेश लेता है। इसलिए बहुत से छात्र दूसरे बहुत से देशों में पढ़ने जाते है।
ये इतनी सी बात अगर किसी को समझ नहीं आ रही है तो या तो आप किसी गधे के अवैध शुक्राणु से पैदा मूर्ख है या बहुत घटिया दर्जे के धूर्त। 🙂
देशभर के आंदोलनकारियों के सूचनार्थ!
भाजपा और उनके संगी-साथियों के दुर्व्यवहार, दुर्वचनों और हिंसा को सब देख लें। इनका दुस्साहस देखिए कि अभी युवाओं को वचन दिए हुए चंद घंटे भी नहीं हुए हैं और ये भाजपाई अपने इतिहास को दोहराते हुए फिर से धोखा दे रहे हैं। भाजपा के ये संस्कारी नेताजी अपने शीर्ष नेतृत्व के दिये गये आश्वासन की सरेआम धज्जियाँ उड़ा रहे हैं और वीडियो भी बना रहे हैं। अब क्या ये भी डबल इंजन की टकराहट के कारण हो रहा है।
तुरंत गिरफ़्तारी हो!
भाजपाई तो अपने वचन के भी सगे नहीं हैं।
भरोसे का विलोम भाजपा!
“मेरा ज़्यादा नंबर था, मगर मुझसे कम नंबर वाले बच्चे का सेलेक्शन हो गया। ये मेरिट की हत्या है।”
आपने भी यह तर्क बार-बार सुना होगा।
पहली नज़र में यह शिकायत न्यायसंगत लग सकती है, लेकिन ज़रा ठहरकर पूरी चयन-प्रक्रिया की संरचना को समझिए। मान लीजिए 100 पदों की वैकेंसी है। उनमें 40 पद सबके लिए खुले हैं। 10 पद आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए हैं। यानी सामान्य वर्ग का अभ्यर्थी कुल 50 पदों पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है। फिर भी यदि वह इन 50% सीटों में जगह नहीं बना पाता और अपनी असफलता का कारण आरक्षण को बताता है, तो यह तर्क कहाँ तक तार्किक है?
सच्चाई यह है कि ओपन कैटेगरी में प्रतिस्पर्धा सबके लिए होती है — अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग, सभी के लिए। अनेक बार आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार भी ओपन मेरिट में चयनित होते हैं। ऐसे में जो अभ्यर्थी चयनित नहीं हो पाया, वह प्रायः अपने ही सामाजिक-शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिस्पर्धियों से पीछे रह जाता है, लेकिन दोष आरक्षण को देता है।
यह भी समझना होगा कि “मेरिट” कोई निर्वात में पैदा होने वाली चीज़ नहीं है। वह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संसाधनों की उपज होती है। सदियों तक ज्ञान, शिक्षा और सत्ता संस्थानों पर जिन वर्गों का वर्चस्व रहा, उन्हें पुस्तकालय, ज़मीन, सामाजिक सम्मान, शिक्षित परिवेश और नेटवर्क — सब कुछ सहज रूप में उपलब्ध था। दूसरी ओर जिन समुदायों को सामाजिक अपमान, शैक्षणिक वंचना और सांस्कृतिक बहिष्कार झेलना पड़ा, उनके लिए प्रतिस्पर्धा की शुरुआती रेखा ही अलग थी। ऐसे असमान प्रारंभ बिंदुओं को नज़रअंदाज़ करके केवल अंतिम अंकतालिका को “शुद्ध मेरिट” घोषित कर देना वस्तुतः इतिहास को मिटा देना है।
कैम्पसों में अव्वल रहने की जो लालसा “सर्वोच्च मेरिट” की अपेक्षा करती है, उसमें नाकाम रहने वाले अक्सर अपनी हार को स्वीकार करने के बजाय आरक्षण को दोषी ठहराते हैं। जबकि वस्तुतः वे ओपन कैटेगरी की प्रतिस्पर्धा में पराजित हो चुके होते हैं। आरक्षण उनकी सीट नहीं लेता; वह उन लोगों को अवसर देता है जिन्हें सदियों तक अवसर से दूर रखा गया। दरअसल इस देश में “मेरिट” और “आरक्षण” को किसी वैकल्पिक बहस की तरह नहीं, बल्कि अनिवार्य पाठ की तरह पढ़ाया जाना चाहिए। हर कैंपस में, हर सार्वजनिक मंच पर यह समझ विकसित होनी चाहिए कि समान अवसर का अर्थ क्या है और ऐतिहासिक अन्याय का प्रतिकार कैसे किया जाता है। जब तक यह बौद्धिक स्पष्टता नहीं आएगी, तब तक वर्चस्वशाली समूह अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए आरक्षण को ही कठघरे में खड़ा करते रहेंगे — और दुनिया की एक ज़रूरी सामाजिक न्याय व्यवस्था का अपमान करते रहेंगे।
Via Shri @DrLaxman_Yadav
#reservation #ISupportReservation @nethrapal
EWS और UPSC स्कैम।
UPSC 2025 में 104 कैंडिडेट EWS कोटा से चुने गए!
उनमे से 67 ऐसे कोचिंग से पढ़े जिसकी फीस लाखों में थी।
14 कैंडिडेट IIT से ग्रेजुएट थे।
28 के माता-पिता का बिजनेस है।
10 MNCs में नौकरी करते थे।
ग़ज़ब खेल चल रहा है।
बड़ी ख़बर 🔥
Alt News की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आए हैरान करने वाले आंकड़े।
बंगाल में चुनाव नहीं हुए, चुनाव के नतीजे चुनाव आयोग ने पहले ही तय कर दिए थे।
न्यू टाउन की सीट, जिसका रिजल्ट सबसे बाद में घोषित किया गया, वहां खुली बेईमानी से बीजेपी को जिता दिया गया।
88% मुस्लिम मतदाताओं वाले बंगाल के न्यू टाउन में एक बूथ पर बीजेपी को 97% वोट मिले, जबकि CPI (M) को 1 और TMC को 5 वोट मिले।
मुसलमानपारा के स्थानीय लोग इसे एक असंभव परिणाम बता रहे हैं; उनका सवाल है कि उनके वोट कहां गए?
जहाँ बीजेपी प्रचार के लिए नहीं जाती, वहाँ 95% वोट बीजेपी को कैसे मिले?
चुनाव आयोग और बीजेपी ने चुनाव और लोकतंत्र, दोनों का मज़ाक बना दिया है।
#WestBengal #ElectionIntegrity #Democracy #Elections
हम मिनाज के स्कूल पर चुप्पी साध के बैठे थे और आज हमारे 3 नाविकों का मर्डर कर दिया गया.
सॉरी तक नहीं बोला गया, जैसे बाप का राज है.
भारत के लोग न गली के कुत्ते हैं, न नाली के कीड़े कि मर गए तो मर गए. भाड़ में जाए G7 का फोटोऑप. आज हमारे 3 घरों में मातम है!
- जीडी बक्शी
पहले सिर्फ हिंदू खतरे में था, अब हिंदू की गाड़ी भी खतरे में है.
पहले मिलावटी पेट्रोल बेचने वालों को सरकार जेल भेजा करती थी, आज सरकार ख़ुद मिलावटी पेट्रोल बेच रही है…
…सरकार मिलावटी पेट्रोल क्यों बेच रही है, इससे पाकिस्तान कैसे तबाह होगा, ये जानने के लिए देखिए धुरंधर-पार्ट 3.
NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष .@VinodJakharIN कह रहे हैं कि हाल ही में हुआ UPSC का पेपर एक अनंतन नाम की कोचिंग के कंटेंट में से आया है।
विनोद कह रहे हैं कि 82 सवाल तो हुबहू उसी कोचिंग के मेटेरियल में से पड़े हैं। जब उम्मीदवारों की इस पर नजर पड़ी तो कोचिंग ने तुरंत अपना मैटेरियल बदल डाला।
तो क्या अब UPSC का पेपर भी लीक किया जा रहा है?
दूध का कारोबार करने वाले भाई ने नितिन गड़करी से प्रभावित होकर M 20 दूध लाने का सोचा है - 20% मिनरल वाटर युक्त दूध 😂😂
यदि आप M-20 और M-80 को उसी रूप में रखना चाहते हैं, तो परिष्कृत पाठ इस प्रकार होगा:
आगे चलकर M-20 दूध को एक साल के भीतर हम M-80 दूध भी देने लगेंगे, यानि 80 प्रतिशत मिनरल वाटर युक्त दूध, इसके कई चमत्कारिक फायदे हैं और ये जेब पर भी काफी हल्का होगा, लगभग 20 रुपये लीटर 😆
योगी सरकार में "आरक्षण की लूट" जारी है🔥
UPSSSC ने अभी थोड़ी देर पहले "सहायक लेखाकार" का विज्ञापन जारी किया है।
जिसका पदवार विवरण निम्न है👇
कुल पद - 609
UR - 536
OBC-09
SC - 04
ST - 00
EWS - 60
संवैधानिक आरक्षण के नियमों के तहत OBC को 27 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से 164 पद मिलना चाहिए था लेकिन मिला केवल 09 पद,
यानी OBC वर्ग के 155 पदों को लूट लिया गई।
वही SC वर्ग को 21 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से मिलना चाहिए था 127 पद लेकिन मिला केवल 04 पद,यानी SC वर्ग के 123 पदों को लूट लिया गया।
जबकि ST वर्ग को 2 प्रतिशत के हिसाब से मिलना था 12 पद लेकिन मिला 00 पद, यानी ST वर्ग के 12 पदों को लूट लिया गया।
सवाल यही है कि OBC,SC,ST वर्ग के छात्रों के संवैधानिक अधिकारों को कब तक लूटा जाएगा??
दरवाज़े के बाहर लिखा है — “परामर्श शुल्क ₹1000”।
एक बार डॉक्टर को दिखाने के लिए, सिर्फ 7 दिनों तक मान्य।
एक गरीब मज़दूर के लिए यह सिर्फ़ फीस नहीं, बल्कि पूरे हफ्ते की रोटी का हिसाब है।
जिस देश में किसान दिनभर धूप में जलकर 300-400 रुपये कमाता हो,
जहाँ मज़दूर की कमर ईंट ढोते-ढोते टूट जाती हो,
वहाँ एक बीमार इंसान से 5 मिनट की बातचीत के ₹1000 लेना…
क्या सच में “सेवा” कहलाता है?
मेडिकल काउंसलिंग ऑफ इंडिया और सरकार से निवेदन है परामर्श शुल्क के लिए एक गाइडलाइन बनाई जाए और तय किया जाए और फीस को निश्चित किया जाए। ताकि आम व्यक्ति इलाज कराने से कतराए नहीं और इलाज और डॉ पर भरोसा बनाए रखे।
डॉक्टर को भगवान कहा जाता है।
लेकिन आज मेडिकल सिस्टम के कई हिस्सों में “सेवा” की जगह “व्यापार” बैठ चुका है,
OPD फीस आसमान पर,
टेस्ट कमीशन पर,
और ऊपर से महंगी “मोनोपोली” दवाइयाँ —
जिन्हें गरीब खरीदते समय अपनी जेब नहीं, अपनी उम्मीदें खाली करता है। एक मरीज से ₹1000 , दिन भर में 250 से 300 मरीज आप हिसाब लगा सकते हैं।
औसत मरीज 200× ₹1000 = ₹2,00,000 पर डे का है।
गरीब आदमी अस्पताल इलाज कराने नहीं, डरते हुए जाता है।
उसे बीमारी से कम, बिल से ज्यादा डर लगता है।
वो सोचता है —
“अगर डॉक्टर को दिखाया, तो बच्चों की फीस कैसे भरूंगा?”
“दवा खरीदी, तो घर का राशन कैसे आएगा?”
सब डॉक्टर ऐसे नहीं होते।
आज भी कई ईमानदार डॉक्टर हैं जो रात-रात भर मरीज बचाते हैं, कम फीस लेते हैं, इंसानियत निभाते हैं। कई डॉ तो गरीबों की फीस माफ कर देते हैं और सेम्पल की को दवाएं उनके पास होती है वो भी फ्री दे देते है, ऐसे ही लोगो की वजह से लोगों का भरोसा बना हुआ है।
लेकिन जो लोग बीमारी को बिजनेस बना चुके हैं,
जो हर मरीज में सिर्फ़ “कमाई” देखते हैं —
उन्होंने पूरे पेशे की छवि को चोट पहुंचाई है।
जो डॉ गलत कर रहे हैं सिर्फ उनकी बात की जा रही है
स्वास्थ्य कोई लग्ज़री नहीं है।
इलाज अमीरों का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए।
अगर एक गरीब इंसान इलाज के डर से अस्पताल जाने से कतराने लगे,
तो समझिए समाज कहीं न कहीं संवेदनहीन हो चुका है।
ज़रूरत है ऐसे सिस्टम की —
जहाँ डॉक्टर सम्मान से कमाएँ,
लेकिन गरीब इलाज के लिए बिकने पर मजबूर न हो।
जहाँ दवा इंसान बचाने के लिए हो,
न कि कंपनियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए।
क्योंकि जब इलाज बाज़ार बन जाता है,
तब सबसे पहले गरीब की साँसें हारती हैं।
BJP के वरिष्ठ नेता का बेटा घर के बाहर खड़ी लड़की का रेट लगा रहा था.
यूपी के मुजफ्फरनगर में मां-बेटी अपने घर के बाहर खड़ी थीं.
तभी वहां BJP नेता का बेटा आर्यमान अपने दोस्त शौर्य के साथ पहुंचा. आर्यमान ने मां के साथ खड़ी लड़की से पूछा- क्या रेट है.
फिर ये वीडियो बना 👇
जेल के फाटक टूट गये, Ex-मंत्री के बेटा छूट गये!
यूपी- मुजफ्फरनगर में लड़की और उसकी मां से "रेट" पूछकर छेड़छाड़ करने वाला BJP नेता और पूर्वमंत्री का बेटा आर्यमान और उसका साथी कानून की गिरफ्त से छूट गया है.
पुलिस ने "कमजोर" धाराओं में केस दर्ज किया. कुछ घंटों बाद शांतिभंग की धारा में आरोपियों को सिटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया जहां से उन्हें तुरंत जमानत दे दी गयी.
आमतौर पर ऐसे मामलों में पुलिस सख्ती दिखाती है मगर यहां मामला BJP नेता और पूर्वमंत्री सुधीर बालियान के बेटे से जुड़ा हुआ है. बालियान साहब BJP की कल्याण सिंह सरकार में मंत्री रहे है.
ये है यूपी में असल "मिशन शक्ति-5.0" है
पीड़िता की पीड़ा सुनिये-
ज़रा एक बार सोचिए, शंभू जी अगर YouTube पर और सोशल मीडिया पर रिपोर्टिंग शुरू नहीं करते तो क्या इन्हें कभी भी मनु मीडिया में जगह मिलती? क्योंकि शंभू जी वो खबरें दिखाते हैं उन खबरों को मनु मीडिया द्वारा दिखाया नहीं बल्कि जानबूझकर दबाया जाता है। शंभू जी ने अपना चैनल YouTube पर तब शुरू किया, जब YouTube पर कोई जर्नलिज़्म नहीं करता था। इनके Facebook पेज को सरकार ने जब बंद किया तो यह सिर्फ एक Facebook पेज नहीं था, यह वह बच्चा था जिसे बड़ा करने में शंभू जी ने अपना सब कुछ लगा दिया है। अगर आज आप लोग @NationalDastak के लिए आवाज़ नहीं उठाएंगे तो बहुजनों की आवाज़ उठाने वाला हर चैनल भविष्य में बंद कर दिया जाएगा, कुछ नहीं बचेगा।
फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण के पति और अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर की प्रेस कॉन्फ्रेंस की बहुत चर्चा है. यहां आपको उनका पूरा प्रेजेंटेशन देखने को मिला जाएगा👇
परकला प्रभाकर के मुताबिक- 2024 के आंध्र प्रदेश चुनावों में आधी रात के बाद लगभग 17 लाख वोट डाले गए.
लगभग 4.16 प्रतिशत वोट रात 11:45 बजे से सुबह 2 बजे के बीच डाले गए.
EVM 14 सेकेंड में रिसेट होती है, लेकिन वोट 6 सेकंड में पड़ रहे थे.
परकला प्रभाकर ने बहुत ही गंभीर आरोप लगाए हैं. इन आरोपों की पूरी जिम्मेदारी निर्मला सीतारमण के पति परकला प्रभाकर की है. कोई मुकदमा उन पर किया जाए.
बाकी मैं मानता हूं कि EVM में गड़बड़ी नहीं हो सकती, और चुनाव आयोग पूरी तरह से निष्पक्ष है.
अघोषित आपातकाल के प्रमुख समाचार👇
यूट्यूब चैनल 4pm का यूट्यूब बंद कर दिया गया
4pm का फेसबुक बंद किया और उनकी एंकर का भी पेज बंद कर दिया गया।
नेशनल दस्तक चैनल का फेसबुक पेज बंद कर दिया गया।
Molitics चैनल का फेसबुक बंद कर दिया गया।
गडकरी परिवार के बीफ व्यापार पर कारवां की रिपोर्ट के हवाले से वीडियो बनाने वाले मुकेश मोहन पर 50 करोड़ का केस कर दिया गया।
हर दिन बड़ी संख्या में सरकार की आलोचना करने वाले अकाउंट बंद किए जा रहे हैं।
पूरा मीडिया खरीद लिया। आम लोग बिक नहीं रहे हैं। सरकार अब उन्हें डराकर सबका मुंह बंद करना चाहती है।
यू ट्यूब पर इस गाने को 100M से ज्यादा लोगों ने सुना था, उसके बाद सरकार ने इस गाने पर बैन लगा दिया और यू ट्यूब से डिलीट करवा दिया। अब पुनः इस गाने को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास है।
पीएम केयर्स फंड में जैसी गोपनीयता है, वैसी ही गोपनीयता इलेक्टोरल बॉन्ड में थी। द क्विंट की एक जांच में पता चला कि एक जापानी कंपनी ने महाराष्ट्र में दोबारा उत्पादन शुरू करने की अनुमति मिलने के बाद पीएम केयर्स फंड में पैसे दिए। इलेक्टोरल बॉन्ड की तरह पीएम केयर्स में भी 'चंदा दो, धंधा लो' वाला काम तो नहीं हो रहा है?
- अंजलि भारद्वाज, आरटीआई कार्यकर्ता