@khanumarfa आप रहने ही दो।
आसमानी मजहब में बेटी-बहू भी सुरक्षित नहीं। सब समान है भोग की वस्तु है।
इसीलिए मजहबी सोच वाले जब समाज में “बेटी” शब्द सुनते हैं,
तो उनका दिमाग उसी मजहबी सोच से चलता है।
लाखों आतंकवादी होने के बाद भी उनका मज़हब बदनाम नहीं होता। और एक मंदिर में चोरी हो गई तो तुम्हारी आस्था सवालों के घेरे में आ जाती है! ऐसे नैरेटिव से सतर्कता जरूरी है।
जिस भी विरोध प्रदर्शन में सड़क पर आम लोगों की सहभागिता होती है, उसके सामने सरकारें झुकती हैं। UGC आंदोलन सिर्फ़ इंटरनेट पर था।
किसानों में जिगरा था, एक वर्ष तक राष्ट्रीय राजधानी को ऐसा घेरकर रखा कि स्वयं पीएम को तीनों कृषि क़ानून वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी। कॉकरोचों के पास इंस्टाग्राम की ताक़त थी, एक होड़ मची और इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनना 'कूल' माना गया। अंततः शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ। शाहीन बाग़ वालों ने महीनों डेरा डाले रखा था, दंगा हुआ और कोविड-19 महामारी आई जिस कारण वो वापस गए।
वहीं यूजीसी को लेकर जो आक्रोश था, उसमें सबने अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकनी शुरू कर दी थी। सड़क पर अड़ने को कोई तैयार न था। एकाध दिनों का विरोध प्रदर्शन राजनीतिक दलों के शक्ति प्रदर्शन के लिए होते हैं, जनांदोलनों के लिए नहीं।
मेरी बातें बुरी लग सकती हैं, लेकिन आंदोलन स्टूडियो या कीबोर्ड के सामने से नहीं होते। सड़क पर होते हैं। स्टूडियो और कीबोर्ड इसके सहायक बनते हैं।
बेहद ही शर्मनाक- बीजेपी वालों। जो मांगें मान ली गई हैं उसको लेकर @ajeetbharti , @ARanganathan72@neha_laldas और अन्य भी कब से बोल रहे थे- उन्हें अनसुना करके - सोशल मीडिया पर अपमानित करके, झुके किसके सामने CJP( सड़क की हिंसक भीड़ के सामने)।