लघुता से गुरुता मिले…!
गुरु अपने आप में लघु शब्द है। दो मात्रा (।।) का, हल्का। केवल एक अक्षर ता अथवा त्व जुड़ते ही भारी हो जाता है, दुगुना भारी अर्थात चार मात्रा (।ऽ।) का।
छंदशास्त्र में दो मात्राओं वाले वर्ण को गुरु कहा जाता है किंतु गुरु में कोई गुरु वर्ण ही नहीं है। इस दृष्टि से गुरु अपने आप में दो मात्राओं वाला अर्थात दो लघु वाला लघु शब्द है।
इसी लघुता में गुरु की गुरुता है!
गुरु पूर्णिमा पर सश्रद्ध गुरुवंदन🙏🌹
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय,
तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।
मुझे तो तन, मन, वचन से आपके चरणों की ही शरण है, आपके भरोसे मैंने देवताओं को देवता करके नहीं माना ।🌺✨
हिंदी और संस्कृत में जब 'र' किसी दूसरे व्यंजन के साथ संयुक्ताक्षर बनाता है, तो उसके दो प्रमुख रूप दिखाई देते हैं. पहला रकार (पदेन 'र') है, जैसे क्र, ग्र, त्र, प्र, द्र, जिसमें पहले मूल व्यंजन और उसके बाद 'र' का उच्चारण होता है. दूसरा रेफ है, जैसे र्क, र्ग, र्थ, र्म, र्व, जिसमें 'र्' पहले उच्चरित होता है और उसके बाद अगला व्यंजन. अर्थात दोनों में अंतर केवल लिखने का नहीं, बल्कि उच्चारण के क्रम का भी है.
इन्हीं रकार वाले संयुक्ताक्षरों को देखते हुए मुझे एक रोचक पैटर्न दिखाई दिया. सामान्यतः रकार अल्पप्राण स्पर्श व्यंजनों के साथ अधिक मिलता है, जबकि महाप्राण व्यंजनों के साथ उसके उदाहरण अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं, यद्यपि भ्र (भ्राता, भ्रम, भ्रूण), घ्र (घ्राण) और ध्र (ध्रुव) जैसे उदाहरण भी मिलते हैं.
मेरा अनुमान है कि इसका कारण केवल शब्दों का इतिहास नहीं हो सकता. शायद इसका संबंध मुख की आंतरिक संरचना, मांसपेशियों की गति और व्यंजन-गुच्छों के उच्चारण से भी है. किसी भी भाषा की प्रवृत्ति ऐसे ध्वनि-समूहों को अपनाने की होती है जिन्हें स्पष्ट, सहज और कम प्रयास में बोला जा सके. संभव है कि इसी कारण कुछ व्यंजन-गुच्छ अधिक प्रचलित हुए और कुछ अपेक्षाकृत विरल रह गए.
देवनागरी की लेखन-पद्धति को देखते हुए भी कुछ वैसी ही प्रवृत्ति दिखाई देती है. सामान्यतः जिन व्यंजनों में खड़ी डंडी होती है, उनके साथ रकार एक तिर्यक रेखा वाले रूप में बनता है. जिनमें खड़ी डंडी नहीं होती, जैसे ट, ठ, ड, ढ, द और ह, उनके साथ सामान्यतः दो तिर्यक रेखाओं वाला रूप बनने की अपेक्षा होती है, जैसा ट्र और ड्र में दिखाई देता है.
लेकिन यहाँ भी द्र और ह्र जैसे अपवाद मिलते हैं. मेरा अनुमान है कि इसका कारण भी शायद लेखन की सहजता ही है. जैसे द में पहले से ही नीचे की ओर एक विस्तार मौजूद है और ह के भीतर भी रकार के लिए पर्याप्त स्थान है. यदि यहाँ भी दो-रेखीय रकार जोड़ दिया जाए, तो अक्षर अनावश्यक रूप से जटिल हो जाएगा. संभव है कि इसी कारण देवनागरी के विकास में न्यूनतम रेखाओं, दृश्य संतुलन और लेखन की सहजता को प्राथमिकता दी गई हो.
मुझे इन दोनों बातों में एक समानता दिखाई देती है. ध्वनि के स्तर पर भाषा शायद वही व्यंजन-गुच्छ अधिक स्वीकार करती है जिन्हें मुख की बनावट सहजता से उच्चारित कर सके, और लिपि के स्तर पर वही संयुक्ताक्षर अधिक टिकते हैं जिन्हें कम से कम रेखाओं में स्पष्ट और संतुलित ढंग से लिखा जा सके.
यदि यह अनुमान सही दिशा में है, तो रकार का वर्तमान स्वरूप केवल व्याकरण का परिणाम नहीं, बल्कि मानव शरीर, ध्वनि और लिपि, तीनों के लंबे सह-विकास का परिणाम माना जा सकता है.
आकिंचन इंद्रीदमन, रमन राम इक तार।
तुलसी ऐसे संत जन, बिरले या संसार ॥
जो अकिंचन हैं (जिनके पास ममताकी कोई भी वस्तु नहीं है), जो इन्द्रियोंका दमन किये हुए हैं और जो एकतार (निरन्तर) राममें ही रमण करते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं ऐसे संतजन इस संसारमें बिरले ही हैं ॥ ❤️🌺
देवर्षि नारद जब मात्र 5 वर्ष के थे, तब सांप के काटने से उनकी माता का देहांत हो गया। सांसारिक दृष्टि से यह बहुत बड़ा दुख था, परंतु नारद जी ने इसे भी भगवान का अनुग्रह माना कि प्रभु ने उन्हें सारे सांसारिक बंधनों से मुक्त कर अपनी शरण में ले लिया।
राम नाम पर तुलसी नेह निबाहु ।
एहि ते अधिक न एहि सम जीवन लाहु ॥
तुलसीदासजी कहते हैं- अरे मन ! राम-नामसे प्रेमका निर्वाह करो। इससे अधिक तो क्या इसके बराबर भी जीवनका कोई (दूसरा) लाभनहीं है ॥❣️✨
रामनामगुणालापी सज्जनो रामवल्लभः।
सत्यं वच्मि महाभाग रामनाम परात्परम् ।।
हे महाभाग ! श्रीरामनाम का जप कीर्तन करने वाले सज्जन पुरुष श्रीरामजी के अत्यन्त प्रिय हैं। श्रीरामनाम परात्पर तत्व है यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ। 🌺✨
ध्यान करते-करते थक गए, तो माला उठाकर जप करने लगिए।
जप करते-करते मन भटकने लगे, तो कोई धार्मिक पुस्तक या पाठ शुरू कर दीजिए।
पाठ से भी थक जाएं, तो उठकर हरिनाम का कीर्तन करने लगिए।
और यदि सब में थकान हो, तो ठाकुर जी के दर्शन करने निकल पड़िए!