एक रोज़ आएगा,
जब सिगरेट के बट्टो से ज्यादा
कविताएं जलेगी
मेरे कमरे में,
एक रोज़ आएगा,
कोई फ़रिश्ता सर सहलाने को
और मैं कहूंगा,
मैं दम घुटने से नहीं मरा।
जाते-जाते छूटता रहेगा पीछे
जाते-जाते बचा रहेगा आगे
जाते-जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब
तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा
और कुछ भी नहीं में
सब कुछ होना बचा रहेगा।
विनोद कुमार शुक्ल
01 जनवरी, 1937 — 23 दिसम्बर, 2025
सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।
सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।
सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।
सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण।
सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।
/वाजिद जी