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Anyone facing same?
' जो अतीक का यूपी में हुआ
बंगाल में वैसा ही जहांगीर का होगा '
टाइम्स नाउ के हिंदी चैनल को TMC के उम्मीदवार जहांगीर ख़ान की लाश चाहिए. जहांगीर खान की हत्या पर जश्न मनाने का मौका चाहता है ये चैनल .
अगर देश में कोई कायदा कानून होता तो किसी हत्या के लिए उकसाने वाले शो चलाने वाले चैनल के खिलाफ मुकदमा होता .
कोई न्यूज चैनल ऐसा कैसे लिख सकता है ?
ऐसे मीडिया वाले इस देश को कहां ले जाना चाहते हैं , इसकी कल्पना की जा सकती है .
गरीब का बेटा सांसद
हत्प्राण की माँ विधायक..
कुछ पोस्ट देख रहा हूँ। बताया जाता है कि भाजपा कैसे किसी "गरीब" जिसके घर मे "फूस की छप्पर" है, उठाकर सांसद बना दी। किसी की बेटी का बलात्कार और हत्या हुई, मां को टिकट देकर विधायक बना दिया।
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भाजपा आरएसएस में प्रभावशील एक नेता, जो मित्र भी है, ने बड़े गर्व से घटना सुनाई।
यह कि किसी राज्य में भाजपा के किसी कार्यालय में दशकों तक साफ सफाई करने वाले की निष्ठा और सेवा से, फलां सँगठन मंत्री जी द्रवित हो गए।
उसे गृह क्षेत्र से टिकट दिला दिया।
वो 20 हजार वोट से जीता।
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वे गर्व से अपने दल की गुणवत्ता बता रहे थे। मेरा सवाल था- क्या आप इस "योग्यता" के आधार पर उसे अपना डॉक्टर बनाकर इलाज करने देंगे।
अपना वकील बना लेंगे? कम्पनी का सीईओ बना सकते है? अगर नही- तो इस समाज और देश का लॉ-मेकर कैसे बना सकते है? क्या यह गैर जिम्मेदाराना चयन नही है??
क्या लॉ मेकिंग सबसे क्रीम मस्तिष्क के लिए भी सबसे डिफिकल्ट काम नही है? क्या इसके लिए न्यूनतम विषय योग्यता की भी जरूरत नही?
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भारत की संसद हो, या राज्यो की विधानसभा। ज्यादातर सदस्यों को न बोलने का शउर है, न अर्थव्यवस्था, कानून, इम्प्लेंटेशन, योजनाओं की पेचिदगियों की समझ।
विधाइकायें दिनों दिन गर्त में जा रही हैं। उबाऊ, बोझिल और स्तरहीन बातों के बाद मत विभाजन के समय पार्टी व्हिप के अनुसार वोट देना भर काम है।
पहले साल में डेढ़ सौ दिन का सत्र, आम था। अब ये 110 दिन बमुश्किल चलती है। 1990 के बजट सत्र में बहस
123 घंटे हुई थी, 2023 में महज 12 घंटे- इसमे भी अर्थहीन बातें हुईं।
यह 90% की गिरावट है।
या 100℅??
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42% बिल 30 मिनट से भी कम में पास हो जाते हैं। उन्हें समझने और बहस करने वाले लोग संसद में हैं भी नहीं। नतीजतन, कमजोर कानून बनते है।
इसलिए कन्फ्यूज्ड नीतियां बनती है, जिन पर रोज नए दिशानिर्देश और गाइडलाइन भ्रम को और बढ़ाती है। अफसर से लेकर जनता सब पागल बना दी जाती है।
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लोकसभा राज्यसभा मिलाकर देश के साढ़े सात सौ सांसदों में से 50-60 को छोड़कर बाकी कूड़ा करकट हैं। वे सिर हिलाते है, शोर करते हैं, अटेंडेंस लगाते है, वेतन लेते हैं, और फोटो खिंचाते हैं।
विधानसभाओं में स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है। मगर ओवरऑल एक निराशाजनक सेनेरियो है। देश का बेस्ट माइंड, संसद में नही होता। वहां दुखियारे, गरीब, विक्टिम्स, और सेवादारों का जमावड़ा है।
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औऱ इससे देश का भला नही होता।
पार्टी का भी नही।
आपका तो बिल्कुल नही। पार्टी के छाप पर आंख मूंदकर वोट डालने के पहले यह भी जरूर देखें कि उस व्यक्ति में लॉ मेकिंग की एबिलिटी है भी, या नही।
क्योकि देश का कानून बनाने वाला “क्रीम मस्तिष्क” होना चाहिए, न कि सिर्फ “वफादार” या दुखियारा..
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द फेस ऑफ लॉस्ट ओपेर्चुनिटी!!
पवन खेड़ा को राहत मिल गयी है। उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने माना कि आरोप राजनीतिक हैं, और गिरफ्तार करके पूछताछ की जरूरत नही है।
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इस केस को कीनली देखता रहा। खेड़ा का हमला सटीक औऱ सामयिक था। एन चुनाव की बेला में, एक सधा हुआ हमला था। सही या गलत, इसके ऑनसरेबल खेड़ा नही थे।
जवाब तो विश्वसरमा को देना था। वे धमकियां देने लगे। खुलेआम गाली बकने लगे। ऐसा मंजर, ऐसी भाषा भारतीय राजनीति के इतिहास में देखी नही गई थी।
लेकिन वे जीत गए। इसलिए कि खेड़ा, भागते और कोर्ट से राहत मांगते दिखे। वीक दिखे, और इसलिए बाजी हार गए। और यह हार उनकी अकेली नही, एक पार्टी के रूप में कांग्रेस और उनके लीडर, उनके समर्थकों की भी हार है।
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मंजर की कल्पना करिए..
कि धमकी के बाद खेड़ा सीना ठोककर गोहाटी जाते है। एयरपोर्ट पर गिरफ्तार होते हैं। बेड़ियों के, घसीटकर ले जाते हुए पवन खेड़ा।
उनके पीछे दिल्ली में राहुल गांधी, जयराम रमेश, खड़गे और दर्जन भर बड़े नेता वही आरोप दोहराते हैं। खुद को भी खेड़ा ही तरह, गिरफ्तारी की चुनौती देते हैं। सारे गोहाटी जाते हैं। आरोपो को दोहराते है।
अगर उन्हें भी गिरफ्तार किया जाता है, तो देश के कोने कोने इसे 100 सांसद, हजार विधायक यही दोहराते है। गोहाटी पहुँचते हैं।
पूरी कांग्रेस का हू इज हू,
विश्वसरमा की जेल में है।
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लेकिन नही। क्योकि पुलिस, असम की उस वक्त चुनाव आयोग के प्रभार में है। इन गिरफ्तारी का जवाब चुनाव आयोग को देना है। मोदी सरकार को देना है।
पूरी दुनिया मे देना है। पूरे एक माह, चुनावी मौसम में, यही खबर होती। मामला, गले की हड्डी हो जाता। यहां अपराध कुछ भी नही है, तो किसी को फांसी नही होती। लीगल टीम ऐसे 100-50 मामले क्लब करके, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाती।
महीने 15 दिन में सभी बाहर..जैसे अभी अकेले खेड़ा हैं।
लेकिन तब कांग्रेस विजयी भाव में होती।
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भाजपा फट्टूओ का दल है। मुझे याद है, जब चोर को चोर कहने पर राहुल को 2 वर्ष सजा मिली। और अपील में उन्होंने हफ्ता भर लगाया। एक बार को लगा कि वे शायद अपील न करे।
सरकार की सांस अटक गई। खुद अमित शाह ने राहुल को मीडिया के माध्यम से सलाह दी कि उन्हें हायर कोर्ट में अपील करनी चाहिए। जब राहुल ने अपील की, तब भाजपा की लीडरशिप, कांग्रेस से ज्यादा राहत में आई होगी।
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इस बार खेड़ा के पास सितारा बनने का अवसर था।
उनके आरोप का खंडन किसी विदेशी एम्बेसी ने नही किया। संदिग्ध पासपोर्ट पर, विदेश मंत्रालय ने कोई क्लीन चिट नही दी। खुद भाजपा में कोई नेता हिमंता के साथ खड़ा न दिखा। वे बदहवास थे, उन्हें बेहतरीन ढंग से कार्नर किया जा चुका था।
लेकिन कांग्रेस, बड़ी फट्टू साबित हुई।
राजनीतिक लड़ाई जनता के परसेप्शन में लड़ी जाती है। जेल, दमन, गाली, अत्याचार उस परसेप्शन में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति और श्रद्धा पैदा करते।
गिरफ़्तारी से डरकर अवसर खो दिया गया।
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खोए गए इस एक लाखवें अवसर का चेहरा, पवन खेड़ा है।
हर वह कांग्रेसी भी जिसने इस समय खेड़ा को अकेला छोड़ा। उनके आरोप नही दोहराए। जेल से कन्नी काटी, और खेड़ा के लगाए आरोपों की सत्यता असत्यता पर बहस करते रहे।।
वे सारे के सारे लॉस्ट ओपेर्चुनिटी हैं। फेल्ड लीडर्स हैं, डरपोक और कच्चे हैं। दे डोंट डिजर्व पॉवर। दे ऑल,
आर फेस ऑफ लॉस्ट ओपेर्चुनिटी..
कह दिया था - चुनाव के बाद महंगाई की गर्मी आएगी।
आज कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹993 महंगा। एक ही दिन में सबसे बड़ी बढ़ोतरी। यह चुनावी बिल है।
फरवरी से अब तक: ₹1,380 की बढ़ोतरी - सिर्फ़ 3 महीनों में 81% का इज़ाफ़ा।
चायवाला, ढाबा, होटल, बेकरी, हलवाई - हर किसी की रसोई पर बोझ बढ़ा। और इसका असर आपकी थाली पर भी पड़ेगा।
पहला वार गैस पर, अगला वार पेट्रोल-डीज़ल पर।
हार्ट अटैक का शक हो तो सबसे पहले एम्बुलेंस/इमरजेंसी मदद बुलाइए। देर मत कीजिए, खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने की कोशिश भी मत कीजिए। व्यक्ति को बैठाइए, आराम करने दें , तंग कपड़े ढीले करें।
अगर मरीज होश में है, और उसे एस्पिरिन से एलर्जी नहीं है, पेट/आंत से खून बहने की समस्या नहीं है, डॉक्टर ने मना नहीं किया है, तो 300 mg aspirin चबाकर निगलना मदद कर सकता है। पहले इमरजेंसी कॉल करें, एस्पिरिन के चक्कर में कॉल में देरी न करें।
अगर मरीज को पहले से nitroglycerin डॉक्टर ने लिखकर दी है, तो वही दवा निर्देश के अनुसार दी जा सकती है. अपनी तरफ से कोई नई दवा मत दें।
अगर व्यक्ति बेहोश हो जाए, सांस न ले रहा हो, या प्रतिक्रिया न दे रहा हो , तो तुरंत CPR शुरू करें और पास में AED हो तो उसका इस्तेमाल करें।
ध्यान रखें , हार्ट अटैक सिर्फ़ तेज़ सीने के दर्द से नहीं आता। सीने में दबाव/जकड़न , दर्द का हाथ-जबड़े-पीठ तक जाना, सांस फूलना, पसीना , मितली , चक्कर, बहुत ज़्यादा कमजोरी भी संकेत हो सकते हैं। महिलाओं , बुज़ुर्गों और डायबिटीज़ वालों में लक्षण अलग या हल्के भी हो सकते हैं।
हर सिलेंडर पर 29% की बचत।
विद सच ए सिम्पल सॉल्यूशन।
खबर पढ़ा तो दांतो तले उंगली दबा ली- 14 किलो के सिलेंडर में 10 किलो ही गैस मिलेगी। क्या गजब है, वैज्ञानिक सोच है - जब पूरे सिलेंडर में 71.42% गैस से ही भर सकते हैं..
तो 100% की जरूरत क्यो है?
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हमारी छठवीं में विज्ञान की किताब में लिखा था कि गैस, निराकार होती है। वह फैलकर पूरा स्थान घेर लेती है। तो 10 किलो गैस भरने के बाद, उस लाल सिलेंडर का कोई भी कोना, आप खाली खोजकर नही दिखा सकते।
इसके बावजूद, कांग्रेस की अदूरदर्शिता के कारण हम महंगी गैस को 14 किलो तक ठूंस ठूंसकर भरते रहे। अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बर्बाद हुई। अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ।
और देश कर्ज में डूबता गया।
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पर अब देश इकॉनमिक्स, और साइंस के साथ है। हर चीज का नये सिरे से हिसाब हो रहा है। अभी कल परसों की रैली में प्रधान जी ने कहा ही था कि हरेक का हिसाब होगा।
लोगो ने सोचा कि केवल तृणमूल पार्टी को कह रहे है। पर ऐसा नही होता। प्रभु प्रजा-प्रजा में भेद नही करते। कपड़े आप जैसे पहनें, धर्म कोई भी माने-
सिलेंडर सबको एक जैसा मिलेगा। दाम भी नही बढ़ेंगे, युद्ध के बावजूद सप्लाई बदस्तूर रहेगी। कोई कमी नही- 10 केजी इच।
एंड दैट्स कॉल्ड मातृचोट..
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स्केच पेन के एक स्ट्रोक से, देश का 29% गैस कंजम्प्शन घटा देना, आम मस्तिष्क की चीज नहीं। गजब तो यह है कि यह साधारण समाधान, आज तक भारत मे किसी को यह बात सूझा ही नही।
जीनियस ऐसे ही होते हैं। पिछली बार एक आदमी ने पेड़ से सेब गिरते देखा था। इसके बाद उसने ग्रेविटी खोज निकाली। जरा सोचिए, करोड़ो साल से सेव पेड़ से गिरते आये हैं।
लाखो लोगो ने गिरते देखा होगा।
पर ग्रेविटी खोजी सिर्फ न्यूटन ने..
क्योकि वो जीनियस था। और संयोग देखिए।
एन फ़ॉर नरेंदर, एन फ़ॉर न्यूटन।
दोनों का ईजाद किया फार्मूला भी काफी सिमिलर है। न्यूटन ने लिखा था - जी इज इक्वल टू एम वन एम टू बाई आर स्क्वेयर.. कुछ समझ आया?
नहीं?? अरे बेटा, ये जो हर सिलेंडर पे 4 किलो बचा..
वही एक्स्ट्रा टू एबी है।
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जीनियस लोग नया काम नही करते, वे पुराने काम को जीनियस तरीके से करते हैं। और अब आखरी बात..
गैस 14 किलो ही क्यो रहती थी।
नेहरू की गलती है। अन्वेषण से पता लगा की नेहरू का जन्मदिन 14 नवम्बर को होता है। जैसे कांग्रेस ने जगह जगह नेहरू यूनिवर्सिटी, नेहरू स्टेडियम, नेहरू साइंस सेंटर बनाये
वैसे ही गैस 14 किलो रखी-
उनका नाम अमिट बनाने के लिए।
लेकिन अब गैस 10 किलो रहेगी।
इतिहास का एक और दाग मिटेगा।
एक और कांग्रेसी किला ढहेगा।
💪😎✌️
Faridabad is part of NCR, yet roads stay waterlogged even without rain.
This is what happens when municipal bodies are filled with people who neither want to work nor understand the basics of city planning.
Taxpayers pay. Authorities sleep. Cities Rot.
झूठ बोले, कौआ काटे ..
कल्पना करें, कि शानदार महल है। इसकी दीवारें झूठ की ईंटों से बनी हैं। खिड़कियों पर चापलूसी के पर्दे लगे हैं।
हर दरो-दीवार, और राजा के कंधों पर बैठे सैंकड़ो तोते, उसे झूठे किस्से सुना रहे हैं। इसलिए कि सच बोलने वालों को तो राजा ने पहले ही दीवारों में चुनवा डाला है।
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1943 के बाद हिटलर की यही हालत थी। अब तक पोलैंड, फ्रांस और नॉर्वे उसकी मुट्ठी में आ चुके थे। लेकिन यूरोप की ताकतें सम्हल चुकी थीं, कड़ी टक्कर दे रही थीं।
हिटलर की फौजें अब अजेय नहीं रह गई थीं। पर हार की खबर उसे पसंद न थी। चेतावनी देने वाले अफसर किनारे लगा दिए गए, और रोमेल जैसों को, तो जहर खिला दिया गया।
अब बचे हुए जनरल, सिर्फ सुखद झूठ सुनाने आते।
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रूस पर हमले के पहले गोअरिंग ने शान से दावा किया कि उसकी एयरफोर्स,कुछ हफ़्तों में रूस को हरा देगी। पहले हमले के बाद उसने खुशखबरी दी, कि सारी रूसी एयरफोर्स ध्वस्त हो गयी है।असलियत यह थी कि हज़ारों रूसी विमान लड़ने को बचे हुए थे।
जनरल हल्दर ने अक्टूबर 1941 में खबर दी कि मॉस्को किसी भी क्षण हाथ में आ जाएगा। सच यह कि ठंड और कीचड़ में फँसी जर्मन फौज, अभी मॉस्को पहुँची भी न थी।
और वो कभी पहुँच भी न सकी।
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स्टालिनग्राद के बाद रेडियो ने दावा किया कि पाउलस की सेना ने घेराबंदी तोड़ दी, जबकि वे कैद हो चुके थे। फील्ड मार्शल वॉन मान्स्टाइन ने कुर्स्क को "अटूट किला" बताया। लेकिन वो 12 दिन न टिक सका, और जर्मन दूसरे विश्वयुद्ध का सबसे बड़ा टैंक युद्ध हार गए।
आर्डेन्स अटैक में रुंडश्टेट ने जीत का दावा किया। तब उसका ईंधन खत्म हो चुका था।खड़े टैंकों पर बम बरस रहे थे। एंटवर्प मित्र राष्ट्रों के कब्ज़े में था।
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अंतिम दिनों में, गोएबेल्स और बोर्मन ने बर्लिन बचाने के लिए स्टाइनर के हमले की झूठी कहानी रची। जबकि स्टाइनर के पास हमला करने लायक सेना ही नहीं थी।
ये झूठ थोक में जनता को भी सुनाए जाते। जर्मन रेडियो जगह-जगह जीत की खबरें दे रहा था। बर्लिन पर टनों बम गिरते रहे, लेकिन रेडियो कहता रहा, कि पदुश्मन के विमान नष्ट हो गए और शहर सुरक्षित है।
हद तो यह कि जब हिटलर, बंकर में आत्महत्या की तैयारी कर रहा था, रेडियो पर फ़्यूरर की विजय उद्घोषणा बज रही थी।
आम जनता को तो रूसी सैनिक अपने दरवाजे पर देखकर यकीन ही नही हो रहा था।
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झूठ का लाक्षागृह, हमारे लिए भी बनाया जा चुका है। ट्रेलर आप, ऑपरेशन सिन्दूर में देख चुके।
भारत ने आतंकी ठिकानों पर सीमित हमले किए। लेकिन चैनलों ने इसे निर्णायक महायुद्ध बना दिया। दावा किया गया कि कराची पोर्ट नष्ट हो गया। लाहौर पर बमबारी हुई है, इस्लामाबाद पर कब्ज़े की तैयारी है।
पुरानी फुटेज को लाइव बताकर दिखाया गया।
टीवी पर AI जनरेटेड वीडियो चले। नकली सायरन बजे। मिसाइल और विस्फोटों के AI- ग्राफिक्स खूब चले।
दो JF-17 जेट गिराने का दावा चला, पुरानी क्रैश फुटेज के साथ। एक एंकर ने कहा कि हमने पाक का न्यूक्लियर बेस हिट किया। सोशल मीडिया पर AI वीडियो वायरल हुआ, कि पाक आर्मी चीफ़ आसिम मुनीर गिरफ्तार हो गए।
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सरकार ने इन्हें रोका नही, और न त्वरित खंडन किये। लेकिन जो फैक्ट-चेकर्स इन झूठों को उजागर कर रहे थे, उन्हें ट्रोल किया गया, गालियाँ दी गईं।
इस देश को 4 दिन, झूठ की ईंटों और फेक न्यूज़ के पर्दों से बने कैदखाने में बंद कर दिया गया।
यह एक बेहद सीमित, रणनीतिक ऑपरेशन की कहानी है।
जरा सोचिए, अगर कोई असली, पूर्ण युद्ध छिड़ गया, तो आपको असली खबरें मिल रही होंगी?
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और क्य असली खबर शीर्ष निर्णायकों तक पहुँच रही होगी? और अगर पहुँच भी रही होगी, तो क्या वह "बादलों में रेडार से छुपकर वार" करने की जिद पर अड़ा नहीं होगा?
स्टालिनग्राद में हिटलर को यकीन था कि विजय निश्चित है। तब सेना चारों तरफ़ से घिरी हुई थी। जनरल पाउलस ने आत्मसमर्पण की सलाह दी, तो हिटलर बोला- एक कदम पीछे नहीं, आख़िरी सैनिक तक लड़ो!
नतीजतन, उसके तीन लाख सैनिक हुक्मउदूली करके समर्पण कर गए। नाज़ी साम्राज्य की रीढ़ टूट गई।
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नॉर्मंडी हमले से, पहले हिटलर की छठी इंद्री कहती रही कि मुख्य हमला कैले में होगा। उसने सारे संसाधन वहीं फँसाए रखे। हमला नॉर्मंडी में हुआ। यह उसके अंत की शुरआत थी।
क्योकि जब सत्ता प्रतिष्ठानों में झूठ की मीनारें खड़ी हो जाती हैं, तब निर्णय भ्रम पर लिए जाते हैं। अंत की शुरुआत वहीं से होती है।
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यह भ्रम और प्रवंचना हमारी आर्थिक स्थिति, विदेश नीति, रक्षा नीति में साफ़ दिख रही है। लेकिन आलोचक दुश्मन, और झूठे आज वफादार बने बैठे हैं।
पर आप सच्चाई से मुँह मोड़ सकते हैं, इतिहास से नहीं। अफसोस बस इतना है, कि नेता के झूठ बोलने पर, कौआ सिर्फ़ नेता को नहीं,
एक समूचे देश, एक पूरी पीढ़ी को काटता है।
2021 खीरी में किसानों को थार से कुचलने के बाद मूंछों पर ताव देते हुए साहब को आप सभी लोग जानते ही होंगे ,
ये बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री रहे अजय मिश्रा टेनी का बेटा आशीष मिश्रा मोनू हैं!
कुछ दिनों पहले इसके उपर गवाहों को धमकाने का मुकदमा भी दर्ज हुआ था , लेकिन अब खबर आ रही हैं कि 20 गवाह कोर्ट में मुकर गए हैं!
इसका मतलब ये कुछ दिनों में बरी भी हो सकता हैं , कानून व्यवस्था का मजाक बना कर रख दिया गया हैं!
इस देश में अगर आपके पास पैसा और पावर है तो आप अपनी गाड़ी के नीचे आम आदमी को कुचल सकते हैं, कानून आपका कुछ नहीं उखाड़ पाएगा !
गवाह , जज , पुलिस सब मैनेज किया जा सकता हैं, जैसे इस मामले में हो रहा हैं!