आज ईश्वर, माता-पिता ,गुरुजनों और समस्त बड़ो बुजुर्गों और मेरे समस्त दोस्तों आप सभी के आशीर्वाद एवं दुआओं से अध्यापक पद पर मैंने राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, 7DWD, रावतसर में कार्यग्रहण किया !!🙏🙏❤️
@DhapanBhadu@AjayToxiya@MohitCharan19@_usbhati@Baisa7773@PSwami011
मैं इस्तीफा देता हूं
व्यापार से
परिवार से
सरकार से
मैं अस्वीकार करता हूं
रिआयती दरों पर
आसान किश्तों में
अपना भुगतान
मैं सीखना चाहता हूं
फिर से जीना...
बच्चों की तरह बढ़ना
घुटनों के बल चलना
अपने पैरों पर खड़े होना
और अंतिम बार
लड़खड़ा कर गिरने से पहले
मैं कामयाब होना चाहता हूं
फिर एक बार
जीने में
~ कुंवर नारायण
महोदय का नाम देवेंद्र सिंह है
नागौर, राजस्थान में चतुरदास जी महाराज का मंदिर है
वर्तमान में ये उस मंदिर के अध्यक्ष है
इनके अध्यक्ष बनने के बाद वहाँ अपनी पीड़ा (लकवा ग्रसित समस्या) को लेकर पहुँचने वाले श्रद्धालुओं को फ्री नाश्ता,खाना और रहने का इंतज़ाम को और भी ज़्यादा कर दिया गया है
देवेंद्र सिंह ने अध्यक्ष बनते ही साफ़ निर्देश दिए कि कोई भी दान पात्र में चढ़ावा ना डाले ताकि दान की पारदर्शिता बनी रहे
ये कार्य एक जातिवादी मानसिकता से ग्रसित लोगों जो कि वहाँ अपनी दुकाने लगाके महंगा और घटिया खाना देते हैं उनको रास नहीं आया क्योकि उनकी दुकाने चलना बन्द हो गई
इसलिए उन्होंने देवेंद्र सिंह पर झूठे आ���ोप लगाना शुरू कर दिया
पहले उन पर 22 करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया
फिर दारू का पव्वा ख़ुद के हाथ से रखकर देवेंद्र सिंह पर मंदिर परिसर में दारू पीने का झूठा आरोप लगाया
3-4 बार देवेंद्र सिंह के साथ मारपीट की कोशिश भी की गई थी उन पर गाड़ी चढ़ाने का प्रयास भी हुआ जो कि CCTV फुटेज में क़ैद है
रही बात दारू की तो मंदिर परिसर में लगे CCTV फुटेज में साफ़ दिखा कि दारू उन ��िधर्मियों के द्वारा ख़ुद ही रखी गई थी
देवेंद्र सिंह के पास पुख़्ता सबूत है कि उन्होंने कोई घोटाला नहीं किया है
लेकिन नागौर प्रशासन ना जाने किसके दबाव में है
एक ईमानदार व्यक्ति को परेशान किया जा रहा है
Well done, Arjun. ❤️
Proud of the way you’ve carried yourself through this season, always believing in your ability, staying patient, working hard quietly, and remaining positive despite having to wait for your opportunity till the very last match.
Cricket tests patience as much as skill, and you handled both beautifully today.
Keep your feet on the ground, and continue being in love with the game like you always have.
Love you always.👏
रवींद्रसिंह भाटी, अपने आप पर पेट्रोल नहीं, शासन और प्रशासन की संवेदना की सूखी जड़ों पर थोड़ा पानी डालिए!
हिंसा ख़ुद पर हो या समाज पर या किसी दूसरे पर उससे बुरा कुछ नहीं है। वह त्याज्य है।
लेकिन रवींद्र सिंह भाटी ने पेट्रोल छिड़ककर ठीक किया या ग़लत; न तो यह बहस का विषय है और न यह अच्छा है कि हम उस विडियो को शेयर करें, जिसमें भाटी अपने आप पर पेट़्रोल डाल रहे हैं। यह दोनों ही बातें एक ही जैसी निर्रथक हैं।
किसी भी संघर्ष में किसी का भी शरी��� नहीं जलना चाहिए, बस शासन और प्रशासन के ही नहीं, जो लोग मज़दूरों को न्याय नही दे रहे, उन सब ताक़तवर शक्तियों के अहंकार जलने चाहिए। सत्ता में संवेदना रहनी चाहिए। लेकिन सत्ता शक्ति का ऐसा स्वीमिंग पूल है, जहाँ संवेदना के वस्त्र उतार कर ही प्रवेश किया जा सकता है। वे चाहे कम्युनिस्टों ही की सत्ता क्यों न हो। इसलिए वह सत्ता जब कुछ दूसरे विचार वालों के हाथ होती है तो वहाँ संवेदना का शायद अधोवस्त्र भी एक थोंग में बदल जाता है।
इसलिए पेट्रोल को दूर ही रखा जाए। लड़ाई सड़क, विधानसभा, अदालत, मीडिया, श्रम विभाग और प्रशासन की मेज पर लड़ी जाए। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक विधायक, मजदूर और स्थानीय नागरिक ऐसी चरम बेचैनी तक पहुँचते क्यों हैं?
बाड़मेर की गिरल लिग्नाइट माइंस को लेकर श्रमिकों और ग्रामीणों का आंदोलन कई दिनों से चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार आरोप स्थानीय रोजगार, भूमि-अधिग्रहण और मजदूरों के साथ अन्याय से जुड़े हैं; इसी आंदोलन के बीच भाटी ने बाड़मेर कलेक्ट्रेट के बाहर खुद पर पेट्रोल छिड़का, जिसके बाद कहा जा रहा है कि पुलिस-प्रशासन ने स्थिति संभाली। लेकिन यह स्थिति पैदा किसने की? शायद रवींद्रसिंह भाटी ने नहीं ही पैदा की।
असल मुद्दा पेट्रोल की बोतल नहीं, वह व्यवस्था है जिसमें गरीब की आवाज़ पहले फाइ�� में दबती है, फिर धरने में बैठती है, फिर सड़क पर उतरती है और अंत में किसी खतरनाक प्रतीक की ओर धकेल दी जाती है।
हम पत्रकार बहुत जल्दी कहते हैं, “यह ग़लत कर दिया, यह नाटकीयता कर दी।” लेकिन जो इससे कहीं अधिक ग़लत है; मजदूर की मजदूरी दबना, स्थानीय नौजवानों से रोजगार का वादा टूटना, प्रशासन का कंपनी के आगे झुक जाना, श्रम विभाग का मौन रहना आदि पर हमारा "ग़लत" शब्द खो सा जाता है।
राजस्थान में निवेश सम्मेलन होते हैं। बड़े-बड़े मंच सजते हैं। औद्योगिक घरानों के लिए लाल कालीन बिछता है। इन घरानों में किसी को छींक भी आती है तो मुख्यमंत्री स्तर के लोग विमान से यात्रा करके उनके हाल पूछने जाते हैं, लेकिन मजदूरों के कुनबे के कुनबे ग़र्क़ हो जाएं तो भी कोई कहाँ पूछने जाता है? माइनिंग वाले इलाकों में पूरे के पूरे गांवों में सिर्फ़ युवा विधवाएँ वास करती हैं, अकेली कराहती हैं, लेक��न मजाल कि किसी ने कभी वहाँ जाकर हालात देखे हों। इसलिए ये कुदरती "नरसंहार" चलते रहते हैं और कोई देखता नहीं और एक उद्योगपति की एक छींक की अहमियत इतनी बड़ी हो जाती है। मैं नहीं कहता कि उद्योगपति के यहाँ न जाएँ, लेकिन अगर मजदूर बड़ी तादाद में आंदोलन कर रहे हों तो उनकी सुन तो लो। माना कि आप बांग्लादेशियों को निकाल रहे हैं, लेकिन इन भारतवासियों से तो प्रेम कर लो और इनके घरों में तो थोड़ी ख���शियाँ भर दो ताकि इनके चूल्हे जल जाएँ।
कांग्रेस हो या भाजपा, सत्ता में आते ही दोनों विकास की भाषा में ग़रीब की ज़मीन, गोचर, ओरण, पहाड़ और श्रम को “संसाधन” कहने लगती हैं।
जिन धरतियों पर गायें चरती थीं, जहाँ लोकदेवताओं की स्मृति थी, जहाँ कृष्ण की गोचारण-कल्पना तक हमारे धर्म-संस्कारों में बसी है, वहाँ खनन, मुनाफा और ठेकेदारी की मशीनें उतर आती हैं। दिन भर गाय, धर्म, राम और ईमान की बात करने वाले लोग ���गर मजदूर के बच्चे की भूख नहीं देख सकते तो यह धर्म नहीं—सिर्फ नारा है।मजदूर आतंकवादी नहीं है। वह इस धरती का सबसे असुरक्षित नागरिक है। वह कंपनी का उत्पादन खड़ा करता है, मशीन के नीचे पसीना छोड़ता है, धूल फेफड़ों में भरता है और अंत में उसी से कहा जाता है—तुम्हारा नाम सूची में नहीं है, तुम्हारा ठेका खत्म है, तुम्हारी बात बाद में देखेंगे।
भले लोगो, आखिर जाएगा कहाँ अंतिम निर्धन राजस्थानी? दिल्ली? सूरत? अहमदाबाद? खाड़ी देशों की मजदूरी? या अपने ही गाँव में बेगाना होकर खदान के बाहर धरना?
पुलिस और प्रशासन को भी यह समझना होगा कि वे किसी कंपनी के निजी सुरक्षा-कर्मी नहीं हैं। वे भी ऐसे ही राजस्थानियों और हिन्दुस्तानियों के बेटे बेटियां हैं। लेकिन इतने क्या असहाय कि पूरी की पूरी रीढ़ ही इस्पात से सूतली हो जाए। पुलिस के लोगों को अगर स्वतंत्रता और नैतिक विवेक से काम करने दिया जाए तो एक ईमानदार हैड कांस्टेबल भी कभी-कभी वह न्याय करा सकता है जो बड़ी ट्रेड यूनियनें नहीं करा पातीं। पर जब पुलिस को आदेशों की जंजीर में बाँध दिया जाता है तो हर जगह वही दृश्य दोहरता है—गरीब सामने, बैरिकेड बीच में, सत्ता पीछे और न्याय कहीं गायब।
रवींद्र भाटी के जज्बे का सम्मान इसलिए है कि वे मजदूरों के बीच खड़े दिख���। लेकिन संघर्ष की गंभीरता यही कहती है कि पेट्रोल, आग और आत्मघाती प्रतीकों से दूर रहना होगा। आप पेट्रोल क्या, बंदूक से भी नहीं लड़ सकते। जिस किसी ने कभी हिंसा और बंदूक से प्रशासन और सरकार के मुक़ाबिले का विचार दिया था, वह बहुत अपरिपक्व और आत्मघाती विचार था। इस तरह के रास्तों से आप जीत ही नहीं सकते। इससे आप कुछ अधिक समय तक सरकार, प्रशासन और अफसरशाही को विलंबित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें परास्त नह��ं कर सकते।
रवींद्रसिंह भाटी ने पेट्रोल की बॉटल हाथ में ली और उसे उंड़ेला तो यह विडियो देखकर मेरा दिमाग़ घूम गया। राजस्थान ने ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता देखे हैं, जो लड़ते-लड़ते चले गए; लक्ष्मण खीची जैसे नाम स्मृति में तड़प बनकर रह जाते हैं। बाद में उनके नाम पर नगर बस जाता है, स्मारक बन जाता है, पर जिस मनुष्य ने अपने जीवन से सवाल पूछा था, उस सवाल का उत्तर सत्ता कभी नहीं देती। इसलिए असली मांग साफ होनी चाहिए: गिरल माइंस के मजदूरों और स्थानीय ग्रामीणों की मांगों पर खुली वार्ता हो। भूमि-अधिग्रहण के वादों की समीक्षा हो। स्थानीय रोजगार पर लिखित नीति बने। बकाया मजदूरी, सुरक्षा, ठेका-शोषण और निकाले गए युवाओं पर समयबद्ध निर्णय हो।
प्रशासनिक अधिकारी धरनास्थल पर सिर्फ़ कानून-व्यवस्था देखने न जाएँ; वे मज़दूरों के घर भी जाएँ, उनके बच्चों से मिलें, उनकी बेटियों के हाल देखें कि वे पढ़ पा रही हैं या नहीं? उनके नन्हे मुन्नों को देखें कि उनके पास खिलौने और संग���त के उपकरण या किताबें हैं कि नहीं? उनकी बूढ़ी माँओं से मिलें। बुजुर्ग लोगों से बात करें। उनकी रसोई देखें। तब शायद फाइल में दर्ज “मामला” मनुष्य में बदल जाएगा। उनके घरों के पशुओं को देखें कि उनके लिए चारा है कि नहीं?
कंपनियाँ इतनी विशाल, लेकिन इतनी हृदयहीन हो चुकी हैं कि कई बार उनके सामने लोकतंत्र भी लचकता दिखाई देता है। लेकिन राज्य की रीढ़ यदि सचमुच बची है तो उसे सबसे पहले मज़दूर के पक्ष में ��ीधा खड़ा होना चाहिए। निवेश ज़रूरी ��ै, उद्योग जरूरी हैं, विकास भी ज़रूरी है; लेकिन अगर इस विकास की नींव में मज़दूर की हड्डी, किसान की ज़मीन, गोचर की धूल और ओरण की हत्या दबा दी जाए, तो यह विकास नहीं, राजकीय क्रूरता है।
कृपा करके थोड़ा दया-धर्म रखिए। गाय की बात करते हैं तो गोचर बचाइए। धर्म की बात करते हैं तो न्याय कीजिए। राम की बात करते हैं तो शोषित के पक्ष में खड़े होइए। और ईमान की बात करते हैं तो मज़दूर की मज़दूरी दिलाइए। कृष्ण से प्रेम है तो उनकी यशकथा लिखने वाले रसखान के कुल का संरक्षण कीजिए और उस पूरे गोवर्धन पर्वत को खनन से बचाइए, जहां कभी उस बांसुरीवादक ने गाएँ चराई थीं। उस ओरण को बचाइए, जिसके लिए लड़ते-लड़ते शूरवीर लोग बिना धड़ के ही सैकड़ों किलोमीटर तक दुश्मन को भगा आए थे। यही असली परीक्षा है सरकार की भी, प्रशासन की भी, राजनीति की भी और पत्रकारिता की भी। रवींद्रसिंह भाटी के जज्बे को सलाम। हमारी सभी विधायक उन जैसे हो���!
@RavindraBhati__
आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री!
ईं रै सत रीे आण निभावां,
ईं रै पत नै नही लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,
मायड़ कोड़ां री,
धरती धोरां री !
जै राजस्थान जै जै राजस्थानी....🚩
म्हारी भासा , म्हारौ गुमान....🚩
📌
आगामी जनगणना में अपनी मातृभाषा “राजस्थानी” लिखवाएं और अपनी भाषा को उसका अधिकार दिलाने में भागीदार बनें।
जब हम अपनी भाषा को सम्मान देंगे, तभी उसे संवैधानिक पहचान और अधिकार प्राप्त होगा। मायड़ भाषा के सम्मान और संरक्षण के इस अभियान में सहभागी बनें।
#राजस्थानी#मायड़_भाषा
टैम रेता थका @RavindraBhati__@RajveerChalkoi@AnshumanBhati8 सरीखा कई मोटीयार संघर्ष करिया और आज वो परिणाम देखण ने मिल्यों।। धनबाद हैं।
मोटी बात सैरा का टिंगर आपकी जड़ा ने जाणें ला ।
कईयां के पेट में झूठा मरोड़ भी उठे, पण मानता मिलबा दो, फेर देखो।
सुप्रीम कोर्ट राजस्थानी भासा नै मान दियों।
कह्यो, "राजस्थानी भासा नै सगळा सरकारी अर निजी स्कू���ां रै पाठ्यक्रम मांय सामल करणो चाइजै। सर्वोच्च न्यायालय राज्य नै चरणबद्ध अर प्रगतिशील रूप सूं राजस्थानी नै विषय लागू करण अर विषय बणावण सारू सकारात्मक अर समैसर कदम उठावण रा निर्देश दिया
प्रिय नौजवान साथियों,
आपका अटूट स्नेह, व��श्वास और समर्थन मुझे हमेशा ऊर्जा प्रदान करता रहा है। आज उसी विश्वास के साथ आपसे एक छोटी सी, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण अपील कर रहा हूँ।
वर्तमान समय में सोशल मीडिय��� प्लेटफॉर्म सूचनाओं को साझा करने का एक मजबूत स्तंभ है इसे हम समाज को जोड़ने, सकारात्मक सोच फैलाने और अच्छे कार्यों के लिए इस्तेमाल करें। अगर आप स्वयं को मेरा समर्थक मानते हैं, तो मेरी आपसे विनम्र अपील है कि किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या व्यक्ति विशेष के खिलाफ अमर्यादित टीका-टिप्पणी से दूर रहें।
मेरे राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी अपणायत, भाईचारा और आपसी सम्मान रही है जो कि मुझे मेरे पूर्वजों से मिली हैं। राजनीति और वोट से कहीं ऊपर हमारा सामाजिक सौहार्द है, जिसे बनाए रखना हम सबकी सामुदायिक जिम्मेदारी है।
बीते कुछ समय से हमारी इस पावन अपणायत की धरती पर सुनियोजित तरीके से नकारात्मकता फैलाकर आपसी वैमनस्य बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। लेकिन यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम अपने स्वविवेक, समझदारी और संयम का प���िचय देते हुए इन प्रयासों को सफल न होने दें।
बरसों से चली आ रही भाईचारे, अपनत्व और सामाजिक समरसता की इस परंपरा को बनाए रखना ही हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
आपका अपना,
रविन्द्र सिंह भाटी
आप सभी को गणगौर पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
आइए जानते है कुछ रोचक तथ्य 👇
1 राजस्थान में जयपुर की गणगौर प्रसिद्ध
2 बिना ईशर की गणगौर = जैसलमेर
3 धींगा गवर = उदयपुर
4 धींगा गवर, बेंतमार= जोधपुर
5 गुलाबी गणगौर = नाथद्वारा
5 हरियाली गणगौर= कांकरोली
#गणगौर
रा.उ.प्रा.वि. गावड़ियाें की ढाणी में आने वाले विद्यार्थी दूरी के कारण शिक्षा से वंचित ना रहे इस हेतु खास पहल✍️
ढाणी के सभी भामाशाहों द्वारा कक्षा 8 तक के समस्त विद्यार्थियों को साइकिलें वितरित की गई।
सभी भामाशाहों का विद्यालय परिवार की तरफ़ से आभार🙏
@RESMA_7@madandilawar
आपणो जैसलमेर...!
जैसलमेर में बॉर्डर टूरिज़्म की अनंत संभावनाएं हैं।
सोनार किला...
पटवों की हवेली...
गडिसर झील...
सम सैंड ड्यून्स...
तनोट माता मंदिर...
लोंगेवाला युद्धस्थल..
और सीमांत क्षेत्र की अनोखी संस्कृति व मेहमाननवाज़ी..
इन सबको मिलाकर जैसलमेर
भारत का ‘डेज़र्ट टूरिज़्म कैपिटल’ बन सकता है।
यात्रियों के साथ व्यवहार थोड़ा और बेहतर हो
तो जैसलमेर दुबई का भारतीय विकल्प बन जाएगा। 🇮🇳 ✨
- @bs_rupawat
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