#बस्तर में 2024 #आदिवासीस्त्रियों के हिस्से अत्याचार का एक नया अध्याय- उन्हें दर्दनाक मौत की सज़ा देने की शुरुआत का साल है. #नक्सलीसंगठनों ने रणनीति में यह कैसा बदलाव किया है यह वही जानें, पर अब आदिवासी स्त्रियां उनके निशाने पर हैं.
@poonam_vasam का लेख
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हल जोतते हुये मुठभेड़ में
समलू मारा गया अपने ही खेत में
उसकी लाश बैलों की लाश के साथ
सड़ती रही कुछ दिन वहाँ
मरे हुये बैल व समलू की मरी हुई देह
की खाद भी अब
खेत की मिट्टी में मिल चुकी है
देखो बरसात भी अच्छी हो रही है
खुश होना तो बनता है कि
इस साल समलू के खेत में
फसल अच्छी होगी।
तुमने महुआ टपकते हुए नहीं देखा
तुमने चारपाक का खट्टा-मीठा स्वाद नहीं चखा
तुमने सियाड़ी के पत्ते पर पकी हुई रोटी नहीं खाई
तुमने चापड़ा चींटी का घोंसला नहीं देखा
झरिया का ठंडा पानी नहीं पिया
कितने बुद्धू हो तुम कि मुझसे प्रेम करने से पहले
तुम्हें प्रेम के विषय में कुछ नहीं पता।
इन दिनों सारी दुनिया का विमर्श
मोबाइल की स्क्रीन पर चमक रहा है
सारी क्रांतियां एक दूसरे के कंधे पर बैठी सुस्ता रही हैं
सारे अपराधों से बरी होने का एक ही तरीका है
ईश्वर पर थोप दो अपनी सारी गलतियां
इन दिनों ईश्वर के नाम पर किया गया गुनाह
चलन में है
जो चलन में है वही सभ्य है।
एक फूल सरकार के खिलाफ
बगावत पर उतर सकता है
एक नदी सरकार के मंसूबे पर
पानी फेर सकती है
पहाड़ इतने कठोर हो सकते हैं कि
सरकार की सारी आधुनिक
मशीनें पस्त हो जाएं
एक कोयल सरकार के खिलाफ
लगातार बिना थके गा सकती है
सबका अपना-अपना लोकतंत्र है।
तस्वीर-मुकेश चंद्राकर
【प्रतीक】
सब भूलते हैं अपना धर्म
पेड़ नहीं भूलते
उनके रोमछिद्र खुले होते हैं
प्रार्थनारत ध्वनियों के लिए
इसलिए
दुनिया के तमाम पेड़ों को
ईश्वर का प्रतीक मान लिया
जाना चाहिए
【कविता की भूख】
दियासलाई की एक करंट भरी तिली में
जितनी आग जमा है
झपकना भूल गई एक आँख में
जितना विस्मय
हवा के भीतर जितनी खबर
एक खाली दीवार पर चिपकी हैं
जितनी भी उदासियाँ
वह सब अपने पते पर चली जायें
या घट जायें
उस शहर के भीतर
जहाँ कविता की भूख बेदम हो रही है.
पूनम वासम
तेरह साल का लड़का पूछना चाहता है गुरुजी से सवाल
जहां मृत्यु एक पर्व है, वहाँ 'झण्डा पंडुम'
के नाम पर एक दोनी बूंदी, दो बिस्कुट, दो समोसा से सजी हुई डिस्पोजल प्लेट का नाम ही आजादी है क्या?
कवितांश- #झण्डा पंडुम
धरती नहीं माँगती उनसे अपनी दी गई शुद्ध हवा का हिसाब
धरती निश्चिन्त रहती है वहाँ, जहाँ
पत्तियों के टूट कर गिरने भर से
छतोड़ी टूट जाने वाले दर्द से गुजरता है
हिड़मा का गाँव
धरती कभी नहीं कहना चाहेगी कि
आमचो महापरभु मरलो
धरती जानती है
हिड़मा का बेटा धरती के लिए आक्सीजन है।
धान रोपती स्त्रियां यह बात जानती हैं
कविताओं से ज्यादा
भूख ने मचाई है तबाही
धान रोपती स्त्रियां रोपती हैं देह की ऊर्जा, आत्मा की संतुष्टि, मन का सुकून
और सौंपती हैं धरती को धरती माँ कहलाने का गुरुर!
हम शर्म से मर क्यों नहीं जाते, कितनी आसानी से यह सब कुछ देख पाती हैं हमारी आँखें, क्यों हमारी नसों में खून नहीं उतर आता, दुःख इतना भारी है कि कुछ लिखा नहीं जा रहा😡#मणिपुर
चूमकर तुम्हारे माथे को
एक दिन धरती को
चूमना चाहती हूँ
ताकि तुम्हारे माथे की
उर्वर भूमि का स्वाद
चख सकें धरती के वो तमाम बच्चे
जिनकी जीभ को नहीं पता
स्वाद और स्वाद में अंतर
तुम्हारे माथे को चूमना
मेरे लिए धरती पर प्रेम पुष्पों की
पहली फसल का लहलहाना है.