#SupremeGodKabir
परमात्मा कबीर साहेब पाप विनाशक हैं
यजुर्वेद अध्याय 8 मन्त्र 13 में कहा गया है कि परमात्मा पाप नष्ट कर सकता है। संत रामपाल जी महाराज जी से उपदेश लेने व मर्यादा में रहने वाले भक्त के पाप नष्ट हो जाते हैं।
#SupremeGodKabir
पूर्ण परमात्मा कविर्देव चारों युगों में आए हैं। सृष्टी व वेदों की रचना से पूर्व भी अनामी लोक में मानव सदृश कविर्देव नाम से विद्यमान थे। कबीर परमात्मा ने फिर सतलोक की रचना की, बाद में परब्रह्म, ब्रह्म के लोकों व वेदों की रचना की इसलिए वेदों में कविर्देव का विवरण
#SupremeGodKabir
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17 में कहा गया है कि कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं,
#SupremeGodKabir
आदरणीय गरीबदास जी को पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) स्वयं सत्यभक्ति प्रदान करके सत्यलोक लेकर गए थे, तब अपनी अमृतवाणी में आदरणीय गरीबदास जी महाराज ने आँखों देखकर कहाः-
गरीब, अजब नगर में ले गए, हमकुँ सतगुरु आन। झिलके बिम्ब अगाध गति, सुते चादर तान।।
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आदरणीय गरीबदास जी को पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) स्वयं सत्यभक्ति प्रदान करके सत्यलोक लेकर गए थे, तब अपनी अमृतवाणी में आदरणीय गरीबदास जी महाराज ने आँखों देखकर कहाः-
गरीब, अजब नगर में ले गए, हमकुँ सतगुरु आन। झिलके बिम्ब अगाध गति, सुते चादर तान।।
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ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17 में कहा गया है कि कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं,
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पूर्ण परमात्मा कविर्देव चारों युगों में आए हैं। सृष्टी व वेदों की रचना से पूर्व भी अनामी लोक में मानव सदृश कविर्देव नाम से विद्यमान थे। कबीर परमात्मा ने फिर सतलोक की रचना की, बाद में परब्रह्म, ब्रह्म के लोकों व वेदों की रचना की इसलिए वेदों में कविर्देव का विवरण
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परमात्मा कबीर साहेब पाप विनाशक हैं
यजुर्वेद अध्याय 8 मन्त्र 13 में कहा गया है कि परमात्मा पाप नष्ट कर सकता है। संत रामपाल जी महाराज जी से उपदेश लेने व मर्यादा में रहने वाले भक्त के पाप नष्ट हो जाते हैं।
#अमरलोक_VS_मृत्युलोक
सतलोक Vs पृथ्वी लोक
सतलोक में जाने के बाद जीवात्मा का जन्म-मरण हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
लेकिन सतभक्ति के अभाव में पृथ्वी के प्राणी 84 लाख योनियों के चक्कर में भटकते रहते हैं।
#अमरलोक_VS_मृत्युलोक
पृथ्वी लोक में अपना किया ही जीव भोगता है।
सतलोक में कोई अभाव नहीं है। सब परमात्मा के कोटे से मिलता है और इसी वजह से वहाँ राग-द्वेष नहीं है। सब मिलकर प्रेम से रहते हैं और परमात्मा का गुणगान करते हैं।
#अमरलोक_VS_मृत्युलोक
पृथ्वी लोक में अपना किया ही जीव भोगता है।
सतलोक में कोई अभाव नहीं है। सब परमात्मा के कोटे से मिलता है और इसी वजह से वहाँ राग-द्वेष नहीं है। सब मिलकर प्रेम से रहते हैं और परमात्मा का गुणगान करते हैं।
#अमरलोक_VS_मृत्युलोक
सतलोक Vs पृथ्वी लोक
सतलोक में जाने के बाद जीवात्मा का जन्म-मरण हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
लेकिन सतभक्ति के अभाव में पृथ्वी के प्राणी 84 लाख योनियों के चक्कर में भटकते रहते हैं।
#सतलोक_VS_पृथ्वीलोक
सतलोक Vs पृथ्वी लोक
सतलोक में जाने के बाद जीवात्मा का जन्म-मरण हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
लेकिन सतभक्ति के अभाव में पृथ्वी के प्राणी 84 लाख योनियों के चक्कर में भटकते रहते हैं।
#सतलोक_vs_पृथ्वीलोक
पृथ्वी लोक में अपना किया ही जीव भोगता है।
सतलोक में कोई अभाव नहीं है। सब परमात्मा के कोटे से मिलता है और इसी वजह से वहाँ राग-द्वेष नहीं है। सब मिलकर प्रेम से रहते हैं और परमात्मा का गुणगान करते हैं।
#सतलोक_vs_पृथ्वीलोक
सतलोक कैसा है ?
सतलोक ऐसा अमर लोक है जहां प्रत्येक हंस आत्मा के शरीर का तेज 16 सूर्यों के समान है। जहां सिर्फ पूर्ण गुरु द्वारा बताई गई सतभक्ति से ही जा सकते हैं।
#सतलोक_VS_पृथ्वीलोक
पृथ्वी लोक में सुविधाजनक वस्तुएं होने के बावजूद यहां कोई भी सुखी नहीं है।
यहां हर पल मौत का तांडव होता है।
यहां हर व्यक्ति के मन में रोग तथा मृत्यु का भय हर पल रहता है।
सतलोक में ना रोग का, ना मौत का भय। वहां किसी वस्तु का अभाव नहीं है।
#सतलोक_VS_पृथ्वीलोक
सतलोक अविनाशी लोक है। जहाँ ऊंच-नीच की अवधारणा नहीं है। इस कारण द्वेष उत्पन्न नहीं होता।
जबकि पृथ्वी लोक पर ऊंच-नीच, छोटे-बड़े की आग में सारा संसार जल रहा है।
#सतलोक_vs_पृथ्वीलोक
पृथ्वी पर सब कर्म बंधन से बंधे हैं। जीव को तीनों गुणों के प्रभाव से विवश कर सब कार्य करवाया जाता है।
जबकि सतलोक में किसी गुण का कोई दवाब नहीं है। जीव पूर्णतया स्वतंत्र है।
#सतलोक_vs_पृथ्वीलोक
पृथ्वी पर सब कर्म बंधन से बंधे हैं। जीव को तीनों गुणों के प्रभाव से विवश कर सब कार्य करवाया जाता है।
जबकि सतलोक में किसी गुण का कोई दवाब नहीं है। जीव पूर्णतया स्वतंत्र है।
#सतलोक_VS_पृथ्वीलोक
सतलोक अविनाशी लोक है। जहाँ ऊंच-नीच की अवधारणा नहीं है। इस कारण द्वेष उत्पन्न नहीं होता।
जबकि पृथ्वी लोक पर ऊंच-नीच, छोटे-बड़े की आग में सारा संसार जल रहा है।