All anti-Hindu acts brought in by Congress are still in force. The future of Hindustan is linked to the future of Hindus, and it is bleak if @narendramodi does not pay heed to Swami Vivekananda's warning: Every Hindu who converts is not only one Hindu less, it is one enemy more.
🚨 कांग्रेस की पोल खोल वीडियो ➡️
क्या आप को पता है टेक्सटाइल उद्योग कांग्रेस की मनमोहन सिंह की सरकार की नीतियों के चलते बर्बाद हुआ था
ये वीडियो डाई हार्ड कांग्रेसियों के लिए है
वीडियो क्रेडिट : Opindia
@mrsfunnybones 5000 years ago, when we were using toilet flush, in Indus Valley civilization, the British were defecating in the open. Applying makeup and wearing designer clothes does not bring Wisdom and knowledge. Mumbai Gutterwood was full of fools.... English toilet🤔
Islamist extremists perpetrated 31,221 terror attacks and killed 146,811 people worldwide since 9/11, said the reputed German newspaper @welt in 2019 in its incredible report "18 Years of Terror".
That's an average five terror attacks. Every single day. For eighteen years.
Hindutva was born in Bengal 🚩
We all know when the Bengali audience applauds the loudest - when the one and only @jsaideepak says it 👏
#CalcuttaDebateCircle
कॉन्ग्रेस ने आरंभ किया, वामपंथियों ने यूनियन बनवाए, फैक्ट्रियाँ बंद कराईं, ममता बनर्जी ने कहा हम फैक्ट्री बंद नहीं करेंगे, ऐसी स्थिति बना देंगे कि कोई आए ही नहीं।
कभी भारत की राजधानी और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था रहा बंगाल आज, प्रति व्यक्ति आय के मामले में 24वें नंबर पर आ चुका है।
Now this is a headline that I didn't see coming but many others did.
UAE discourages its students from enrolling in British universities for fear of Islamist radicalization.
https://t.co/t5UKtnVKcu
कहते हैं, उसने 20 हजार ऊँटों पर पानी लादकर पूरे रेगिस्तान को पार किया। भीमदेव के कच्छ में होने के कारण उसने गुजरात की राजधानी अनहिलवाड़ा पर कब्ज़ा किया। मोढ़ेरा में 20,000 आम हिन्दुओं ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन ये प्रतिरोध उसे रोक नहीं पाया। बाद में हिन्दुओं ने सोच लिया कि उनके मंदिर में स्वयं इतना सामर्थ्य है कि दुश्मन नष्ट हो जाएगा। आख़िरकार मंदिर के द्वार पर घमासान युद्ध हुआ और 50,000 हिन्दुओं का क़त्लेआम मचाया गया। लौटते वक़्त वो भटका, जाटों ने नुक़सान पहुँचाया - लेकिन वो वापसी में सफल रहा।
अंततः, खलीफा ने उसके और उसके परिवार को सम्मानित करते हुए कई उपाधियों से नवाजा।
सौराष्ट्र के प्रभास पाटण में खड़े भव्य सोमनाथ मंदिर का शिखर गर्जन करके कहता है कि हजार साल पहले ये ने इस तीर्थ को तहस-नहस तो किया, लेकिन इसमें श्रद्धा रखने वालों का समर्थ इतना अटल था कि ये धर्मस्थल आज भी भगवा ध्वज अपने मस्तक पर लिए सीना तानकर खड़ा है।
सन्न 1026 में जिस गजनी के महमूद ने यहाँ लूटपाट की, आज वही गजनी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में नरक बना हुआ है। हालाँकि, बसेरा वहाँ भी कभी हिन्दुओं का ही हुआ करता था लेकिन इस्लाम अपने साथ सिर्फ़ हिंसा ही नहीं बल्कि ग़रीबी भी लेकर आता है।
आप हिन्दुओं की जिजीविषा देखिए, टिके रहने का उनका समर्थ देखिए कि मात्र 12 वर्षों के भीतर वही सोमनाथ मंदिर एक बार फिर से उठ खड़ा हुआ। और हाँ, इससे पहले कि यहाँ कोई इतिहास का ज्ञाता ये आकर कहे कि उस समय राजा लोग दुश्मन प्रदेशों की संपत्तियों का ध्वंस करते ही थे, उन्हें अल-बरुनी का लिखा पढ़ना चाहिए:
"इन अभियानों का स्वरूप कमोबेश लूट के इरादे से किए गए छापों जैसा था, और साथ ही एक सच्चे मुसलमान की ‘मजहबी रूप से जायज मूर्तिभंजकता’ को तुष्ट करने के लिए भी; और ‘मूर्ति-भंजक’ सोमनाथ और मथुरा के हिंदू मंदिरों से प्राप्त कीमती लूट/धन-संपदा के साथ ग़ज़नी वापस लौटा।"
इससे साफ़ पता चलता है कि सोमनाथ मंदिर को तबाह किया जाना कोई साधारण लूटपाट की घटना नहीं थी, ये इस्लाम के सिद्धांतों को तुष्ट करने के लिए अंजाम दी गई घटना थी। इसने महमूद गजनी को जीते-जी इस्लामी जगत में किवदंतियों का मुख्य किरदार बना दिया था, दूर देशों में उसकी 'बहादुरी' का बखान बच्चों से किया जाता था। अल-उत्बी लिखता है कि सोमनाथ के शिवलिंग को कुदाल से कई टुकड़ों में तोड़ा गया, गजनी ले जाकर मस्जिद की सीढ़ियों में चुनवाया गया। यहाँ तक कि इन्हें जीत की बूटी के रूप में मक्का-मदीना तक भेजा गया।
सोचिए, इन सबके बावजूद हम आज सोमनाथ मंदिर में निर्बाध दर्शन करते हैं, उसे भव्य स्वरूप में खड़ा देखते हैं - ये कितनी बड़ी बात है।
जय सोमनाथ!
वर्ष 2026 में आस्था की हमारी तीर्थस्थली सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। बार-बार हुए हमलों के बावजूद हमारा सोमनाथ मंदिर आज भी अडिग खड़ा है! सोमनाथ दरअसल भारत माता की उन करोड़ों वीर संतानों के स्वाभिमान और अदम्य साहस की गाथा है, जिनके लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता सदैव सर्वोपरि रही है।
पढ़िए, इसी विषय से जुड़ा मेरा यह आलेख...
#SomnathSwabhimanParv
https://t.co/lAiH7CVrC0
खंडवा जिले में जल संरक्षण के नाम पे AI इमजेस डाल के वाह वाही लूटी,
और जब पकड़े गए तो 4 टीचर को निपटा के न्याय की पिपिहरी बजा दी।
सवाल अभी भी वही हैं:
> 2 करोड़ रुपये वाला अवार्ड किस आधार पे दिया?
>जन भागीदारी थी तो उनकी फ़ोटो कहा है?
>जल संचय कहाँ कहाँ हुआ उनकी फ़ोटो कहा है?
>अगर सब सही था तो CTR पोर्टल रातों रात बंद क्यों हो गया था?
>राष्ट्रपति अवार्ड अधिकारी ने लिया और जब बात कार्यवाही की आई तो छोटे कर्मचारियों को क्यों सस्पेंड किया?
जब तलक इनका जवाब नहीं मिलेगा पूरी खुरपेंच टीम शकरकंद खा के सवाल पूछती रहेगी।
धन्यवाद
1. उमर खालिद के अब्बा सैयद कासिम रसूल इलियास खुद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता हैं
2. बेटा कश्मीर की आज़ादी और भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का ख़्वाब देख रहा है
3. ज़ोहरान ममदानी क़ुरान पर हाथ रख कर पद की शपथ लेता है और पहला पत्र इन बाप-बेटों के लिये जारी करता है
और तथाकथित लिबरल समाज इन तीनों को वामपंथी बताता है
पता नहीं लोगों को ये बात कब समझ में आएगी कि मुस्लिम वामपंथी (नास्तिक) नहीं होते
किसी इस्लामिक मुल्क में वामपंथ नहीं है
ये ढोंग सिर्फ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में किया जाता है, वहाँ की लिबरल (कन्फ़्यूज़्ड) बिरादरी को अपने एजेंडे में शामिल करने के लिये
12 हजार किमी दूर रह रहे इन दो लोगों का आपस में क्या रिश्ता है.
राष्ट्र का रिश्ता? नहीं.
एक पार्टी या संस्था में हैं? नहीं.
परिवार के सदस्य हैं? नहीं.
राजनीतिक विचार भी इनके अलग है. एक कम्युनिस्ट है, दूसरा डेमोक्रेटिक पार्टी का सदस्य.
इन दो लोगों को इनका मजहब ही जोड़ता है और इनके लिए उससे बड़ी कोई पहचान नहीं है. इसलिए गाजा में हिंसा-प्रतिहिंसा हो तो हमला ऑस्ट्रेलिया के नागरिकों पर होता है. म्यांमार में रोहंगिया अलगाववादियों पर कार्रवाई होती है तो विरोध में बोध गया पर हमला किया जाता है.
ममदानी को ये भी कहां पता होगा कि केस क्या है. मामला क्या चल रहा है. लेकिन बस वही बात. तेरा मेरा रिश्ता क्या....
जब तक इस्लाम ये निर्धारित नहीं करेगा कि राष्ट्र का स्थान मजहब से ऊपर है, तब तक इस्लाम वैश्विक समस्या बना रहेगा. पूरी दुनिया को मुसलमान बनाने की हवस अशांति को ही जन्म देगी.
पश्चिमी जगत हज़ार साल के हिंदू नरसंहार और मंदिरों के ध्वस्तीकरण को नकारता रहा
नीदरलैंड की राजधानी Amsterdam में कल नये साल के मौक़े पर जलाया गया ऐतिहासिक Vondel Church
#NewYear2026
मैं कोल्हान (झारखंड) खरसावां की आदिवासी बेटी हूँ। आज भी हम Ho Tribe के आदिवासी नव वर्ष नहीं मनाते। यह दिन हमारे उन दो हजार निर्दोष और निहत्थे 'हो आदिवासी' पूर्वजों को याद करने का है, जिन्हें 1 जनवरी, 1948 को खरसावां नरसंहार में बेरहमी से मार डाला गया था।
कई सरकारें आई और गई हमें आज तक इंसाफ नही मिला l न कोई जांच, न आयोग न कोई कमीशन l
#KharsawanMassacre #HoTribe #File
मन्मथनाथ गुप्त गलत नहीं लिख गए क्योंकि...
लन्दन के बकिंघम पैलेस में ब्रिटेन की महारानी/महाराजा से ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि लेने की प्रक्रिया अत्यन्त अपमानजनक है। यह उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ब्रिटेन के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है और इसके पश्चात् उसे महारानी/महाराजा के समक्ष सिर झुकाकर एक कुर्सी पर अपना दायाँ घुटना टिकाना पड़ता है। ठीक इसी समय महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति की गरदन के पास दोनों कन्धों पर नंगी तलवार से स्पर्श करते हैं। तत्पश्चात् महारानी/महाराजा उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ‘नाइटहुड’ पदक देकर बधाई देते हैं।
यह प्रक्रिया सैकड़ों वर्ष पुरानी है और भारत में जिस जिसको यह उपाधि मिली वो सभी ‘सर’ इस प्रक्रिया से गुजरे थे।
ब्रिटेन अपने देश और अपने उपनिवेशों में अपने चाटुकारों को ब्रिटेन के प्रति निष्ठवान बनाने के लिए ऐसी अनेक उपाधियाँ देता रहा है। नाइटहुड (सर) की उपाधि उनमें सर्वोच्च होती थी।
गुलाम भारत में ब्रिटिश शासकों द्वारा देश के अनेक राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् आदि ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने के बाद ही ‘नाइटहुड’ से सम्मानित किए गए थे।
इतिहास बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत उसी को नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित करती थी जिसे वो अपना वफादार चाटूकार दलाल मुखबिर मानती थी। हालांकि औपचारिक रूप से कहा यह जाता था कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह उपाधि दी जाती है। इसीलिए कभी कभी दिखावे के लिए कुछ वैज्ञानिकों चिकित्सकों शिक्षाविदों को भी यह उपाधि दे दी जाती थी।
कुछ अपवादों को छोड़कर देश के लगभग सभी राजा महाराजा नवाब और सेठ साहूकार आदि ब्रिटिश शासकों के तलुए चाटा करते थे। यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है।
अतः उनको दरकिनार कर के आइए जानिए तत्कालीन राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे बड़े नामों को जिन्होंने ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेकर नाइटहुड (सर) की उपाधि ब्रिटिश दरबार में घुटना टेक कर ग्रहण की थी।
#पहला_नाम
सन 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोजशाह मेहता बने थे। मेहता जी ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतने जुझारू तरीके से लड़ी थी कि 1904 में ब्रिटिश शासकों ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।
#दूसरा_नाम
सन 1900 में नारायण गणेश चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। वह देश के प्रति कितना वफादार था और अंग्रेजों के प्रति कितना वफादार था यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साल भर बाद ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने नारायण गणेश चंदावरकर को 1901 में बॉम्बे हाईकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया था। देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए बनी कांग्रेस के उस राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायण गणेश चंदावरकर ने जज बनकर अंग्रेजों की इतनी गज़ब सेवा की कि 1910 में ब्रिटिश शासकों ने नारायण गणेश चंदावरकर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से नवाजा था। 1913 में जज के पद से रिटायर होने के बाद यह चंदावरकर फिर कांग्रेस का बड़ा नेता बन गया था।
#तीसरा_नाम
1907 और 1908 में लगातार 2 बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रासबिहारी घोष ने कांग्रेस के झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतनी जोरदारी और ईमानदारी से लड़ी थी कि सन 1915 में ब्रिटिश शासकों ने रासबिहारी घोष को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था।
#चौथा_नाम
सन 1897 में अंग्रेज़ सरकार का एडवोकेट जनरल चेत्तूर संकरन नायर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था। नायर ने कांग्रेस के झंडे तले देश की आज़ादी की लड़ाई इतने भीषण तरीके से लड़ी थी कि अंग्रेजों ने 1904 में उसको कम्पेनियन ऑफ इंडियन एम्पायर की तथा 1912 में नाइटहुड (सर) की उपाधि देकर समान्नित तो किया ही था साथ ही साथ 1908 में ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया था। 1915 में वह उसी पद से रिटायर हुआ था।
यह👆🏼चार नाम किसी छोटे मोटे कांग्रेसी नेता के नहीं बल्कि कांग्रेस के उन राष्ट्रीय अध्यक्षों के हैं जिन्होंने ब्रिटिश दरबार में घुटने टेक कर ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार रहने की कसम खायी थी।
अतः आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पेशे से वकील इन राजनेताओं ने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया था जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी गदगद हो गयी थी कि उन्हें नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित कर डाला था.?
अंग्रेजों के वफादार रहे कुछ और नामों के ऐसे उदाहरण भी हैं जिनको आजादी मिलने के बाद महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए।
@Orchid83Kumbhat @Sheetal2242 जैसे तुम बोल रहे हो,काश चीन के नागरिकों को भी इस प्रकार बोलने की खुली छूट मिलती तो वहां के समाज और नेताओं की भी पोल खुल जाती... भारत भारत है कुछ भी बोलिए
*केरल में तिरुवनंतपुरम मेट्रोपॉलिटन काउंसिल में BJP की बड़ी जीत के बाद शहर में एक बड़ा बैनर लगाया गया। ये बैनर चुनाव जीतने वाले कॉर्पोरेटर के नहीं हैं, बल्कि उन वीरगति प्राप्त केरल के हिंदू कार्यकर्ताओं के हैं जिन्होंने पिछले 45 सालों में केरल में हिंदुत्व को बनाए रखने के लिए अपनी जान दे दी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो, BJP हो या कोई और हिंदुत्व संगठन, केरल में हिंदुत्व के लिए काम करना इतना आसान नहीं है। लेकिन संघ के लिए काम करते समय त्याग और समर्पण की भावना से काम करना पड़ता है। यह घटना यह साबित करती है।*
🚩जय श्री राम।🚩
एक भाई को ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने की पुरानी आदत थी।
कभी पकड़े नहीं गए, इसलिए हौसला दिन-ब-दिन बढ़ता चला गया।
धीरे-धीरे वो किसी की भी रिजर्व सीट पर धड़ल्ले से कब्जा करने लगे।
कोई टोके तो पहले गाली-गलौच, फिर धमकी और ज़रूरत पड़े तो मारपीट तक उतर आते।
एक दिन एसी कोच में बिना टिकट चढ़े और सीधे एक शरीफ सवारी की सीट पर जा धमके।
उस सज्जन ने मना किया तो वही पुराना ड्रामा शुरू—
पहले अभद्रता, फिर धमकियाँ, फिर हाथ छोड़ने की तैयारी।
सज्जन ने फौरन पुलिस को फोन कर दिया।
पुलिस आई तो भी भाई साहब हेकड़ी दिखाते रहे।
इतने में टीटीई साहब भी पहुँच गए और सबसे पहले टिकट माँगा।
टिकट तो था ही नहीं, बस आँय-बाँय शुरू।
फाइन की बात आई, गिरफ्तारी की बात आई तो भाई बोले:
“अरे जब मैं स्टेशन में घुसा तब आप कहाँ थे?
जब प्लेटफॉर्म पर चढ़ा तब क्यों नहीं रोका?
जब मैं यहाँ आराम से बैठ गया तब किसी ने कुछ नहीं कहा।
अब ये साहब झगड़ा करने लगे तो आप लोग टिकट का बहाना लेकर इनकी तरफदारी करने चले आए?
मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं, जाना इसी ट्रेन से है, तो क्या आप मुझे बाहर फेंक देंगे?
ये कैसा न्याय है भाई? पहले नोटिस दो!
हम सालों-साल से बिना टिकट चल रहे हैं, तब किसी को कुछ नहीं दिखा?
अब बस इस एक आदमी का पक्ष लेने के लिए फाइन ठोंक रहे हो?”
इतना सुनते ही कोच में मौजूद चार-पाँच और बिना टिकट वाले एकदम एक्टिव हो गए।
सब मिलकर हंगामा शुरू:
“ये ट्रेन हमारी है! हमने इसमें पसीना बहाया है!
हमारे बाप-दादों ने खून देकर ये रेल बनवाई है!
टिकट वालों से भेदभाव बंद करो!
सीट सबकी बराबर चाहिए, वरना तानाशाही है!
ये साहब न झगड़ते तो आप लोग आते भी नहीं, साफ-साफ इनकी सपोर्ट में कर रहे हो सब!”
फिर तो कुछ लोकल छुटभैये नेता भी पहुँच गए।
माइक निकाला और भाषण शुरू:
“रेल की सीटों पर पहला हक बिना टिकट यात्रियों का है!
रेलवे जानबूझकर टिकट वाले और बेटिकट वाले के बीच नफरत फैला रहा है।
हम ये नफरत नहीं होने देंगे!
हम कानून बनवाएँगे कि पहले सारी सीटें बिना टिकट वालों को मिलेंगी,
बची-खुची सीटें होंगी तो टिकट वालों को दे देना!”
टीटीई और पुलिस वाले आपस में देखने लगे—
अब बताओ, बिना टिकट वाले को पकड़ना गुनाह था या नेकी?
बस यही नैरेटिव आजकल देश में सेट करने की पूरी कोशिश हो रही है।
रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिए ठीक वैसे ही सरहद पार करके आते हैं,
कब्जे जमाते हैं, और हमारे सेक्युलर नेतागण, राहुल गांधी जैसे बड़े-बड़े लोग
खुलेआम उनकी वकालत करते हैं, SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं,
और यही कहते हैं - “पहले तो आने दिया, अब क्यों निकाल रहे हो?”
ठीक वही ट्रेन वाला डायलॉग, बस स्केल बड़ा हो गया है।
हम लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एक स्वयंसेवक के रूप में काम किया है...
यहां कोई OPEC देश पैसा नहीं देते, यहां कोई इंटरनेशनल चर्च पैसा नहीं देता,
यहां समाज के सहयोग से संगठन खड़ा हो रहा है...