पीके ने पहले ही एक इंटरव्यू में स्पष्ट कर दिया था कि उनका उद्देश्य केवल विधायक बनकर बांकीपुर के लिए सीमित स्तर पर काम करना नहीं है। उनका बड़ा लक्ष्य बिहार को देश का एक अग्रणी राज्य बनाना है, और उस दिशा में उन्होंने अपनी शुरुआत भी कर दी है। यही सोच और व्यापक विज़न देखकर बांकीपुर की जनता ने भी उन पर विश्वास जताया और उन्हें अपना समर्थन दिया।
वो अपना काम कर रहे हैं और पूरी मेहनत और ईमानदारी से कर रहे हैं। अलख पांडे एक कंपनी के मालिक हैं, इसलिए अपनी कंपनी की ब्रांडिंग और PR करना कोई गलत बात नहीं है, बल्कि हर सफल बिज़नेस का सामान्य हिस्सा है। जिस मुकाम पर वे आज हैं, वहाँ पहुँचकर अपनी पहचान और काम को आगे बढ़ाने के लिए PR करना बिल्कुल स्वाभाविक है।
इसके साथ ही, वे सिर्फ़ अपने बिज़नेस तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने ज़रूरतमंद और गरीब लोगों की मदद के लिए भी कई पहल की हैं। बच्चों को साइकिलें देना हो या असम बाढ़ जैसी आपदाओं में आर्थिक और अन्य प्रकार की सहायता करना—वे समाज के लिए भी लगातार योगदान दे रहे हैं। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके PR से नहीं, बल्कि उसके काम और समाज के प्रति उसके योगदान से भी किया जाना चाहिए।
तिलक तराजू और तलवार वाले युवा साथी लगातार 'RESERVATION HATAO ANDOLAN' को आगे बढ़ा रहें हैं!
अब हमे तब तक नहीं रुकना है जब तक या तो आरक्षण में reform ना हो जाये या इसे पूर्ण रूप से हटा ना दिया जाए!!
वीर तुम बढे चलो
धीर तुम बढे चलो,
आगे पहाड़ है
सिंह की दहाड़ !
#ReservationHatao
बेशक अजित भारतीं का आलोचक हूँ
लेकिन उनके एक फैन ने इस लेटर को शेयर करने के लिए आग्रह किया है। अजीत भारती मुझे ब्लॉक किया हुआ है उसे आपलोग कमेंट में टैग कर देना।
उन्होंने लिखा है 👇
आपके शुरुआती दिनों से मैं आपका प्रशंसक रहा हूँ। अगर समय मिले तो मेरे इस सुझाव को ज़रूर पढ़िए।
कुछ समय पहले तक आप, नेहा दास जैसे गिने-चुने लोग ही आरक्षण के मुद्दे पर खुलकर बोलते थे। लेकिन अब समय आ गया है कि इस बहस को और बड़े स्तर पर ले जाया जाए। मैंने आपका दिल्ली यूनियन वाला डिबेट देखा। शुरुआत में आपका वही तेज, आक्रामक और वीर रस वाला अंदाज़ पूरे माहौल पर भारी था, लेकिन बाद में जब सामने वाले अपनी बातें रखने लगे तो लगा कि हमारे पक्ष की धार थोड़ी कमजोर पड़ गई। मुझे लगता है कि इसकी वजह यह है कि हम हर बार नए-नए तर्कों का जवाब मौके पर सोचते हैं।
मेरे हिसाब से आरक्षण के समर्थन में आने वाले कुल तर्क बहुत सीमित हैं। मेरा सुझाव है कि आप, नेहा दास, AKTK और बाकी सभी प्रमुख वक्ता एक बार ऑनलाइन ही सही, बैठकर इन सभी तर्कों का संकलन करें और हर तर्क का तथ्यात्मक, मजबूत और आपके अंदाज़ वाला ऐसा जवाब तैयार करें कि फिर देश का कोई भी मंच हो, कोई भी डिबेट हो, हर वक्ता उसी मजबूती और उसी इंटेंसिटी के साथ जवाब दे। जब पूरे देश में एक जैसी धार के साथ जवाब दिए जाएँगे, तभी यह बात आम लोगों और छात्रों तक भी पहुँचेगी।
उदाहरण के लिए, जब कोई कहता है कि हमारे साथ अत्याचार होता है, तो सवाल यह भी होना चाहिए कि अत्याचार रोकने के लिए SC/ST Act जैसे कानून पहले से मौजूद हैं, फिर हर समस्या का समाधान आरक्षण ही क्यों बताया जाता है? जब शादी की बात करते हैं कि ऊँची जाति वाले शादी नहीं करेंगे, तो मेरा मानना है कि आज के समय में अधिकतर शादियाँ आर्थिक स्तर, शिक्षा, सोच और सामाजिक स्तर देखकर होती हैं, केवल जाति देखकर नहीं। इसी तरह यदि गरीबी और पिछड़ापन मूल समस्या है, तो समाधान आर्थिक रूप से कमजोर हर व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति का हो। अगर हर पीढ़ी तक जाति आधारित आरक्षण ही चलता रहेगा, तो फिर इसकी समयसीमा क्या होगी?
मेरा मानना है कि अगर हमारे पक्ष के 10–15 प्रमुख वक्ताओं के पास हर तर्क का एक जैसा, मजबूत और तथ्यपूर्ण जवाब होगा, तो आरक्षण पर होने वाली बहस की दिशा ही बदल सकती है। सामने वाले बार-बार वही तर्क दोहराते हैं, लेकिन अगर हर बार उन्हें उसी मजबूती से काटा जाए, तो उनके पास बचने की बहुत कम गुंजाइश रहेगी।
यह सिर्फ एक छोटे भाई का सुझाव है। अगर आपको उचित लगे तो इस पर एक बार ज़रूर विचार कीजिए।
धन्यवाद।
@TejasweeSs
अगर सेना में आरक्षण नहीं है क्योंकि वह एक संवेदनशील पेशा है, तो जो इंजीनियर पुल बना रहा है, जिसमें बाद में 50 लोग मर जाते हैं, क्या वह संवेदनशील नहीं है?
डॉक्टर, जिसके हाथ में लोगों की जान होती है, क्या वह संवेदनशील नहीं है?
कसम से, देश में विपक्ष कितना जाहिल है।
@INCIndia@RahulGandhi@AamAadmiParty@yadavakhilesh
#EndReservation
ओबीसी समाज के कई लोग भी अब आरक्षण के विरोध में अपनी आवाज़ उठाने लगे हैं। जो भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर देश और समाज के व्यापक हित में सोचता है, वह आरक्षण जैसी नीतियों का समर्थन कभी नहीं करेगा.
#ReservationHataoMovement
जिस देश में चुनावो में ईमानदार व्यक्ति को टिकट ना देकर, जाती देखकर टिकट दिया जाता हो,
जिस देश में जाती देखकर सरकारी नौकरियाँ दी जाती हो
जिस देश में जाती देखकर परीक्षा में pass-fail किया जाता हो,
जिस देश में जाती देखकर एंट्रेंस एग्जाम के कटऑफ सेट किए जाते हो,
जिस देश में जाती देखकर सरकारी योजनाएं लाई जाती हो,
जिस देश में जाती देखकर कॉलेजो के नियम तय किए जाते हो
जिस देश में जाती देखकर कानून की धाराए लिखी जाती हो
जिस देश में उच्चतम राजनीतिक पदो पर जाती देखकर सत्ता सौंपी जाती हो,
जिस देश में मेरिट को स्थान ना देकर जाती को स्थान दिया जाता हो,
जिस देश में योग्यता ना देखकर जाती को ही योग्य माना जाता हो,
उस देश को बर्बाद होने से साक्षात भगवान भी नहीं बचा सकते।
जय भीम - CJP प्रोटेस्ट -मोदी जी आपके चाहने वाले जंतर मंतर पर है
मिल लो 😃
आपका बहुत सम्मान कर रहे है क्योंकि आप दलित के बेटे हो आपको अपमानित किया जा रहा है। OBC धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा जा रहा है क्योंकि वो कुर्मी है
जेसी करणी बेसी भरनी - बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से आय।
#पंकजधवरैय्या #pankajdhavraiyya #दिल्ली #DharmendraPradhan #JantarMantar
I remember one of my first tweets against Reservations. It went viral & got around 500+ comments.
Around 90% were people tagging Delhi Police, demanding my arrest under SC/ST Act.
Today, the same issue is being discussed in the mainstream media. We've come a long way.
अगर 100 पदों की वैकेंसी है, तो समान अवसर का मतलब ही यही है कि सभी अभ्यर्थियों को उन सभी पदों पर प्रतिस्पर्धा करने का समान अवसर मिले, न कि सिर्फ 40 पदों पर।
आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ओपन मेरिट में चयनित होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि उन्हें अलग से किसी कैटेगरी की ज़रूरत नहीं है, मेरिट में कोई वर्ग किसी से अब कमतर नहीं रहा ।
मेरिट कोई सदियों से विरासत में मिलने वाली चीज़ नहीं है।
अगर मेरे परदादा को पढ़ाई का मौका नहीं मिला, तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं भी पढ़ाई नहीं कर पाऊँगा।
मेरी मेरिट इस बात पर निर्भर करेगी कि मुझे शिक्षा ग्रहण करने का कितना अवसर मिला।
अब चूँकि मेरिट इस बात पर निर्भर करती है कि उस व्यक्ति विशेष को शिक्षा का कैसा अवसर मिला, इसलिए आरक्षण भी उसे ही दिया जाना चाहिए, जिसे समान अवसर अभी नहीं मिल रहा है।
यहाँ पर एक पीढ़ी का प्रारंभिक बिंदु उस पीढ़ी के जन्म से है, न कि एक हज़ार साल के इतिहास से।
इस देश में मेरिट और आरक्षण को बिल्कुल किसी वैकल्पिक बहस की तरह नहीं, बल्कि एक अनिवार्य पाठ की तरह पढ़ाया जाना चाहिए।
यह बताया जाना चाहिए कि समान अवसर क्या है और कैसे ऐतिहासिक अन्याय के नाम पर, जो वर्ग वास्तव में आरक्षण का हकदार है, उसे उसका लाभ न देकर एक वर्चस्वशाली समूह आरक्षण का लाभ ले रहा है।
और वर्चस्वशाली समूह वह है, जो हर तरह से संपन्न होकर भी सदियों की कहानी के नाम पर वंचितों के आरक्षण के अधिकार को ले रहा है।
अब एक ही बात बचती है कि व्यक्ति चाहे IAS या IPS ही क्यों न बन जाए, उसे जातिगत दंश झेलना पड़ता है।
तो इसका मतलब फिर यही हुआ न कि जातिगत विद्वेष हटाने के लिए आरक्षण एक सही हथियार नहीं है???