अरुणाचल में चीनी घुसपैठ को लेकर स्थानीय पत्रकार Katung Kino का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है!
उन्ही का एक वीडियो ये भी है जो चीनी घुसपैठ को लेकर उन्होंने बनाया है! सुनिए 👇🏻
आम व्यक्ति किसी देश की एम्बेसी से वीजा लेता है, तो उसके पासपोर्ट नंबर की एंट्री हो जाती है।
फिर एयरपोर्ट पर,जैसे ही वह इमिग्रेशन पर खड़ा होता है, वहाँ -पासपोर्ट औऱ वीजा दोनों स्केन होते है। उसका डेस्टिनेशन, फ्लाइट डिटेल्स, सब कुछ विदेश मंत्रालय की निगाह मे होता है।
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पर अगर वह व्यक्ति सांसद - MP है -
तो उसके पास टाइप D डिप्लोमेटिक पासपोर्ट है।
अब उसे किसी भी यात्रा के लिए सरकार से प्रायर "पॉलिटिकल क्लियरेंस" की जरूरत है।
आवेदन कम से कम यात्रा के 3 हफ्ते पहले दिया जाता है। जिसे पूरी ऐटेनरी पढ़, समझ, जानकर ही - सरकार अनुमति देती हैं।
फिर संबंधित एम्बेसी को "पॉलिटिकल क्लियरेंस" की सूचना दी जाती है, ताकि उस देश मे हमारी एम्बेसी, पॉलिटिकल क्लियरेंस की शर्तो नियमों का कम्प्लायंस पक्का करवा सके।
इसके बाद ही, किसी MP की विदेश यात्रा संभव हो पाती है।
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अब अगर वह LOP हैं
तो आपने सुरक्षा कर्मी भी दिए है। जो साथ घूम रहा है। वह सरकारी कर्मचारी है, पर असल मे सरकारी खबरी है। यह बात तो ऑफिशियल हैं, सबको पता है।
अनऑफिशियल, उसके स्टाफ मे आपने तमाम आदमी घुसा रखें है। फोन मे पैगासस डाल रखा है। यात्रा की इटेनरी आपके पास है, तो उसके होटल, कमरे मे बग डाले होंगे।
कई दर्जन जासूस सादे कपड़ो मे होंगे।।
फोटो बाजी हो रही होगी।
दूरबीने लगी होंगी।
(न लगी, तो आप गधे हो)
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अब त्रिवेदी जी की मानी जाये, तो राहुल गाँधी, बिना पासपोर्ट, बिना वीजा, बिना मोदी गवर्मेँट की पॉलिटिकल क्लियरेंस के - शायद किसी स्मगलर की डोंगी मे बैठकर, कोस्ट गार्ड से बच बचा के किसी "अज्ञात" देश गए है???
औऱ "संदिग्ध "लोगो से मिल रहे है??
जिनकी पहचान, फोटो, खबर कुछ भी नहीं।
तो वो नहीं , आपका पूरा गैंग पप्पू है।
यह तो त्रिवेदी जी के विदेश मंत्रालय, इंटेलीजेंस सर्विसेज, तमाम खुफिया तंत्र, औऱ उस देहाती जेम्स बॉन्ड के गाल पर धूमधाम से मारा गया तमाचा है।
यदि त्रिवेदी जी की बात सत्य है, तो उन्हें ऐसी भोंदू सरकार से तुरंत इस्तीफा मांगना चाहिए।
🙏😊
टॉप 10 सिविल जमीन से जुड़े SC के ऐतिहासिक फैसले जो आज भी मुकदमे
पलट देते हैं !!
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के भूमि और संपत्ति विवादों से जुड़े ऐसे ऐतिहासिक फैसले, जो आज भी पुराने मुकदमों का रुख बदल देते हैं:
1. कर्नाटक बोर्ड ऑफ वक्फ बनाम भारत सरकार (2004) / सिर्फ लंबे कब्जे से स्वामित्व नहीं
फैसला: सिर्फ इतने भर से किसी जमीन पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता कि आप उस पर लंबे समय से काबिज हैं। दावेदार को यह साबित करना होगा कि उसका कब्जा खुला, शत्रुतापूर्ण (Hostile) और वास्तविक मालिक के खिलाफ था !
2.2. किराएदार बनाम मकान मालिक का अधिकार (2026/पुराने मामले)
फैसला: किराए पर दी गई दुकान या मकान पर दशकों (50-70 साल) तक काबिज रहने मात्र से किराएदार मालिक नहीं बन जाता।
अनुमति आधारित कब्जा 'एडवर्स पोज़ीशन' (Adverse Possession) नहीं माना जा सकता !
3.राजस्व अधिकारियों को भूमि स्वामित्व तय करने का अधिकार नहीं !!
फैसला:
सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के लगातार फैसलों के अनुसार, म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) या रेवेन्यू रिकॉर्ड केवल टैक्स वसूली के लिए हैं; राजस्व अधिकारी जमीन का मालिकाना हक तय नहीं कर सकते।
मालिकाना हक सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है !!
4. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम -
धारा 22 (पैतृक कृषि भूमि पर अधिकार)
फैसला: कृषि या पैतृक भूमि बेचने से पहले सह-उत्तराधिकारी (Class-1 heirs) को प्राथमिकता का अधिकार होता है।
परिवार के किसी सदस्य को अपनी हिस्सेदारी बाहर बेचने से पहले अन्य कानूनी वारिसों को खरीदने का मौका देना अनिवार्य है !
5. रजिस्टर्ड सेल डीड की वैधता और पुराना विवाद (हरिद्वार नरसीपुर कलां केस - 2026)
फैसला: यदि रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) मौजूद है और उस पर धोखाधड़ी का कोई ठोस सबूत या गवाहों में विरोधाभास नहीं है, तो दशकों पुराने (जैसे 70 साल पुराने) म्यूटेशन विवाद या चकबंदी के आधार पर उसे शून्य नहीं ठहराया जा सकता !!
6. बिना विधिवत अधिग्रहण जमीन का उपयोग नहीं
फैसला: सरकार या प्रशासन भी बिना कानूनी प्रक्रिया और उचित अधिग्रहण के किसी निजी व्यक्ति की जमीन पर कब्जा नहीं कर सकती। ऐसा होने पर बढ़ा हुआ मुआवजा, ब्याज और हर्जाना देना होगा !!
7. राम मंदिर / अयोध्या भूमि विवाद फैसला (2019)
फैसला: ऐतिहासिक सिविल टाइटल सूट में साक्ष्य, राजस्व रिकॉर्ड, ऐतिहासिक दस्तावेजों और आर्कियोलॉजिकल प्रमाणों को मौखिक दावों से ऊपर रखा गया।
8. मुख्तारनामा (Power of Attorney) से संपत्ति का सीधा हस्तांतरण नहीं
फैसला: सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले
(सूरज लैम्प्स एंड इंडस्ट्रीज केस) के अनुसार, केवल जनरल पावर ऑफ ATTORNEY (GPA) या इकरारनामा से जमीन का पूर्ण मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता,
इसके लिए रजिस्टर्ड सेल डीड जरूरी है।
9.एसेंस्ट्रल प्रॉपर्टी (पैतृक संपत्ति) में बेटियों का सह-दायर अधिकार
(विनीत शर्मा बनाम राकेश शर्मा, 2020)
फैसला: हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के तहत बेटियों को पुत्रों के समान ही पैतृक संपत्ति में जन्मजात सह-दायिंदार (Coparcener) का अधिकार मिला, भले ही पिता की मृत्यु 2005 से पहले क्यों न हुई हो।
10. बेनमी ट्रांजैक्शन अधिनियम और बेनामी संपत्ति पर रोक
फैसला: किसी अन्य के नाम पर चुपचाप खरीदी गई बेनामी संपत्तियों पर सख्त रुख अपनाते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि असली फंडिंग और सबूत के आधार पर ही वास्तविक मालिक तय होगा, कागजी पर्दों को कानूनी सुरक्षा नहीं मिलेगी।
#SupremeCourt के स्पष्ट फैसले के अनुसार, केवल दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) न होने मात्र से किसी व्यक्ति की संपत्ति या जमीन का मालिकाना हक खत्म नहीं हो जाता।
1. मुख्य कानूनी सिद्धांत: दाखिल-खारिज (Mutation) बनाम मालिकाना हक (Title)
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले और इससे पहले भी कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे जितेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य और करम सिंह बनाम अमरजीत सिंह) में लगातार यह स्पष्ट किया है कि:
• दाखिल-खारिज मालिकाना हक का प्रमाण नहीं है: राजस्व रिकॉर्ड (जैसे खतौनी, जमाबंदी या दाखिल-खारिज) में नाम दर्ज होना या कटना किसी व्यक्ति को संपत्ति का कानूनी मालिक नहीं बनाता और न ही उसका मालिकाना हक छीनता है।
• इसका उद्देश्य केवल टैक्स (राजस्व) वसूलना है: म्यूटेशन की प्रक्रिया सिर्फ एक प्रशासनिक और वित्तीय (Fiscal) प्रक्रिया है ताकि सरकार को यह पता रहे कि जमीन का लगान या टैक्स किससे वसूलना है।
• रजिस्ट्री ही मुख्य दस्तावेज है: संपत्ति का वास्तविक मालिकाना हक केवल वैध पंजीकृत दस्तावेजों (जैसे Registered Sale Deed, Gift Deed या कानूनन वसीयत) से ही तय होता है।
2. वास्तव में कोर्ट ने क्या आदेश दिया था?
यह विवाद मुख्य रूप से बिहार सरकार के एक नियम को लेकर था, जिसमें जमीन की रजिस्ट्री कराने के लिए विक्रेता के नाम पर पहले से दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) होना अनिवार्य कर दिया गया था।
• सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के इस नियम को अमान्य (Illegal) घोषित कर दिया।
• कोर्ट ने कहा कि निबंधन अधिकारी (Registry Office) किसी भी वैध दस्तावेज की रजिस्ट्री करने से सिर्फ इसलिए मना नहीं कर सकते कि जमीन का म्यूटेशन रिकॉर्ड अपडेटेड नहीं है।
• मालिकाना हक पहले आता है, म्यूटेशन उसके बाद होता है (Mutation follows ownership, not vice versa)।
3. क्या सच में अब दाखिल-खारिज कराने की जरूरत नहीं है?
नहीं, यह दावा भ्रामक है कि दाखिल-खारिज कराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। हालांकि यह सही है कि दाखिल-खारिज न होने से आपका मालिकाना हक खत्म नहीं होता, फिर भी जमीन खरीदने के बाद दाखिल-खारिज कराना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि:
1. सरकारी रिकॉर्ड अपडेट रखने के लिए: भविष्य में जब आप उस संपत्ति को आगे बेचेंगे, तो सरकारी रिकॉर्ड में आपका नाम होना जरूरी है।
2. लोन और सरकारी योजनाओं के लिए: बैंक से लोन लेते समय या किसी सरकारी मुआवजे का लाभ लेते समय म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) के दस्तावेजों की मांग की जाती है।
3. विवादों से बचने के लिए:
यदि आप म्यूटेशन नहीं कराते हैं, तो पुराना मालिक धोखाधड़ी से उस जमीन पर दोबारा लोन ले सकता है या किसी अन्य को बेचने की कोशिश कर सकता है।
निष्कर्ष: रजिस्ट्री होने के तुरंत बाद कानूनी रूप से मालिक तो आप बन जाते हैं, लेकिन अपनी संपत्ति को पूरी तरह सुरक्षित रखने और भविष्य की कागजी जटिलताओं से बचने के लिए सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) करवाना अभी भी बेहद जरूरी और उचित कदम है।
चुनाव आयोग और सरकार ने मिलकर वोटिंग से जुड़े वीडियो रिकॉर्डिंग और दस्तावेज सार्वजनिक न करने का कानून क्यों बनाया?
जो सूचनाएं पहले सार्वजनिक होती थीं, उनको क्यों छुपाया?
चुनाव आयोग ने देश से इतने सारे झूठ क्यों बोले?
यह स्पष्ट रूप से देशद्रोह है।
EXCLUSIVE REPORT
SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर बड़ा खुलासा!
SIR के दौरान बिना स्पष्ट कारण बताए लाखों वैध मतदाताओं के नाम अचानक वोटर लिस्ट से काट दिए गए थे।
इसी गड़बड़ी और प्रशासनिक गोपनीयता की सच्चाई जानने के लिए अंजलि भारद्वाज ने RTI के तहत चुनाव आयोग और संबंधित प्राधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगे थे।
उनके पूछे गए प्रमुख सवाल और उन पर मिले जवाब नीचे दिए गए हैं।
◾ECI से पूछे गए RTI सवाल और उनके जवाब
सवाल 1:
देशभर या विभिन्न राज्यों में वोटर लिस्ट का SIR कराने का फैसला चुनाव आयोग द्वारा किस तारीख को और किस बैठक में लिया गया?
जवाब:
चुनाव आयोग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी/CPIO ने RTI के लिखित जवाब में कहा कि "SIR आयोजित करने का निर्णय खुद चुनाव आयोग (Commission as a body) द्वारा नहीं लिया गया था।"
सवाल 2:
SIR प्रक्रिया को शुरू करने के निर्णय से संबंधित आधिकारिक File Notings, प्रस्तावों और चुनाव आयोग की बैठकों के मिनट्स की प्रतियां प्रदान की जाएं?
जवाब:
चुनाव आयोग ने यह स्वीकार किया कि उनके पास इस निर्णय से जुड़ी कोई फाइल नोटिंग्स या आधिकारिक बैठक का मिनट्स रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है।
सवाल 3:
क्या SIR प्रक्रिया को शुरू करने से पहले तय वैधानिक नियमों, पूर्व शर्तों और दिशानिर्देशों का पालन किया गया था और उनसे जुड़े नीतिगत रिकॉर्ड कहाँ दर्ज हैं?
जवाब:
आयोग इस संबंध में कोई भी स्पष्ट नीतिगत दस्तावेज या रिकॉर्ड प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा और यह दर्शाया कि इसके लिए कोई अलग से नीतिगत फाइल मौजूद नहीं है।
सवाल 4:
क्या पूर्व में आयोजित किए गए SIR (जैसे 2003 या उससे पहले के संशोधनों) के आधिकारिक दस्तावेज और दिशानिर्देश आयोग के पास उपलब्ध हैं?
जवाब:
चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि अतीत में हुए ऐसे रिवीज़न की गाइडलाइंस और रिकॉर्ड भी उनके पास उपलब्ध नहीं हैं।
◾सुप्रीम कोर्ट व न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़े RTI सवाल/मुद्दे और उनके जवाब
सवाल 1:
चुनाव आयोग द्वारा मतदान, मतगणना और नामांकनों की CCTV/वीडियो रिकॉर्डिंग को नागरिकों के देखने के लिए कब तक सुरक्षित रखा जाता है और इसे प्राप्त करने की क्या प्रक्रिया है?
जवाब:
RTI और न्यायिक याचिकाओं के माध्यम से सामने आया कि चुनाव आयोग ने नियमों में संशोधन करके फुटेज सुरक्षित रखने की अवधि को घटाकर चुनाव परिणाम घोषित होने के केवल 45 दिनों तक सीमित कर दिया है, जिसके बाद इस डेटा को नष्ट किया जा सकता है।
सवाल 2:
SIR प्रक्रिया के दौरान जिन लाखों मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं, उन्हें फिर से नाम जुड़वाने के लिए 'फॉर्म-6' भरकर यह घोषणा क्यों करनी पड़ रही है कि "वे जीवन में पहली बार वोटर बन रहे हैं"?
जवाब:
चुनाव आयोग से इस विसंगति पर कोई संतोषजनक उत्तर न मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई। अदालत ने इसे कानूनी रूप से अनुचित मानते हुए आयोग व केंद्र सरकार को इस प्रक्रिया पर सुनवाई और जवाब के लिए नोटिस जारी किया।
सवाल 3:
यदि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय ने खुद SIR कराने का निर्णय नहीं लिया, तो यह फैसला किसने लिया और इसकी सार्वजनिक जवाबदेही कौन तय करेगा?
जवाब:
चुनाव आयोग की ओर से कोई लिखित जवाब न मिलने पर अंजलि भारद्वाज और अन्य कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर संवैधानिक और पारदर्शिता के मुद्दे को मुख्य विचाराधीन याचिकाओं के साथ जोड़ते हुए आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।
अंजलि भारद्वाज की RTI ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
बिना किसी लिखित रिकॉर्ड के लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
इस खुलासे के बाद ECI की निष्पक्षता पर बहस शुरू हो गई और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी उठी।
आखिरकार यह पूरा मामला देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।
इंदौर में एक 15 साल की गरीब बच्ची गरबा खेलने आई
इंदौर में BJP मंडल अध्यक्ष ने बच्ची को धक्का दिया उसके साथ बदसलूकी की
नवरात्र में देवी स्वरूप के साथ यह बर्ताव ही BJP की असलियत है
🤡 12 साल की चापलूसी का बिल अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है
जो कल तक Mogli की वंदना में लगे थे
आज उन्हें नुकसान का एहसास हो रहा है
सच बोलने वालों को देशद्रोही बताया
सवाल उठाने वालों को दबाया
अब हिसाब सामने आया तो रोना-धोना शुरू
चापलूसी की मलाई खाई
अब जवाबदेही की मिर्ची लग रही है
#BreakingNews: अमित शाह ने सुबह का सूरज निकलने के पहले एक बडी गिरफ्तारी को अंजाम दिया है...
"अंकिता भंडारी के बूढ़े माँ बाप को गिरफ्तार करके"
क्योंकी VVIP दुष्यंत गौतम जान से प्यारा है,
इसलिए उसे गवर्नर बनाया गया है। शाबाश।।
ये तो लेने के देने पड़ गए
चश्मे वाले अंधभक्त ने पड़ी लकड़ी ले ली और इस भाई ने सही से भूत उतार दिया
आलू से सोना मोदी ने कहा था😀
अंधभक्त होना भी कोई आसान काम नहीं है,हर जगह जलील होना पड़ता है बस यूं समझ लीजिये..
खजूर का पेड़ है और पैंट उतारकर चढ़ना है! 😂
दिल्लीतील ज्ञानेश कुमार आंदोलनातील ट्विस्ट:
ज्या पोलिसांना रस्त्यावर गुंडागर्दी करताना पाहिले,
महिला मुलींवर हात टाकताना दिसले,
ते भाजपचे (अमित शहा) नकली पोलिस होते,
भाडोत्री गुंडांना खाकी गणवेश देऊन आंदोलकांना रोखण्यासाठी उतरवले होते
दिल्लीत आंदोलनाच्या आसपास खाकी पोलिस वर्दी ने गच्च भरलेल्या गाड्या होत्या
कोणासाठी?
नेमप्लेट शिवाय जे पोलिस दिसत होते ते अशी वर्दी घातलेले गुंड होते
हाच राष्ट्रीय सुरक्षेचा गुजरात पैटर्न आहे!
उघडा डोळे आणि बघा नीट!