जंतर मंतर के छात्र प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाना क्रूर कार्रवाई थी। इस प्रदर्शन को ‘आप’ नेता @ArvindKejriwal ने भी पूरा समर्थन दिया था। उनको भी चाहिए कि इस मुद्दे पर विपक्षी एकता दिखाएँ पर पैलेट गन विक्टिम को न्याय दिलाने के लिए FIR कराने कनाट प्लेस थाने पहुंच जाएं जहां नेता विपक्ष @RahulGandhi पहुँचे हुए हैं।
विपक्ष एक रहेगा तो सेफ़ रहेगा।
चचा आप कब्र में पैर लटकाए हुए हैं पर चटुकारिता में इतने आगे बढ गए हैं की सही गलत की व्याख्या भी नहीं कर पा रहे क्या पैलेट गन मे एक या दो चार छर्रे ही होते हैं जो मात्र एक दो लोगो को ही लगे ? बाकी लोग सामने नही आ रहे
राहुल गांधी के विशाल धरने के बाद अब दिल्ली पुलिस पैलेट गन से घायल साहिल लोचब की तरफ से FIR दर्ज कर लिया है. राहुल गांधी के साहसिक नेतृत्व के खाते में यह एक और उपलब्धि है. गृह मंत्रालय को इस मुद्दे पर पीछे हटना पड़ा और दिल्ली पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया. FIR की मांग को लेकर ही राहुल गांधी आज साहिल लोचब की मां और उनके वकील के साथ संसद मार्ग पुलिस स्टेशन पर धरना पर बैठ गये. कुछ ही देर के अंदर उस इलाके में चारों तरफ कांग्रेस के कार्यकर्ता आ गये और धरना बहुत विशाल हो गया. ऐसा लगता है हालात को देखते हुए शासन ने अपना रवैया बदला.
पर अचरज की बात ये है कि साहिल लोचब ने अगर 14अगस्त से अब तक कई बार FIRदर्ज कराने की कोशिश की तो पुलिस दर्ज करने से इंकार क्यों करती रही? FIR पहले क्यों नहीं लिया गया और अब क्यों लिया गया? देश में ऐसी हर जगह राहुल गांधी कैसे पहुंच पायेंगे,जहां साहिल जैसे किसी आम आदमी के साथ पुलिस जुल्म होगा? अपने मुल्क, इसके शासन और पुलिस की कार्यशैली के लिए यह बहुत दुखद पहलू है.
यूपी में बुरी तरह से पराजित होने वाली स्मृति ईरानी को महासचिव बना भाजपा ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। यकीनन ऐसा जानबूझ कर किया गया है।
ऐसा फैसला करके फर्स्ट राउंड में विपक्ष को लीड दे दी गई है। यह स्पष्ट है कि यूपी की जनता न तो स्मृति ईरानी को पसंद करती है न उन्हें स्वीकारेगी।
यूपी में बाबा योगी आदित्यनाथ समेत पूरी टीम स्मृति को सहजता से बतौर महासचिव स्वीकार करेगी इसकी संभावना भी बेहद कम है।
यह बात भी साफ समझ में आ गई है कि यूपी के रण में अपनी चालों को अंजाम देने के लिए ही शीर्ष नेतृत्व ने स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी दी है।
यह भी तय हो गया कि अगर यूपी में परिणाम बीजेपी के पक्ष में आए तो स्मृति ईरानी भी सीएम पद की एक स्वाभाविक दावेदार होंगी।
सही कहा आपने .
काश ! मोदी -शाह और योगी ने भी संविधान सभा की बहसों को पढ़कर उससे कुछ सीखा- समझा होता तो देश में नफ़रत की खेती करके अपनी सियासत नहीं कर होते .
उनके पूर्वजों ने तो आजादी की लड़ाई में हिस्सा भी नहीं लिया था . 1925 से 1947 तक सिर्फ दंड -बैठक ही करते रह गए थे . आज वो सबको देश-भक्ति और देश-विरोधी का तमगा दे रहे हैं .विरोधियों को दिमागी नक्सल कहकर अपने अंध-भक्तों को हथियार दे रहे हैं .
अपने आप को चतुर बुद्धिमान समझने वाला खुद मल चाटु पत्रकार बना बैठा है जिसे खुदकी मालकिन और मालिक की गलती नही दिखाई देती वह उसे एक नई अदा की संज्ञा देकर दलाली फिक्स करता रहता है
दिमाग़ी नक्सल की सप्रसंग व्याख्या करिए…
कवि ने चतुर और बुद्धिमान लोगों को दिमाग़ी नक्सल की संज्ञा दी है।जो व्यक्ति धर्म और जाति के ध्रुवीकरण को अच्छे से समझते हैं,जिन्हें मोतियाबिंद की शिकायत नहीं है,जिनमें खुद सोचने और समझने की शक्ति है,जिनके अपने विचार हैं,
जो भक्त या अंधभक्त नहीं हैं।इन तमाम लोगों को कवि दिमाग़ी नक्सल कहना चाहते हैं।दूसरे बचीं श्रेणी को क़तई मूर्ख नहीं कहा जाएगा…
एक मज़ेदार pattern दिख रही है आजकल..आप CJP से कोई सवाल पूछ भर लीजिए..अचानक CJP/AAP के sponsored handles जिनके न के बराबर followers होंगे,DP नहीं होगी और वो आपके follower भी नहीं होंगे लेकिन उन्हें ऊपर से आदेश मिला होगा कि गिद्ध हमला शुरू करो..तो वो बाकायदा आपके खिलाफ organised attacks शुरू कर देंगे..पहले परेशानी होती थी अब हंसी आती है..हंसती हूं और सबको block कर देती हूँ 😀
#happyindependencedayindia
कांग्रेस शासितकिसी भी राज्य में महिलाओं को शासन या संगठन में जगह देने की क्या जरूरत है? जब पार्टी की शीर्ष पद पर परिवार की दो महिलाएं काबिज है वही सब कुछ है
इस बार “छात्रों की गूँज” कार्यक्रम पुणे महाराष्ट्र में हो रहा है।नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी महिला छात्रों से वार्ता करेंगे।लेकिन एक सच यह भी है कि,कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार और दिल्ली नेतृत्व कैबिनेट में एक भी महिला को जगह नहीं दे पाए…
ढेरों भक्त भक्तिन मुझे कमेंट कर रहे हैं कि लाख कोशिश कर लो राहुल गांधी पीएम नहीं बन पायेंगे। कौन कह रहा है कि राहुल गांधी पीएम बनना चाहते हैं? या पीएम बनने जा रहे हैं?पीएम भी कोई पद है टॉफी बांटने, जबरिया गले मिलने वाला?
दरअसल तुम लाख दम लगा लो अब सत्ता परिवर्तन होकर रहेगा।फिर तुम्हें राहुल ऐसा पीएम देंगे कि तुम कहोगे अरे यह क्या हो गया। अगला पीएम ऐसा देश बनाएगा जिसकी डिजाइन राहुल की होगी। यह होकर रहेगा।
तुम राहुल गांधी को समझने में नाकाम रहे हो।तुम्हें समझने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि तुम देश को ही नहीं समझ पाए हो। राहुल गांधी पीएम बनाते हैं पीएम मैटेरियल तैयार करते हैं।अब पीएम का पद बहुत छोटा है राहुल गांधी के लिए।
यह बात कम लोग जानते हैं कि 2024 के चुनाव में अगर राहुल पीएम ही बनना चाहते तो मोदी की सरकार कभी नहीं बनती। इतिहास गवाह है कि उन्होंने एक बार भी नायडू और नीतीश की ओर खुद हाथ नहीं बढ़ाया।
सच्चाई यह है कि इंडिया गठबंधन अब एकतरफा जीत चाहता है और देश उसकी ओर बढ़ चुका है। राहुल न केवल एक सशक्त नायक के तौर पर उभरे हैं बल्कि यह साबित किया है कि केवल वो एक हैं जिसके नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन हो सकता है।
मोदी ने पीएम पद की गरिमा बहुत गिरा दी है जिस पद को सोनिया गांधी ने तीन तीन बार ठुकराया। राहुल जब चाहते पीएम बन सकते थे।वह पद उनके लिए मायने नहीं रखता।
इस बार साहेब ने नेहरू को क्यों बख़्श दिया, नेहरू-गाँधी परिवार, वंशवाद और कांग्रेस भी एक बार नहीं आए 90 मिनट में।
कोई बता सकता है कि ये बदलाव क्यों आया?
दलालों को राहुल गांधी के मल में भी प्रोटीन विटामिन से भरपूर भोज्य पदार्थों का रस स्वादन का भरपूर आनंद आ रहा है वे कैसे राहुल गांधी की आलोचनाओ का बचाव नही करेंगे
Meloni विवाद पर हमारी बिरादरी ( मीडिया ) का एक तबका मान रहा है कि राहुल गांधी और संदीप दीक्षित को माफ़ी माँगनी चाहिए।लेकिन Meloni,Melody का प्रचार तो विपक्ष ने नहीं किया था।वो तो खुद सरकारी प्रचार तंत्र ने बड़े चटकारे के साथ देश को बताया था कि मोदी जी ने Meloni को Melody खिलाई !
“आपने आज़ादी को कब महसूस किया?”
अपने अनुभव पर 2 मिनट का वीडियो बनाइए और इस 15 अगस्त, जुड़िए देश के कई नामी कलाकारों और हस्तियों के साथ!
📲Entry भेजें: https://t.co/wvl0bFyQLi
Deadline: 14 अगस्त, रात 11:59 बजे तक
“आज़ादी का जश्न और यूथ के प्रश्न”
An Online Concert & Conversation
#MeriAzadi #IndependenceDay
गधों को राहुल गांधी का हर कहा अनकहा सुनाई दे जाता है पर गृह मंत्री ने कहा हुआ नही सुनाई देता कि मै संसद में हर जवाब का जवाब देने को तैयार हूँ पहले पप्पू संसद को बकरा मंडी तो न बनाए
दल्ले फिर क्यो चिखता रहता था https://t.co/3Zx7l4qPix ने अपने भवन पर तिरंगा नही फहराया रही तिरंगे के बेकदरी की बात यह लोगों के मानसिक दिवालिये पन का सबूत है
सरकार का अभियान चल रहा है,
“हर घर तिरंगा”।जबकि 2002 के नवीन जिंदल केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,तिरंगा फहराना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।जबकि 1950 से 2002 तक सिर्फ सरकारी इमारतों,स्कूलों पर ही झंडा फहरा सकते थे।घर पर तिरंगा लगाने की इजाजत नहीं थी।यानी ये अधिकार पहले ही मिल चुका है।
दिल्ली के जंतर-मंतर प्रोटेस्ट और रांची के प्रोटेस्ट में थोड़ी समानता और ज्यादा फर्क है. जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में बड़े रहस्यमय ढंग से कुछेक 'बाहरी अभिभावक' जरूर आये पर वह हमेशा युवा-GenZ का प्रोटेस्ट बना रहा. 'हाईजैक' नहीं हुआ. क्योंकि नेतृत्व अपेक्षाकृत सामूहिक, समावेशी और समझदार था.'अभिभावक बनकर आये लोग' स्वयं ही एक्सपोज होते गये. जंतर-मंतर के छात्र-युवाओं के पक्ष में देश भर में Gen-Z प्रोटेस्ट होने लगे! पर रांची में जेनुइन युवाओं के असंगठित समूह में 1-2 अगस्त से ही निहित स्वार्थ से प्रेरित तत्वों की घुसपैठ बढ़ गई. कुछ ने तो जयपाल सिंह स्टेडियम में डेरा डाल दिया! प्रदेश के मुख्य विपक्षी और देश के मुख्य सत्ताधारी दल के नेताओं की भी प्रोटेस्ट के मंच पर आवाजाही शुरू हो गई. अंतत: वही हुआ, जिसकी आशंका थी. प्रोटेस्ट अपनी युवा शक्ति खोने लगा और इस पर सूबे की 'पावर-पालिटिक्स' का रंग चढने लगा.
10अगस्त को 'निहित स्वार्थी तत्वों' ने योजना के तहत छिटपुट हिंसा और सुरक्षा बल से बेवजह टकराना शुरू कर दिया. जबकि वहां तैनात सुरक्षा बल के जवान दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को तैनात सुरक्षा बल की तरह 'दमनकारी मंसूबा' नहीं दिखा रहे थे! संभवत: शासन से उन्हें इस आशय का संदेश मिला था कि प्रदर्शनकारी युवाओं पर हमलावर नहीं होना है!
मैने किसी चैनल पर स्वयं देखा-सुना जब 10अगस्त के प्रदर्शन में रांची के एक प्रमुख पुलिस अधिकारी छात्रों को विधानसभा के मुख्य द्वार तक पहुंचने की कोशिश न करने की लाउडस्पीकर से अपील कर रहे थे. लेकिन छात्रों के बीच घुसपैठ कर चुके कुछ 'गैर-छात्र' उस वक्त भाषण करते सुने गये कि युवाओं को विधानसभा के मुख्य द्वार तक जरूर पहुंचना है. कुछ तो विधानसभा के अंदर घुसने का आह्वान करते सुने गये! ये कौन सिरफिरे थे? ये आंदोलनकारी छात्र तो हरगिज नहीं दिख रहे थे! कुछ यूट्यूबरों ने उनके इस आशय के भडकाऊ वक्तव्यों को रिकाॅर्ड भी किया, जो अब सबके लिए उपलब्ध है. भड़काऊ भाषणों और आह्वानों के चलते ही युवाओं की एक 'नियोजित भीड' ने विधानसभा भवन के मुख्य द्वार और फिर भवन में घुसने के मकसद से 'पुलिस काॅर्डन्स और बैरिकेडिंग' आदि को तोड़ना शुरू कर दिया. इस तरह, जेनुइन प्रोटेस्टर्स को दरकिनार कर इन तत्वों ने प्रोटेस्ट को पटरी से उतार दिया!
यह महज संयोग नहीं कि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने 11 अगस्त को 'झारखंड बंद' का आह्वान कर दिया. 20 जुलाई को 'जंतर-मंतर' पर भयानक दमन के बावजूद क्या विपक्षी Congress या AAP ने 'दिल्ली बंद' का ऐसा कोई आह्वान किया?संभवत: इन दोनों दलों ने GenZ प्रोटेस्ट को नैतिक समर्थन देने के बावजूद उसके प्रतिरोध के दायरे में अपनी भौतिक मौजूदगी दर्ज कराने से परहेज किया. और यह उनका सही फैसला था. लेकिन झारखंड में युवाओं के प्रोटेस्ट का सिर्फ 'राजनीतिकरण' करने का ही अभियान नहीं चला, उसके 'लंपटीकरण' की भी कोशिश की गई. इस तरह 10 अगस्त का युवा प्रदर्शन अपने लक्ष्य से भटक गया. इसके साथ ही झारखंड की JMM-गठबंधन सरकार ने भाजपा के 'सियासी प्रोजेक्ट' को भी विफल कर दिया! पर मुख्यमंत्री @HemantSoren को प्रोटेस्ट करने वाले जेनुइन युवाओं से उनकी बाकी बची कुछ मांगों पर द्विपक्षीय संवाद जारी रखना चाहिए. क्योंकि इन युवाओं के प्रोटेस्ट के कई मुद्दे समूचे झारखंड के युवाओं, उनके परिवारों और स्वयं राज्य प्रशासन के व्यापक हित में हैं.
आप पत्रकार हैं आप अपने स्वार्थ से किसी भी सवाल को छोटा या बड़ा बता सकते हैं और कौन गया नही गया का बजाब कर सकते है पर बाजिब क्या है यह जानता जानती समझती है
कौन जंतर मंतर गया.. कौन रांची गया…. ये सवाल छोटा है .. क्योंकि आंदोलन किसी और राज्य में भी हो सकता है .. हुआ भी था और होगा भी .. सवाल बड़ा ये है कि प्रतियोगी परीक्षा और शिक्षा को लेकर लोकतंत्र के सारे चार स्तंभों ने घोर उपेक्षा की है ..सबको एकजुट होके इसे राष्ट्रीय समस्या मानकर लडाई लड़नी होगी .. छात्र बहुत परेशान और संशय में है .. और 72 करोड़ वही है .. जो समझे ठीक है नही समझे तो वो समझा देंगे