@SupriyaShrinate Yhi to hai jha koi male protest krega to female police ko bhejenge jisse agr kisi ka hath galati se bhi touch ho jaye to fas gya CM ...OR FEMALE protester ke liye khud janwar jese handle krte h
@IMinakshiJoshi Mdm ji samay samay ki baat hai phle bjp neta welcome ke chuke hai ab rahul gandhi kul mila kr baat ye hai ki jab recharge ke pese bdh rhe hai to data ki speed q km ho rhi hai
@ABPNews To kya ye protest n hokar gangwar to nhi ho rha @DelhiPolice aapko dono se sambhalna hai sir... best of luck apni duty smbhal ke krna ji goons ko jail m dalna pr khud ko bhi bchana or dairya dikhana pr apni ijjat km na hone dena..
@DIPENDR14806878@arvindchotia Sirf teacher hi vote nhi dalwate bhai sare department voting krwate hai to sbka hi festival khrab hota h or rhi baat ki to festival pr wese bhi police ki bhut si or bhi jimmedariyan hoti hai...jbki voting m police ka bhi bhut jyada yogdaan rhta hai to law and order ...
राज भले ही भारतीयों का है
भले ही लोकतंत्र आ गया है
लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये हमारे राजस्थान में चुनाव की तारीखें आज भी अंग्रेज ही तय करते हैं। कोई भारतीय अधिकारी चुनाव की तारीखें तय कर रहे होते तो कुछ खास भारतीय तिथियों का अवश्य ही ध्यान रखते। लेकिन लगता है, हर चुनाव में ये अंग्रेज अपनी टांग अड़ा देते हैं।
भारत में धनतेरस का महत्व क्या किसी भारतीय अधिकारी को बताने की जरूरत है? अधिकारी तो ये सब रटकर-पढ़कर ही बनते होंगे। एक साधारण भारतीय भी धनतेरस का महत्व जानता है। देश के सबसे बड़े त्यौहार दीपावली पर्व का यही पहला दिन है जब बाजार गुलजार हो उठते हैं। इस एक दिन भारत के लोग बाजार जरूर जाते हैं। गांवों के लोग खरीदारी के लिए शहर आते हैं लेकिन अंग्रेजों को इससे क्या? उन्हें तो अपने हिसाब से एक तारीख तय करनी होती है। भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे आपत्ति दर्ज कराएं। फिर वे जागेंगे और उसमें संशोधन भी कर देंगे।
2023 के विधानसभा चुनाव में भी अंग्रेजों ने यही किया था। राजस्थान में विधानसभा चुनाव का पहला चरण देव उठनी एकादशी के दिन ही घोषित किया था। क्योंकि अंग्रेजों को यह सब कहां पता होता है कि देव उठनी एकादशी का भारतीय संस्कृति में क्या महत्व है? फिर भारतीयों ने आपत्ति की। भारतीय मीडिया ने मुद्दा उठाया, मतदान प्रतिशत कम रहने का अंदेशा जताया तब जाकर तारीखों में बदलाव किया गया। इस बार अंग्रेज बहादुरों को चिठ्ठी लिखने की पहल सांचौर विधायक जीवाराम चौधरी ने की है। बदलाव निश्चित है। लेकिन हर बार ये अफसर अपने अंग्रेज होने का सबूत दें ही, यह जरूरी है क्या?
*सांचौर विधायक ने चुनाव तारीख बदलने की मांग की:* बोले- 4 और 6 नवंबर को त्योहार है, वोटर व्यस्त रहेंगे; निर्वाचन आयुक्त को लेटर लिखा
https://t.co/sMPqK9lHwx
जिस देश में पार्षद चुनाव के बाद खरीद-फरोख्त और क्रॉस वोटिंग के आरोप लगते हैं, राज्यसभा चुनाव में वोटों के सौदे के आरोप सामने आते हैं, धनबल के आरोपों के बीच चुनी हुई सरकारें गिर जाती हैं और पूरी-पूरी पार्टियों पर कब्जे की राजनीति होती है, वहाँ राजस्थान में सरपंच प्रत्याशी को प्रचार के लिए सिर्फ 17 घंटे देकर धनबल रोकने का तर्क दिया जा रहा है!
वाह रे व्यवस्था
धनबल रोकना है तो धनबल पर लगाम लगाइए, प्रचार का समय क्यों काट रहे हैं
गाँव का गरीब प्रत्याशी 17 घंटे में क्या करेगा
दोपहर को चुनाव चिन्ह मिलेगा, फिर पर्चे-पोस्टर बनवाएगा, उसके बाद घर-घर जाएगा और रात तक पूरे गाँव को अपना चुनाव चिन्ह समझाएगा
क्या यही लोकतंत्र है
अगर बड़े चुनावों में हफ्तों-महीनों तक प्रचार हो सकता है, तो गाँव के मतदाता को अपने सरपंच का उम्मीदवार समझने के लिए समय क्यों नहीं मिलना चाहिए
चुनाव में धनबल रोकने के नाम पर लोकतंत्र की आवाज को छोटा मत कीजिए।
प्रचार का समय घटाने से धनबल नहीं रुकता, बल्कि मतदाता का अधिकार सीमित होता है।
चुनाव आयोग को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
@SecRajasthan@ECISVEEP
सरपंच एवं पंच के चुनाव में नामांकन चुनाव से एक दिन पूर्व निर्धारित कर दिया गया है तथा चुनाव से लगभग 17 घंटे पहले चुनाव चिन्ह आवंटित किया जाता है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अपना चुनाव चिन्ह मतदाताओं तक पहुंचाना और उन्हें समझाना मुश्किल हो जाता है तथा चुनाव के दौरान अफरा-तफरी का माहौल बनता है।
मेरी मांग है कि ब्लॉक एवं जिला परिषद सदस्यों के नामांकन के साथ ही पंच एवं सरपंचों के नामांकन भी उपखण्ड कार्यालय में करवाए जाएं तथा उपखण्ड कार्यालय द्वारा ही चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएं।
इस व्यवस्था से उम्मीदवारों को अपने चुनाव चिन्ह को मतदाताओं तक पहुंचाने और समझाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा तथा चुनाव शांतिपूर्ण एवं व्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सकेंगे।
आशा है कि राज्य निर्वाचन आयोग एवं पंचायती राज विभाग इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए आवश्यक कदम उठाएगा।
बलकौर सिंह ढिल्लों
हरिपुरा, संगरिया, हनुमानगढ़
@DmHanumangarh@Khushaal_IAS@SecRajasthan@RajCMO@jogaram
कुछ दिन पहले निर्वाचन विभाग के एक अधिकारी का बयान आया था कि त्योहारों को ध्यान में रखते हुए चुनाव की तारीख तय की जाएगी।
लेकिन अब तीसरे चरण में सरपंच पद का मतदान धनतेरस के दिन और अगले ही दिन रूप चौदस/छोटी दीपावली के दिन उपसरपंच का चुनाव रखा गया है।
सवाल यह है कि जब प्रदेश का सबसे बड़ा त्योहार दीपावली सामने हो, तब गांवों में चुनाव प्रक्रिया रखने से आम मतदाता, प्रत्याशी, मतदानकर्मी और प्रशासन के सामने कितनी परेशानियां खड़ी होंगी?
त्योहारों की अपनी परंपरा और सामाजिक महत्व है। चुनाव लोकतंत्र का महत्वपूर्ण पर्व है, लेकिन दोनों के बीच ऐसा संतुलन होना चाहिए कि किसी को भी अनावश्यक परेशानी न हो।
निर्वाचन विभाग को इस निर्णय पर एक बार पुनर्विचार कर त्योहारों और ग्रामीण जनता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए चुनाव कार्यक्रम तय करने पर विचार करना चाहिए।
लोकतंत्र मजबूत तभी होगा, जब चुनाव भी सुविधाजनक माहौल में हों और त्योहार भी पूरे उत्साह से मनाए जा सकें।
@SecRajasthan