🚨केंद्र सरकार अपने विश्वविद्यालयों में SC, ST, OBC के ख़ाली पड़े 80% तक पदों को भर क्यों नहीं रही है? कौन है ज़िम्मेदार?
नौकरी देने में जातिवाद करने वाले सभी वाइस चांसलर बर्खास्त किए जाएँ और जेल में डाले जाएँ। और शिक्षा मंत्री @dpradhanbjp किस बात के ओबीसी है, अगर उनका कुछ चलता ही नहीं है। और @narendramodi ही क्या कर रहे हैं?
कुछ समय पहले इस तश्वीर ने भारत के साथ साथ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था. ये दोनों फोटो बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के प्रपौत्र राजरत्न अंबेडकर की है. जिन्होंने दिल्ली के एक मैदान से 22 प्रतिज्ञाओं की शपथ ली. जहाँ पर आम आदमी पार्टी के नेता राजेन्द्र पाल गौतम भी मौजूद थे. उन्होंने भी ये शपथ दुहराई.
इस दृश्य से आहत जी न्यूज, आजतक, रिपब्लिक भारत, इण्डिया टीवी जैसी मनुवादी मीडिया और उसके एंकर बौखला गये. और उनसे भी जादे बौखलाहट बेचैनी मनुवादी संगठन RSS सहित उसके सभी अनुषांगिक संगठनों विश्व हिंदू परिषद व भारतीय जनता पार्टी को हुई.
भाजपा के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर राजेन्द्र पाल गौतम और केजरीवाल की हिन्दू धर्म विरोधी बताकर आलोचना करने लगे. राजेन्द्र जी पर किसी तिवारी ने FIR भी कराया है. संक्षिप्त मे बताता चलूं कि भारत मे बौद्ध धर्म, जैन धर्म, आजीवक दर्शन का इतिहास सबसे पुराना है. यानी भारत में आर्यों के आगमन से भी पहले यहाँ ये धर्म विद्यमान थे.
जैन धर्म/दर्शन को प्रसिद्ध करने वाले वर्धमान महावीर उसके 24 वें तीर्थंकर थे. वैसे ही बौद्ध धर्म को विश्वविख्यात करने वाले सिद्धार्थ गौतम बुद्ध 28 वें बौध्द थे. आजीवक व चार्वाक जैसे धर्म तो आज विलुप्त हो चुके हैं.
लगभग 4000 ई.सा. पूर्व आर्यों के आगमन ने शासन, सत्ता के साथ साथ धार्मिक व सांस्कृतिक टकराव पैदा किया. यहीं बैठ कर सारे वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, स्मृतियां रची गई. और उनका समय मानव के प्रागैतिहासिक काल से भी पीछे बताया गया. जिन्होंने इस पर सवाल उठाया उसे आस्था व भगवान के डर से शांत करा दिया गया.
आज भी किसी हड़प्पा व मोहनजोदड़ो जैसे स्थान की खुदाई में न आर्यों की संस्कृत भाषा की लिपि मिलती है और न ही इनके पहले से होने के कोई सबूत मिलते हैं. ये अंधविश्वास और विभिन्न अनुष्ठानों व पाखंडो के माध्यम से लोगों के दिमाग में भर दिये गए हैं. जो जल्दी निकलते नहीं है.
आज भी भारत मे बौद्धों से जुड़े मठ, गुफाएं, मूर्तियां सुदूर पहाड़ों और जंगलों मे मिल रही हैं. बहुत से ऐसी मूर्तियों और मठों पर चंदन तेल लगाकर ब्राह्मण धर्म के पुरोहितों ने कब्जा कर लिया है और खूब कमाई कर रहे हैं. ब्राह्मण धर्म ने समय समय पर अपने नाम मे बदलाव किया ताकी लोग बगावत न करें. इसे हिंदू धर्म और फिर सनातन धर्म कहकर प्रचारित किया. ताकि लोगों को लगे की ये सबसे पुराना धर्म है जिसका उद्गम स्थल भारत ही है. इस कुटिल चाल को समझने की आवश्यकता है.
Shiva Nand Yadav
(शोधछात्र, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर)
भारतीय इतिहास में ब्राह्मणों ने धर्म परिवर्तन कब किया?
पिछले 200 साल में ब्राह्मणों ने अपना काग़ज़ी इतिहास कुछ ऐसे बनाया?
1. काल्पनिक काग़ज़ी वैदिक काल स्थापित कर ख़ुद को 3500 साल पहले आया हुआ ब्राह्मण विदेशी घोसित किया।
2. उसके बाद ख़ुद को बुद्ध का मनपसंद चेला स्थापित करने हेतु तिपितक के एडजेक्टिव बमण का अनुवाद हर जगह जातिसूचक ब्राह्मण कराया ताकी सभी लोग इतिहास पढ़ते वक्त कंफ्यूज रहे की विद्वान भिक्खू की बात हो रही या पिछले हज़ार साल में पनपे जातिवादी ब्राह्मण की।
3. इतिहास के जीतने भी बौद्ध भिक्खू हुए उन्हें ब्राह्मण बताना सुरू किया ताकी लोग यह समझे की इतिहास में जीतने भी बुद्धिस्ट लोगो ने दुनिया भर में परचम फैलाया वो ब्राह्मण थे। सोचने वाली बात है कि बुद्धिस्ट भिक्खुओं के सबूत मिले उनके विश्वविद्यालय भी मिले लेकिन जातिवादी ब्राह्मण का न कोई राजा मिला न कोई गुरुकुल। और आज सारे ब्राह्मण ग्रंथ बुद्ध को गाली देते नज़र आते है।
4. मुस्लिम साम्राज्य में ब्राह्मण संस्कृत में अल्लाहउपनीषद और मुग़ल को पिछले जन्म का अपने ब्राह्मण भाई बताने लगा।
5. वही ब्राह्मण जो ख़ुद को बुद्ध का शिष्य बता रहा था अब उसने ये तक नहीं लिखा की बौद्ध विश्वविद्यालय कब और किसने जलाया, बौद्ध कैसे ख़त्म हुए। जब उसके बाप दादे बुद्ध के शिष्य थे तो अपने बाप दादो के इतिहास क्यों ग़ायब किया? हालाँकि वो काल्पनिक पुराण काल्पनिक वेद, उपनिषद् रामायण महाभारत गीता धर्म शास्त्र लिखने लगा और भारतीय मूल लोगो को शूद्र वैश्य कहके स्त्री सहित सबको नीच पापयोनी गाली देने लगा। क्षत्रिय को नीचा दिखाने हेतु उन्हें ब्राह्मणों के नियोग पुत्र महाभारत आदिपर्व में लिखा।
6. फिर काल्पनिक वेद को भारत का इतिहास बताने लगा फिर मुग़लों और बाद में अंग्रेजों ने पूछा की भारत के लोग तो पाली पाक्कित बोलते थे तो संस्कृत में लिखी वेद उपनिषद् धरम ग्रंथ उनका इतिहास कैसे हुआ तब वह यह प्रचारित करने लगा की ईश्वर की आज्ञा है सिर्फ़ ब्राह्मण पीढ़ी दर पीढ़ी गपोड़ेगा और शूद्र स्त्री को पढ़ने लिखने का हक़ नहीं है और क्षत्रिय वैश्य को पढ़ाने का हक़ नहीं इसलिए ये लोग ये सारी बाते नहीं जानते। शूद्र वैश्य के कान में शीशा पिघला कर डालने और जीभ काटने की बात करने लगा।
अब यहाँ सवाल यह है कि ब्राह्मणों को धम्म लिपि आती नहीं थी तो वो बुद्ध का सबसे ज़्यादा पसंद चेला कैसे था?
गुप्त वंश की लिपि 1812AD , 1817AD के क़रीब फ्लीट ने पढ़ी। सम्राट असोक की लिपि 1837AD में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ी।
बुद्ध का जन्म ब्राह्मणों ने कापिलवस्तु न बता कर कीटक बता सबको भ्रमित किया यही नहीं बोधिस्तवों
की मूर्तियों को तरह तरह के देवी देवता बता कर बुद्ध का भारत का इतिहास ग़ायब करने की कोशिश की।
सबसे बड़ा सवाल है काल्पनिक काग़ज़ी वैदिक काल में जब न कोई मंदिर था न ही कोई मूर्ति तो फिर ब्राह्मणों ने अपने ब्रह्मा के दिये वैदिक ज्ञान को नकार कर मुस्लिम साशन में बुद्ध और बोधिस्त्वों को देवी देवता बता मूर्ति पूजा क्यों शुरू की?
ब्राह्मणों के किस अवतार ने उनका धर्मपरिवर्तन करा मूर्ति पूजा शुरू करवाया?
सोशल मीडिया के कारण ऐसा शोर मचा कि लगा पूरा देश किसान क़ानूनों के खिलाफ है, जबकि वह आंदोलन मुख्य रूप से तीन राज्यों में था। किसी ने खेत मज़दूरों, ग्राहकों और अन्य वर्गों से पूछा भी नहीं कि वे चाहते क्या हैं। संसद का बनाया क़ानून दबाव में बदल दिया गया।
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पूरे देश के किसान फार्म लॉ के खिलाफ थे तो वे 2024 में केंद्र में सरकार बदल देते।
ये क्या बात है कि 5,000 ट्रैक्टर लाकर दिल्ली घेर लो, खेत मज़दूरों को पूछो तक नहीं, ऊपर से सोशल मीडिया से ग्लोबल हल्ला मचाओ। सरकार भी लुल्ल। संसद का बनाया क़ानून बदल दिया।
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मोदी सरकार भी लुल्ल है। जिन इलाक़ों में किसान आंदोलन चला वहाँ लगभग 30% SC हैं। पंजाब लैंड एलिनेशन एक्ट के कारण उनके पास ज़मीन नहीं है। वे खेत मज़दूर हैं। क़ानून वापस लेते समय उनसे पूछा तक नहीं गया।
सोशल मीडिया का दबाव सरकार के सिर चढ़कर पर बोला।
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भगवद् गीता ब्राह्मणवादियों द्वारा प्रमोट करने का मुख्य कारण है कि वो रोटी बेटी संबंध,अंतर्जातीय विवाह निषेध की वकालत करती है।@dhruv_rathee चैप्टर 1 में अर्जुन की प्रमुख समस्या यह है कि लड़ाई में जो लोग मारे जाएँगे तो उनकी औरते दूषित हो जाएगी यानी न सिर्फ़ संपूर्ण स्त्रियों के चरित्र पर भी संदेह कराया गया है बल्की वो स्त्रिया दूसरे वर्ण के लोगो से शादी विवाह भी करेगी और फिर उससे वर्णसंकर बच्चे बच्चे पैदा होंगे जिससे वर्णव्यवस्था चरमरा जाएगी का भी दर्द व्यक्त किया गया है। और इससे लड़ाई में मरे हुए लोगो को पितरो का पिंड नहीं मिल पायेगा और कुल का नाश हो जाएगा।
ये प्रश्न के साथ ही चैप्टर 1 समाप्त होता है दूसरे चैप्टर में कृष्ण को इसका जवाब देना था लेकिन कृष्ण इसका जवाब देने की बजाय जातिवादी जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर मुद्दा ग़ायब करने की कोशिश करते है मसलन चैप्टर 2 के 3 श्लोक में कृष्ण, अर्जुन को नपुंसक कहकर न सिर्फ़ किन्नर समाज को दुर्बल कहके नीचा दिखाने की कोशिश करते है बल्की श्लोक 2 में अर्जुन को स्वर्ग का ख़्वाब भी दिखाते है।
सवाल है इसी चैप्टर 2 के श्लोक 23,24, 25 में वो आत्मा पर कोई भी भौतिक प्रभाव पड़ने से साफ़ इंकार करते है तो अर्जुन स्वर्ग में भोगेगा क्या?
क्या मरने के बाद स्वर्ग भोगने के लिए आत्मा जाएगी या आत्मा को स्वर्ग भोगने के लिए फिर से एक नई माता पिता की ज़रूरत होगी जो उसे शरीर देगा? स्वर्ग में मर्दों के लिये अगर अप्सराये होंगी तो स्त्रियों को कौन कौन सुविधा मिलेगी ?
इस मुद्दे पर गीतकार कोई जानकारी नहीं देता न ही कोई अन्य ग्रंथ।
वर्णसंकर बच्चों से कुल नाश होगा या नहीं इसपर भी कृष्ण जवाब नहीं देते और गृहयुद्ध के लिए लड़ने को अर्जुन को उकसाते है चैप्टर 2 का 31, से 38 श्लोक। और पूरे गीता में कृष्ण वर्ण व्यवस्था को ख़ुद बनाये है और वर्णव्यस्था बनाये रखने की वकालत करते नज़र आते है (गीता चैप्टर18 )और अर्जुन को भी वर्णव्यवस्था फॉलो करने के लिये उकसाते है।
conclusion : वर्णवयस्था बनाये रखना न सिर्फ़ humanity के ख़िलाफ़ है बल्कि यह भारतीय संविधान की मूल भावना अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन के भी ख़िलाफ़ है।
आप ख़ुद पढ़ लीजिए।
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ओबीसी का असंतोष लोकतंत्र के लिए ख़तरा बन गया था। आधी आबादी को नाराज़ रखकर लोकतंत्र कैसे चलता? दोनों ने उस असंतोष का समाधान कर दिया और लोकतंत्र को बचा लिया।
भारत में संविधान का लागू होना सबसे बड़ी क्रांति है। उसके बाद की दो बड़ी सामाजिक क्रांतियाँ वीपी सिंह और अर्जुन सिंह के नाम है। कलम की एक नोंक से उन्होंने करोड़ों ओबीसी को सरकारी नौकरियों (1990) और यूनिवर्सिटी (2006) तक पहुँचा दिया।
लोकतंत्र से कुछ न मिलने का जो भाव ओबीसी में आ रहा था और इसकी वजह से जो सामाजिक अशांति आ रही थी, उसका समाधान इस तरह हुआ। लोकतंत्र बच गया।
वो वक्त भी आएगा, जब लोग समझ पाएँगे कि करोड़ों लोगों का नया मिडिल क्लास बनाकर उन्होंने कितना बड़ा काम किया है। भारत के विकास का ये एक ज़रूरी काम था।
ठाकुर सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं बनेंगे तो ठाकुर वकील भी बड़े नहीं बन पाएँगे। आप लिस्ट निकाल लीजिए। दिल्ली के दो सौ बड़े वकीलों में ठाकुर वकील खोजकर दिखाइए।
सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से ठाकुर जज नहीं बना है। अभी 33 में कोई जज ठाकुर नहीं है। जबकि ठाकुरों की न्याय भावना प्रसिद्ध है।
जज आपस में रिश्तेदारी के आधार पर जज बना रहे हैं। ऐसे में तो ठाकुरों का कभी नंबर ही नहीं आएगा। कोलिजियम सिस्टम बदलना चाहिए। एक ठाकुर जज तो होना ही चाहिए।
वीपी सिंह और अर्जुन सिंह के आरक्षण संबंधी फ़ैसलों के बाद सिस्टम का ठाकुरों पर भरोसा नहीं रहा। पता नहीं राजा साहब कब न्याय करने के लिए मचल जाएँ।
@AbhiArya0@KapilMishra_IND 😁 विदेशी ब्राह्मणों को #पेशवा की उपाधि विदेशी मुगलवंश ने दिया है
#पेशवा ईरानी मुसलमानों की फ़ारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है #प्रधानमंत्री
मुगलवंश #फ़ारसी भाषा बोलते थे और अपने प्रधानमंत्री को #पेशवा कहते थे ! कुछ समझ में आया.😛
महाराष्ट्र का बाजीराव पेशवा इजराइल का यहूदी था
ट्विटर के पूर्व CEO जैक डॉर्सी ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि भारत में किसान आंदोलन के वक्त मोदी सरकार ने धमकी दी थी कि अगर सरकार की आलोचना करने वाले अकाउंट्स को सस्पेंड नहीं किया गया तो छापे मारेंगे। #JackDorsey#TwitterCEO#FarmersProtest
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@Profdilipmandal प्राचीन भारत के श्रमणों बौद्धों को सेना में न भर्ती करने का सिलसिला छठी शताब्दी: में ब्राह्मणों ने शूरु कर दिया था उस समय भारत में विदेशी मुस्लिमों का प्रवेश नहीं हूआ था
सिंध का ब्राह्मण राजा #दाहिर का बाप ब्राह्मण #चच ने अभीरों गुर्जरों जाटों लोहाणों की ज़िन्दगी नर्क बना कर रखा