You can abuse Islamists as much as you can, But they are far better than Hindus when it comes to Parenting and preserving their culture!!
During CJP Protest: Muslim Girls were present at the protest. They wore decent clothes, did not use abusive words on camera for anyone. They dint March to parliament on 20th July.
They made sure their careers are not affected, They are not viral on Social media or FIRs are filed against them.
On the other, Hindu Girls were so obssesed with camera and fame, they tried every trick - from abusing PM to wearing revealing clothes. Even FIRs dint matter to them.
This is because of bad Parenting!!
This will move you to tears. Powerful. Emotional. Beautiful. Spirited. Patriotic.
Kargil’s Team Stringmo Sisters sing in support of Indian Army on the eve of 27th Kargil Vijay Diwas. 🇮🇳
Politician: I promise to solve all your problems.
Voter: What if you don't?
Politician: Then you can vote for someone else.
Voter: And what if they don't?
Politician: Then you can vote for me again!
#democracy
वो तमाम अधिकारी, जो अपने विभाग के लिए शायद मंत्री से भी ज़्यादा उत्तरदायी होते हैं, वो मज़े से तमाशा देख रहे हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका 'वर मरे चाहे कन्या, हमें दक्षिणा से मतलब' वाला मोड आगे भी जारी रहेगा... बहुत होगा तो इस विभाग के निदेशक से उस विभाग के सचिव हो जाएंगे
ग़जब है...
कुछ हफ्तों पहले CJI सूर्यकांत एक लापरवाह सा स्टेटमेंट देते हैं। विदेश में बैठा एक युवक इस स्टेटमेंट को सटीक टाइमिंग के साथ धर लेता है। एक सोशल मीडिया अकाउंट बनता है, अकाउंट से पार्टी बनती है, फिर वो पार्टी धरातल पर आती है, धरने पर बैठती है....
धरने में मुट्ठी भर लोग (कॉक्रोच) भी नहीं जुटते। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ लाने वाले युवा ज़मीन पर गायब हो जाते हैं। पार्टी का मुखिया धर्मसंकट में फंस जाता है—करे तो क्या?
प्रयास होता है कि किसी प्रकार इज्जत बचाते हुए निकल लिया जाए, लेकिन सरकार का दिल पसीज जाता है, पुलिस प्रोत्साहित करती है कि, अरे ऐसे कैसे, "देखो- इतनी दूर से आए हो तो बिना धरना दिलवाए तो नहीं जानें देंगे..."
नेता फिर फंस जाता है...
फिर शुरू होती है भूख हड़ताल, लेकिन उससे भी लोगों का दिल नहीं पसीजता,
एक तरफ आमरण अनशन, दूसरी तरफ छोले भठूरों, ब्रेड पकौड़ों को सेवन जारी रहता है।
वो तो भला हो ढपली गैंग और सिद्धहस्त/अनुभवी आंदोलनजीवियों का, जो रिइन्फोर्समेंट लेकर मैदान पर पहुंच जाते हैं।
फिर अचानक एक दिन सरकार को लगता है कि, भले उसने न लिया हो, लेकिन जनता इस प्रोटेस्ट को गंभीरता से लेने लगी है...
अचानक दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बदल दिया जाता है। कुछ वक्त पहले जेल काटकर आए बुजुर्ग नेता को शहादत से ऐन पहले अस्पताल में भर्ती करवा दया जाता है।
संसद का मॉनसून सत्र शुरू होता है। उसी दिन प्रदर्शनकारी संसद मार्च निकालते हैं।
स्टूडेंट्स के बीच उपद्रवी घुस जाते हैं। जमकर पथराव होता है, हंगामा होता है और फिर पुलिस लाठीचार्ज करती है।
लाठीचार्ज में युवा घायल होते हैं, उनकी तस्वीरें वायरल होती हैं, जनता और भड़क जाती है, और ज्यादा भीड़ जंतर-मंतर पहुंच जाती है...
आंदोलन के महायज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए अलग-अलग दलों के नेता भी पहुंच जाते हैं...
कांग्रेस पीछे रह जाती है, तो अपना अलग मोर्चा खोल लेती है। सरकार को इस मोर्चे से भी निपटना है।
बाजी राहुल गांधी के हाथ न लग जाए, अंततः वो कॉक्रोचों के नेता को ही प्रदर्शन का मुख्य नेता मानने का फैसला ले लेती है
कॉक्रोचों के प्रतिनिधि सरकार से बातचीत शुरू करते हैं।
दूसरी बैठक में ही सरकार झुक जाती है और सरकार के बेहद कद्दावर मंत्री—कई राज्यों में भाजपा की सरकार बनाने वाले, पूर्व में उज्ज्वला जैसी योजना को अमली जामा पहनाने वाले और नई शिक्षा नीति पर काम कर रहे धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी चली जाती है।
कई विपक्षी पार्टियों को खा-पचा कर हज़म कर चुकी और संख्या बल के लिहाज़ से दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ रही मोदी सरकार झुकने को मजबूर हो जाती है, वो भी कल के नौसिखिए लड़कों के सामने।
करीब 70 दिन की यही टाइमलाइन है...
खैर, सोचता हूं कि धर्मेंद्र प्रधान कभी CJI गवई से मिलेंगे तो क्या कहेंगे ?
वैसे, एक मज़े की बात ये भी है कि वो तमाम अधिकारी, जो अपने विभाग के लिए शायद मंत्री से भी ज़्यादा उत्तरदायी होते हैं, वो मज़े से तमाशा देख रहे हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
उनका 'वर मरे चाहे कन्या, हमें दक्षिणा से मतलब' वाला मोड आगे भी जारी रहेगा...
बहुत होगा तो इस विभाग के निदेशक से उस विभाग के सचिव हो जाएंगे,
सरकारें आएंगी- जाएंगी...ब्यूरोक्रेसी वहीं बनी रहेगी
इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।
तब तक भारत माता की जय
वंदे मातरम
@rahul_saggi@ChartingG@MagicNifty Agreed. We choose convenience when we know that change is inevitable. If I need to choose between two jokers then I will go for friendly one. Bitter Truth !
@ChartingG@rahul_saggi@MagicNifty 2. No need to blame voters in present democratic system. Voters don't have too many options to chose the joker. Hence they vote as per their convenience (cast, religion, etc.).
@ChartingG@rahul_saggi@MagicNifty 1. Corruption cannot be defeated by changing faces in government; it can only be defeated by systematically changing the system that enables it. We need leader with an iron hand (combination of Lee Kuan, Mao Zedong, and Deng Xiaoping).