हाल ही बिहार के DGP विनय कुमार ने अपना वीडियो जारी कर सार्वजनिक बयान दिया था "...वर्दी में तिलक ना लगाए, कलावा या माला ना पहने..यह #पुलिस_संहिता का उल्लंघन है। "
तब एक IPS मित्र से विमर्श भी हुआ तो उन्होंने भी DGP का पक्ष लिया।
बंगाल की एक मुस्लिम महिला IPS का तबादला किया गया। इस पर मुस्लिम समाज हंगामा कर रहा है। दलील है, "...वीडियो में #अल्लाह की शान में नारे लगाए तो तबादला कर दिया?
जबकि सच्चाई क्या है?
खड़गपुर की एडिशनल एसपी डॉ. बुशरा बानो (2021 बैच, बंगाल कैडर, कन्नौज निवासी) को 14 सितंबर को राज्य सशस्त्र पुलिस 4वीं बटालियन में डिप्टी कमांडेंट बना दिया गया।
गुजरे 13 सितंबर के वीडियो में उन्होंने UPSC अस्पिरेंट्स को AMU कोचिंग के बारे में बताया। वीडियो #अस्सलामुअलैकुम से शुरू, #इंशाअल्लाह और #जज़ाकल्लाह के साथ खत्म हुआ। #जयहिंद या #वंदे_मातरम नहीं बोला गया। इस पर "हिंदू लीगल फंड" ने गृह सचिव को शिकायत दी।
सवाल मेरा बिहार के मौजूदा DGP से? इस पर क्या कहती है आपकी #पुलिस_संहिता? खुद को शिक्षित मानों! कोई समस्या नहीं, लेकिन जनता को #मूर्ख नहीं। नहीं तो मुझे बहुत दिक्कत है। घात लगाए बैठा रहूंगा।
आधिकारिक नोटिफिकेशन में इसे पब्लिक इंटरेस्ट में मामूली फेरबदल बताया गया। पार्थ घोष नई ASP बनीं।
@SuvenduWB दा! संविधान का अक्षरशः पालन करो। #UCC लागू करो।
@AmitShah@samrat4bjp
जिस #जियोनिज्म को खत्म करना दुनिया भर के मुसलमानों एकमात्र मकसद है? यहूदियों के कब्जे से जिस #अल_अक्सा_मस्जिद को दुबारा हासिल करना हर मुसलमान का एकमात्र ख्वाब है।
आज उन्हीं मुसलमानों की सबसे मकद्दस जमीं #सऊदी_अरब ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए यहूदियों के एकमात्र देश #इसराइल से मदद की गुहार लगाई है। #मक्का_पैक्ट से वजूद पर मंडराते खतरे को राहत नहीं मिली। क्योंकि सुन्नी मुल्क पाकिस्तान और तुर्किए अपने हम मजहब के खिलाफ दगाबाज साबित हुए।
सऊदी ने मदद क्यों मांगी? क्योंकि शिया लड़ाकों की फौज #अंसार_अल्लाह ने #सुन्नी_सऊदी को विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है। वैसे भी संभवतः हदीस में कहा गया है, अल्लाह से मांगे #आधे_दिन का समय सन 2026 में खत्म हो रहा है। अल्लाह का कहा गलत कैसे हो सकता है?
आखिर, #ब्याजखोर_मुसलमान की हिफाजत अल्लाह क्यों करेगा? कुरान में अल्लाह ने आठ जगह कहा है, "...सूदखोरों से मेरी सीधी जंग होगी।" बाकी किसी गुनाह में अल्लाह ने खुद से सीधी जंग की बात नहीं कही।
हालांकि सऊदी ने यह मदद बजरिए #अमेरिकी_सेंट्रल_कमांड मांगी है। सीधे नहीं। वैश्विक हालात बहुत तेजी के साथ बदल रहे हैं।
पर एक बात फिर कह रहा हूं। बार-बार कहता हूं, पूरी दुनिया में जंग #आस्थाओं के बीच है, जो समाज अपनी आस्था पर जितना दृढ़, उसकी जीत उतनी तय।
यदि किसी राज्य में कोई भाषा बोलना कंपल्सरी किया जाता है और तर्क ये है की उस राज्य में काम करते है तो भाषा आनी चाहिए
तो उस राज्य से आने वाले किसी व्यक्ति को देश में मंत्री पद देने से पहले चाहिए उस नेता का टेस्ट ले और देखे की उसको पूरे देश में बोले जानी वाली सभी भाषाओं का ज्ञान है या नहीं
यदि नहीं है तो उसको मंत्री नहीं बनाना चाहिए
एक स्त्री होने के नाते स्वरा भास्कर को आपत्ति इस कृत्य पर होनी चाहिए थी कि एक आक्रांता विधर्मी स्त्रियों को कैसे भोगदासी बनाकर उनके साथ जीवनपर्यंत अत्याचार करते थे।
इस बात का क्या तुक है कि मुग़ल आतताई तो ज़ुल्म ढायेंगे, मानमर्दन करेंगे, तुम कैसे उनके चंगुल से मुक्त हो गईं? क्यों नहीं उनकी दासी बनीं?
इन नारीवादियों का पूरा ज्ञान हिंदुओं के लिए ही है।
इस्लाम बहुत उदार है। अल्लाह के हुक्मनामे #कुरान_मजीद में गुलाम, रण्डी, लौंडिया, जजिया...हरेक की बहुत विस्तृत व्याख्या है। पूरी व्यवस्था है।
@ReallySwara ने कुरान मजीद की इन व्यवस्थाओं में अपने लिए सम्मानजनक एक राह चुनी, लेकिन वो वीरांगनाएं #कायर थीं, जिन्होंने "अल्लाह के हुक्म" को खारिज कर #जौहर का मार्ग चुना।
वरना #जौहर_व्रती_वीरांगनाओं के सामने क्या मजबूरी थी जो इन #मोहतरमा की मांनिद गुलाम, रण्डी या लौंडिया का रास्ता अख्तियार ना किया? आखिर कुरान इतना सम्मानजनक ओहदा तो दे रहा है ना?
ध्यान रहे, अल्लाह के हुक्म #कुरान का एक लफ्ज तो क्या, जेर, जबर, नुक्ता तक बदलने की ताकत #इंसान में नहीं है।
स्वरा भाष्कर #ब्राह्मण हैं ऐसे ब्राह्मणों के लिए हिन्दू व्यवस्था में एक शब्द है, #पतित_ब्राह्मण। पतित शब्द सिर्फ ब्राह्मण के लिए आरक्षित है। अन्य किसी वर्ण को यह #उपाधि नहीं मिलती।
खैर अब स्वरा की सफाई आ रही है, जिसमें उन्होंने कहा, "...अंग्रेजी में मैंने कहा, क्या रेप विक्टिम को जीने का हक नहीं है? कम जानकर समझ नहीं पाए!"
तो अब तीन सवाल..
■ क्या बलात्कार पीड़ित को #कुरान ससम्मान जीने का हक देता है? कृपया कुरान या हदीस के हवाले से बताएं?
■ दूसरे, क्या जानबूझ कर बलात्कार को आमंत्रित करना चाहिए? बलात्कार होने की प्रतीक्षा करो? फिर #मृत्युपरांत मृत देह के साथ #नेक्रोफिलिया होने दो?
■ तीसरा और आखिरी सवाल, निकाह के बाद नाम क्यों नहीं बदला? खुद को मुस्लिम घोषित करने में #शर्म क्यों? #नबी पर यकीन नहीं? यदि अभी भी हिन्दू हो तो कुरान में आपका दर्जा #रखैल का है। और आपका शौहर #वाजिब_उल_कत्ल के काबिल। आप दोनों ने अभी तक कितनी बार #हज किया?
भारत में आटा 35 रूपये किलो, ईरान में आटा 4500 किलो बिक रहा है।
रोटी खाना है तो भारत में रहो।
पेट्रोल पीना है तो ईरान में रहो।
सिर उठा कर जीना है तो भारत में रहो।
जिल्लत की जिंदगी जीना है तो ईरान में रहो।
मर्जी तुम्हारी।
🤣
Sheikh Hasina bought electricity from Adani at 14 taka per unit. Adani is an Indian Hindu, so Tarique Rahman could not accept it.
Now Bangladesh will buy electricity from China at 25 taka per unit. Because of extremist anti-Hindu Tarique Rahman’s ego, Bangladesh is paying the price.
Dumbduck moron Swara Begum.
The Devis who committed Jauhar were NOT r*** survivors. They embraced the sacrificial fire BEFORE they could be violated to ensure that their bodies and souls were never molested in the first place. So they were not survivors - they were VICTORS. They did not commit s**cide but self-preservation of their own dignity and spirit.
They could have chosen any other way to end their lives. Why do you think they chose the horrifyingly, painful path of burning their living bodies to ashes??
It's because it is a documented fact that the invading Islamic hordes did not spare children, elderly and even *dead bodies* from their savage lust. So these Devis ensured that even their dead body did not end up becoming a victim of such barbaric evil.
Do you know what kind of fate awaited those who became the living victims of those invading beasts?
Imagine being subjected to the savagery of gang-r*** by hundreds of violent murderous beasts who were high on opium and possessed by bloodlust. Victim's bodies were literally ripped apart, then brutally slashed by weapons and left to a horrifying, tortured end, writhing in the painful agony of injuries and internal bleeding.
Those who were unlucky enough to survive the assaults were forced to become sex slaves and subjected to horrors worse than death in a slow painful existence. Any sane woman with a shred of dignity or self-integrity would exercise her agency and do anything to prevent such a fate.
Now imagine allowing your infant child or any of your children to be subjected to such horror?? No woman who calls herself mother would ever let her child be subjected to such a terrifying destiny
You have neither the brains, nor the heart or the soul to understand even an iota of what these brave Hindu Rajput women's self-sacrifice meant.
Stick to your vibrator and Halala. Yahi hai teri auqaat.
मुल्ले शवों के साथ भी रेप करते थे। पाकिस्तान में आज भी वही हो रहा है। इसलिए हिन्दू स्त्रियाँ जौहर करती थीं। किसी दो कौड़ी की मुल्ला प्रेमी, करियर में फुँक चुकी लौंडी के लिए यह समझना कठिन हो सकता है क्योंकि उसके लिए उसकी ‘पुसी फॉर अ रेंट’ ही जीवन का सत्य है।
ऐसी लौंडियाँ सेक्स को स्वतंत्रता मानती हैं, जितनों के साथ सेक्स, उतनी अधिक स्वतंत्र। हर स्त्री ऐसा नहीं मानती। उनके लिए अरब के बाजारों में सेक्स स्लेव बनना उतना अडवेंचरस और फुलफुलिंग नहीं दिखा होगा, जितना आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझती, भैया कह कर सैंया बनाने वाली के लिए दिखता हो।
तुम नंगी हो कर एम्सटर्डम के बाजारों के शीशे में नाचों, तुम्हारी मुटल्ली देह भी किसी को पसंद आ जाएगी। हाँ, किसी योनि-केन्द्रित लौंडिया का नारीवाद यह तय नहीं करेगा कि दूसरी स्त्रियाँ रंडी बन कर ही घूमें क्योंकि तुम्हें रंडीपना बहुत पसंद है।
यह पोस्ट मैंने बहुत माइल्ड लिखा है। हिन्दू नारियों पर ऐसे आक्षेप का उत्तर मैं और भी अच्छी शब्दावली के साथ दे सकता हूँ।
जीवित त्वचा के तनिक तिली भी पास लगती है तो अनायास चीख निकल जाती है। वे कौन वीरांगनाएँ थीं, जिन्होंने अपनी शुचिता और प्रतिष्ठा को रौंदे जाने से बचाने के लिए स्वयं को आहूत कर दिया? क्या उन्हें अपने प्राण प्रिय न थे?
“कूद पड़ी थीं यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अँगारों पर!”
वे कायर नहीं थीं। वे इतनी जीवट थीं कि शवों को भी न बख़्शने वाले मलेच्छों के हाथों उनकी राख भी नसीब नहीं हुई थी। उन शील और चरित्र की प्रतिमूर्तियों पर ये विदूषक प्रवचन देंगे जिनका जीवन केवल देह से आरंभ होकर देह पर समाप्त होता है। मुस्लिम आक्रांताओं पर आसक्त इन लफ़्फ़ाज़ अभिनेत्रियों को मालूम होना चाहिए कि जीवन केवल अस्थिमज्जा से संचालित नहीं होता।
भारत एक ज़ख़्मी सभ्यता है। जौहर हरे घाव।
When Hindus say Onam belongs to Hinduism, they reject it, saying it's a festival for all, celebrated as a festival or harvest.
Do we need more proof that it's a Hindu festival?
मैंने अभी पहली बार ये वीडियो देखा।
वीडियो में हिंदी में बोल रहे हैं मतलब टारगेट उत्तर भारतीय जनता है।
गारंटी के साथ उत्तर भारत में किसी भी टी स्टाल पर कोई किसी से जाति नहीं पूछता।
राहुल गांधी यहां ऐसे बच्चे लग रहे हैं जिसे माई बेस्ट फ्रेंड का निबंध याद है और वही लिखे जा रहे भले परीक्षा में निबंध माई होम पर पूँछा गया हो।
बहुत जल्द "डेयरी प्रोडक्ट" सत्ता संघर्ष की राजनीति के केंद्र में होगा।
कोई दस दिन पहले लिखी पोस्ट में आशंका जाहिर की थी, "मिलावट के खिलाफ जारी अभियान लोकहित में है, और वास्तविक उत्पादक को जरूर सशक्त करेगा, लेकिन "शुद्ध उत्पाद" का मूल्य इतना ज्यादा होगा कि मध्य आय वर्ग की चीख निकल जाएगी।
और यह चीख सत्ता संघर्ष में विपक्ष का हथियार बनेगी।
मेरी पोस्ट की तारीख दर्ज कर रख लीजिए। ताकि मुझे खरी-खोटी सुनाने के काम आए।
@narendramodi
राजनीति को केवल विचारधारा के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे तो शायद कभी समझ ही नहीं पाएँगे।
समय रैना और “इंडियाज़ गॉट लैटेंट” का उदाहरण देखिए। कार्यक्रम में हुई अभद्र टिप्पणियों के बाद असम पुलिस ने समय रैना सहित कई लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने सार्वजनिक रूप से इसकी जानकारी देते हुए कार्यक्रम की भाषा तथा सामग्री पर गंभीर आपत्ति जताई।
अब उसी समय रैना को महाराष्ट्र साइबर के जागरूकता कार्यक्रम में बुलाया जाता है, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की उपस्थिति में सम्मानित किया जाता है और पूरे प्रसंग को हँसी-मजाक के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
सामान्य नागरिक इसे कैसे समझे?
एक ही राजनीतिक दल की एक राज्य सरकार जिस व्यक्ति के विरुद्ध मामला दर्ज करती है, दूसरी राज्य सरकार उसी व्यक्ति को सार्वजनिक मंच पर सम्मानित करती है, तो फिर पार्टी का सिद्धांत क्या है, सरकार की नीति क्या है और नागरिक किस कार्रवाई को गंभीर माने?
मैं यह दावा नहीं कर रहा कि इसके पीछे देवेंद्र फडणवीस और हिमंत बिस्व सरमा के बीच कोई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है, क्योंकि हमारे पास इसका प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है कि ऐसी घटनाएँ राजनीतिक संदेशों की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करती हैं।
समस्या यह नहीं है कि राजनीति में परिस्थितियाँ बदलती हैं, क्योंकि संवाद, सुधार और पुनर्विचार के लिए स्थान रहना चाहिए; समस्या तब पैदा होती है जब परिवर्तन का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता और समर्थकों से अपेक्षा की जाती है कि वे कल के विरोध तथा आज के सम्मान, दोनों को समान उत्साह से सही सिद्ध करें।
आज राजनीति में सिद्धांत से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपयोगिता हो चुकी है, इसलिए किसी घटना को समझने के लिए केवल यह मत देखिए कि कौन क्या कह रहा है, बल्कि यह भी देखिए कि वह कब, कहाँ और किस आवश्यकता के कारण कह रहा है।
और अब समय जी ने दोबारा बवाल काट दिया है।