भावनात्मक व्यक्ति हूं। जमीर , ईमानदारी और इंसानियत मेरे लहजे में है। मैं भी आपकी तरह एक इंसान हूं ।
__संघर्ष चल रहा है जिंदगी से
मगर मंज़िल का अभी कुछ पता नहीं।
पिछले तीन दिनों से जेई सफीलपुर से घर में बिजली न आने की समस्या को लेकर मिलना चाह रहा था। बिलारी के सफीलपुर फिटर के जेई की बात सुने। मैं नहीं बैठूंगा। मैं वहां नहीं करना चाह रहा। किसी और की पोस्टिंग करवाइये।
#बिलारी@1912PVVNL@DirTechPVVNL
@DirectorPVVNL
@MdPvvnl
थामेंगे तुझे, संभाले तुझे, थमेंगी न जब तक सांसे ए वतन।❤️
देश के एक एक सच्चे क्रांतिकारी को सलाम, नमन 🙏🏻
80 वे स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।
🇮🇳🇮🇳
आजादी अभी बाकी है मेरे दोस्त ......
इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय, वंदे मातरम्।
#स्वतंत्रतादिवस 2026
ये लड़ाई बीजेपी, सपा या कांग्रेस की नहीं हैं, ये युवाओं का मुद्दा हैं और देश का मुद्दा हैं। जो लोग कह रहे राजनीतिक पार्टियां घुस गई युवाओं का इस्तेमाल कर रही हैं। तो
मैं कहता हूं विपक्ष के साथ बीजेपी को भी युवाओं के साथ होना चाहिए था।
धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो।
#protest
खुरपेंच पर हुई FIR से साबित हो गया।आप जहर बेचिए आपका कुछ नहीं होगा लेकिन लेना देना ठीक ठाक रखना #Iwithstand@khurpenchh
देश के यशस्वी प्रधानमंत्री जी देख लो भ्रष्ट मैनेजमेंट की हरकत। कुछ तो सोचो प्यारे देशवासियों के बारे में। ये हत्यारे बन रहे है देशवासियों के। @JPNadda@PMOIndia
India needs to move towards One Nation, One Medical Treatment, where access to best medical care is available to all, regardless of income or influence.
That is exactly why I questioned the low health allocation in this Budget and demanded a relook in Parliament. In this Budget, health gets around 2% of total government expenditure, roughly ₹1 lakh crore. But the real gap is bigger.
Under the National Health Policy 2017, India committed to spending 2.5% of GDP on public health. In 2026, we are still at around 0.5% of GDP.We are nowhere near our own target.
Other countries understand the value of health spending. Kyonki jaan hai toh jahaan hai. The US spends around 18% of GDP on healthcare, the UK around 12%, Germany around 13%, and countries like Sweden, Netherlands, Denmark, Japan and Spain spend around 10%.
The consequences are visible. Government hospitals are understaffed and under-equipped. Overworked doctors, too few beds, shortages of machines and medicines, and waiting dates that delay treatment.
When families cannot wait, they are pushed to excruciatingly expensive private hospitals. One health emergency then becomes a debt emergency.
Raghav Chadha ने राज्यसभा में “वन नेशन , वन मेडिकल ट्रीटमेंट” की आवश्यकता पर जोर देते हुए भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि देश में एक ही बीमारी का इलाज अलग-अलग राज्यों और अस्पतालों में अलग गुणवत्ता और अलग कीमत पर मिलना असमानता को दर्शाता है। कहीं सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी है , तो कहीं निजी अस्पतालों में इलाज की लागत आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
उन्होंने मांग की कि पूरे देश में इलाज के न्यूनतम मानक तय हों , दवाओं और चिकित्सा प्रक्रियाओं की कीमतों में पारदर्शिता हो और हर नागरिक को समान गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं मिलें।
जब कोई सांसद अच्छा मुद्दा उठाए तो पार्टियों के विचारधारा से हट कर उसका समर्थन करना चाहिए
राज्यसभा सांसद @raghav_chadha ने खाने में मिलावट के मुद्दे को उठाया है
बाजार में शुद्धता का चिह्न लगा कर खुलेआम जहर बेचा जा रहा है
जैसे
दूध में यूरिया मिल जाता है !!
सब्जियों में ऑक्सीटोसिन !!
पनीर में कॉस्टिक सोडा !!
मसालों में ब्रिक powder !!
Steroids in Poultry !!
आइस क्रीम में डिटर्जेंट !
जिन देशों में कुछ फ़ूड आइटम को पालतू जानवर भी नहीं खाता उनको ये कंपनिया यहाँ बेच रही है। !
कुछ प्राइवेट फार्मा कंपनियाँ ब्रांडेड दवाइयों (medicines) पर 600% से 1000% तक मुनाफ़ा कमा रही हैं। यह कोई आरोप नहीं, बल्कि संसद की समिति की रिपोर्ट में दर्ज तथ्य है।
जहाँ वही दवा generic रूप में 80-90% सस्ती मिल सकती है, वहीं सिर्फ ब्रांड के नाम पर आम आदमी से कई गुना कीमत वसूली जा रही है।
बीमार इंसान के पास मोलभाव का विकल्प नहीं होता,
उसे किसी भी हाल में दवा चाहिए, और इसी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है।
स्वास्थ्य कोई व्यापार नहीं, अधिकार है। गरीब और मध्यम वर्ग की गाढ़ी कमाई दवा कंपनियों के मोटे मुनाफ़े में नहीं जानी चाहिए।
आज मेरी बेरोज़गारी का अंतिम दिन है….!!!
पिता के साथ जंगल में भेड़ चराने आया हूँ…!!
आज का पूरा दिन पिता के साथ बिताऊँगा…!!!
मेरे पिता बहुत खुश है….
कल उनका बेटा राजस्थान पुलिस जॉइन करेगा…!!
खुले आम खाने में जहर बिक रहा है, लोगों की जिंदगी नर्क बन गई है। कैंसर के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। क्यों इतना गिर चुके हो सिस्टम वालों , सब कुछ पैसा नहीं होता है साहब @fssaiindia@PMOIndia
🚨🚨 देश की सबसे ज़्यादा भ्रष्ट और गैर-जवाबदेह संस्था अगर कोई है,तो वो है -
Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI)।
>> देश में कैंसर, किडनी फेल्योर, हार्मोनल डिसऑर्डर, बच्चों की इम्युनिटी गिरने जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं— और जिस संस्था का काम खाने को सुरक्षित बनाना था, वही खामोश साझेदार बनी बैठी है।
>> हक़ीक़त ये है—
• FSSAI के पास अपनी कोई ज़मीनी रिसर्च नहीं
• कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक पैरामीटर नहीं
• सब कुछ विदेशी डॉक्यूमेंट्स की कॉपी-पेस्ट गाइडलाइन
• फूड इंडस्ट्री आगे, रेगुलेटर पीछे
• टेक्नोलॉजी के नाम पर फॉर्मलिटी और फाइलें
>> लैब रिपोर्ट काग़ज़ों में साफ़, मार्केट में ज़हर खुलेआम।
>> जिस संस्था को मिलावट रोकनी थी— वो लाइसेंस बाँटने वाली दुकान बन चुकी है।
असली खेल इससे भी गहरा है—
• बजट कहाँ जाता है, कोई ऑडिट नहीं
• पॉलिसी कैसे हाईजैक होती है, कोई पूछताछ नहीं
• बड़े ब्रांड पर कार्रवाई क्यों नहीं, जवाब नहीं
• छोटे दुकानदार पर ही छापा क्यों, जवाब नहीं
> रेगुलेशन नहीं, नेगोशिएशन चल रहा है
> निगरानी नहीं, मैनेजमेंट चल रहा है
> जन-स्वास्थ्य नहीं, कॉरपोरेट कंफर्ट चल रहा है
>> और याद रखिए—
खाना अगर ज़हरीला है, तो बीमारी व्यक्तिगत नहीं रहती,
वो राष्ट्रीय संकट बन जाती है।
>> टीम खुरपेंच द्वारा बहुत जल्द —
बताया जाएगा कि FSSAI का बजट कौन लीलता है, पॉलिसी कैसे बिकती है, और ब्लैकमेलिंग किस लेवल पर होती है।
👉🏻 ये सिर्फ़ शुरुआत है। अब सवाल पूछे जाएंगे।
हर केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट नहीं कर सकता।
District courts & High courts करते है।
उसी तरह AIIMS में हर किसी मरीज को नहीं जाना चाहिए, राज्यो में बेहतरीन अस्पताल बने, सुविधाएं हो, वहाँ पर इलाज हो।
जिसका इलाज नहीं हो पाए जिसको सच में एम्स की जरूरत हो, उस मरीज को एम्स में रेफेर किया जाना चाहिए। या फिर कोई गंभीर बीमारी जिसका इलाज सिर्फ गिने चुने अस्पतालों में होता हो तो एम्स जाना चाहिए !
केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मरीजों के लिए बहुत कुछ करने कि ज़रूरत है।
#healthcare
‘बीमारी से पहले ठंड मार देगी’
AIIMS के बाहर से रात 3 बजे
ठंड से ठिठुरते, ज़मीन पर लेटे मरीज़
रात भर Appointment के लिए लोग
बर्फ़ सी फर्श, बीमारी से तड़पते लोग
न पीने का पानी, पेशाब घर पर भी ताला
सरकार के दावों की पोल खोलती Report
Full Documentary is on Red Mike YT
कल्पना कीजिए कि आपके घर में किसी को अचानक रात में पेट दर्द हो जाये। आप इमरजेंसी में ज़िला सदर अस्पताल में ले कर मरीज़ को जाते हैं जहाँ पे डॉक्टर उसे तुरंत किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में रेफेर कर देते हैं।
एंबुलेंस से तुरंत आप वहाँ से निकलते हैं। चूँकि आपको पता है कि मेडिकल कॉलेज में पता नहीं कितनी भीड़ होगी इसलिए आप एंबुलेंस से किसी निजी अस्पताल में उतरते हैं।
और अस्पताल में मरीज़ जैसे ही बेड पर लेटा, अभी कुछ इलाज शुरू भी नहीं हुआ है, डॉ ने देखा भी नहीं और आपका बिल हो गया 20,000 रुपए।
मार्केटिंग के नाम पर कमीशन के खेल ने तथा सरकारी अस्पताल के कर्मियों / डॉक्टरों , एंबुलेंस और निजी अस्पताल के गठजोड़ ने यही स्तिथि बना कर रखी है।
और ये प्राइवेट एम्बुलेंस ही नहीं बल्कि 108 एम्बुलेंस की हालत है ।
और इतनी भयावह स्थिति के बावजूद कोई इसके विरोध में कुछ लिखना तो छोड़िए, बात नहीं करना चाहता।
@JharkhandCMO@IrfanAnsariMLA
यह होता है आम आदमी का जनप्रतिनिधि🔥
आज राघव चड्ढा जी ने राज्यसभा में वह मुद्दे उठाए जो लोगों की सबसे बड़ी चिंता हैं मगर उनपर कोई बात नहीं करता,
Health Insurance Companies और Private Hospitals की मनमानी पर उन्होंने बेहद ही ज़रूरी चर्चा की और सदन को अवगत करवाया।