हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया :-
“हसद (रश्क़) सिर्फ़ दो ही कामों में जायज़ है, एक वह शख़्स जिसको अल्लाह ने माल दिया और उसे हक़ की राह में ख़र्च करने पर लगा दिया, (उससे रश्क़ करना जायज़ है), और दूसरा वह शख़्स जिसे अल्लाह ने (दीन की) समझ दी और वह उसके मुताबिक़ फ़ैसले करता है और इसकी तालीम देता है”
(इब्ने माज़ा 4208)
#HadithOfTheDay
*सैयदना उस्मान रज़िअल्लाहु अन्हु और सैयदना हुसैन रज़िअल्लाहु अन्हु को जिन लोगों ने भी शहीद किया, जिन लोगों ने भी उस में ताऊन किया और जो लोग भी उनकी शहादत से खुश हुए सब पर अल्लाह रब्बुल आलमीन की, अल्लाह के फ़रिश्तों की और तमाम मोमिनीन की लानत हो.*
*फ़ज़ाइल ओ मनाक़िब*
*सैयदना अली अल-मुर्तज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु*
रसूलुल्लाह ﷺ ने अली (रज़ि०) से फ़रमाया कि क्या तुम इसपर ख़ुश नहीं हो कि तुम मेरे लिये ऐसे हो जैसे मूसा (अलैहि०) के लिये हारून (अलैहि०) थे। अल्बत्ता मेरे बाद कोई नबी नहीं ।[ स़ह़ीह़ी बुख़ारी - 3706, स़ह़ीह़ी मुस्लिम - 6217 ]
आप ﷺ ने फ़रमाया: कल मैं एक ऐसे शख़्स को झण्डा दूंगा या (आप ﷺ ने इस तरह फ़रमाया कि कल) एक ऐसा शख़्स झण्डे को लेगा जिससे अल्लाह और उसके रसूल को मुहब्बत है या आपने ये फ़रमाया कि जो अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत रखता है, फ़िर आप ﷺ ने झण्डा सैयदना अली (रज़ि०) को अता फ़रमाया।[ स़ह़ीह़ी बुख़ारी - 3702 ]
उम्मुल-मोमिनीन आयशा सिद्दीक़ा (रज़ि०) कहती हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने सैयदना अली, सैयदा फ़ातिमा ज़ोहरा, सैयदना हसन और सैयदना हुसैन रज़िअल्लाहु अन्हुमा को अपनी चादर में जमा करके फ़रमाया कि अल्लाह चाहता है कि आप से नापाकी को दूर करे और आप को पाक करे ऐ घर वालों ।[ स़ह़ीह़ी मुस्लिम -6261 ]
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: अली मुझसे है और मैं अली से हूं । [ जामे तिर्मिज़ी - 3712 ]
हज़रत अली (रज़ि०) ने कहा : "उस ज़ात की क़सम जिसने दाने को फाड़ा और रूह को बनाया ! नबी अकरम ﷺ ने मुझे बता दिया था कि मेरे साथ मोमिन के सिवा कोई मुहब्बत नहीं करेगा और मुनाफ़िक़ के सिवा कोई बुग़्ज़ नहीं रखेगा।" [ स़ह़ीह़ी मुस्लिम - 240 ]
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: जिसका मैं दोस्त हूं , अली भी उसके दोस्त हैं। [ जामे तिर्मिज़ी - 3713 ]
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन अंबिया के बाद दुनिया की अफ़ज़ल तरीन हस्तियाँ हैं
नबी ﷺ ने फ़रमाया :
तुम मैं बेहतर मेरे दौर के लोग (सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन) हैं।
(सहीह बुख़ारी : 6695)
इमाम इब्न तैमिया रह० ने फ़रमाया :
सहाबा के बाद सहाबा से अफ़ज़ल कोई नही हो सकता। (रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन)
(मज्मू अल-फ़तावा : 11/223)
इमाम इब्न क़य्यिम रह० ने फ़रमाया :
रसूल अल्लाह ﷺ के असहाब, ज़मीन के चिराग़, मख़लूक़ के रहनुमा और इल्म के मुंतहा है।
(तावील मुश्किल अल-क़ुरआन : 148)
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन से मुहब्बत सुन्नत है, उनके लिए दुआ करना क़ुर्ब-ए-इलाही का बाइस है, उनकी पैरवी करना वसीला है, और उनके आसार को थामना फज़ीलत है।
(तबक़ात अल-हनाबिलाह: 1/64)
अल्लामा इब्न-उल-असीर अल-जज़ारी रह० ने फ़रमाया :
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन पर तान दर'असल शरियत पर तान है।
(अल-कामिल फ़ि-तारीख़ : 6/582)
इमाम तहावी रह० ने फ़रमाया :
सहाबा-ए-किराम से मुहब्बत दीन, ईमान और अहसान है, और उनसे बुग़्ज़ रखना कुफ़्र, निफ़ाक़ और सरकशी है।
(अल-अकी़दा अल-तहाविया : 57)
इमाम मालिक रह० ने फ़रमाया :
जिस शख़्स के दिल मे सहाबा मे से किसी एक के बारे में भी कीना व बुग़्ज़ है, वह कुफ़्र का मुर्तकिब है।
(तफ़सीर अल क़ुर्तुबी : 16/297)
इमाम इब्न तैमिया रह० ने फ़रमाया :
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन इस्लाम मे हर इल्म भलाई, हिदायत और रहमत का मंबा-ओ-मख़रज है।
(मिन्हाज अस-सुन्नत अन-नबवियाह : 6/368)
इमाम इब्न तैमिया रह० ने फ़रमाया :
गंदे तरीन दिल के मालिक वह हैं जिनके दिलो मे सब से बेहतर अहले ईमान और अंबिया के बाद सब से बड़े औलिया यानी सहाबा-ए-किराम से मुताल्लिक़ कीना और बुग़्ज़ है।
(मिन्हाज अस-सुन्नत अन-नबवियाह : 1/ 22)
वही है जिसने तुम्हारे लिये समुद्र को सधा रखा है, ताके तुम उससे तरो-ताज़ा गोश्त लेकर खाओ और उससे ज़ीनत (शोभा) की वो चीज़ें निकालो जिन्हें तुम पहना करते हो। तुम देखते हो के नाव समुद्र का सीना चीरती हुई चलती है, ये सब कुछ इसलिये है के तुम अपने रब की मेहरबानी तलाश करो और उसके शुक्रगुज़ार बनो। (क़ुरआन 16:14)
हुज़ूर ﷺ ने उन लोगों से ‘जो जुमें से पीछे रह जाते है’ फ़रमाया:-
“मैंने इरादा किया कि किसी आदमी की हुक़्म दूँ की वह लोगों को नमाज़ पढ़ाए, फिर उन लोगों के घरों को उन पर (उन समेत) जला दूँ जो जुमें से पीछे रहते है”
(मुस्लिम 652)
#HadithOfTheDay
MEA के मुताबिक पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है और सिर्फ यात्रा करने के लिए जारी किया गया डॉक्यूमेंट है।
तो भाई, इतनी जांच के बाद पासपोर्ट जारी करते वक़्त उसमें नेशनैलिटी के आगे जो इंडियन लिखा होता है वो फिर क्या देख के या चेक करके लिखा होता है?
गजबे है
अहमद रज़ा खान साहब का फ़तवा
ताज़ियादारी करना हराम है।
ताज़िया देखना भी हराम है।
अहमद रज़ा खां साहब बरेलवी का फ़तवा
1- अलम, ताज़िया, अबरीक, मेहंदी, जैसे तरीक़े जारी करना बिदअत है, बिदअत से इस्लाम की शान नहीं बढ़ती, ताज़िया को हाजत पूरी करने वाला मानना जहालत है, उसकी मन्नत मानना बेवकूफी, और ना करने पर नुक़सान होगा ऐसा समझना वहम है, मुसलमानों को ऐसी हरकत से बचना चाहिये!
{हवाला : रिसाला मुहर्रम व ताज़ियादारी, पेज 59}
2. ताज़िया आता देख मुहं मोड़ ले, उसकी तरफ़ देखना भी नहीं चाहिये!
{हवाला: इर्फाने शरीअत, पहला भाग पेज 15 }
3. ताज़िये पर चढ़ा हुआ खाना न खाये, अगर नियाज़ देकर चढ़ाये या चढ़ाकर नियाज़ दे तो भी उस खाने को ना खाए उससे परहेज करें!
{हवाला : पत्रिका ताज़ियादारी, पेज 11}
मसला : किसी ने पूछा हज़रत क्या फ़रमाते हैं ?
इन अमल के बारे में :
सवाल 1- कुछ लोग मुहर्रम के दिनों में न तो दिन भर रोटी पकाते है और न झाड़ू देते है, कहते है दफ़न के बाद रोटी पकाई जाएगी!
सवाल 2 - मुहर्रम के दस दिन तक कपड़े नहीं उतारते!
सवाल 3 - माहे मुहर्रम में शादी नहीं करते!
अलजवाब : - तीनों बातें सोग की है और सोग हराम है
{हवाला : अहकामे शरियत, पहला भाग, पेज 171}
हज़रत मौलाना मुहम्मद इरफ़ान रिज़वी साहिब बरेलवी का फ़तवा!
ताज़िया बनाना और उस पर फूल हार चढ़ाना वग़ैरह सब नाजाइज़ और हराम है !
{हवाला : इरफाने हिदायत, पेज 9}
हज़रत मौलाना अमजद अली रिज़वी साहिब बरेलवी का फ़तवा!
अलम और ताज़िया बनाने और पीक बनने और मुहर्रम में बच्चों को फ़क़ीर बनाना बद्दी पहनाना और मर्सिये की मज्लिस करना और ताज़ियों पर नियाज़ दिलाने वग़ैरह ख़ुराफ़ात है उसकी मन्नत सख़्त जहालत है ऐसी मन्नत अगर मानी हो तो पूरी ना करें!
{हवाला : बहारे शरियत, हिस्सा 9, पेज 35, मन्नत का बयान}
ताज़ियादारी अहमद रज़ा बरेलवी की नज़र में!
ये ममनू है, शरीअत में इसकी कुछ असल नहीं और जो कुछ बिदअत इसके साथ की जाती है सख़्त नाजाइज़ है, ताज़ियादारी में ढोल बजाना हराम है!
{हवाला : फतावा रिज़विया, पेज 189 , जिल्द 1 , बहवाला खुताबते मुहर्रम}
क्या अब भी हमारे मुसलमान भाई ताज़िया के जुलूस जैसी ख़ुराफ़ात से बचने की कोशिश नही करेंगे ?
क्या यह नबी ﷺ या अहल-ए-बैत का तरीक़ा है!
उनसे जब कहा जाता है कि अल्लाह ने जो अहकाम [ आदेश ] उतारे हैं उनकी पैरवी करो , तो जवाब देते हैं कि हम तो उसी तरीक़े की पैरवी करेंगे जिसपर हमने अपने बाप - दादा को पाया है । अच्छा , अगर उनके बाप - दादा ने अक़्ल से कुछ भी काम न लिया हो और सीधा रास्ता न पाया हो तो क्या फिर भी ये उन्हीं की पैरवी किये चले जाएँगे ?
नोट : आज भी अहले - बिद्दत को समझाया जाए के इन बिदआत की दीन में कोई असल नहीं है तो वो भी जवाब देते है के ये रस्में तो हमारे बाप - दादा से चली आ रही हैं हालांकि बाप - दादा भी दीनी हिदायत से महरूम रहे , इस लिए दलाईल - ए - शरीयत के मुक़ाबले में बाप - दादा की पैरवी ग़लत है । अल्लाह ताअला मुसलमानों को गुमराही की इस दलदल से निकालें ।
(सुरह अल-बक़रा 2 : 170)
वेज चिकन पार्टी थी शायद...
कल तक गंगा में इफ्तार करने से जिनकी भावनाएँ आहत हो रही थीं, आज उसी गंगा में चिकन और शराब की पार्टी से किसी की भावनाएँ आहत क्यों नहीं हो रही हैं? शायद इसलिए कि इस बार पार्टी करने वाले दूसरे समुदाय के हैं।
उस जात की कसम जिसके हाथ में मेरी जान है तुम दूसरों को नेकी का हुक्म देते रहो और बुराई से रोकते रहो वर्ना अल्लाह तुम पर अजाब नाज़िल कर देगा, फिर तुम उस से दुआ करोगे फिर वो तुम्हारी दुआ न कबूल करेगा ( तिरमिज़ी)
@Abhimanyu1305 पुलिस के जवानों पर पिस्तौल तान देना कौन सा देशभक्ति है कानून को चैलेंज करना कौन सा समाजसेवा है पुलिस ने जो भी किया अच्छा किया हमे गर्व है विहार पुलिस पे अगर इस भरत तिवारी कि जगह अब्दुल होता तो अब तक उसे मीडिया देशद्रोही गुंडा माफिया बना दिया जाता
ख़ातिमुल-अंबिया हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की "10 मुबारक आदतें"
1. सुबह जल्दी उठना
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम सुबह बहुत जल्दी उठ जाया करते थे ! ऐसी कोई रिवायत नहीं मिलती कि आपकी तहज्जुद की नमाज़ कभी क़ज़ा हुई हो ! सूरज निकलने से कुछ पहले और उसके लगभग एक घंटे बाद तक का वक़्त ऑक्सीजन से भरपूर माना जाता है ! आज की वैज्ञानिक रिसर्च भी बताती है कि सेहत के लिहाज़ से 24 घंटों में यह सबसे बेहतर वक़्त होता है, जिसमें इंसान को ज़्यादा से ज़्यादा ऑक्सीजन मिलती है !
2. आँखों का मसाज करना
सुबह नींद से उठने के बाद रसूलुल्लाह सल्लललाहों अलैहि वसल्लम अपनी आँखों का मसाज फ़रमाया करते थे ! कहा जाता है कि नींद से उठने के बाद शरीर के सिस्टम को पूरी तरह सक्रिय होने में कुछ समय लगता है ! आँखों का मसाज इस प्रक्रिया में मददगार माना जाता है !
3. बिस्तर पर कुछ देर बैठना
रसूल सल्लललाहों अलैहि वसल्लम बिस्तर से उठकर कुछ देर बैठा करते थे और आम तौर पर तीन बार सूरह इख़लास पढ़ते थे ! इसमें लगभग एक मिनट लगता है ! माना जाता है कि अचानक उठकर चल देने की बजाय कुछ देर बैठने से शरीर और दिमाग़ को पूरी तरह सक्रिय होने का मौक़ा मिलता है !
4. क़ैलूला (दोपहर में थोड़ी देर आराम करना)
आप सलल्ललाहों अलैहि वसल्लम की आदत-ए-मुबारका थी कि दोपहर के खाने के बाद कुछ देर आराम फ़रमाते थे ! आज भी बहुत से मुल्कों में दोपहर के समय छोटा-सा ब्रेक दिया जाता है ताकि लोग आराम कर सकें और तरोताज़ा महसूस करें !
5. खाने से पहले फल खाना
रसूलुल्लाह सल्लललाहों अलैहि वसल्लम आम तौर पर खाने से पहले फल नोश फ़रमाते थे ! फलों में पानी और पौष्टिक तत्वों की मात्रा अधिक होती है, जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है और हज़्म की प्रक्रिया में मदद मिलती है !
6. खाने के फ़ौरन बाद पानी न पीना
रिवायतों में आता है कि रसूल सल्लललाहों अलैहि वसल्लम खाने के बाद तुरंत पानी नहीं पीते थे ! अगर प्यास महसूस होती तो थोड़ा इंतज़ार करते या बहुत कम मात्रा में पानी लेते !
7. वुज़ू (अबलूशन) का एहतेमाम
मुसलमान दिन में पाँच वक़्त की नमाज़ के लिए वुज़ू करते हैं ! इसमें हाथ, मुँह, नाक, चेहरा, बाज़ू और पाँव धोए जाते हैं। इससे सफ़ाई बनी रहती है और ताज़गी का एहसास होता है !
8. जल्दी सोना
रसूल सल्लललाहों अलैहि वसल्लम की आदत थी कि इशा की नमाज़ के बाद जल्दी आराम फ़रमा लेते थे ! जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना आपकी सुन्नतों में शामिल था ! आज भी सेहत के माहिर अच्छी नींद के लिए यही मशवरा देते हैं !
9. मिस्वाक करना
रसूलुल्लाह सल्लललाहों अलैहि वसल्लम मिस्वाक को बहुत पसंद फ़रमाते थे और बार-बार उसका इस्तेमाल करते थे ! मिस्वाक या दाँतों की सफ़ाई मुँह की सेहत के लिए बेहद फ़ायदेमंद मानी जाती है !
10. हफ़्ते में दो रोज़े रखना
रसूल सल्लललाहों अलैहि वसल्लम सोमवार और गुरुवार का रोज़ा रखा करते थे और उम्मत को भी इसकी तरग़ीब दी ! कम खाना, भूख लगने पर खाना और पेट भरने से पहले हाथ रोक लेना भी आपकी तालीमात में शामिल है !
हमारे लिए अल्लाह के रसूल सल्लललाहों अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी बेहतरीन नमूना है !
"लक़द काना लकुम फ़ी रसूलिल्लाहि उस्वतुन हसनह"
"यक़ीनन तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल सल्लललाहों अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी में बेहतरीन नमूना मौजूद है!" (सूरह अल-अहज़ाब: 21)
अल्लाह के तरफ़ से आने वाले पैगंबरों और उसकी नाज़िल की हुई किताबों ने इंसानों की हिदायत के लिए और आख़िरत की कभी न खत्म होने वाली ज़िंदगी में उनको क़ामिल फलाह तक पहुंचाने के लिए जिन चंद नुक्तों पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया है उनमें से एक ये भी है कि इन्सान दुनिया को बिल्कुल hakeer और बे कीमत समझे और इस से ज्यादा दिल न लगाए और इसे अपना मकसद ऐ हयात न बनाए बल्कि आख़िरत को असल मंज़िल और दायमी वतन समझे और दुनियां के मुकाबले में इसकी जो कद्र वो कीमत है उसे पेश ऐ नज़र रखे।