Deeply shocking to read this official US statement, which contains absolutely no expression of regret or condolence for the loss of innocent Indian lives. How can a “friend” and strategic partner be so deeply insensitive?
Why couldn’t a non-compliant commercial vessel have been stopped using other, non-lethal means? Is it not possible to disable a ship's propulsion or steering without firing missiles targeted to kill civilian crew members?
Practically every merchant ship navigating these crucial waters has Indian crew on board. Are they all considered fair game for US missiles now?
This approach is unacceptable and I hope @DrSJaishankar had said so to @marcorubio.
पिता आसमान है और मां धरती, इसलिए इनका दिल कभी न दुखाओ, इन दोनो में यदि एक भी चला गया, पिता चला गया तो समझलो सर से आसमान लुट गया और मां चली गई तो चरणों से धरती ...
>लखनऊ में छात्रों ने पहले से ही 12 जून को आंदोलन प्लान कर रखा था
>अभिजीत दीपके ने जान बूझकर तारीख 12 जून रखी
>जिससे आयी हुई भीड़ को CJP की भीड़ बताकर मस्त रील और फोटो खिंचवा सकें
>लेकिन उत्तर प्रदेश के छात्रों ने आंदोलन हाइजैक नहीं होने दिया
>और अभिजीत दीपके को वहाँ से भागना पड़ा
दारोगा जी का होगा कुछ नहीं छोटे मोटे नेता विधायकों को ये कुछ समझते नहीं होंगे बाक़ी ऑटो वाला जहाँ शिकायत ले जाने की बात कर रहा वहीं का वरदहस्त प्राप्त होगा इनको
इस राज्य में विधानसभा चुनाव होते क्यो हैं चलाना सब कुछ पटवारी से लेकर कलेक्टर को है बिना मतलब अरबो फूंकने का क्या मतलब मंत्री विधायक की जब चपरासी तक नहीं सुनते
परम विकट स्थिति है!
एक वक्त हुआ करता था जब अफसर कोताही बरतते थे तब मंत्री उन्हें शंट करवा देते थे। अब ‘अफसरयुग’ में नौकरशाही का अमृतकाल चल रहा है तो मंत्री ‘पत्र मात्र’ लिखकर भड़ास निकाल ले रहे हैं। खैर मंत्री जी के आरोप गंभीर हैं पर हमारे सूबे में समरथ को नहीं दोष गुसाईं का चलन है लिहाजा कुछ होगा इसे लेकर जातकों में शंकाएं हैं।
खैर, आरोप-प्रत्यारोप, वार-पलटवार, शह-मात के इस खेल में बिजली व्यवस्था का क्या हाल होना है इसे समझना कोई राकेट साईंस नहीं है!!!🤔🤔😢
प्रयागराज से सुबह 10:30 बजे हडप्सर-भुसावल जंक्शन ट्रेन में मां व छोटी बहन के साथ सफर कर रही किशोरी लापता हो गई।
परिजन परेशान होकर तलाश में जुटे हैं।
सूचना हेतु संपर्क: 7709495933, 7317696022
@prayagraj_pol
बड़का हिन्दू वादी सरकार बनी फिरती है योगी की भाजपा सरकार उत्तर प्रदेश में लेकिन नकल रोकने के नाम पर कलावा काटने तक पर रोक न लगा पाते.....!!
न ही पेपर लीक पर रोक लग पाती है बस गाल बजाते रहो....!!
BIG BREAKING | ऊर्जा मंत्री बनाम UPPCL चेयरमैन 🚨
"बिना मुझसे पूछे बिजली महंगी क्यों की?" ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा का UPPCL चेयरमैन पर बड़ा हमला. मेरे विभाग के फैसले मुझे टीवी न्यूज चैनल से पता चलते हैं। बिना बताए मुख्यालय से कहां गायब रहते हो?
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बिजली संकट और बढ़े हुए बिजली बिलों के बीच अब ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा और UPPCL चेयरमैन आशीष गोयल के बीच खुली टकराहट सामने आ गई है।
ऊर्जा मंत्री ने UPPCL चेयरमैन को कड़ा पत्र लिखकर सवाल किया है कि जून 2026 के बिजली बिलों में 10% Fuel & Power Purchase Adjustment Surcharge (FPPAS) लगाने का फैसला बिना उन्हें बताए और बिना उनकी अनुमति के कैसे लिया गया?
मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि इस फैसले से सरकार की छवि खराब हुई है और विभाग की बदनामी हुई है। उन्होंने पूछा कि इतने महत्वपूर्ण फैसले पर मंत्री को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया?
यही नहीं, मंत्री ने चेयरमैन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि संकट के समय चेयरमैन मुख्यालय से बाहर रहते हैं और विभागीय मामलों में लगातार लापरवाही बरती जा रही है। मंत्री ने इसे जनहित के खिलाफ और गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताया। मुझे मेरे ही विभाग के फैसले मीडिया से पता चलते हैं। ये रवैया ठीक नहीं।
पत्र में बिजली विभाग में अनुभवी कर्मचारियों को हटाने, नए और कम अनुभवी लोगों को तैनात करने तथा बिजली आपूर्ति व्यवस्था में खामियों पर भी नाराजगी जताई गई है।
#Lucknow #UPPCL #ElectricityBill @CMOfficeUP@aksharmaBharat@UPPCLLKO
BIG BREAKING | ऊर्जा मंत्री बनाम UPPCL चेयरमैन 🚨
"बिना मुझसे पूछे बिजली महंगी क्यों की?" ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा का UPPCL चेयरमैन पर बड़ा हमला. मेरे विभाग के फैसले मुझे टीवी न्यूज चैनल से पता चलते हैं। बिना बताए मुख्यालय से कहां गायब रहते हो?
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बिजली संकट और बढ़े हुए बिजली बिलों के बीच अब ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा और UPPCL चेयरमैन आशीष गोयल के बीच खुली टकराहट सामने आ गई है।
ऊर्जा मंत्री ने UPPCL चेयरमैन को कड़ा पत्र लिखकर सवाल किया है कि जून 2026 के बिजली बिलों में 10% Fuel & Power Purchase Adjustment Surcharge (FPPAS) लगाने का फैसला बिना उन्हें बताए और बिना उनकी अनुमति के कैसे लिया गया?
मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि इस फैसले से सरकार की छवि खराब हुई है और विभाग की बदनामी हुई है। उन्होंने पूछा कि इतने महत्वपूर्ण फैसले पर मंत्री को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया?
यही नहीं, मंत्री ने चेयरमैन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि संकट के समय चेयरमैन मुख्यालय से बाहर रहते हैं और विभागीय मामलों में लगातार लापरवाही बरती जा रही है। मंत्री ने इसे जनहित के खिलाफ और गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताया। मुझे मेरे ही विभाग के फैसले मीडिया से पता चलते हैं। ये रवैया ठीक नहीं।
पत्र में बिजली विभाग में अनुभवी कर्मचारियों को हटाने, नए और कम अनुभवी लोगों को तैनात करने तथा बिजली आपूर्ति व्यवस्था में खामियों पर भी नाराजगी जताई गई है।
#Lucknow #UPPCL #ElectricityBill @CMOfficeUP@aksharmaBharat@UPPCLLKO
हर्षद मेहता सीरीज़ में एक डायलॉग है कि जब किसी का काम खराब नहीं कर सकते तो उसका नाम खराब कर दो। दुर्भाग्य से नेहरू इस देश की सबसे मिसअंडरस्टुड शख्सियत हैं, इतने कि कुछ लोग शास्त्री जी से भी उनकी तुलना करके शास्त्री जी को महान बताने का प्रयास करते हैं। पता नहीं, शास्त्री जी ये सब देखते तो ऐसे लोगों को क्या कहते।
जब तक नेहरू जीवित थे, न तो विपक्ष में किसी का क़द उनके सामने राजनीति करने लायक़ था, और न ही कांग्रेस में कोई उनके खिलाफ जाने की हैसियत रखता था।
तब घोर रूढ़िवादी कांग्रेसी उन्हें कट्टर कम्युनिस्ट कहते थे, मुस्लिम लीगी उन्हें कट्टर हिंदुवादी कहते थे, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट उन्हें पूँजीपतियों का एजेंट कहते थे। महासभाई और संघी उन्हें मुस्लिम तुष्टिकर्ता कहते थे।
यह महासभाइयों का फैलाया हुआ झूठ ही है कि नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और केवल दुर्घटनावश हिन्दू हूँ, जो आज सच की तरह बिकता है।
नेहरू दुनिया के उन दुर्लभतम पिता-पुत्र द्वय में से एक हैं, जिन्होंने जब अपने महान पिता की पगड़ी अपने सिर पर बांधी तो उनके पिता की पहचान फुटनोट्स में समा गई। यह पंडित मोतीलाल नेहरू ही थे जिन्होंने लॉर्ड बिर्किनहेड की इस चुनौती का कि इंडियन इतने मैच्योर नहीं हैं कि स्वयं अपने शासन के लिए संविधान लिख सकें, प्रत्युत्तर नेहरू रिपोर्ट लिखकर दिया था, जिसे भारत का पहला लिखित संविधान माना जाता है। इसी रिपोर्ट में पहली बार भारत को एक आज़ाद देश के रूप में देखने की अवधारणा दी गई थी।
नेहरू शौक से कम्युनिस्ट नहीं थे, उस वक्त तीसरी दुनिया ही पूरी तरह से कम्युनिज़्म की चपेट में थी। यूरोप की तरह यहाँ दुनिया भर से लूटकर लाई गई संपदा नहीं थी और इन्हीं यूरोपियन्स से आबाद हुए अमेरिका जैसे विभिन्न पूंजी के स्रोत भी नहीं थे।
इनमें से ज़्यादातर देशों में पारंपरिक सामंती व्यवस्था थी। पूंजी के एकमात्र स्रोत भूमि पर असमान स्वामित्व था। भारत भी इससे अछूता नहीं था। कम्युनिज़्म जहाँ भी फैला, उसके लिए सबसे उर्वर भूमि यहाँ भी थी। बड़े संख्या में जमींदार थे , जो कि विभिन्न व्यवस्थाओं के दें थे। देशभर में बड़े ज़मींदारों से लेकर छोटी जोत के किसान भी स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेसी थे। कई जगहों पर ज़मींदारों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सबकुछ लुटा दिया था। वे कांग्रेस से लेकर क्रांतिकारी संगठनों तक की फंडिंग करते थे। इनके योगदान को भुलाकर नेहरू इन्हें कम्युनिस्टों के हवाले नहीं छोड़ सकते थे, जो कल्चरल रेवोल्यूशन के नाम पर सबको मरवा दें और फिर बाद में जिनसे मरवाएँ उन्हें भी भूखे मरने के लिए छोड़ दें, जैसे माओ ने छोड़ दिया था।
नेहरू ने अपनी सूझबूझ से पहले तो कम्युनिस्टों को लोकतंत्र स्वीकारने पर मजबूर किया, फिर उनके सशस्त्र विद्रोह के ख्वाबों के एक-एक करके पर कुतरे। फिर उनकी जायज नीतिओं को स्वीकारा , भूमि सुधार लागू किया। पूंजी के नए स्रोतों का सृजन किया।
जापान के बाद नेपाल ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगाई. नेपाल सरकार का कहना है कि भारतीय आमों में कीटनाशकों की मात्रा, तय नियमों से कहीं ज्यादा है. इस बैन का भारत पर क्या असर पड़ेगा? भारत के आम व्यापारी इससे कैसे निपटेंगे?
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आदमखोर भेड़िये हलफनामे दे दें कि इंसानी बच्चे उनके साथ सुरक्षित रहेंगे तो उन पर ज़्यादा विश्वास करूंगा बनिस्बत धर्मेंद्र प्रधान के त्रुटिशून्य NEET परीक्षा कराने के वादे पर।