इतिहास कभी-कभी ऐसे चौराहों पर आकर खड़ा हो जाता है जहाँ एक व्यक्ति का फैसला आने वाली पीढ़ियों की नियति तय कर देता है। भारत की आज़ादी के बाद ऐसा ही एक चौराहा था और उस पर खड़े थे जवाहरलाल नेहरू।
यह बात अक्सर भुला दी जाती है, या जानबूझकर दबा दी जाती है, कि नेहरू के पास तानाशाह बनने की पूरी संभावना ही नहीं, बल्कि पूरा अवसर भी था।
देश आज़ाद हुआ था। संविधान अभी बना नहीं था।
लोकतांत्रिक संस्थाएँ शैशव अवस्था में थीं।
सेना, प्रशासन, नौकरशाही सब केंद्र की और देख रहे थे।
नेहरू जनमानस में निर्विवाद नेता थे गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी, आज़ादी के नायक, अंतरराष्ट्रीय पहचान वाले चेहरे।
इतिहास गवाह है कि ऐसे हालात में दुनिया के कई देशों ने लोकतंत्र नहीं, तानाशाही चुनी। चीन, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका सूची लंबी है।
देश को मज़बूत करने” के नाम पर सत्ता को स्थायी बना लिया गया।लेकिन नेहरू ने वह रास्ता नहीं चुना।
उन्होंने संविधान बनने का इंतज़ार किया।
उन्होंने स्वतंत्र न्यायपालिका को स्वीकार किया।
उन्होंने आलोचना सहन की ।उन्होंने विपक्ष को कुचला नहीं, बल्कि उसकी मौजूदगी को लोकतंत्र की ज़रूरत माना।
सोचिए वे चाहें तो चुनाव टाल सकते थे।
वे चाहें तो प्रेस पर अंकुश लगा सकते थे।
वे चाहें तो “राष्ट्रीय सुरक्षा” या “राष्ट्रीय एकता” का हवाला देकर असाधारण शक्तियाँ अपने हाथ में रख सकते थे।
लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
क्यों?
क्योंकि नेहरू सत्ता के प्रेमी नहीं थे, विचार के अनुयायी थे।वे जानते थे कि भारत किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं, बल्कि विविधताओं से भरा एक जीवंत समाज है जिसे सिर्फ़ लोकतंत्र ही संभाल सकता है।
आज जब इतिहास को सरल नारों में समेट दिया जाता है, तब यह याद रखना ज़रूरी है कि लोकतंत्र भारत को मिला नहीं था उसे चुना गया था और उस चुनाव का सबसे बड़ा श्रेय जवाहरलाल नेहरू को जाता है।
नेहरू से असहमति हो सकती है।
उनकी नीतियों पर बहस हो सकती है।
लेकिन यह सच्चाई नकारना बौद्धिक बेईमानी होगी कि उन्होंने सत्ता के शिखर पर खड़े होकर भी स्वयं को संविधान के अधीन रखा।
तानाशाह बनना आसान था।
लोकतंत्र चुनना कठिन।
नेहरू ने कठिन रास्ता चुना और भारत को वह विरासत दी, जिसकी वजह से आज भी सवाल पूछे जा सकते हैं, सरकारें बदली जा सकती हैं, और असहमति ज़िंदा है।
यही नेहरू का सबसे बड़ा योगदान है।🌹
राजस्थान में पेड़ों का संहार – विकास के नाम पर विनाश! 🌳
क्या यही विकास है?
बीकानेर से जैसलमेर तक फैले इलाक़ों में 26 लाख से ज़्यादा पेड़ अब तक काटे जा चुके हैं, और 38 लाख और काटने की तैयारी है — सिर्फ़ सोलर प्लांट्स लगाने के लिए!
📌 कहां गया सरकार का पर्यावरण प्रेम?
📌 बंजर ज़मीन होते हुए भी उपजाऊ भूमि क्यों उजाड़ी जा रही है?
📌 क्या ये “हरित राजस्थान” का सपना था?
पुगल तहसील के बरजू गांव में जब ग्रामीणों ने खेजड़ी के पेड़ों को काटने से रोका, तो उन पर कटर मशीन से हमला कर दिया गया जिसमे 5 लोग घायल हुये हैं यहाँ पुलिस प्रशासन की सह से बदमाश प्रवृत्ति के लोग कंपनियों से पैसे लेकर खेजड़ी जैसे हजारों पड़ो की कटाई कर चुके है और रुकने का नाम नही ले रहे,
अफ़सोस पेड़ बचाने निकले लोग अब अपनी जान बचा रहे हैं, और सरकार………..आंखें मूंदे बैठी है
❌ भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र और मुनाफाखोर कंपनियों की मिलीभगत से राजस्थान का इकोसिस्टम तबाह हो रहा है।
❌ जंगल साफ़ किए जा रहे हैं, जीव-जंतुओं का घर छीना जा रहा है, और हमें बताया जा रहा है कि यह “प्रगति” है।
हम खामोश रहे तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ़ रेगिस्तान ही मिलेगा, छांव नहीं।
🛑 आमजन सरकार से मांग करता हैं:
1.सभी पेड़ों की कटाई पर तत्काल रोक लगे
2.सोलर प्लांट के लिए केवल बंजर भूमि का ही उपयोग हो
3.पर्यावरणीय आकलन के बिना कोई योजना स्वीकृत न हो
4.हमलावरों के खिलाफ़ सख्त कार्रवाई हो
🌱 विकास ज़रूरी है, लेकिन विनाश नहीं!
आओ, आवाज़ उठाएं। अपनी ज़मीन, अपने जंगल, अपने पेड़ों को बचाएं।
@PMOIndia@RajCMO @CMHelpdesk @PoliceRajasthan@RajPoliceHelp@IgpBikaner@DEFCCOfficial@hanumanbeniwal@RLPINDIAorg@BJP4India@byadavbjp
उर्दू ने सिर्फ़ मौलवी नहीं बनाए, शायर भी बनाए. संस्कृत से सिर्फ़ पुरोहित नहीं बनते, कवि भी बनते हैं.
कठमुल्लापन मानसिकता है भाषा नहीं और यह तो हिंदी में भी आ सकता है. हिंदी में बलात्कार की धमकी और भद्दी गालियाँ देते तथाकथित धार्मिक लोगों को यहीं सोशल मीडिया पर देखा होगा. राम की तस्वीर प्रोफ़ाइल में लगाकर हिंदी को हिंसा की भाषा बनते भी देखा होगा.
उर्दू की जननी भारत है और हिंदी उर्दू की बहन है. भारतीय भाषाओं का ऐसा अपमान सिर्फ़ इतिहास बोध शून्य व्यक्ति ही कर सकते है.
द यूजलेस क्लास ..
पोस्ट युवाल नोआ हरारी की किताब और लेक्चर्स पर आधारित है।हरारी की किताब सेपियन, मानव इतिहास को रिविजिट करती है।
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वो इतिहास के टर्निंग प्वाइंट्स की पहचान कर उन्हे परिभाषित करती है। मौजूदा समाज, उसकी बिलीफ और हालात पर उस क्षण की छाप को चिन्हित करती है।
मानव इतिहास के साथ हरारी अपने लेक्चर्स मे, उसके भविष्य को भी प्रिडिक्ट कर रहे है।
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इतिहास मे कृषि की खोज महत्वपूर्ण है, जो मनुष्य को शिकारी, घुमन्तू और खतरनाक जीवन से निकाल सुरक्षित करती है।
करेंसी की खोज, सेवाओं और सामान का व्यापार आसान बनाती है। राजाओं की सत्ता, लगान वसूली, और करेंसी ढालने वाले से ही आम आदमी पर नियंत्रण रखती थी।
अठारहवी शताब्दी की औद्योगिक क्रांति बड़ा असर डालती है। अब राजा और नोबल से पैसा खिसक कर उद्योगों के पास आता है।
नेताओं और उद्योगपतियों का नेक्सस, इस दौर मे पहली बार बनता है।
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हर बदलाव, उस समाज मे लोगो के अंतर्संबंधों पर असर डालता है। रोजगार पर भी..
उद्योगों ने पारंपरिक रोजगार छीने। एक पावरलूम, सौ करघों से ज्यादा और सस्ता उत्पाद बनाती।
पर नए जाब्स आए। लोगों ने पढ़ लिखकर मैनेजर, ट्रासपोर्टर, डाक्टर, इंजीनियर बनना शुरू किया।
ये सर्विस सेक्टर का विकास था।
अगली कड़ी मे विज्ञान ने आटोमशन को और तेज किया। मशीनों की दक्षता बढ़ी, उत्पादन ज्यादा से ज्यादा मशीनों मे होने लगा। अन स्किल्ड जॉब्स में वेतन गिरे।
छिपी हुई, मौसमी, और अर्धबेरोजगारी बढ़ी।
मगर शिक्षित लोग टूरिज्म, बैंकिग, इन्श्यारेंस, सेल्समैन, स्टोर मैनेजर, सॉफटवेयर और कोडिंग मे जॉब पाने लगे।
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हर बदलाव जो कम स्किल्ड थे, गरीबी की ओर बढ़े। स्क्ल्डि की समृद्धि बढ़ी, पर शिक्षा के महंगे होते जाने, जनसंख्या के बढने और ऑटोमेशन ने उनके चैलेंजेस भी टफ कर दिये है।
अब तक, सोचने और निर्णय लेने का काम मनुष्य के हाथ मे ही था। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने, यहां भी कब्जा जमा लिया है।
हरारी जल्द ही AI के विकास मे अप्रत्याशित उछाल देखतेे है। जैसे 30 साल मे जिस तरह से कम्प्यूटिंग और टेलीफोनी मे चमत्कारी बदलाव हुए, आगे 15 साल मे AI कई पीढ़ी आगे बढ़ जायेगा।
और जॉब्स खाएगा।
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ड्राइवरलेस कारें, करोड़ो ड्राइवर्स को घर बिठा देंगी। मेडिकल एप्स, टेलीमेडिसिन, पड़ोस के डॉक्टर से बेहतर चिकित्सकीय सलाह देंगे।
कोई एल्सा नाम का एप आपको बेहतर काउंसलिंग देगा। एल्गोरिदम बेहतर डिसिजन सुझाएगा।
यूटृयूब के माध्यम से लाखो होम टयृटर का बिजनेस चौपट होते देख ही रहे है। बड़े स्केल पे खेलने वाले मॉल, नुक्कड़ की दुकानों से बेहतर ऑफर दे रहे हैं।
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तो 8 बिलियन इंसानों का क्या होगा??
दरअसल, अधिकांश जनता, एक यूजलेस क्लास होगी। सरकार, उद्योग, या समाज के लिए कोई उपयोगिता नही।
तो क्या करेंगे इनका????
हरारी का मानना है कि सरकारों के लिए भोजन देना कोई समस्या नही होगी। तकनीक, अधिक अन्न उपजा लेगी।
जेबखर्च के लिए डीबीटी, न्याय, किसान कल्याण निधि या लाडली बहना, न्याय के नाम से थोड़े पैसे भी आ जाऐंगे। यूरोप में यूनिवर्सल बेसिक इनकम की बात छिड़ चुकी है।
पर असली चुनौती इस कचरे को व्यस्त रखना है।
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महामारी, युद्ध, दंगे सँख्या घटाने के अच्छे तरीके हैं। दमन भी एक रास्ता है।
क्योकि इनके पास पॉलीटकल ताकत नही होगी।
फैक्ट्री मजदूरो, ट्रक ड्राइवरो या किसानों की हड़ताल समाज का काम रोक देती है। सरकार को मजबूरन इनकी माननी पड़ती है। यूजलेस बेरोजगार बारगेनिंग चिप नही रखते।
फिर सर्वेलिंयेस तकनीक आप पर 24×7 निंगाह रखे है। एक क्लिक पर आपका नाम-पता, आखो-अंगुलियों की छाप उपलब्ध होगी।
सोशल मीडिया पर बायोग्राफी तस्वीरों सहित है। डिजिटल पेमेन्ट से आपके खर्च, आदत, आवाजाही की मैपिंग है। बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट वहाट्सप पर है।
इतनी चीजों मे एक सिंगल इल्लीगलिटी खोजकर जेल ठूंसना कितना मुश्किल होगा??
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पर जेल कितने को भेजेंगे। हरारी की मानना है कि नशा, डेटा, कम्प्यूटर गेमिंग सस्ते होंगे।
यह चीज भी दिख रही है। मोबाइल एडिक्शन आपकी सोचने समझ को दिशा दे रहा है।समय खा रहा है,जिंदगी चाट रहा है।
क्रातिकारी विचार रुक जाता है, पोर्न और सत्ता समर्थक कंटेट को एल्गोरिदम फेवर कर रहा है।
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युवाल हरारी इसे फ्यूचर में होते देखते हैं। मै भारत का वर्तमान देखता हूं।
एक विशाल यूजलेस क्लास है। इसे 5 किलो आटा और डेढ जीबी डाटा फ्री दिया है। धर्म और गर्व की अफीम मिल रही है।
मुसलमान,मन्दिर, पाकिस्तान हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है।घण्टे भजन चौराहों पर देख रहा हूँ। एक ध्वंस का जश्न झांकी है,कई जश्न अभी बाकी हैं।
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सोचने की ताकत खो चुका समाज खुशी खुशी अपनी आजादी खो चुका है।
देश ऑलरेडी, एक विशाल यूजलेस क्लास बन चुका हैं।
मिनी पाकिस्तान !!
क्या आपके आसपास कोई मुस्लिम बस्ती है? वही, जिसे आपके शहर का "मिनी पाकिस्तान" कहते हैं।
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शहर का पिछड़ा, तिरस्कृत इलाका, जिनके हालात Ghetto से बेहतर नही होते।
पहले Ghettoization समझिये।
मुम्बई की चाल आपने सुनी है। सामुदायिक अपार्टमेंट, जिसमे निम्न मध्यवर्गीय परिवार, जैसे तैसे जीते हैं।
लेकिन चाल में बहुरंगी कल्चर होता है। घेट्टो में एक जाति, समुदाय के लोग होते हैं।
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घेट्टो शब्द चला, नाजियों के राज में।
सत्ता पाते ही यहूदी दुकानें, व्यवसाय, नौकरी चौपट करने के बाद, नाजियों में उनसे आम कालोनियों में रहने का अधिकार छीना।
विशेष रूप से बनाई चालों में भेज दिया गया, जिसके चारों ओर गार्ड्स होते। ये सेटलमेंट्स, घेट्टो कहलाये।
बेहद घटिया सिविक कन्डीशन में ये एक तरह की जेलें थी। यहां से लोगो को ट्रेनों में भरकर कंसन्ट्रेशन कैम्पो में पहुंचा दिया जाता।
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कंसेंट्रेशन का मतलब होता है- इकट्ठा करना।कैम्प पहुंचते ही स्त्री बच्चे बूढ़े तत्काल नहाने भेज दिए जाते। बाथरूम के शावर से “ज्य्क्लोन-बी” नामक गैस निकलती, सब मर जाते।
कार्यक्षम युवा कुछ माह,भूखे कमजोर होने के बाद गैस चेम्बर जाते।
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भारतीय मुस्लिम, खुद के बनाये घेट्टो में जा चुके हैं। वही,जिसे आप मिनी पाकिस्तान कहते हैं। इनका निर्माण अलग अलग कालक्रम में अलग ढंग से हुआ।
पुराने शहरों में सुलतानों-नवाबों के महल, किलों के गिर्द मुस्लिम बस्तियां मिलेंगी।
इसे मुस्लिम सत्ता के दौर की सिविल लाइन या ऑफिसर्स कालोनी समझिये। कभी राजसी इलाके थे, अब घेट्टो हैं।
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आजाद भारत मे विभाजन के घाव, दंगो की शक्ल में रिसते रहे। फिर भी मानवीय रिश्तों में बंधे हिन्दू इलाकों के मुसलमान,
और मुसलमान इलाको के हिन्दू एक दूसरे को स्वीकार करते। हजारों किस्से हैं, जब किसी हिन्दू ने मुसलमान, या मुस्लिम ने हिन्दू को बचाया।
पर नफरत की दुकान के सेल्समैन, मेहनत करते रहे। सेल में 1992 के बाद बम्पर वृद्धि हुई।
तो मुसलमान अच्छी कालोनियों से निकलकर वहाँ चले गए, जो मुस्लिम बहुल कहलाते। रिवर्स में उन इलाकों के हिन्दू भी निकलकर अन्यत्र चले गए।
नये घेट्टो बने। नफरत और भय का शिकार मुसलमान इस आत्म-घेट्टोकरण में सुरक्षा तलाश रहा था। वैसे ही, जैसे मौत की छाया में ज्यूस घेट्टो में दुबक कर रहते थे।
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घेट्टो के अंदर क्या होता है, इस पर सूचनाये कम..धारणाए ज्यादा हैं।
गोद मे बैठे मीडिया की खबर है, कि पाकिस्तान समर्थक नारे लगे।आतंकवादी पैदा हो रहे हैं।मस्जिद में हिन्दू विरोधी तकरीर हो रही,मदरसा जिहाद सिखा रहा है।
भ्रम और रहस्य का कुहासा, इसके गिर्द बुन दिया गया है।
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घेट्टो के भीतर का युवा भी भ्रमित हैं। किले के भीतर एकता का जोश है, कौम पे मर मिटने की ख्वाईश है।
लेकिन किले के बाहर अल्पसंख्यक होने की कमतरी भी है। ये नार्मल नही है।
तिस पर मौजूदा राजनीति ने इन्हें भयाक्रांत करने में कोई कसर नही छोड़ी। अब तो जनमानस के बड़े हिस्से ने, खुलकर यह धारा अपना ली है।
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विसर्जन, शोभायात्रा इस नंगी धमक का अवसर बन गए हैं। साल में 4-5 बार, देश भर में हिन्दू यह नग्नोत्सव झूमकर सेलिब्रेट करने लगा है।
घबराहट का मजा लेने लगा है।
पर यह घबराहट विस्फोटक है।
समाज के दो हिस्से जब एक दूसरे से दूर होते हैं, तो अविश्वास और कबीलाई आक्रामकता स्वतः जन्म लेती हैं।
याने घेट्टो की सीमाओं के दोनो ओर, युद्धोन्माद का पूरा समान मौजूद है। युद्धोन्माद लाशों के ढेर की ओर बढ़ता है। लाशें ही नफरत की सियासत को खाद पानी देती है।
और लाश चाहे जिस धर्म की हो, उसके तमाशबीनों की ताली से सत्ता, एक ही दल की निकलती हैं।
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ध्यान से देखिये। अब हम उसी नाजीज्म का सस्ता वर्जन है। नकली देशभक्ति है, झूठ का बोलबाला है।नफरत की सियासत, प्रोपगंडा चैनल हैं, निशाने पर लाया गया एक समाज है।
उसके आत्मनिर्मित घेट्टो भी हैं।
मगर आगे की राह में थोड़ा फर्क है।
नाजियों को शर्म थी, छुपाकर गैस चेम्बर्स में ले जाते थे। यहाँ शर्म की जरूरत नही। बस्तियों को ही एक्सटर्मिनेशन कैम्प में तब्दील करने का जतन है।
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फर्क यह भी, कि आम जर्मन इसके खिलाफ खड़े नही हुए थे।
हम खड़े हो गये हैं।
याद करके कि हम भारतीय हैं, और "हम भारत के लोग" किसी तानाशाह की आवाज पर, होलोकॉस्ट के समर्थन में खड़े होने वाली ब्रीड नही हैं।
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जर्मन नही हैं हम। हिंदू हैं।
सगर्व हिन्दू हैं..
वसुधैव कुटुम्बकम वाले।
पनाह छीनना, मार देना..
हिन्दू की तासीर नही।
इससे पहले कि दंगाई किसी घेट्टो को चुनें, आप अपनी पसंद का घेट्टो चुन लीजिये। बार्डर क्रास कीजिये, उनका हाथ पकड़ आश्वस्त कीजिए। एक मुस्कान बिखेरिये।
और तब, गर्व से मैं भी कहूँगा
आप हिन्दू हैं..
❤️
@AMISHDEVGAN "माफी" के साथ एक बात कहना है......
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आपके जैसा निष्पक्ष पत्रकार
आपके जैसा निडर पत्रकार
आपके जैसा ईमानदार पत्रकार
ना कोई हुआ है, ना कोई होगा !!
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मुसलमानों पढ़ो ख़ूब पढ़ो नेक बनो, क़ाबिल बनो, वकील बनो हिस्ट्री पढ़ो, संविधान पढ़ो ताक़तवर बनो, तुम को क़ौम की क़यादत करना है. तुम लीडर बनोगे या गीदड़? लीडर बनने के लिए पढ़ना पड़ेगा. असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM)