#शिवजी_की_सत_साधना_करो
कांवड यात्रा
जिसका न श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णन है और न वेद में; इसलिए यह एक शास्त्र विरुद्ध साधना है।
और गीता अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार शास्त्र विरुद्ध साधना से कोई लाभ नहीं होता। बल्कि इससे पाप ही होता है।
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में;
जिसका प्रमाण
श्रीमददेवी भागवतमे
कहा है कि नीलकण्ठ (शिव जी) भी मैंने ही पहले निर्मित किए हैं ।
उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में;
जिसका प्रमाण
श्रीमददेवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है।
श्रीमददेवी भागवत
देव्युवाच । तथौवे नीलकण्ठोऽपि मयैव निर्मितः पुरा।३ स एव तारकेऽऽसिन्नपि लोके सप्तयोनिषु वर्तते । ४ । सोऽपि जन्ममृत्युर्मध्यें प्रवर्तते नात्र संशयः ।५॥#शिवजी_की_सत_साधना_करो
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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शिव जी को हम समाधि लगाए हुए देखते हैं यानी शिव जी से अधिक शक्ति युक्त भगवान कोई और है जिनकी शिव जी को भी तलाश है। वह वास्तव में पूर्णब्रह्म है। जिनकी वास्तविक जानकारी जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel
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श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 1 श्लोक 54 में लिखा है कि मकड़ी के तन्तुजाल में फँसे कीट की भाँति ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि ये सभी देव उन भगवती की लीला से मायारूपी बन्धन में पड़ जाते हैं और आवागमन (जन्म-मृत्यु) के चक्र में भ्रमण करते
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श्रीमद्देवीभागवत, भाग 1, स्कन्ध 4, अध्याय 13, श्लोक 27-29 और श्रीमद्देवीभागवत, भाग 1, स्कन्ध 5, अध्याय 27, श्लोक 31-33 में स्पष्ट लिखा है कि आयु के समाप्त होने पर ब्रह्मा, विष्णु व शिव (महेश) की भी मृत्यु होती है। यानी
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♦️ कांवड़ यात्रियों को अक्सर बम-बम बोलते हुए देखा जा सकता है यानी उन्होंने शिव जी का मूल मन्त्र छोड़ मनमाना मंत्र प्रारंभ कर दिया; जिसका न गीता में वर्णन है और न वेद में; इसलिए यह एक शास्त्र विरुद्ध साधना है और गीता अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार इससे कोई
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कूर्म पुराण, अध्याय 5 श्लोक 19-21 में लिखा है कि ब्रह्मा, वासुदेव (विष्णु) तथा शंकर की काल के द्वारा ही सर्जना होती है, पुनः वही काल इनका संहार भी करता है।
@VKSingroliMP@vinod_sahu1993
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श्रीमद्भागवत महापुराण में केवल मिट्टी, पत्थर या काष्ठ की मूर्ति को ही इष्ट मानना उचित नहीं बताया गया है। शास्त्रानुकूल भक्ति जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel।
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जिसका न गीता में वर्णन है और न वेद में; इसलिए यह एक शास्त्र विरुद्ध साधना है और गीता अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार इससे कोई लाभ नहीं होता।
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जा तीर्थ पर कर है दानं । ता पर जीव मरत है अरबानं ।। गोते-गोते पड़ि है भारं । गंगा जमना गए केदारं ।।
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में;
जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है।
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@SaintRampalJiM
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कांवड़ लाने का प्रमाण न गीता में है और न वेद में और न परमात्मा प्राप्त संतों की वाणी में। इसलिए यह एक शास्त्र विरुद्ध साधना है और इस बारे में श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 26, श्लोक 15 में भी लिखा
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🍀🍀शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, स्कन्ध 5, अध्याय 1 श्लोक 54 में लिखा है कि मकड़ी के तन्तुजाल में फँसे कीट की भाँति ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि ये सभी देव उन भगवती की लीला से मायारूपी बन्धन में पड रहते हैं।
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परमेश्वर कबीर जी ने कहा है:
कबीर, तीर्थ कर कर जग मुवा, ऊड़ै पानी न्हाय। रामहि राम ना जपा, काल घसीटें जाय ।।
शास्त्रों में कहीं भी कांवड़ यात्रा,जल चढ़ाने या दिखावे की पूजा का विधान नही है। सच्ची भक्ति करें, जीवो की रक्षा करे।
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