Happy #WorldEnvironmentDay2025
This picture is of the district centre building, Janakpuri, New Delhi. Clicked yesterday. The whole building with several functioning offices is like this- dirty, filthy and full of paan spit stains. This is in the capital city of India.
IOCL पानीपत रिफाइनरी में काम करने वाले मजदूर हड़ताल पर चले गए.
उनकी मांग है कि
• 12 घंटे की जगह 8 घंटे काम कराया जाए.
• अगर 12 घंटे काम करा रहे तो 4 घंटे का ओवर टाइम दिया जाए
• सैलरी आने के देर ना हो, 1 से 7 तारीख के बीच सैलरी आ जाए
@KESCoHQ@DMKanpur
चुन्नीगंज स्थित पेट्रोल पंप चुन्नीगंज मेट्रो स्टेशन के ठीक सामने बिजली की एक केबल जो काफी नीचे आ गई है पेट्रोल पंप के आगे से गुजरी हुई है पेट्रोल पंप पर सीएनजी स्कूल की बसें आती हैं पिछले एक महीने से लगातार शिकायत कर रहा हूं लेकिन कोई संज्ञान नहीं.
रेगिस्तान को सोलर से ढकने के बाद अब अरावली को नक्शे से मिटाने की तैयारी कर ली है।
इतनी विकास की भूख भी अच्छी नहीं है सरकार
हम पर्यावरण प्रेमी कहां कहां लड़ाई लड़े।
In today’s economy, products keep getting cheaper while the services around them get costlier. Manufacturing scales with global efficiency & automation but repair, maintenance and skilled labour remain local and expensive. See it in case of appliances, gadgets, cars, even housing
शाहरुख़ ख़ान: नवउदारवादी स्वप्न का चेहरा और पूँजीवादी मोह का सिनेमाई नायक
आज शाहरुख़ ख़ान 60 साल के हो गए।हमारी पीढ़ी उनकी फ़िल्मों के साथ बड़ी हुई है।उनपर बात करना बनता है।
वे हिंदी सिनेमा के उन दुर्लभ अभिनेताओं में हैं जिनकी लोकप्रियता तीन दशकों से भी अधिक समय तक बनी रही है। उनके अभिनय में ऊर्जा, आकर्षण और भावनात्मक अपील का अनोखा मेल है। वे एक असाधारण ‘परफ़ॉर्मर’ हैं जिनकी शैली ने 1990 के दशक के भारतीय मध्यमवर्गीय दर्शकों के मानस पर गहरा असर डाला।
लेकिन अगर हम उनके करियर और फ़िल्मों को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखें, तो स्पष्ट होता है कि शाहरुख़ का सिनेमाई व्यक्तित्व भारत के नवउदारवादी आर्थिक सुधारों और वैश्वीकरण के दौर में उभरे नव धनाढ्य और आकांक्षी मध्यवर्ग की कल्पनाओं, इच्छाओं और विरोधाभासों का प्रतिनिधि रहा है।
नवउदारवाद और उपभोक्तावाद का नायक
1990 के दशक के आरंभ में भारत जब IMF और विश्व बैंक के निर्देशों पर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की दिशा में बढ़ रहा था, तब शाहरुख़ का उदय हुआ। उनकी फ़िल्में- दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी ग़म, कल हो ना हो आदि उस दौर की उपभोक्तावादी चेतना का प्रतिबिंब थीं।
इन फ़िल्मों ने प्रेम, परिवार और नैतिकता की पारंपरिक अवधारणाओं को बनाए रखते हुए भी उन्हें ब्रांडेड जीवनशैली, विदेशी लोकेशन, लिबरल रोमांस, और निजी सफलता के सपने के साथ जोड़ दिया। यहाँ नायक अब संघर्षरत सर्वहारा नहीं था; वह एक उपभोक्ता था। आत्मविश्वासी, भावनात्मक और बाज़ार में अपनी पहचान गढ़ने वाला।
शाहरुख़ का “राज” या “राहुल” वह मध्यवर्गीय भारतीय था जो वैश्विक पूँजीवाद के आकर्षण में अपनी पहचान ढूँढ रहा था। वे पात्र अपनी मेहनत या वर्गीय संघर्ष से नहीं, बल्कि अपने आकर्षण, प्रेम और निजी नैतिकता से सफलता पाते हैं। यह वह दौर था जब सिनेमा ने वर्गीय संघर्ष के सवालों से मुँह मोड़ लिया और “ड्रीम सेलिंग” यानी सपनों की बिक्री उसका केंद्रीय सूत्र बन गया।
भावनाओं का वस्तुकरण और सांस्कृतिक पूँजीवाद
वास्तव में, शाहरुख़ की फ़िल्मों ने भारतीय समाज में वस्तुकरण (commodification) की प्रक्रिया को भावनाओं तक पहुँचा दिया। प्रेम, परिवार, नैतिकता- सब कुछ उपभोक्तावादी पैकेजिंग में बिकने लगा। दिल तो पागल है या कल हो ना हो जैसी फ़िल्में भावनाओं को उत्पाद बना देती हैं।
हालाँकि शाहरुख़ का अभिनय इन सबमें एक ‘मानवीय चेहरा’ जोड़ देता है जिससे दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ता है लेकिन असलियत में वह पूँजीवादी मूल्यों को आत्मसात कर रहा होता है। वे वैश्वीकरण के दौर के ‘सांस्कृतिक दूत’ बन जाते हैं जो दर्शकों को बताते हैं कि आधुनिकता और सफलता का रास्ता प्रेम, ब्रांड और आत्म-प्रदर्शन से होकर जाता है, न कि संघर्ष या प्रतिरोध से।
प्रतिरोध नहीं, सहमति का सिनेमा
बाक़ी मुंबइया फ़िल्मों की तरह शाहरुख़ की फ़िल्में भी स्थिति-यथास्थिति (status quo) को चुनौती नहीं देतीं; वे उसे और गहराई से वैधता देती हैं। उनके नायक वर्ग-संघर्ष से नहीं, भावनात्मक समाधान से दुनिया बदलना चाहते हैं। पूँजीवादी असमानताओं, बेरोज़गारी या शोषण के प्रश्न उनके संसार में अनुपस्थित हैं।
शाहरुख़ के पात्र कभी व्यवस्था से संघर्ष नहीं करते; वे हमेशा व्यवस्था या पितृसत्तात्मक संरचना (दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे) के भीतर स्वीकृति पाते हैं। इन कथाओं में संघर्ष को भी पूँजीवादी नैरेटिव में आत्मसात कर लिया गया है जहाँ बदलाव भी कॉर्पोरेट-फ्रेंडली नैतिकता के तहत आता है।
अभिनय की ताक़त और सीमाएँ
यह कहना भी ज़रूरी है कि शाहरुख़ ख़ान का अभिनय भारतीय लोकप्रिय सिनेमा को नई जीवंतता देता है। उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस, डायलॉग डिलीवरी और भावनात्मक तीव्रता ने दर्शकों को गहराई से छुआ है। वे ‘आकर्षक पूँजीवाद’ के सबसे प्रभावशाली कलाकार रहे हैं जिनके चेहरे पर बाज़ार की मुस्कान और इंसान की उदासी दोनों दिखती है।
लेकिन यही द्वैत यानि मानवीय संवेदना और पूँजीवादी आकांक्षा का मिश्रण उन्हें नवउदारवादी युग का परिपूर्ण प्रतीक बना देता है।
शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्में भारत के नवउदारवादी समाज का सांस्कृतिक आईना हैं जहाँ संघर्ष की जगह स्वप्न, समानता की जगह सफलता, और वर्ग चेतना की जगह आत्म-सिद्धि ने ले ली। उनके नायक वह “वैश्विक भारतीय” हैं जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर पूँजीवादी यथार्थ को स्वीकार करता है।
फिर भी, उनका महत्व इसलिए है कि उन्होंने इस पूँजीवादी युग की भावनात्मक व्याख्या की। उन्होंने दर्शकों को दिखाया कि बाज़ार के भीतर भी एक हद तक संवेदना संभव है, भले ही वह सीमित और नियंत्रित रूप में क्यों न हो।
#ShahRukhKhan𓀠 #SRK
जबलपुर रेलवे स्टेशन पर शर्मनाक घटना। एक यात्री ने समोसा मांगा, लेकिन ऑनलाइन पेमेंट फेल हो गया। इतने में ट्रेन चल पड़ी। इसी बात पर समोसा वाले ने यात्री की कॉलर पकड़ ली और जबरदस्ती पैसे या समोसे की मांग करने लगा। ट्रेन छूटने से बचने के लिए यात्री को अपनी घड़ी उतारकर उसे देनी पड़ी।
Shameful incident at Jabalpur , Railway Station
A passenger asked for samosas, PhonePe failed to pay, and the train started moving. Over this trivial matter, the samosa seller grabbed the passenger's collar, accused him of wasting time, and forced the money/samosa. The passenger had to remove his watch and hand it over to catch his train.
Now even travelling by train is not safe in the country.
Shameful incident at Jabalpur , Railway Station
A passenger asked for samosas, PhonePe failed to pay, and the train started moving. Over this trivial matter, the samosa seller grabbed the passenger's collar, accused him of wasting time, and forced the money/samosa. The passenger had to remove his watch and hand it over to catch his train.
Now even travelling by train is not safe in the country.
राजीव मेरे IIMC के जूनियर थे। उत्तराखंड में मेहनत करके अपना YouTube चैनल चलाते थे। उत्तरकाशी में सरकारी अस्पताल का भ्रष्टाचार दिखाया। 10 दिन लापता रहे,फिर नदी ने एक दिन लाश उगल दी।
चमक-धमक वाला बड़ा पत्रकार होता तो नेता मंत्री ट्वीट करते मगर अभी कोई पूछने वाला नहीं है! CM @pushkardhami जी क्या न्याय होगा?
जब पत्रकार ही पत्रकार की बात नहीं कर रहे तो बाकी क्यों करेंगे? हिंदू-मुस्लिम करने वाली पत्रकारिता के लिए ये खबर नहीं होगी क्योंकि इसमें कोई सेलिब्रिटी या सांप्रदायिकता नहीं है।
कोई बात नहीं! जलते घर को देखने वालों…
🚨 BJP राज में ZLD सिर्फ़ दिखावा है,
रात को लूणी में बहता है हरा ज़हर! ☠️💧
जहां से लाखों को पानी मिलना था,
वहीं अब बह रहा है कैंसर! 😡
रास्ता काटकर, छिपकर होता है ये गुनाह…
क्या Pollution Board भी इस खेल में BJP के साथ है? 🤔
Harsh and his 70 years old mother were beaten by his lawyer Samuel Masih and his gang of goons inside the Tis Hazari Courts, Delhi when Harsh asked him to return his case file.
And if this was not enough then the Lawyer managed to lodge a case of molestation and snatching against Harsh by a female lawyer after Harsh called the police and complained about the assault. Can you expect Justice when we have such Goons in the Courts?