क्यूबा के राष्ट्रपति रहे फिदेल कास्त्रो भारत को और पंडित नेहरू को इतना पसंद क्यूं करते थे रेहान फजल
जब 1960 में फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा के राष्ट्रपति बने तो 15वे सयुक्त राष्ट्र की बैठक में शामिल होने गए..!
जहां अमेरिका में फिदेल कास्त्रो कोई किसी होटल में कमरा नहीं दिया इससे फिदेल कास्त्रो नाराज हुए..!
और फिदेल कास्त्रो संयुक्त राष्ट्र के सचिव से मिले और कहा यदि कमरा नही मिला तो संयुक्त सचिव की बिल्डिंग के बाहर रात बिताऊंगा...!
उसके बाद अंत फिदेल कास्त्रो को टेरेंस होटल में कमरा दिया गया, उस वक्त फिदेल कास्त्रो की उम्र 34 साल थीं..!
जब फिदेल कास्त्रो पहली बार किसी वैश्विक नेता से मिले तो वो पंडित जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने उनका हौसला अफजाई किया था....!
@ratanac81230688
#nehrustudycircle
क्यूबा के राष्ट्रपति रहे फिदेल कास्त्रो भारत को और पंडित नेहरू को इतना पसंद क्यूं करते थे रेहान फजल
जब 1960 में फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा के राष्ट्रपति बने तो 15वे सयुक्त राष्ट्र की बैठक में शामिल होने गए..!
जहां अमेरिका में फिदेल कास्त्रो कोई किसी होटल में कमरा नहीं दिया इससे फिदेल कास्त्रो नाराज हुए..!
और फिदेल कास्त्रो संयुक्त राष्ट्र के सचिव से मिले और कहा यदि कमरा नही मिला तो संयुक्त सचिव की बिल्डिंग के बाहर रात बिताऊंगा...!
उसके बाद अंत फिदेल कास्त्रो को टेरेंस होटल में कमरा दिया गया, उस वक्त फिदेल कास्त्रो की उम्र 34 साल थीं..!
जब फिदेल कास्त्रो पहली बार किसी वैश्विक नेता से मिले तो वो पंडित जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने उनका हौसला अफजाई किया था....!
@ratanac81230688
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कोई विक्टिम कार्ड नहीं, कोई टेलीप्रॉम्प्टर नहीं, कोई फ़िल्टर नहीं – एक ऐसे बैरिस्टर की कहानी जिसे कोर्ट और वकालत में कोई दिलचस्पी नहीं थी, एक बेटे की कहानी जिसके पिता से आइडियोलॉजिकल मतभेद थे, एक ऐसे जेंटलमैन, स्टेट्समैन की कहानी जिसका भारत के लिए विज़न था, जो अपने समय से आगे था।
उनकी पॉलिटिकल लाइफ़ पर सबसे ज़्यादा बहस हुई है, तो पेश है पर्सनल लाइफ़।
नेहरू की ज़िंदगी का सबसे बड़ा अफ़सोस क्या रहा होगा?
मोतीलाल नेहरू ने अपनी पढ़ाई, स्किल्स और टैलेंट से बहुत ज़्यादा दौलत और पहचान बनाई थी। वह इलाहाबाद HC में राम जेठमलानी + हरीश साल्वे के बराबर, अभिषेक मनु सिंघवी के बराबर के सफल वकील थे। जवाहर उनका एकदम निकम्मा बेटा था।
जब उनका बेटा हैरो से बैरिस्टर बनकर लौटा, तो मोतीलाल ने उसकी शादी एक खूबसूरत लड़की से तय कर दी। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी अच्छी-खासी लीगल प्रैक्टिस अपने बेटे को सौंपनी शुरू कर दी।
लेकिन बेटे को बार और बेंच में कोई दिलचस्पी नहीं थी, पॉलिटिक्स में उसकी गहरी दिलचस्पी हो गई, वह 4 जोड़ी कपड़े लेकर गाँवों में प्रोटेस्ट करने घूमता था।
कोई मोबाइल फ़ोन नहीं था, इसलिए उसके पिता को अक्सर पता नहीं होता था कि उसका बेटा कहाँ है। वह उसके ठिकाने के बारे में सिर्फ़ तभी पक्का पता लगा पाता था जब वह लड़का जेल में होता था।
एक दिन, वह नाभा जेल में मिला। पिताजी MP थे, उन्होंने INC छोड़ दी, नई पार्टी बनाई, चुनाव लड़ा और जीता लेकिन बेटा INC में ही रहा।
अपने 'पिता' और 'गांधी' में से, उसने 'गांधी' को चुना। एक पिता के लिए इससे ज़्यादा चौंकाने वाली बात और क्या हो सकती है? इस बीच, मोतीलाल ने वायसराय से कॉन्टैक्ट किया। जवाहर को नाभा में 2 साल की सस्पेंडेड सज़ा मिली। हालाँकि, इस दौरान, नेहरू बीमार रहे, जबकि कमला की सेहत एक गंभीर चिंता का विषय थी और बाद में यही उनकी मौत का कारण बनी।
1917 में इस कपल की एक बेटी हुई, जिसे हम इंदिरा के नाम से जानते हैं। 1924 में, उनका एक बेटा भी हुआ, लेकिन बच्चे की बहुत कम उम्र में मौत हो गई।
हालांकि, जवाहरलाल नेशनल मूवमेंट में आगे बढ़ते रहे और परिवार बहुत पीछे छूट गया।
वे 1930 में INC प्रेसिडेंट बने।
सिविल डिसओबिडिएंस मूवमेंट अपने पीक पर था और जेल धीरे-धीरे उनके लिए लगभग दूसरा घर बन गई। जैसे ही वे जेल से रिहा हुए, अगर रास्ते में कोई प्रोटेस्ट देखते, तो उसमें शामिल हो जाते; फिर पुलिस उन्हें वहां से उठाकर वापस जेल में डाल देती।
आनंद भवन में, जब मोतीलाल अपनी मौत के बिस्तर पर थे, उनकी पत्नी स्वरूप रानी बीमार थीं, उनकी बहू कमला बीमार थीं और जवाहरलाल जेल में थे।
सिर्फ 20 साल पहले, यह इलाहाबाद का सबसे अमीर और सबसे खुशहाल परिवार था।
6 फरवरी 1931 को, मोतीलाल नेहरू का निधन हो गया। कमला को T.B. का पता चला, इसलिए उन्हें भवाली में भर्ती कराया गया, जवाहर को हफ़्ते में एक बार उनसे मिलने की इजाज़त थी क्योंकि वह पास की देहरादून जेल में थे। उनकी सेहत बिगड़ती गई, बाद में, अपने दोस्त सुभाष चंद्र बोस की मदद से, कमला को इलाज के लिए स्विट्जरलैंड में भर्ती कराया गया।
WhatsApp पर चल रहे अलग-अलग दावों के उलट, जवाहरलाल असल में उनके आखिरी पलों में उनके बिस्तर के पास मौजूद थे।
कहा जाता है कि नेहरू ने कमला की चिता की राख एक छोटे कंटेनर में अपने पास रखी थी।
उनके पिता, उनकी पत्नी और 1938 में, उनकी माँ, स्वरूप रानी का भी निधन हो गया। बेटी फिरोज से बहुत प्यार करती थी।
गांधी की सलाह पर, शादी का इंतज़ाम किया गया। लेकिन यह रिश्ता ज़्यादा दिन नहीं चला। उनकी बेटी आखिरकार अपने दो बच्चों के साथ घर लौट आई।
परिवार अक्सर इमोशनल शांति का सेंटर होता है। अगर आप घर पर शांति और सुकून में हैं तो आप पूरी दुनिया से लड़ सकते हैं। फिर भी, कई लोगों के परिवार जिन्हें हम महान ऐतिहासिक हस्तियां मानते हैं, बहुत परेशान और दुखी पाए जाते हैं।
शायद महानता और शोहरत की यही कीमत है, चाहे वह गांधी हों, नेहरू हों, नेपोलियन हों या बेंजामिन फ्रैंकलिन।
PM नेहरू ने 1958 में इस्तीफा दे दिया, लेकिन देश, INC और दुनिया भर के नेताओं ने उन्हें "Carry ON" करने के लिए मजबूर किया।
नेहरू एक तरह की बेपरवाही के साथ लौटे। उन्होंने एडमिनिस्ट्रेशन का काम कृष्ण मेनन, मोरारजी देसाई और कैबिनेट मेंबर्स जैसे लोगों पर छोड़ दिया था, जबकि लाल बहादुर शास्त्री को उनके प्राइवेट ऑफिस से जुड़ी जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं और INC को नीलम संजीव रेड्डी और कामराज के पास छोड़ दिया गया था।
उनकी इकलौती बेटी अब उनके साथ थी और वह विधवा थी। एक बूढ़े आदमी के लिए यह कितना सुकून देने वाला होता?
अपनी मौत के समय, नेहरू की ज़िंदगी का सबसे बड़ा अफसोस क्या रहा होगा?
@Imdineshpurohit
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बंदे मातरम पर कुछ बातें
1- बंकिम बाबू के जिस 'आनंदमठ' से वंदे मातरम को लिया गया है, वह ब्रिटिश विरोधी नहीं बल्कि मुस्लिम विरोधी उपन्यास है।
2-बंकिम बाबू स्वाधीनता सेनानी नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार में ऊंचे पद पर (डेपुटी मजिस्ट्रेट) थे।
3-'बंदे मातरम' गीत नहीं, नारे की तरह लोकप्रिय हुआ था। भगत सिंह ने इसकी जगह 'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' और नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसकी जगह 'जय हिन्द' का नारा चुना।
4- आज़ादी के पहले हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे कभी नहीं गाया।
संघ ने अपना एक नया गीत बनाया- नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि।
5 -कांग्रेस के आयोजनों में इसे गाया जाता था।
6- गुरुदेव टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने मिलकर तय किया था कि इसके शुरू के दो स्ट्रेन्जा गाए जाएँगे, क्योंकि बाद के स्ट्रेन्जा धार्मिक प्रतीकों से भरे हैं।
कांग्रेस कार्यकारिणी ने इसी रेकमेन्डेशन को लागू किया।
7- आज़ादी के बाद भी इसे ही लागू रखा गया।
@Ashok_Kashmir
Three top international editors questioned him openly on his first TV appearance. No scripts, no teleprompters, no vetted questions, no PR campaign. And still he comes across as what he always was - brilliant, thoughtful, articulate, fearless and full of hope and optimism. Jawaharlal Nehru India’s greatest Prime Minister. #JawaharlalNehru The more the Sangh Parivar attacks him, the greater Nehru becomes.
@sagarikaghose #nehrustudycircle
आज यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि पंडित नेहरू के कहने पर कांग्रेस ने वन्दे मातरम् के बाक़ी चार अंतरे “हटा” दिए थे।
लेकिन 1937 के मूल पत्राचार और कांग्रेस Working Committee के दस्तावेज़ स्पष्ट करते हैं कि यह फैसला सिर्फ़ जवाहरलाल नेहरू का फैसला नहीं था।
कांग्रेस Working Committee की Sub-Committee में पंडित नेहरू के साथ सुभाष चंद्र बोस, आचार्य नरेंद्र देव और मौलाना अबुल कलाम भी शामिल थे। और इस Sub-Committee ने रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा दी गई राय पर विचार-विमर्श करके ही अंतिम फैसला लिया था।
और Sub-Committee के इस निर्णय पर कांग्रेस Working Committee में शामिल महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, गोविंद बल्लभ पंत और दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने अंतिम स्वीकृति दी।
हमें यह भी समझना चाहिए कि आखिर हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने वन्दे मातरम् के पहले दो अंतरों को ही क्यों चुना और बाकी को क्यों छोड़ दिया?
इसके पीछे एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन को हर धर्म और समुदाय के लोगों के लिए स्वीकार्य बनाए रखने की कोशिश थी।
वन्दे मातरम् के पहले दो अंतरे मातृभूमि की प्रकृति, उसकी हरियाली, नदियों, फसलों, हवा और उसकी सुंदरता का वर्णन करते हैं। इनमें किसी विशेष धर्म के देवी-देवता का उल्लेख नहीं है। इसलिए ये अंतरे भारत को माँ और मातृभूमि के रूप में संबोधित करते हैं—किसी एक धार्मिक समुदाय की आस्था के रूप में नहीं।
लेकिन आगे के अंतरों का स्वर बदल जाता है।
बाद के अंतरों में मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के प्रतीकों से जोड़ा गया है। एक अंतरे में मंदिरों में उसकी प्रतिमा की बात आती है और दूसरे में हथियार उठाकर संघर्ष करने वाली छवि दिखाई देती है।
यही वह वजह थी, जिसकी वजह से 1930 के दशक में इस पर गंभीर चर्चा हुई।
कांग्रेस के भीतर भी इस बात पर चर्चा हुई कि स्वतंत्रता आंदोलन का राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा होना चाहिए, जिसे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दूसरे समुदाय समान रूप से अपना सकें।
17 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा।
बोस चाहते थे कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए और रवींद्रनाथ टैगोर की राय भी ली जाए।
20 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने बोस को जवाब दिया। नेहरू ने लिखा कि वे टैगोर से वन्दे मातरम् पर चर्चा करेंगे।
उन्होंने लिखा कि आनंदमठ की पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है।
और इसी को बीजेपी मुद्दा बनाकर प्रोपेगेंडा फैला रही है।
लेकिन उसी पत्र में नेहरू ने यह भी कहा कि वन्दे मातरम् के खिलाफ चल रहा ज्यादातर विरोध “manufactured” यानी सांप्रदायिक राजनीति द्वारा पैदा किया गया था।
नेहरू ने इसी पत्र में लिखा कि “कांग्रेस को सांप्रदायिक लोगों को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि जहाँ वास्तविक शिकायत हो, उसे दूर करने के लिए कदम उठाना चाहिए।”
और सबसे अहम बात वन्दे मातरम् पर कांग्रेस Working Committee की बैठक से पहले इस पर रवींद्रनाथ टैगोर की राय ली गई।
टैगोर के अनुसार “शुरुआती दो अंतरों में मातृभूमि की सुंदरता, उसकी प्रकृति, उसकी हरियाली, उसकी नदियों और उसकी समृद्धि के प्रति प्रेम और श्रद्धा व्यक्त होती है।
लेकिन बाकी की पूरी कविता को उसके मूल संदर्भ के साथ पढ़ने पर धार्मिक समुदाय के लिए उसके साथ जुड़ना मुश्किल हो सकता है और उनकी धार्मिक संवेदनाएँ आहत हो सकती हैं।”
टैगोर का मानना था कि पहले दो अंतरे अपने आप में ऐसे हैं, जिनसे किसी संप्रदाय को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
और उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राष्ट्रीय आंदोलन में पहले दो अंतरे वैसे भी एक अलग पहचान हासिल कर चुके थे। राष्ट्रीय आंदोलन में जिस रूप में कोई गीत जनता द्वारा स्वीकार किया गया है, वह अपने मूल साहित्यिक संदर्भ से अलग एक नई राष्ट्रीय पहचान भी हासिल कर सकता है।
इसके बाद अक्टूबर 1937 में Congress Working Committee ने इस मुद्दे पर प्रस्ताव पारित किया।
प्रस्ताव में कहा गया कि पहले दो अंतरे राष्ट्रीय आंदोलन का living and inseparable part बन चुके हैं और उनमें ऐसी कोई बात नहीं है, जिस पर किसी को आपत्ति हो।
वहीं बाकी अंतरों के बारे में कहा गया कि उनमें ऐसे धार्मिक संकेत और धार्मिक विचारधारा है, जो भारत के दूसरे धार्मिक समुदायों की विचारधारा के अनुरूप नहीं हो सकती। इसलिए राष्ट्रीय सभाओं में केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँगे।
इस पूरी बहस को देखने के बाद इतना स्पष्ट है कि यह फैसला अकेले पंडित नेहरू का नहीं था। इसमें कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की सामूहिक भूमिका थी, वहीं सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर की भूमिका इस पूरे विमर्श में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही।
@Mohittripathiii
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वंदे मातरम और कांग्रेस पार्टी
1. बंगाली भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 ईसवी में वंदेमातरम गीत की रचना की।
2. बाद में इस गीत को 1881 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में शामिल गया।
3. भारत की आजादी के आंदोलन में इस गीत का प्रवेश पहली बार 1886 ईसवी में हुआ, जब कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया।
4. इस तरह से अपनी स्थापना के अगले ही साल कांग्रेस पार्टी ने वंदेमातरम को राष्ट्रीय गीत के तौर पर मान्यता दी।
5. अंग्रेजों ने 1905 में जब बंगाल का विभाजन किया तो उस समय के राष्ट्रवादी कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में जनता ने विभाजन के खिलाफ आंदोलन किया। इस आंदोलन की अगुवाई सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय (यह सभी नेता कांग्रेस के अध्यक्ष रहे) जैसे महान कांग्रेस नेताओं ने की।
6. बंगभंग आंदोलन के दौरान ही रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 16 अक्तूबर 1905 को विभाजन के दिन को शोक‑और‑एकता दिवस के रूप में मनाने, राखी बाँधने और वन्दे मातरम् के सामूहिक गायन जैसे प्रतीकों के माध्यम से जन‑एकता खड़ी करने में विशेष भूमिका निभाई और यहीं से वंदेमातरम का जयघोष भारत की आजादी का नारा बन गया।
7. इस तरह वंदेमातरम को आजादी का नारा बनाने का काम कांग्रेस पार्टी ने किया।
8. कांग्रेस ने अपने अधिवेशनों और कार्यक्रमों में वंदेमातरम के नियमित गायन की परंपरा शुरू कर दी।
9. महात्मा गांधी ने जब 1921 में असहयोग आंदोलन छेड़ा तो लाखों कांग्रेसी स्वतंत्रता सेनानी भारत माता की जय, महात्मा गांधी की जय और वंदेमातरम का नारा लगाते हुए जेल गए।
10. कांग्रेस पार्टी ने जहां 1885 में अपनी स्थापना के अगले साल से ही वंदेमातरम को अपना लिया, वहीं 1925 में अपनी स्थापना के बावजूद आरएसएस वंदेमातरम से दूर रहा। वंदेमातरम का नारा लगाने पर अंग्रेजों की लाठियां और गोलियां खानी पड़ती थीं, इसलिये आरएसएस ने अपनी अलग प्रार्थना बनाई।
11. कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं की तरह पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिये भी वंदेमातरम आजादी के आंदोलन अभिन्न हिस्सा था।
12. 1929 में पहली बार कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद 29 दिसंबर 1929 के अपने अध्यक्षीय भाषण के अंत में पंडित नेहरू ने वंदेमातरम का जयघोष किया। यहीं नहीं, अधिवेशन के समापन भाषण में 1 जनवरी 1930 को भी पंडित नेहरू ने वंदेमातरम का नारा लगाया।
13. नेहरू जी को वंदेमातरम गीत कितना प्रिय था, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि अगस्त 1942 में जब मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा होनी थी, तब नेहरू जी ने पत्र लिखकर आयोजकों को निर्देश दिया कि राष्ट्रीय गीतों में सबसे पहले वंदेमातरम का गायन किया जाए।
14. इसी तरह जब 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को भारत स्वतंत्र होने वाला था, तब भी नेहरू जी को सबसे पहले वंदेमातरम की याद आई। 4 अगस्त 1947 को उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कार्यक्रम की रूपरेखा भेजी। उसमें सबसे पहला बिंदु था कि आजादी के कार्यक्रम की शुरुआत वंदेमातरम गीत से हो। और हुआ भी यही।
15. 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्र गान और वंदेमातरम को राष्ट्रगीत के रूप में सर्वसम्मति से स्वीकार किया।
16. नवंबर 1955 में जब तत्कालीन मध्य प्रांत की सरकार ने यह सवाल पूछा कि क्या एक ही सरकारी कार्यक्रम में जनगणमन और वंदेमारतम गाए जा सकते हैं तो नेहरू जी ने कहा कि बिलकुल गाए जाने चाहिए। होना यह चाहिए कि वंदेमातरम से कार्यक्रम की शुरुआत हो और जनगणमन से समाप्ति। आज भी देश में नेहरूजी की दी हुई यह परंपरा कायम है। (नेहरू वांग्मय खंड 31 पेज 543)
@BabelePiyush
#nehrustudycircle
A century ago, Jawaharlal Nehru asked a question that remains relevant today:
Who shapes India’s choices in the world?
In 1927, long before independence, Nehru argued that true freedom meant more than a flag or a government. It meant the ability of a nation to make its own decisions, defend its sovereignty, and stand in solidarity with peoples struggling against domination and exploitation.
Today, as India navigates an increasingly complex global order, these questions return with renewed urgency. Does strategic autonomy still mean what it once did? Can national interest and international justice go hand in hand? What does it mean for India to remain the “mistress of her destiny” in the 21st century?
Our latest Nehru Study Circle parcha revisits Nehru’s foreign policy vision and reflects on its relevance to India’s contemporary dilemmas. We invite students, scholars, and citizens to read, reflect, and debate.
Because a study circle is not a place for agreement alone. It is a space for critical thinking.
Read. Discuss. Disagree. Debate.
Jai Hind!
#NehruStudyCircle #JawaharlalNehru #ForeignPolicy #StrategicAutonomy #NonAlignment
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में एक ब्रिटिश राजनेता से अटलजी की मुलाकात करवाई थी। तब नेहरू जी ने कहा था- इनसे मिलिए। यह युवा एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।
हिंदी भाषा पर अटलजी की काफी अच्छी पकड़ थी। राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीति पर पकड़ और जोरदार भाषणों ने उन्हें संसद में चर्चित कर दिया था। अटलजी सत्ता की नीतियों के विरोध में प्रभावी भाषण देते थे और इन्हीं का जिक्र नेहरू जी ने अटलजी का परिचय करवाते वक्त किया। नेहरू जी ने कहा था- ये मेरा विरोध करते रहते हैं, लेकिन इनमें मैं काफी संभावनाएं देखता हूं।
स्रो. @DainikBhaskar #अटल_बिहारी_वाजपेयी #nehrustudycircle
#AtalBihariVajpayee
टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेई की पुण्यतिथि पर नमन।
#AtalBihariVajpayee
#nehrustudycircle
@narendramodi@RahulGandhi@INCIndia@BJP4India@nsui@ABVPVoice@IYC@BJYM@aajtak@timesofindia@ndtv
14-15 अगस्त 1947 की दरमियानी रात जब भारत आज़ाद हो रहा था तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा को हिन्दी में संबोधित किया था। अंग्रेज़ी वाला भाषण इसके बाद दिया गया था।
नेहरू और हिंदुस्तान में आज़ादी को लेकर ख़ुशी थी तो सांप्रदायिक हिंसा को लेकर रंज था।
सुनिए पूरा भाषण...
राष्ट्रवाद सिर्फ नारे लगाने से नहीं, राष्ट्र को जोड़ने से साबित होता है।
15 अगस्त 1988।
लाल किले से प्रधानमंत्री राजीव गांधी का भाषण खत्म हुआ और दूरदर्शन पर एक ऐसा गीत आया, जिसने बिना किसी नारे, बिना किसी राजनीतिक भाषण और बिना किसी धर्म या जाति का नाम लिए पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया
“मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा…”
14 भारतीय भाषाएँ।
हिंदी, कश्मीरी, पंजाबी, सिंधी, उर्दू, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला, असमिया, उड़िया, गुजराती और मराठी।
पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ से शुरू होकर लता मंगेशकर, एम. बालमुरलीकृष्ण और देश के अलग-अलग हिस्सों के कलाकारों तक पहुंचता यह गीत सिर्फ एक गीत नहीं था।
यह उस भारत की कल्पना थी जिसमें भाषाएँ अलग हो सकती हैं, सुर अलग हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र का स्वर एक होता है।
इसे दूरदर्शन और तत्कालीन सूचना मंत्रालय के सहयोग से राष्ट्रीय एकता और Unity in Diversity के संदेश के लिए बनाया गया था और स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के लाल किले के भाषण के बाद पहली बार प्रसारित किया गया।
मुझे याद है हम सभी बच्चे इसे हमेशा गुनगुनाते थे। एक तरह का नेशनल एंथम बन चुका था।
देश की कई भाषाओं का संगम और कई अंजाने चेहरे इस गीत के दिखे थे, जिन्हें जानने की इच्छा होने लगी।
इन्हें जानने की लिए देश के उन हिस्सों, उन लोगों के बारे में जानने मिला, जो हमारे लिए अनजान थे।
अब सवाल बहुत सीधा है
पिछले 13 वर्षों में आपने सरकार द्वारा बनाया या राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित किया गया ऐसा कौन-सा गीत, फिल्म या संदेश देखा है जिसने भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को इसी तरह जोड़ने की कोशिश की हो?
ऐसा क्या बनाया गया जिसने उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक लोगों को यह महसूस कराया हो कि
“तुम्हारा सुर अलग है, मेरा सुर अलग है… लेकिन भारत का सुर हमारा है।”
देशभक्ति का अर्थ सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करना नहीं होता।
देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण है, वह हर भारतीय को उसके मत, भाषा, धर्म, क्षेत्र और पहचान से ऊपर उठाकर “हम” में शामिल करे।
1988 में सरकार ने एक गीत बनाया था जो आज भी लोगों को जोड़ता है।
आज 2026 में हमारे पास क्या है?
यही सवाल है।
और शायद इसका जवाब ही बताएगा कि हम सचमुच
राष्ट्र को जोड़ रहे हैं… या सिर्फ राष्ट्रवाद का शोर बढ़ा रहे हैं।
@ActForVijay #15अगस्त #स्वतंत्रता_दिवस #IndepedenceDay #nehrustudycircle
"शान से हमने हिंदुस्तान को आज़ाद किया, शान से हमें आगे बढ़ना है, शान से हमें यह जो हिंदुस्तान की आज़ादी की मशाल है, उसको लेकर चलना है और जब हमारे हाथ कमज़ोर हो जाएं, तो औरों को देना है, ताकि नौजवान हाथ उसको उठाएं और हम अपना काम पूरा करके फिर चाहे खाक में मिल जाएं.
लेकिन जब तक हाथ में, जिस्म में, शरीर में ताक़त और बल है, उस वक़्त तक उस ताक़त को इस मुल्क को आगे बढ़ाने में, इस मुल्क के करोड़ों आदमियों की खिदमत करने में इस्तेमाल करें, काम में लाएं और जब ताक़त ख़त्म हो जाए तो हमारा काम भी ख़त्म हुआ. तब फिक्र नहीं हमारा क्या होता है. और लोग आएंगे।"
पंडित जवाहरलाल नेहरू,
15 अगस्त, 1951, लाल किला
#IndepedenceDay #स्वतंत्रता_दिवस #15अगस्त #nehru @RahulGandhi@TheNehruBlog@priyankagandhi@INCHistory@INCIndia@IYC@MahilaCongress@nsui@VinodJakharIN@ActivistSandeep@_SandeepDikshit
आज़ादी का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति उसके नाम पर कोई भी ग़लत काम करने लगे। आज़ादी का सही मतलब यह है कि हम उसकी मर्यादा बनाए रखें न कि आज़ादी के नाम पर उसी की जड़ें खोदने लगें।
- पंडित जवाहरलाल नेहरू, 15 अगस्त 1956
#IndependenceDay#स्वतंत्रता_दिवस#15अगस्त
Long years ago we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially. At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom. "-- Jawaharlal Nehru.
#IndepedenceDay #nehru
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