@harisharandevgn@JPSCreformanch को थोड़ा ज्ञान दीजिए, क्योंकि इनको सिर्फ रद्द से मतलब है, निर्दोष को सजा दिलाना असली मकसद प्रतीत होता है, जोकि सर्वथा न्यायोचित नहीं है।दोषी को सजा मिले , निर्दोष को न्याय, JSSC JPSC में रिफॉर्म की जरूरत है, मैं इसका पक्षधर हूँ।
@JPSCreformanch@PrinceP38815981@gutthi_org@SACHNAMA_ आपकी भी मंशा एकतरफा है,जो निर्दोष है उसको सजा क्यों मिले,मैं हमेशा अन्याय का विरोधी रहा हूँ,लेकिन आपलोगों को अपनी राजनीति सेकनी है।जंहा भीड़ वंहा कूद जाना है।न्याय मतलब पता भी है कि नहीं,1 निर्दोष को सजा भी अन्याय भी है।न्यायलय पर ही भरोशा है,क्योंकि आपलोगों की मानवता मर चुकी है।
मान लो तुम यहां ट्वीट किए अब कोई आके तुम्हे गाली दे जाएगा .. इसके लिए तुम जिम्मेदार थोड़ी हो ?
अब एक ग्रुप है सभी के विचार स्वतंत्र है अगर JPSC रिफॉर्म मंच का कोई आदमी लिखे तो जिम्मेदारी बनती है।
हालांकि तुम्हे नैरेटिव विक्टिम CARD खेलना था SS लेके डाल दिया।
95-96-100 % ही करते रहो करप्शन पर एक शब्द मत बोलना कि हां सभी परीक्षाओं में धांधली हुई है।
@PrinceP38815981@gutthi_org@SACHNAMA_ आपकी भी मंशा एकतरफा है,जो निर्दोष है उसको सजा क्यों मिले,मैं हमेशा अन्याय का विरोधी रहा हूँ,लेकिन आपलोगों को अपनी राजनीति सेकनी है।जंहा भीड़ वंहा कूद जाना है।न्याय मतलब पता भी है कि नहीं,1 निर्दोष को सजा भी अन्याय भी है।न्यायलय पर ही भरोशा है,क्योंकि आपलोगों की मानवता मर चुकी है।
@JPSCreformanch@PrinceP38815981@SACHNAMA_@gutthi_org@yourBabulal आपकी भी मंशा एकतरफा है,जो निर्दोष है उसको सजा क्यों मिले,मैं हमेशा अन्याय का विरोधी रहा हूँ,लेकिन आपलोगों को अपनी राजनीति सेकनी है।जंहा भीड़ वंहा कूद जाना है।न्याय मतलब पता भी है कि नहीं,1 निर्दोष को सजा भी अन्याय भी है।न्यायलय पर ही भरोशा है,क्योंकि आपलोगों की मानवता मर चुकी है।
@pravinm53747916 मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद है🙏🏻
@HemantSorenJMM
@nevergiveup2u@BJP4Jharkhand मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद hai.
@HemantSorenJMM
@nevergiveup2u@BJP4Jharkhand मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद hai.
@HemantSorenJMM
@IAS7777 मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद है
@HemantSorenJMM
@IAS7777 मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद है🙏🏻
@HemantSorenJMM
मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद है🙏🏻
@HemantSorenJMM
मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद है🙏🏻
@HemantSorenJMM
“अगर जेन्युइन हो तो दोबारा परीक्षा देकर फिर पास कर लेना।”
यह तर्क सुनकर लगता है जैसे योग्यता कोई ऐसी चीज है, जिसे हर साल नई रसीद कटवाकर साबित करना पड़ता है।
नीरज चोपड़ा ने टोक्यो 2020 में ओलंपिक गोल्ड जीता, लेकिन पेरिस 2024 में गोल्ड नहीं जीत पाए।
तो क्या इसका मतलब यह है कि टोक्यो का गोल्ड उन्होंने 35 लाख रुपये देकर जीता था?
भारत ने 2011 में क्रिकेट विश्व कप जीता, लेकिन 2015 में खिताब नहीं बचा पाया।
तो क्या 2011 की जीत इसलिए संदिग्ध हो गई कि 2015 में वही टीम दोबारा विश्व कप नहीं जीत सकी?
इसी तरह, इस वर्ष NEET की पुनः परीक्षा में मेरे कई जानने वाले छात्रों के अंक पहली परीक्षा की तुलना में कम हो गए।
तो क्या इसका मतलब यह है कि पहली परीक्षा में उनके अंक फर्जी थे?
नहीं।
क्योंकि हर परीक्षा, हर मैच और हर चुनाव एक नई परिस्थिति होती है।
राजनीति में ही देख लीजिए।
नरेंद्र मोदी ने 2019 में वाराणसी से लगभग 4.79 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। 2024 में जीत का अंतर घटकर लगभग 1.52 लाख रह गया।
तो क्या 2024 में जीत का अंतर कम होने से 2019 की जीत कम वैध हो गई?
बिल्कुल नहीं।
क्योंकि बाद का प्रदर्शन, पहले के प्रदर्शन को अपने-आप अवैध नहीं कर देता।
ठीक यही बात भर्ती परीक्षा पर भी लागू होती है।
अगर किसी अभ्यर्थी ने नियमों के अनुसार परीक्षा दी, अपने प्रदर्शन के आधार पर कटऑफ पार की और चयनित हुआ,
तो बाद में परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी सामने आने पर यह कहना
“अगर सच में योग्य हो तो फिर से परीक्षा देकर पास कर लो”
दरअसल उसकी पहली सफलता को प्रमाणित करने के बजाय उसे एक नई प्रतियोगिता में फिर से उतारना है।
पहली परीक्षा में उसकी योग्यता का प्रमाण उसका उस परीक्षा में किया गया प्रदर्शन था।
दूसरी परीक्षा में वह पास होगा या नहीं, यह पहली परीक्षा में उसके प्रदर्शन का न तो प्रमाण है, न खंडन।
कोई पहली बार 90 अंक लाकर चयनित हो और दूसरी बार 70 अंक पाए, तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि पहली बार उसके 90 अंक फर्जी थे।
अलग परीक्षा = अलग परिस्थिति = अलग प्रदर्शन।
इसलिए व्यवस्था में गड़बड़ी हुई है तो सवाल यह होना चाहिए
किसने गड़बड़ी की?
किसे उसका लाभ मिला?
गड़बड़ी कितनी व्यापक थी?
किस स्तर तक परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित हुई?
और जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध है, उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
लेकिन हर चयनित अभ्यर्थी से यह कहना
“चलो, अब फिर से साबित करो कि तुम योग्य हो।”
यह समाधान नहीं है।
योग्यता का प्रमाण यह नहीं कि कोई व्यक्ति हर बार वही परीक्षा पास कर सकता है।
योग्यता का प्रमाण है जिस परीक्षा में चयन हुआ, उसमें उसने नियमों के अनुसार कैसा प्रदर्शन किया।
दोषी को खोजिए।
लाभार्थी को चिन्हित कीजिए।
गड़बड़ी का दायरा तय कीजिए।
लेकिन केवल इसलिए कि व्यवस्था अपनी गलती सुधार नहीं पा रही, निर्दोष अभ्यर्थी से उसकी सफलता की दूसरी रसीद मत मांगिए।
@pravinm53747916 मेरा स्पष्ट मानना है,निर्दोष को उचित न्याय और दोषी को ढूंढ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।क्योंकि दोषी को सजा नहीं मिली तो ओ फिर से नीच हरक्कत करेंगे।दूसरी ओर अगर निर्दोष को बेवजह सजा दी गयी तो मानवता मर जाएगी,मानो भगवान पर ही भरोशा उठ गया हो।न्याय हो यही उम्मीद है🙏🏻
@HemantSorenJMM
“अगर जेन्युइन हो तो दोबारा परीक्षा देकर फिर पास कर लेना।”
यह तर्क सुनकर लगता है जैसे योग्यता कोई ऐसी चीज है, जिसे हर साल नई रसीद कटवाकर साबित करना पड़ता है।
नीरज चोपड़ा ने टोक्यो 2020 में ओलंपिक गोल्ड जीता, लेकिन पेरिस 2024 में गोल्ड नहीं जीत पाए।
तो क्या इसका मतलब यह है कि टोक्यो का गोल्ड उन्होंने 35 लाख रुपये देकर जीता था?
भारत ने 2011 में क्रिकेट विश्व कप जीता, लेकिन 2015 में खिताब नहीं बचा पाया।
तो क्या 2011 की जीत इसलिए संदिग्ध हो गई कि 2015 में वही टीम दोबारा विश्व कप नहीं जीत सकी?
इसी तरह, इस वर्ष NEET की पुनः परीक्षा में मेरे कई जानने वाले छात्रों के अंक पहली परीक्षा की तुलना में कम हो गए।
तो क्या इसका मतलब यह है कि पहली परीक्षा में उनके अंक फर्जी थे?
नहीं।
क्योंकि हर परीक्षा, हर मैच और हर चुनाव एक नई परिस्थिति होती है।
राजनीति में ही देख लीजिए।
नरेंद्र मोदी ने 2019 में वाराणसी से लगभग 4.79 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। 2024 में जीत का अंतर घटकर लगभग 1.52 लाख रह गया।
तो क्या 2024 में जीत का अंतर कम होने से 2019 की जीत कम वैध हो गई?
बिल्कुल नहीं।
क्योंकि बाद का प्रदर्शन, पहले के प्रदर्शन को अपने-आप अवैध नहीं कर देता।
ठीक यही बात भर्ती परीक्षा पर भी लागू होती है।
अगर किसी अभ्यर्थी ने नियमों के अनुसार परीक्षा दी, अपने प्रदर्शन के आधार पर कटऑफ पार की और चयनित हुआ,
तो बाद में परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी सामने आने पर यह कहना
“अगर सच में योग्य हो तो फिर से परीक्षा देकर पास कर लो”
दरअसल उसकी पहली सफलता को प्रमाणित करने के बजाय उसे एक नई प्रतियोगिता में फिर से उतारना है।
पहली परीक्षा में उसकी योग्यता का प्रमाण उसका उस परीक्षा में किया गया प्रदर्शन था।
दूसरी परीक्षा में वह पास होगा या नहीं, यह पहली परीक्षा में उसके प्रदर्शन का न तो प्रमाण है, न खंडन।
कोई पहली बार 90 अंक लाकर चयनित हो और दूसरी बार 70 अंक पाए, तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि पहली बार उसके 90 अंक फर्जी थे।
अलग परीक्षा = अलग परिस्थिति = अलग प्रदर्शन।
इसलिए व्यवस्था में गड़बड़ी हुई है तो सवाल यह होना चाहिए
किसने गड़बड़ी की?
किसे उसका लाभ मिला?
गड़बड़ी कितनी व्यापक थी?
किस स्तर तक परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित हुई?
और जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध है, उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होनी चाहिए?
लेकिन हर चयनित अभ्यर्थी से यह कहना
“चलो, अब फिर से साबित करो कि तुम योग्य हो।”
यह समाधान नहीं है।
योग्यता का प्रमाण यह नहीं कि कोई व्यक्ति हर बार वही परीक्षा पास कर सकता है।
योग्यता का प्रमाण है जिस परीक्षा में चयन हुआ, उसमें उसने नियमों के अनुसार कैसा प्रदर्शन किया।
दोषी को खोजिए।
लाभार्थी को चिन्हित कीजिए।
गड़बड़ी का दायरा तय कीजिए।
लेकिन केवल इसलिए कि व्यवस्था अपनी गलती सुधार नहीं पा रही, निर्दोष अभ्यर्थी से उसकी सफलता की दूसरी रसीद मत मांगिए।