"भारत के इतिहास की हर कहानी में राणा प्रताप को एक वीरोचित स्थान प्राप्त है। न केवल भारत में, अपितु विश्व के वीरों की श्रृंखला में वह प्रखर स्वतंत्रता सेनानी सदा याद रहेंगे।''
श्री दत्तात्रेय होसबाले
सरकार्यवाह,@RSSorg#HaldighatiVijay450
हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष.....
महाराणा प्रताप ने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊहपर मातृभूमि की स्वतंत्रता को रखा। उनका जीवन राष्ट्रनिष्ठा का आदर्श है।
#HaldighatiVijay450
लोहासिंह एवं भादराजून अभिलेख (१५७६-१५७७ ई.): हल्दीघाटी युद्ध के अगले कुछ महीनों और वर्षों के भीतर महाराणा प्रताप द्वारा आसपास के दर्जनों गांवों में 'लोहासिंह ताम्रपत्र' और भूमि सुधार संबंधी प्रशासनिक आदेश जारी किए गए।
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अरावली की घाटियों में भील धनुर्धारियों के तीर शत्रु के लिए आतंक का कारण बन गए थे। उन्होंने प्रताप की सेना को स्थानीय भौगोलिक गुरिल्ला युद्धकला का अमूल्य सहयोग दिया।#HaldighatiVijay450
हल्दीघाटी के रण में घायल होने के बाद भी #चेतक ने अपने स्वामी महाराणा प्रताप को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। स्वामीभक्ति और साहस का ऐसा उदाहरण इतिहास में विरल है।#HaldighatiVijay450
जब संघर्ष के कारण संसाधनों का संकट उत्पन्न हुआ, तब भामाशाह ने विशाल कोष महाराणा प्रताप को समर्पित कर दिया। यह राष्ट्रहित में त्याग की अनुपम मिसाल है।#HaldighatiVijay450
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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने पर समारोह
तिथि - 17 जून 2026, समय - प्रातः 9.30 बजे
स्थान - महाराणा भूपाल स्टेडियम, उदयपुर
वक्ता - डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
https://t.co/8PVqVS966u
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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने न केवल अपने शौर्य से, बल्कि कुशल नेतृत्व से भी मेवाड़ को दो दशक तक शांतिपूर्ण रखा।"
#HaldighatiVijay450
हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर उदयपुर में आयोजित राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
📍 चेतक सर्किल, उदयपुर
🎙 मुख्य वक्ता: डॉ मोहन भागवत जी
🏛 आयोजक: प्रताप गौरव केन्द्र
#HaldighatiVijay450
हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर उदयपुर में आयोजित राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
📍 चेतक सर्किल, उदयपुर
🎙 मुख्य वक्ता: डॉ मोहन भागवत जी
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समकालीन संस्कृत पांडुलिपि अमरकाव्य वंशावली में हल्दीघाटी युद्ध की विभीषिका का विस्तृत विवरण है कि युद्ध के पश्चात मुगल सेना इस कदर भयक्रांत थी कि महाराणा प्रताप की छापामार भील सेना के डर से पहाड़ों के भीतर प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाई।
राणा पुंजा ने भी तीन कमान धारी भीलों को साथ लेकर महाराणा प्रताप को वचन दिया कि वह भी मेवाड़ की रक्षा के लिए उनके साथ है। राणा पूजा के नेतृत्व में हल्दीघाटी युद्ध के दौरान छापामार युद्ध नीति से मुगल सेना को परास्त किया। #HaldighatiVijay450
उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा का ही होता था। प्रताप के शासनाधिकार से यह प्रमाणित होता है कि प्रताप #हल्दीघाटी_युद्ध में हारे नहीं थे बल्कि विजय रहे थे। #HaldighatiVijay450
महाराणा प्रताप ने प्रभु श्री राम के आदर्शों को अपनाते हुए महल छोड़ वनवास को चुना और समाज को एकजुट कर मेवाड़ की अस्मिता के लिए संग्राम चुना।#HaldighatiVijay450
महाराणा प्रताप के संघर्ष में भील समाज ने केवल सहयोग ही नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व अर्पित किया। वीर बालक दुधा भील महाराणा को भोजन सामग्री उपलब्ध करवाते हुए बलिदान हो गया।#HaldighatiVijay450
"मुगल इतिहासकारों के विवरण एकपक्षीयहोने के बावजूद उनके खुद के कथनों सेसिद्ध होता है कि युद्ध के बाद शाही (मुगल)सेना की बहुत बुरी दुर्दशा हुई थी।"
संदर्भ पुस्तकः
डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा की पुस्तक,उदयपुर राज्य का इतिहास, पृष्ठ 442
#हल्दीघाटी_विजय_450वर्ष#MaharanaPratapJayanti