मैं यक़ीन-ए-गुमाँ से निकला हूँ ,
अपने ही दरमियाँ से निकला हूँ !!
मेरा किरदार बोलता था बहुत,
इसलिए दास्ताँ से निकला हूँ !!
किसके दुख-दर्द का हूँ मैं हासिल,
किसकी आह-ओ-फ़ुग़ाँ से निकला हूँ !!
~ धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़
'क्यूं' 16 बरस बाद शाय हुआ जॉन एलिया का छठा शेरी मजमूआ
हो इश्क़ भी तो अक़्ल की बेदारियों के साथ
फुर्सत भी हो तो ख़्वाब न देखा करे कोई
होके दुश्वार ज़िंदगी अपनी
कितनी आसान हो गई होगी
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@ChhotiKavita टहलते फिर रहे हैं सारे घर में
तिरी ख़ाली जगह को भर रहे हैं
तिरी ख़ुशबू से जो वाकिफ़ नहीं हैं
वो फूलों से गुज़ारा कर रहे है
- फ़हमी बदायूनी