बयान की राजनीति और योगदान का प्रश्न
✍️ डॉ विनोद नराणीवाल
आप ने वाइस चांसलर नियुक्तियों और को लेकर जो टिप्पणी की, उसने एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के स्तर पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है। किसी संगठन की विचारधारा से असहमति भी स्वाभा��िक है। लेकिन असहमति और उपहास के बीच एक बहुत पतली रेखा होती है, और जब राजनीति उस रेखा को पार करने लगती है, तब वह तर्क से अधिक पूर्वाग्रह जैसी प्रतीत होने लगती है।
दशकों से देश ने ऐसे हजारों लोगों को देखा है जिन्होंने समाज सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, संगठन निर्माण और सार्वजनिक जीवन में योगदान दिया। किसी संगठन से जुड़े व्यक्ति से असहमति रखी जा सकती है, लेकिन यह कहना कि ज्ञान, अनुभव और योग्यता अप्रासं���िक हो जाते हैं, एक व्यापक सामान्यीकरण है।
शायद आप जैसे कुछ नेताओं को लगता है कि विश्वविद्यालयों में पुस्तकालय नहीं, राजनीतिक सदस्यता रजिस्टर रखे जाते होंगे।
शायद यह लगता है कि शोधपत्रों की जगह विचारधारा के प्रमाणपत्र जमा होते होंगे।
और शायद यह भी लगता होगा कि किसी व्यक्ति के वर्षों के अध्ययन, अनुभव और परिश्रम से अधिक उसकी पहचान मायने रखती है।
लेकिन वास्तविकता अक्सर राजनीति से अधिक जिद्दी होती है।
विचारों से लड़िए, तथ्यों से बहस कीजिए, नीतियों की आलोचना कीजिए — यही लोकतंत्र है। परंतु लाखों लोगों के योगदान को एक वाक्य में छोटा करने का प्रयास, बहस को मजबूत नहीं करता; वह केवल शोर को बड़ा करता है।
इतिहास का एक सरल नियम है —
जो लोग जड़ों को समझे बिना वृक्ष पर टिप्पणी करते हैं, वे अक्सर उसकी ऊँचाई देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
@RSSorg @BJP4India @BJP4Rajasthan @narendramodi @AmitShahOffice @INCIndia @RahulGandhi
“पूरा देश जानता है कि अगर आप वाईस चांसलर बनना चाहते हैं, आपको सब्जेक्ट नॉलेज की कोई ज़रूरत नहीं, आपको एक्सपीरियंस की कोई ज़रूरत नहीं। अगर आप rss के हैं, तो आप वाईस चांसलर बन सकते हैं”
जब किसी गंभीर आरोप की नींव “सुना गया”, “बताया गया”, “कहानियाँ प्रचलित थीं” जैसे वाक्यों पर टिकी हो, तो वह स्वतः ही ज्ञान (knowledge) की श्रेणी से बाहर होकर केवल मत (opinion) या अधिक से अधिक अनुमान (speculation) बन जाता है
विचार परंपरा में यह एक स्थापित सिद्धांत है कि:
👉 “असाधारण आरोपों के लिए असाधारण प्रमाण आवश्यक होते है
किन्तु यहाँ आरोपों की गंभीरता जितनी अधिक है, प्रमाणों की अनुपस्थिति उतनी ही गहरी है। यही असंतुलन इन दावों की विश्वसनीयता को मूलतः संदिग्ध बना देता है।
क्योंकि ज��� कोई नेता
देश को वैश्विक स्तर पर मजबूत करता है
भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करता है
और मजबूत राजनीतिक स्थिति बना लेता है
तो उसके खिलाफ व्यक्तिगत और चरित्र पर आधारित हमले शुरू हो जाते हैं, क्योंकि विरोधी विचारधारा के पास ठोस मुद्दे नहीं बचते
यहां यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है, लेकिन झूठे और अश्लील आरोप लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि दुरुपयोग है
@narendramodi @BJP4Rajasthan @BJP4India @madanrrathore
This explains why I kept a safe distance from Modi from the time he assumed power in May 2014. I did not even go to gift him a copy of my book on him. Just sent an unsigned copy through his favourite bureaucrat Bharat Lal!
The names of women who were made MPs and ministers by Modi due to intimacy with him were being whispered loudly enough within Sanghi power networks right at the outset. That is why I took precautions very early on.
The names of those like Hardeep Puri who provided him special services while he was Gujarat CM were also being shared in hushed tones as soon as Hardeep and Jaishankar were included in the Cabinet!
In 2014, when I went for lectures to America, there too tales of his aiyyashi were doing the rounds.
Appointment of 12th pass Smriti Irani as Education Minister had given credence to other scandals, till then hidden from public view.
The scandal involving Mansi Soni had already reached the Supreme Court.
Someone close to Modi gave me a whole set of papers submitted in the Supreme Court by the incarcerated IAS officer who too was having a rollicking time with Soni.
In addition, people from Gujarat, including some of those close to Modi, shared with me disgusting stories of his sickly dalliances with women while he was Gujarat CM.
And earlier while he was pracharak and BJP office bearer!
Hearing those stories, I became so averse to his presence that I avoided even those functions, including marriage receptions, where Modi was likely to show up!
So traumatized I was by the gory accounts that I actually sank into deep depression in 2014 which deeply impacted my health. Went for 21 days to an Ayurvedic healing centre in Coimbatore in 2015 in the hope of recovering from multiple shocks.
I remember when I shared my grief at the reports I was hearing with a very senior RSS intellectual, he shrugged it off saying, "why are you so shocked? Why should his personal life bother any of us?"
The appointment of #pornpeddler Amit Malviya as BJP's Social
Media incharge was yet another proof of the inclinations of the top bosses of BJP!
I might have overlooked his predatory sexual conduct, if he had done well on other fronts.
But his aggressive peddling of genocidal vaccines and brazen attempts at crushing Hindu samaj and demonizing Hindu dharma, his outrageous patronage of Bheemtas and Meemtas to launch lethal attacks on Hindus, his slavish conduct vis a vis the Globalist Mafia, his devilish conduct in persecuting Hindus during the Kathua Kand (described in detail in my book The Girl From Kathua, A Sacrificial Victim of GhazwaE Hind) and much else, made me realize in the first term itself that we are saddled with a Satanic ruler, a CIA plant who has been put in power to wreck India, and decimate Hindus!
Modi's personality disorders have convinced me that we should pay far more attention to sexual corruption of our leaders.
Those who are compromised on this front very easily succumb to blackmail by enemies of Bharat, than those who are financially corrupt!
Will soon provide proof of how he is being blackmailed from day one.
Hence the vulgar 56 inchiya boasts!
ये क्या कि तुम कभी भी मीज़ान बदल देते हो,
मैं सा रे गा मा लगाता हूँ, तुम तान बदल देते हो।
बरसों बरस सँभाल के रखता हूँ मैं अपने पंख,
और जब वक़्त आता है, तुम उड़ान बदल देते हो।
मैं पसीने से तराशता हूँ अपनी तक़दीर का सफ़ा,
तुम एक दस्तख़त में पूरा अरमान बदल देते हो।
मैं सच की लौ जलाए अंधेरों से लड़ता रहता हूँ,
तुम हवाओं का रुख़ मोड़कर तूफ़ान बदल देते हो।
मैं खामोशी से भी अपनी जंग लड़ लेता हूँ,
तुम महफ़िल में आकर पूरा बयान बदल देते हो।
फिर भी सुन लो…
मेरे हौसलों की उम्र तुमसे कहीं लंबी है,
तुम चाहे जितनी बार इम्तिहान बदल देते हो।
और याद रखना —
हम वो लोग हैं जो हालात से हारते नहीं,
तुम रास्ते बदलते रहो… हम आसमान बदल देते हैं।
ये क्या कि तुम कभी भी मीज़ान बदल देते हो.. मैं सा रे गा मा लगाता हूँ, तुम तान बदल देते हो.. बरसों बरस तैयार करता हूँ मैं अपने पंख.. और जब मौक़ा आता है, तुम उड़ान बदल देते हो....... फिर भी...
#Zindagi_Zindabaad
एक ही रैंक पर दावा करने वाले तीसरे प्रकरण के बाद यूपीएससी परिणाम चर्चा में
9 मार्च 2026
यूपीएससी रिजल्ट ने चौंकाने वाले परिणाम दिये है
एक के बाद एक समान रैंक पर दो अलग अलग अभ्यर्थियों के दावा करने वालों की श्रेणी में अब तीसरे विवाद ने ली जगह
रैंक 522 पर भी दो अलग अलग पूजा को बधाई मिल रही है
आईएएस एस्पायरेंट ऐसे क्लेम कर सकते है यह कभी सोचा भी नहीं जा सकता है अभी यह समझ से बाहर है कि जिस तरह से आकांक्षा सिंह वाले मामले में यूपीएससी ने स्वयं विरोधाभास को समाप्त किया तीस वैसे ही इन दो मामलों में भी कब किया जाएगा यह देखने लायक पहलू होगा
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यूपीएससी रिजल्ट में मचा एक और हंगामा
दैनिक भीलवाड़ा केसरी
8 मार्च 2026
पूर्व में रैंक नंबर 301 पर दो आकांक्षा सिंह ने जिस तरीके से अपना-अपना दावा किया उसे तरीके का एक अनोखा मामला और सामने आया हे जिसमें दो राहुल कुमार एक ही रैंक पर अपना अपना दावा कर रहे है
रैंक 141 पर भागलपुर के राहुल कुमार को 141 में रैंक मिलने पर प्रमुख समाचार पत्रों ने बधाई दी और इस समय पर राजसमंद के राहुल कुमार पालीवाल ने भी 141 की रैंक प्राप्त करना बताया और स्थानीय विधायक और नेताओं ने उनको भी बधाई दे दी
हैरानी की बात यह है कि यह समझ में नहीं आ रही है कि आईएएस एस्पायरेंट एसा इश्यू कैसे बना सकता है
और ऐसे भ्रामक दावा करने से जनता को भ्रमित करने पर क्या इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जाएगी ?
@8PMnoCM@DainikBhaskar@JagranNews@arvindchotia@Viveksbarmeri@ashokshera94@ABPNews
यूपीएससी रिजल्ट में मचा एक और हंगामा
दैनिक भीलवाड़ा केसरी
8 मार्च 2026
पूर्व में रैंक नंबर 301 पर दो आकांक्षा सिंह ने जिस तरीके से अपना-अपना दावा किया उसे तरीके का एक अनोखा मामला और सामने आया हे जिसमें दो राहुल कुमार एक ही रैंक पर अपना अपना दावा कर रहे है
रैंक 141 पर भागलपुर के राहुल कुमार को 141 में रैंक मिलने पर प्रमुख समाचार पत्रों ने बधाई दी और इस समय पर राजसमंद के राहुल कुमार पालीवाल ने भी 141 की रैंक प्राप्त करना बताया और ���्थानीय विधायक और नेताओं ने उनको भी बधाई दे दी
हैरानी की बात यह है कि यह समझ में नहीं आ रही है कि आईएएस एस्पायरेंट एसा इश्यू कैसे बना सकता है
और ऐसे भ्रामक दावा करने से जनता को भ्रमित करने पर क्या इनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जाएगी ?
@8PMnoCM @DainikBhaskar @JagranNews @arvindchotia @Viveksbarmeri @ashokshera94 @ABPNews
वेदों में “ज्योतिष” शब्द मंत्रों के अंदर नहीं मिलता, क्योंकि “ज्योतिष” वेद का अंग है, वेद का अध्याय नहीं।
यानी—
वेद = मुख्य ग्रंथ
वेदांग = वेद को समझने और प्र���ोग करने के उपकरण
जैसे व्याकरण, निरुक्त, छन्द और कल्प—
वैसे ही ज्योतिष भी वेदांग है, इसलिए उसका मुख्य स्रोत वेदों में नहीं, वेदांग-ज्योतिष नामक अलग ग्रंथ में है।
लेकिन अगर आप पूछ रहे हैं कि वेदों में ज्योतिषीय तत्व या खगोलीय गणना कहाँ मिलती है,
तो हाँ—वेदों में कई मंत्र नक्षत्र, सूर्य-चंद्र गति, ऋतुओं, काल-गणना का उल्लेख करते हैं।
🔹 1. ऋग्वेद 10.85.13 — नक्षत्रों का उल्लेख
> “नक्षत्राणि देवा अ��्वयन्त…”
देवताओं ने नक्षत्रों का निर्धारण किया।
🔹 2. ऋग्वेद 1.164.11 — सूर्य की गति और समय-चक्र
> “द्वादश प्रधयश्चक्रं…”
१२ भागों वाला वर्ष-चक्र (सौर वर्ष)।
🔹 3. ऋग्वेद 10.18.1 — सूर्योदय-सूर्यास्त व काल
> “उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः…”
सूर्य के उदय से समय का प्रवाह।
🔹 4. यजुर्वेद 33.43 — चंद्र-कलाएँ
> “यच्चन्द्रमा विवर्धते…”
चंद्रमा की वृद्धि–क्षय (चंद्र मास का आधार)।
🔹 5. अथर्ववेद 19.7.2 — ऋतुओ��� और वर्ष-चक्र का वर्णन
> वर्ष-गणना और ऋतु-चक्र।
🔹 6. सामवेद में नक्षत्रों व मासों के उल्लेख
यज्ञ-मुहूर्त, ऋतुओं और आकाशीय घटनाओं का बार-बार संदर्भ।
ज्योतिष का उद्देश्य वेदों के यज्ञीय कर्मों का समय निर्धारण था।
इसलिए वेदों में इसके बीज—नक्षत्र, सूर्य-चंद्र, ऋतु, मास, संवत्सर—सब मिलते हैं,
पर “ज्योतिष” नामक व्यवस्थित शास्त्र वेदांग के रूप में ��िलता है।
वेदांग-ज्योतिष ही वह ग्रंथ है जिसे 'ज्योतिष शास्त्र' की नींव माना जाता है
इसका प्रारंभिक मंत्र है—
“कालोऽस्य जनकः...”
समय ही यज्ञ का जनक है।
यही कारण है कि प्राचीन भारत में
ज्योतिष = खगोल गणित + समय निर्धारण + नक्षत्र विज्ञान ही सारांश होता था
जो कि वेद-परंपरा का अनिवार्य अंग था।
@TheTribhuvan ये दावे सुनने में आकर्षक लग सकते हैं, पर यह आधी-अधूरी जानकारी और सतही तर्क पर आधारित निष्कर्ष हैं
‘वेदों में ज्योतिष नहीं’ — यह दावा ही गलत है
वेदांगों की सूची प्राचीनतम स्रोतों—याज्ञवल्क्य, पाणिनि, निरुक्त, मनुस्मृति आदि—में स्पष्ट रूप से दी गई है।
इन छह वेदांगों में एक है:
📌 ज्योतिष वेदांग
अर्थात्—ज्योतिष वैदिक परंपरा का अविभाज्य अंग है।
ज्योतिष वेदांग के ग्रंथ—लाघव ज्योतिष, सूर्य सिद्धांत, वेदांग ज्योतिष—स्पष्ट रूप से वेद-कालीन हैं और समय-ज्ञान, नक्षत्र-विज्ञान, ग्रह-गति तथा गणना की विस्तृत व्याख्या करते हैं।
“क्योंकि वेदों में राशिफल शब्द नहीं लिखा है इसलिए ज्योतिष वैदिक नहीं”—यह वैसी ही तर्कहीन बात है ज���से “वेदों में ‘भौतिकी’ शब्द नहीं है इसलिए वेदों में विज्ञान नहीं था।”
§
वैदिक ज्योतिष केवल कैलेंडर विज्ञान नहीं है
प्राचीन ज्योतिष सिर्फ़ “पंचांग बनाने” तक सीमित था।
यह भी गलत है।
"बृहद्पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, जातक पारिजात, जैमिनि सूत्र, वराहमिहिर का बृहत्संहिता"
ये सभी ग्रंथ आधुनिक फलित ज्योतिष की रीढ़ हैं, और ये प्राचीन भारतीय खगोल–ज्योतिष की निरंतर परंपरा में आते हैं।
यदि फलित ज्योतिष कोई आधुनिक “धंधा” होता, तो इतने विद्वान ऋषि इसे लिखते ह�� क्यों?
§
मनोविज्ञान वाले तर्क अधूरे हैं
बरनूम इफ़ेक्ट और कन्फ़र्मेशन बायस का तर्क यह मानकर चलता है कि हर भविष्यवाणी धुंधली और सब पर लागू होने वाली होती है।
लेकिन असली ज्योतिषी—
दशा–अंतरदशा
ग्रह दिग्बल
अष्टकवर्ग
नक्षत्र पाद
विभाजन कुंडलियाँ (D1–D60)
—इन सबके आधार पर विशिष्ट और अस्पष्टता रहित भविष्यवाणियाँ करते हैं।
यह भविष्यवाणियाँ generic statements नहीं होतीं।
इसलिए मनोविज्ञान वाले तर्�� पॉप-अस्ट्रोलॉजी पर लागू होते हैं,
वैदिक ज्योतिष पर नहीं।
§
दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास, पाखंड, गलत प्रथाओं और धार्मिक दलाली का विरोध किया था—
ज्योतिष शास्त्र का नहीं।
सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने क्वैक ज्योतिषियों की आलोचना की,
पर वेदांग–ज्योतिष को प्रमाणित और अनिवार्य माना।
इसीलिए आर्यसमाज के सभी संस्कार एवं यज्ञ—
पंचांग आधारित होते हैं।
यदि वह “ज्योतिष धोखा है” मानते, तो पंच��ंग छोड़ने की बात करते।
§
ज्योतिष एक परंपरा है जो हजारों वर्षों की निरंतर गणना और अवलोकन पर आधारित ह��
ऋग्वैदिक नक्षत्र सूचियाँ
महाभारत के ग्रहण-विश्लेषण
आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य के खगोल सिद्धांत
प्राचीन यूनान, मिस्र, चीन, माया सभ्यता तक समान विचार
इतना विशाल, संगत और स्वतंत्र विकास किसी “मूर्ख बनाने के जाल” का परिणाम नहीं हो सकता।
यह एक संगठित, अवलोकन-आधारित, क्रमिक वैज्ञानिक परंपरा है।
§
“वैदिक ज्योतिष नहीं होता”,
“फलित ज्योतिष भ्रम है”—
ये दावे केवल आंशिक जानकारी, भावनात्मक प्रतिक्रिया, या आधुनिकता के मोह से उपजे विचार हैं।
सच्चाई यह है—
ज्योतिष भारतीय ज्ञान-परंपरा का गहन, बहुआयामी और शोध-आधारित विज्ञान है, जिसमें खगोल, गणित, सांख्यिकी, मनोवैज्ञानिक पैटर्न और सांस्कृतिक अध्ययन सभी शामिल हैं।
ज्योतिष को अस्वीकार करना हर किसी का अधिकार है,
लेकिन गलत तथ्यों के आधार पर प्राचीन विद्या को “धंधा” कहना—
ज्ञान और इतिहास—दोनों के प्रति अन्याय है।
@TheTribhuvan ये दावे सुनने में आकर्षक लग सकते हैं, पर यह आधी-अधूरी जानकारी और सतही तर्क पर आधारित निष्कर्ष हैं
‘वेदों में ज्योतिष नहीं’ — यह दावा ही गलत है
वेदांगों की सूची प्राचीनतम स्रोतों—याज्ञवल्क्य, ��ाणिनि, निरुक्त, मनुस्मृति आदि—में स्पष्ट रूप से दी गई है।
इन छह वेदांगों में एक है:
📌 ज्योतिष वेदांग
अर्थात्—ज्योतिष वैदिक परंपरा का अविभाज्य अंग है।
ज्योतिष वेदांग के ग्रंथ—लाघव ज्योतिष, सूर्य सिद्धांत, वेदांग ज्योतिष—स्पष्ट रूप से वेद-कालीन हैं और समय-ज्ञान, नक्षत्र-विज्ञान, ग्रह-गति तथा गणना की विस्तृत व्याख्या करते हैं।
“क्योंकि वेदों में राशिफल शब्द नहीं लिखा है इसलिए ज्योतिष ���ैदिक नहीं”—यह वैसी ही तर्कहीन बात है जैसे “वेदों में ‘भौतिकी’ शब्द नहीं है इसलिए वेदों में विज्ञान नहीं था।”
§
वैदिक ज्योतिष केवल कैलेंडर विज्ञान नहीं है
प्राचीन ज्योतिष सिर्फ़ “पंचांग बनाने” तक सीमित था।
यह भी गलत है।
"बृहद्पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, जातक पारिजात, जैमिनि सूत्र, वराहमिहिर का बृहत्संहिता"
ये सभी ग्रंथ आधुनिक फलित ज्योतिष की रीढ़ हैं, और ये प्राचीन भारतीय खगोल–ज्योतिष की निरंतर परंपरा में आते हैं।
यदि फलित ज्योतिष कोई आधुनिक “धंधा” होता, तो इतने विद्वान ऋषि इसे लिखते ही क्यों?
§
मनोविज्ञान वाले तर्क अधूरे हैं
बरनूम इफ़ेक्ट और कन्फ़र्मेशन बायस का तर्क यह मानकर चलता है कि हर भविष्यवाणी धुंधली और सब पर लागू होने वाली होती है।
लेकिन असली ज्योतिषी—
दशा–अंतरदशा
ग्रह दिग्बल
अष्टकवर्ग
नक्षत्र पाद
विभाजन कुंडलियाँ (D1–D60)
—इन सबके आधार पर विशिष्��� और अस्पष्टता रहित भविष्यवाणियाँ करते हैं।
यह भविष्यवाणियाँ generic statements नहीं होतीं।
इसलिए मनोविज्ञान वाले तर्क पॉप-अस्ट्रोलॉजी पर लागू होते हैं,
वैदिक ज्योतिष पर नहीं।
§
दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास, पाखंड, गलत प्रथाओं और धार्मिक दलाली का विरोध किया था—
ज्योतिष शास्त्र का नहीं।
सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने क्वैक ज्योतिषियों की आलोचना की,
पर वेदांग–ज्योतिष को प्रमाणित और अनिवार्य म���ना।
इसीलिए आर्यसमाज के सभी संस्कार एवं यज्ञ—
पंचांग आधारित होते हैं।
यदि वह “ज्योतिष धोखा है” मानते, तो पंचांग छोड़ने की बात करते।
§
ज्योतिष एक परंपरा है जो हजारों वर्षों की निरंतर गणना और अवलोकन पर आधारित है
ऋग्वैदिक नक्षत्र सूचियाँ
महाभारत के ग्रहण-विश्लेषण
आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य के खगोल सिद्धांत
प्राचीन यूनान, मिस्र, चीन, माया सभ्यता तक समान विचार
इतना विशाल, संगत औ��� स्वतंत्र विकास किसी “मूर्ख बनाने के जाल” का परिणाम नहीं हो सकता।
यह एक संगठित, अवलोकन-आधारित, क्रमिक वैज्ञानिक परंपरा है।
§
“वैदिक ज्योतिष नहीं होता”,
“फलित ज्योतिष भ्रम है”—
ये दावे केवल आंशिक जानकारी, भावनात्मक प्रतिक्रिया, या आधुनिकता के मोह से उपजे विचार हैं।
सच्चाई यह है—
ज्योतिष भारतीय ज्ञान-परंपरा का गहन, बहुआयामी और शोध-आधारित विज्ञान है, जिसमें खगोल, गणित, सांख्यिकी, मनोवैज��ञानिक पैटर्न और सांस्कृतिक अध्ययन सभी शामिल हैं।
ज्योतिष को अस्वीकार करना हर किसी का अधिकार है,
लेकिन गलत तथ्यों के आधार पर प्राचीन विद्या को “धंधा” कहना—
ज्ञान और इतिहास—दोनों के प्रति अन्याय है।
पहले तो वैदिक एस्ट्रोलॉजी नाम की कोई चीज़ नहीं होती; क्योंकि वेद, उपनिषद और षड्दर्शन में ऐसा कुछ नहीं है। दूसरे फल���त ज्योतिष मूर्ख बनाने का एक मोहक जाल है।
+
“वैदिक एस्ट्रोलॉजी” शब्द सुनने में जितना चमकदार है, अंदर से उतना ही भ्रामक है। वेद, उपनिषद और षड्-दर्शन का जो मूल कोर है, वह ब्रह्म, ज्ञान, नैतिकता और मुक्ति की खोज है, न कि राशिफल और कुंडली मिलान की दुकान।
प्राचीन ग्रंथों में ज्योतिष को वेदाङ्ग के रूप में ज़रूर गिना गया है, लेकिन उसका काम मुख्यतः खगोलीय गणना, पंचांग बनाना और यज्ञ आदि के समय निर्धारण था यानी यह एक तरह की कैलेंडर–खगोल विद्या थी, न कि आज के अर्थ में “फलित ज्योतिष”, जो हर व्यक्ति का स्वभाव, शादी, नौकरी, पैसा, बीमारी सब ग्रहों से जोड़कर बताने का दावा करता है।
+
जहाँ तक “फलित ज्योतिष” की बात है, आधुनिक विज्ञान ने इसे बार-बार परखा है और कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला कि कुंडली या ग्रह–नक्षत्र किसी का भविष्य या चरित्र भरोसेमंद तरीके से बता सकते हैं। नियंत्रित परीक्षणों में भविष्यवाणियाँ अक्सर रैंडम गेस से बेहतर नहीं पाई गईं; भारत में खगोलभौतिकीविद जयंत नारळीकर और नरेंद्र दाभोलकर की टीम ने 100 कुंडलियों पर किया गया प्रसिद्ध प्रयोग इसी नतीजे पर पहुँचा। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी मात्र 46% सही निकली, यानी ताश फेंकने से भी बदतर।
+
मनोविज्ञान हमें बताता है कि लोग ऐसी भविष्यवाणियों को बरनूम इफ़ेक्ट और कन्फ़र्मेशन बायस के कारण सच मान लेते हैं, जो वाक्य सब पर लागू हो सकता है, उसे भी “मेरे बारे में बिल्कुल सही” समझ लेते हैं और जो ग़लत बैठता है उसे अनदेखा कर देते हैं।
+
दयानंद सरस्वती ने इसे आँख के अंधे और गाँठ के पूरे लोगों से पाखंडी ब्राह्मणों का पैसा ऐंठने का धंधा बताया था। इसलिए सीधी, वैज्ञानिक और वैदिक दोनों दृष्टि से बात यह है: आज जो बाज़ार “वैदिक ऐस्ट्रोलॉजी” और “फलित ज्योतिष” के नाम पर बेच रहा है, वह न तो वेदों की केन्द्रीय शिक्षा है, न आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है; यह मुख्यतः डर, असुरक्षा और अंधविश्वास पर टिका एक मोहक व्यावसायिक जाल है। मुझे हैरानी है कि ये पढ़े लिखे पत्रकार महोदय नाहक एक बहादुर महिला के ख़िलाफ़ एजेंडा चला रहे हैं। जिस राजनीतिक शक्ति के ख़िलाफ़ काँग्रेस जैसी पार्टी धराशायी हुए जा रही है, वहाँ ममता बैनर्जी एक अकेली लौहलालना कैसे आत्मविश्वास से लबरेज़ होकर डटी हुई हैं। @MamataOfficial @TMC_Supporters
@AstroSharmistha @SushantBSinha @abhishekaitc, @derekobrienmp, @MahuaMoitra @KunalGhoshAgain, @AITCofficial
@parmarshivendra जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं
ईश्वर आपकी हर मनोकामना पूरी करे और आप भाई श्री @parmarshivendra के हर सपने को साकार होते हुए हमेशा साक्षात् देखे
सादर चरण स्पर्श
💥 "डिजिटल इंडिया या डिजिटल कबाड़?" 💥
2200 करोड़ उड़ गए, और नतीजा?
ई-मित्र प्लस, एटीएम-किट्स — अब कबाड़ में लोट रहे हैं!
सरकार कहती है “डिजिटल इंडिया”,
पर मशीनें कहती हैं — “बैटरी लो, फिर बात करना।” 🔋😏
372 करोड़ ई-मित्र पर, 17 करोड़ एटीएम पर —
और जनता आज भी कतार में खड़ी है, “सर्वर डाउन है” सुनते हुए। 🙄
22 विभागों में लगी मशीनें भी शायद सोच रही हों —
"हमसे ��़्यादा निष्क्रिय तो फाइलें भी नहीं होतीं!" 📂
टेक्नोलॉजी पुरानी, सिस्टम बंद, मेंटेनेंस गायब —
पर ठेकेदार और अफसरों की जेबें “अपडेटेड” हैं। 💸
देश का विकास तब तक सपना ही रहेगा,
जब तक “डिजिटल प्रोजेक्ट” बस “डिजिटल घोटाले” बनते रहेंगे। 😡
सवाल बस इतना है —
क्या ये सिस्टम फेल है या ईमानदारी फेल? 🤔
#घोटाला_राज #ईमित्र_कबाड़ #DigitalIndiaReality #TaxPayersCry #SystemDown
आदरणीय @1K_Nazar यह पत्र एसडीएम बनेड़ा के मौखिक निर्देश पर रायला के उप तहसीलदार ने जारी किया है बड़ी विचित्र बात ह��� कि एसडीएम ने मौखिक निर्देश दिए पर तहसीलदार बनेड़ा को यह संज्ञान में ही नहीं लाया गया