दफ्तर में उसकी मौत की खबर आई
दो मिनट का मौन रहा
फिर उसके हिस्से का काम
औरों में बांट दिया गया।
और वह मरने वाला इस डर से छुट्टी नहीं लेता था
कि अगर वह छुट्टी करेगा
तो उसके बिना काम कैसे चलेगा
"यूं ही आबाद रहेगी दुनिया
हम ना होंगे तो हम सा कोई होगा"
Harassment in Indian Overseas Bank
A young Probationary Officer raised genuine concerns about targets & mental pressure.
Instead of listening, GM Sanjay Kumar Singh took it as an ego hit and issued a fake “misconduct” notice for allegedly saying: “Tumhare paas dimaag nahi hai”
Ask ourself- will a probationer dare say that to a GM in a branch meeting?
This is not about language? No, Never. It’s about silencing dissent.
- No inquiry, No witness
- Just a top-down ego trip.
@IOBIndia must answer:
- Is this how you treat honest young officers?
- Is GM Sanjay Kumar Singh’s ego more important than truth?
- Will @MDIOB, @RBI and @DFS_India take action or remain silent?
We stand with this officer.
No more silent exploitation.
#IOBExposed
#StopBankHarassment
#BankPOsAreNotSlaves
#SaveBankers
#BankNahiBandaMazdoor
देश में हर महीने औसतन 15 से 20 बैंक कर्मचारी आत्महत्या कर रहे हैं ,
हर दिन हजारों कर्मचारी 12-14 घंटे की ड्यूटी बजाते हैं ,
और सालाना लाखों बैंक कर्मी डिप्रेशन और मानसिक बीमारियों के इलाज में जा रहे हैं।
लेकिन सोशल मीडिया पर
100 में से 97 जोक्स बैंक वालों की सुस्ती, चाय , और लंच ब्रेक पर ही बने मिलते हैं।
और अब जब वही कर्मचारी टारगेट, ट्रांसफर और तनाव में पिसकर
ज़िंदगी से हार रहे हैं,
तो पूरा समाज जैसे फेवी क्विक चाट कर बैठ गया है >> चुपचाप , संवेदनहीन।
वाह रे भारत , चुटकुलों के लिए इंसान चाहिए, इंसानियत के लिए कोई नहीं।
यह बात समझना बेहद ज़रूरी है कि >>
सभी को लगता है कि बैंक 4 बजे बंद हो गया है , लेकिन हकीकत बैंक 4 बजे सिर्फ ग्राहकों के लिए बंद होता है। यकीन ना हो अपने रिश्तेदारी में दोस्तो से पूछना जो बैंकिंग सेक्टर में है।
जबकि हक़ीकत ये है कि
👉 4 बजे सिर्फ ग्राहकों का क्लोजिंग टाइम होता है ,
बैंक का काम वहीं से असली रूप में शुरू होता है।
क्योंकि उसके बाद
📝 सभी ट्रांजेक्शन की क्लोजिंग एंट्री,
💵 कैश की गिनती और मिलान,
🏦 चेक की स्क्रूटनी और क्लीयरिंग,
📊 रोज़ाना रिपोर्टिंग और डेटा एंट्री,
📚 लेजर और बैलेंस शीट की मिलान जैसे
महत्वपूर्ण कार्य होते हैं,
जो अक्सर 2 से 3 घंटे तक चलते हैं।
👨💼 मतलब कर्मचारी तब तक बैंक से नहीं निकलते जब तक एक-एक चीज़ को क्रॉस चेक न कर लें।
इस प्रक्रिया में जरा सी चूक लाखों का हेरफेर बना सकती है।
इसलिए अगली बार कोई कहे कि बैंक 4 बजे बंद हो जाता है,
तो ध्यान दिलाइए >>
बैंक ग्राहक के लिए 4 बजे बंद होता है,
कर्मचारी के लिए नहीं।
वो अपने काम के प्रति ज़िम्मेदार हैं > और अक्सर दिखते नहीं, पर थकते ज़रूर हैं।
लंबा लिख रहा हूँ, क्योंकि दर्द छोटा नहीं है पूरा पढ़िएगा
सरकारी बैंक (RRB) से Morgan Stanley और फिर अपना बिज़नेस - तीन दुनियाओं का सफर और मेरी कहानी
मैंने अपनी करियर की शुरुआत भारत के सरकारी बैंक (RRB) से फिर किस्मत ने मौका दिया यूरोप में पढ़ने और फिर वहाँ मॉर्गन स्टेनली में काम करने का।
फर्क क्या था?
सिर्फ सैलरी का नहीं।
सिर्फ नाम का नहीं।
सबसे बड़ा फर्क था - इज्जत, माहौल और इंसानियत का।
भारत के सरकारी बैंकों में क्या देखा?
🔻 रोज़ नए-नए टारगेट
🔻 सीनियर्स के धमकी भरे व्हाट्सएप मेसेज
🔻 “आज 20 PMJJBY अकाउंट क्यों नहीं खुले?” जैसे सवाल
🔻 ऑफिस की हालत - टूटी कुर्सियाँ, टपकती छत, न एसी, न इंटरनेट
🔻 मेमो, सस्पेंशन और ट्रांसफर की तलवार हर वक्त सिर पर
🔻 छुट्टी मांगो तो जुर्म मानो
🔻 काम करो चाहे जान चली जाए - कोई पहचान नहीं, कोई तारीफ नहीं
वहाँ हमें इंसान नहीं, टारगेट मशीन समझा जाता था।
मेंटल हेल्थ?
वर्क-लाइफ बैलेंस?
करियर डेवलपमेंट?
❌ भारतीय बैंकिंग में ये शब्द सुनने तक को नहीं मिलते।
फिर मैंने मॉर्गन स्टेनली यूरोप जॉइन किया।
वहाँ जाकर महसूस हुआ, बैंकिंग का असली मतलब क्या होता है।
✅ अगर किसी दिन देर तक काम करो, तो ओवरटाइम खुद सिस्टम में रिकॉर्ड होता था। फिर मैनेजर से पूछा जाता था - Why did he work late?
✅ अगर काम ज्यादा है, तो मैनेजर खुद कहते थे - Need more staff? Take it. But your team should have work-life balance.
✅ महीने का एंड बहुत बिज़ी होता था, पर फिर मैनेजर खुद कहते - Go for some holiday and we will partially pay.
✅ ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर - सब्सिडाइज़्ड।
✅ ऑफिस में जिम, पूल, स्पा।
✅ कोई ड्रेस कोड का झंझट नहीं।
✅ “मन नहीं है काम करने का, कोई बात नहीं, आज आराम कर लो। टीम में कोई और संभाल लेगा।
✅ प्रमोशन, इनक्रीमेंट सब कुछ सिर्फ परफॉरमेंस पर बेस्ड।
✅ अगर किसी को बीच में बिज़नेस करना है, या कोई दूसरा वेंचर ट्राय करना है, तो मैनेजर बोलते - जाओ, ट्राय करो। कभी भी वापस आना चाहो, दरवाज़ा खुला है
✅ बिना सीलिंग के फुल मेडिकल फैसिलिटी।
✅ तनाव हो रहा है तो थेरेपी की सुविधा उपलब्ध।
✅ कभी भी किसी से भी संपर्क करने की छूट, कोई हीरार्की नहीं - आप किसी से भी अपनी समस्या शेयर कर सकते हो
✅ रिजाइन करने के बाद भी HR और मैनेजर टाइम-टाइम पर टच में रहते है- सब ठीक तो है? किसी मदद की ज़रूरत है?
ये सब देखकर एक ही बात समझ में आई -
मॉर्गन स्टेनली में जो सपोर्ट और माहौल मिला, उसी ने मुझे कॉन्फिडेंस दिया कि मैं खुद का वेंचर शुरू कर सकूं।
जो आत्मविश्वास मुझे मॉर्गन स्टेनली में मिला, वो भारतीय बैंकिंग सिस्टम में कभी नहीं मिला।
शायद वही माहौल और जॉब सिक्योरिटी थी, जिसने मुझे अपना वेंचर शुरू करने की हिम्मत दी।
आज पिछले डेढ़ साल से यूरोप, अफ्रीका और इंडिया में छोटा ही सही, लेकिन अपना वेंचर चला रहा हूँ - और उस फाइनेंशियल लेवल पर हूँ, जिसकी सरकारी बैंकिंग में रहते हुए कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।
सरकारी बैंकिंग में रहता, तो शायद आज इतनी हिम्मत नहीं होती।
बल्कि सच कहूँ, तो शायद डिप्रेशन में या सुसाइड की कगार पर पहुँच गया होता।
क्योंकि सरकारी बैंकिंग में तो सब कुछ उल्टा था:
❌ सबसे बहतरीन स्टाफ लेकिन सबसे ख़राब प्रबंधन
❌ देर तक काम करो, तो पूछने वाला कोई नहीं कि क्यों रुके
❌ स्टाफ कम है तो भी मैनेजर कहेंगे - काम तो करना ही पड़ेगा
❌ छुट्टी लेना जुर्म है
❌ घूमने-फिरने का तो सवाल ही नहीं।
❌ कोई सपोर्ट नहीं, कोई समझ नहीं।
❌ बस टारगेट, टारगेट, और धमकी।
❌ अपनी खुद की ग्रोथ के बारे में सोचना भी गुनाह।
❌ रिजाइन कर दो, तो बैंक के लिए तुम जैसे कभी थे ही नहीं
Morgan Stanley became a global investment bank not just because of capital and clients - but because it invests in people.
भारत की बैंकिंग सिस्टम टूट रही है, क्योंकि वो अपने ही लोगों को तोड़ रही है।
If you torture your employees with unrealistic targets, verbal abuse, and outdated systems - you destroy morale.
अगर आप लोगों को ही कुचल दोगे, तो कोई सिस्टम टिकेगा नहीं।
भारतीय बैंकिंग पॉलिसी मेकर्स से अपील है -
अगर आप सच में बैंकिंग सिस्टम को सुधारना चाहते हैं, तो शुरुआत उन लोगों से कीजिए, जो वहाँ दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।
– कर्मचारियों को इज्जत दो।
– उनका वर्क-लाइफ बैलेंस बचाओ।
– मेंटल हेल्थ को सीरियसली लो।
– रोज-रोज के टारगेट और धमकियाँ बंद करो।
– उन्हें आगे बढ़ने का मौका दो।
बैंक सिर्फ अकाउंट खोलने से नहीं चलते।
बैंक चलते हैं इंसानों से।
उन्हें संभालो - इससे पहले कि देर हो जाए।
नितिन त्यागी
(एक पूर्व बैंककर्मी)
#IndianBanking #RRB #MorganStanley #Bankervoice
Today, I announce my retirement from international hockey.
It’s a tough moment, but one every athlete must face one day.
It has been the greatest honour and pride of my life to represent our country 🇮🇳🙏
Thank you for everything. 🙏 @HockeyIndiaLeag@TheHockeyIndia
Enough is enough. Officers from Uttar Pradesh Gramin Bank left the unlawful detainment by @CdoHapur. We'll not yield to your unscrupulous pressure tactic. @pupgbaa stands firm with our officers for their fearless stand. We shall pursue this matter to its logical end.
"कैशियर बनाम अफसर: एक अनकही दास्तान"
आजकल शाखाओं में एक नया ट्रेंड चला है—
"एंट्री लेवल का सारा काम कैशियर करेगा।"
और कारण भी बहुत "तर्कसंगत" है—
"सैलरी बढ़ी है तो काम भी बढ़ेगा!"
कोई माने या न माने,
जहां दो ही स्टाफ में ब्रांच चल रही हो,
वहां तो कैशियर चाहे न चाहे,
हर एंट्री, हर स्कैन, हर पासबुक प्रिंट—सब कुछ करेगा ही करेगा।
और करे भी क्यों न?
मैनेजर साहब व्यस्त हैं—बैठकों में, रिपोर्टों में, मीटिंग्स में।
बचा कौन? कैशियर।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती—
अब ज़रा सोचिए,
जहां मैनेजर के अलावा दो-दो अफसर हों,
और दोनों बड़े गर्व से कहें:
"हम एंट्री लेवल का कोई काम नहीं करेंगे!"
तो सवाल उठता है—क्यों नहीं करेंगे भई?
क्या सिर्फ वेरिफाई करना ही अफसर का धर्म रह गया है?
बाकी सब काम—काउंटर से लेकर प्रिंटर तक,
स्कैनर से लेकर पासबुक तक—एक ही आदमी करेगा?
फिर कस्टमर सेवा कौन करेगा?
"बैंकिंग" तो रह जाएगी, लेकिन "सर्विस" कहीं खो जाएगी।
और फिर मैनेजमेंट भी तो यही चाहता है न?
थोड़ा लड़ाई, थोड़ा तनाव, थोड़ा 'कौन क्या करेगा' का विवाद...
"फूट डालो, राज करो" का फार्मूला आज भी खूब चल रहा है।
पर समझना ये है—इससे फायदा किसका होगा?
न कैशियर का,
न अफसर का,
न ग्राहक का,
न ही बैंक का।
नतीजा?
"200% कस्टमर सर्विस खराब, 100% व्यवसाय प्रभावित"
लड़ते लड़ते संस्था भी डूब जाएगी।
हर शाखा में नहीं,
लेकिन बहुत सी शाखाओं में यह दर्द सुनाई देता है।
इसलिए अब भी वक्त है—
"काम को काम समझो, पद को अहंकार नहीं।"
"साथ मिलकर काम करो, तभी बैंकिंग बचेगी!"
पीएमश्री योजना के तहत NIELIT द्वारा #JNV में AI & ML की प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई जिसमें छात्रों ने Python प्रोग्रामिंग के माध्यम से डेटा विश्लेषण, Algorithm व Neural Network में दक्षता हासिल की। यह पहल छात्रों की तकनीकी दक्षता व रोजगार क्षमता को बढ़ाने के लिए है। #NEP2020
अतुल सौरभ की आत्महत्या पर
अतुल की आत्महत्या के बाद सोशल मीडिया में जैसे चर्चा हो रही है, हम सब को लगता है कि इससे परिवर्तन हो जाएगा। मुझे ऐसा नहीं लगता।
अतुल सौरभ जैसे दर्जनों केस हर वर्ष होते रहते हैं। अतुल एक सुलझे हुए व्यक्ति थे जिन्होंने वीडियो और पत्र के माध्यम से अपनी पीड़ा और आत्महत्या के निर्णय पर प्रकाश डाला। हर पीड़ित के पास अभिव्यक्ति के साधन नहीं होते। वो बस तंत्र से हार कर मर जाते हैं।
तंत्र से जीतना असंभव है। अतुल की मृत्यु से कुछ नहीं बदलेगा। मैं आश्वस्त हूँ कि वही महिला किसी और से विवाह कर के, अपने बेटे को ग्रूम करते हुए, बाप के बारे में विषैली बातें करते हुए उसे पालेगी। संभवतः कोर्ट उसे अतुल की संपत्ति का पूरा हिस्सा भी दे देगी।
जहाँ तक जज की बात है, जजों को जज बचा लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से ले कर जिला न्यायालयों के परिसर में धूल फाँकते वकील को भी पता है कि कोर्ट हर स्तर पर घुसखोरी का अड्डा है। तो, इस पर भी कोई चर्चा तक नहीं होगी।
परसों तक यह विषय समाप्त हो जाएगा और हमारे पास नया विषय आ जाएगा। यही सत्य है।
मैं अतुल से सहानुभूति भी रख कर क्या करूँगा? वो तो चले गए। अतुल को मरने से पहले एक-दो को साथ ले कर जाना चाहिए था। मुझे ‘शूल’ फिल्म का अंतिम दृश्य याद आता है जहाँ मनोज बाजपेयी के पात्र को तंत्र ने विवश कर दिया कि वो विधानसभा में विधायक की कनपटी पर बंदूक रख दे।
समाज ऐसा ही न्याय चाहता है। संभवतः न्याय है भी वही। परंतु, कानून की पुस्तक में वो न्याय नहीं हत्या हो जाएगी। कानून की पुस्तक में अतुल ने आत्महत्या की है, पर समाज जानता है कि अतुल की हत्या की गई है।
न्यायपालिका के हाथ कानून से बँधे हो सकते हैं, पर जो पेशकार जज के नीचे बैठ कर पैसा लेता हो, और जो जज स्पष्ट रूप पाँच लाख माँग रही हो, उसे राह चलते कल को कोई गोली मार दे, तो वह अन्याय नहीं होगा। क्योंकि उस जज ने केवल घूस नहीं माँगा, उसने उस व्यक्ति की हत्या में अपना योगदान दिया है।
कई लोग कह रहे हैं कि जज को पैसे दे कर सेटलमेंट कर लेता, जीवन क्यों ले लिया अपना। यह बात आप इसलिए नहीं समझ सकते क्योंकि कुछ लोग अपने आदर्शों से इस सीमा तक समझौता नहीं कर पाते। पेशकार को सौ रुपए देना भी घूस ही है, पर पेशकार से न्याय की आशा नहीं है।
वहीं, कोई जज हर बात जानते हुए भी आपको विवश करने लगे, तो आप ट्रिगर हो जाते हैं कि ये कब तक चलेगा? भगत सिंह चाहते तो असेंबली से भाग सकते थे बम फेंकने के बाद। वो नहीं भागे क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी फाँसी से आंदोलन को बल मिलेगा।
अतुल की आत्महत्या भगत सिंह के स्तर की नहीं है, पर सोच वही है कि उसकी मृत्यु से कोई परिवर्तन हो, कोई नोट करे कि यह अपवाद नहीं, उदाहरण है। अतुल को जब लगा कि पूरा सिस्टम, न केवल उसे बल्कि उसके पूरे परिवार को टार्गेट करता रहेगा, उनके दिए पैसे ही उनकी पीड़ा का कारण बनेंगे तो उन्होंने यह कठिन निर्णय लिया।
हम स्वयं को ले कर जितनी चिंता नहीं करते, उससे अधिक अपने माँ-बाप या पत्नी-बच्चे को ले कर चिंतित रहते हैं। यदि वैसी परिस्थिति आती है, तो हम अपने लिए नहीं, उनकी पीड़ा को ध्यान में रख कर कॉम्प्रोमाइज करते हैं।
अतुल की आत्महत्या उसके परिजनों के लिए कॉम्प्रोमाइज है। उसे लगा कि वह यदि इस समीकरण से हट जाता है, तो बाकी हर व्यक्ति चैन से रह लेंगे। पुत्र का चेहरा भी उसे याद नहीं था, वह छोटा है, बड़ा हो कर उसे कदाचित् पिता का पक्ष समझ में आ जाए, ऐसा अतुल ने सोचा।
पुलिस, न्यायपालिका आदि जितनी भ्रष्ट हो सकती है, हो जाएगी। इनके लिए अतुल उन सैकड़ों नामों में से एक नाम है, जिसे ये हर सप्ताह वसूली का वॉलेट समझते हैं। उन तक ये वीडियो पहुँचा भी होगा तो ‘चू#% साला’ बोल कर समोसे खा लेंगे।
यही सत्य है। यही दुर्भाग्य है।
#AtulSubhash #JusticeIsDue
🚨 Indian Telecom Companies Need To Launch Call Only Recharge Packs (Without Mobile Data)
Many Poor and Senior Citizens Don’t Need Data Still End Up Paying High Price For Recharge
TRAI Needs To Regulate This For Fair Market
Picture dedicated to all the Union leaders affiliated to 'BMS - Bharat Mazdoor Sangh' who betrayed Banker's agitational programme to oppose attack on Bank staffs in Maharashtra. One more attacked today.
What U will call those leaders now!
From August 2024, we are starting free coaching for Jawahar Navodaya Vidyalaya (JNV) entrance exam for children studying in government schools in Davanagere district. Most students who get admission to JNV schools come from private schools. Poor students in villages, especially belonging to SC, ST and Muslim communities predominantly study in government schools.
➡️SO साहब से एक पुलिस कांस्टेबल छुट्टी की जायज फरियाद करता है, जिसमें कारण दिया गया था कि संबधित कांस्टेबल की पत्नी डिलिवरी हेतु अस्पताल में एडमिट है.
➡️लेकिन कप्तान साहब के आदेशानुसार SO द्वारा कांस्टेबल को घर जाने की छुट्टी नहीं दी जाती है. इसी बीच कांस्टेबल विकास निर्मल की पत्नी एवं नवजात बच्ची की दुखद मौत हो जाती है. अंत में कांस्टेबल ने कप्तान से लगाई गुहार तब कहीं जाकर कांस्टेबल अपने गृह जनपद मैनपुरी के लिए निकलता है जहां उसकी मासूम नवजात बच्ची और उसकी पत्नी दोनों मृत पड़े हुए हैं.
➡️इस घटना से पता चलता है कि विभागों में नैतिकता का स्तर क्या है. हम एक इंसान के नाते कितना नीचे गिर रहे हैं. मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. क्या विभाग कोई एक कारण बता सकता है जिम्मेदार कप्तान और SO पर हत्या का मुकदमा नहीं दर्ज होना चाहिए?
➡️अब सब ठीक है उस कांस्टेबल ने अपना परिवार खो दिया अब वो आराम से ड्यूटी करेगा. इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की क्यूँ न हो. मामले में लीपापोती जारी. @Uppolice@UPGovt@myogiadityanath@CMOfficeUP@HMOIndia@PMOIndia
He was working in Ellaquai Dehati Bk, a RRB sponsored by State Bank of India – the largest PSB.He was shot dead by a terrorist in J&K Kulgam in the second targeted attack on Hindus.A resident of Hanumangarh district in Rajasthan, Kr had recently joined his posting in Kulgam.
What a great news for youth and upcoming talents! Big compliment to the initiators for bringing back the HIL and adding a women's competition! #inspiration#stars