@FBDPolice द्वारा लोकतन्त्र की हत्या 20/7/2026 सीआईए बताकर कर घर का ताला तोड़ते हैं घर में छानबीन, और मुझे धमकी दी जाती है जंतर-मंतर से वापस आ जा नहीं तो तेरे पिताजी को उठा लेंगे वहीं हुआ FBD में कितने आंदोलन कारियो के पिता को उठाया यह है जातिवाद @DGPHaryana@cmohry@NCSC_GoI
@ashu_vidrohi
A minister resigned. But who does our education system actually serve? Whose knowledge is included, whose is erased? Institutions built on caste exclusion still call themselves meritocratic.
The system wasn’t broken. It was designed this way.
Full film 15 August
Ask the youths participating here how many are in college or have a job and you'll get root of frustration. At least the youth protesting at Jantar Mantar acknowledge that w/o free & fair entrance examination they will never get gainful employment.
@Shubham_fd लगता है इस चुनमुंगने ने कभी भीम आर्मी के जिला अध्यक्ष को नहीं देखा, मैं गारंटी देता हूं कि जिस दिन देख लेगा उस दिन उसकी आंखें देखना और मुंह सच बोलना सीख जाएंगे।
@BhimArmyChief@BASFOriginal
"संसद में बात तभी होगी, पहले इस्तीफा फिर वार्ता। बिना इस्तीफे के कोई वार्ता नहीं होगी...आप इतने ही संवाद वाले हैं तो आपने 20 तारीख से पहले क्यों नहीं संवाद किया।"@BhimArmyChief
पटना में छात्रों द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर किए जा रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस द्वारा किया गया लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़े जाना अत्यंत निंदनीय, अलोकतांत्रिक और अस्वीकार्य है।
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी आवाज़ उठा रहे मासूम बच्चों और बच्चियों के साथ जिस प्रकार का बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया, उसके घाव अभी भरे भी नहीं थे कि अब पटना में छात्रों पर फिर से लाठियाँ बरसाई गईं और आँसू गैस के गोले छोड़े गए।
सरकार छात्रों की बात सुनने के बजाय उनकी आवाज़ को बल प्रयोग से दबाने की नीति पर चल रही है।
#संसद_मार्च #जंतर_मंत्र
@dpradhanbjp@RahulGandhi@INCIndia@DelhiPolice और ARF की सुरक्षा में तैनात @RSSorg के गुंडों ने निर्दोष लड़कियों, छात्रों और बुजुर्गों को पीटा याद रखिए धर्मेंद्र प्रधान, यह 21वीं सदी है और बाबासाहेब ने कहा था कि यह सामाजिक न्याय और समान अवसर की सदी होगी। We the people of India are committed to this @BhimArmyChief
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
छात्रों की आवाज को दबाने के लिए हमारे भीम आर्मी छात्र संघ के साथियों को घर में नजरबंद करना, उनकी बोलने की आजादी और अभिव्यक्ति का अधिकार के खिलाफ है।
@Uppolice release our Muradabad students federation members immediately.
@BhimArmyChief@VinayRatanSingh@CJP_for_India
@Uppolice सरकारें बदलती रहती हैं और अगर छात्रों का दमन इस तरीके से करोगे, आपको जवाब देना बहुत महंगा पड़ेगा,, छात्र एकता की ताकत शायद आप नहीं जानते, तो छात्र आपके परिवार में भी होंगे हम हर एक दिन एक डायरी मेंटेन कर रहे हैं जिसमें तुम्हारी दमन निति के प्रकरण लिख रहे हैं हम समय आने पर उजागर करेंगे,
मेरे छोटे भाई "कुलदीप अंबेडकर" जी को मुरादाबाद मंडल प्रभारी "भीम आर्मी छात्र संघ" (BASF) को तत्काल प्रभाव से नजर बंद से मुक्त किया जाए, अन्यथा मैं और पूरे उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी, भीम आर्मी छात्र संघ, आजाद समाज पार्टी और अन्य सभी बहुजन समाज के संगठनों को साथ लेकर एक बड़े आंदोलन का आगाज करूंगा।
हमें हमारी आवाज उठाने से कोई नहीं रोक सकता हम संवैधानिक हैं।
डॉ. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी के अनुयाई हैं।
इस बार हम लेकर रहेंगे आजादी इस भ्रष्ट सरकार और बीजेपी को उखाड़ फेंकेंगे चाहे हमारी जान भी चली जाए। @basf4u@BasfUp #basf @BhimArmyChief@VinayRatanSingh
!The first and foremost thing that must be recognized is that Hindu Society is a myth. Hindu is itself a foreign name... Hindu society as such does not exist. It is only a collection of castes. Each caste is conscious of its existence.
@BhimArmyChief@ambedkariteIND
If Hindu Raj becomes a fact, it will, no doubt, be the greatest calamity for this country. No matter what the Hindus say, Hinduism is a menace to liberty, equality and fraternity. On that account it is incompatible with democracy. Hindu Raj must be prevented at any cost." #BRA
केन–बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी पिछले कई वर्षों से उचित मुआवज़े, सम्मानजनक पुनर्वास और अपने संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इस वर्ष अप्रैल में भी प्रभावित परिवारों ने आंदोलन किया था। तब प्रशासन द्वारा समझा-बुझाकर आंदोलन समाप्त करा दिया गया था, लेकिन मांगें पूरी न होने के कारण अबकी बार वे आखिरी तक लड़ने के जज़्बे के साथ आंदोलन के 14वें दिन भी चिता सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह तथा प्रतीकात्मक फांसी सत्याग्रह के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि अपनी लोकतांत्रिक आवाज़ उठाने पर उन्हें शासन-प्रशासन द्वारा तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है।
आंदोलनकारी आदिवासियों का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि कई प्रभावित परिवारों के घरों को बिना पर्याप्त पूर्व सूचना ध्वस्त कर दिया गया। इसके साथ ही मुआवज़े के निर्धारण और वितरण में अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार के आरोप भी सामने आए हैं।
उनका यह भी कहना है कि उन्हें दिया जा रहा मुआवज़ा वास्तविक नुकसान की तुलना में बेहद अपर्याप्त है। इस राशि से न कहीं और सम्मानजनक ढंग से बसना संभव है, न रहने के लिए घर की समुचित व्यवस्था हो सकती है, न आजीविका का स्थायी साधन जुटाया जा सकता है और न ही बच्चों की शिक्षा एवं परिवार के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि जिन स्थानों पर उनका पुनर्वास किया गया है, वहाँ बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। ऐसे में प्रभावित परिवारों के सामने अपने अस्तित्व और भविष्य का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
यदि विकास के नाम पर लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीन, घर, आजीविका और सामाजिक जीवन से विस्थापित किया जाता है, तो यह सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रत्येक प्रभावित परिवार को न्यायपूर्ण एवं पर्याप्त मुआवज़ा, सम्मानजनक पुनर्वास, मूलभूत सुविधाओं से युक्त पुनर्वास स्थल, वैकल्पिक आजीविका तथा कानून के अनुरूप सभी अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ।
मैं शीघ्र ही अपने इन परिवारों से मिलने उनके बीच जाऊँगा। मेरा वादा है कि उनकी आवाज़ बनकर इस पूरे मामले को लोकसभा में पूरी मजबूती के साथ उठाऊँगा।
@MP_MyGov को आंदोलनरत आदिवासी परिवारों के साथ संवेदनशीलता और गंभीरता से संवाद कर उनकी जायज़ मांगों का शीघ्र समाधान करना चाहिए। विकास तभी सार्थक है, जब वह न्यायपूर्ण, पारदर्शी, सहभागी और मानवीय हो; न कि आदिवासियों के अधिकारों, सम्मान और भविष्य की कीमत पर।