मेरी और असत्य नींदी वाले उच्च स्तरीय लफ़ंगे की बातचीत
मैं- बंगाल में TMC गई
लफ़ंगा- कांग्रेस मजबूत होगी
मैं-DMK का पत्ता साफ़
लफ़ंगा- कांग्रेस मजबूत होगी
मैं- दिल्ली में AAP ग़ायब
लफ़ंगा- कांग्रेस मजबूत होगी
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मैं- ले बेटा दस का नोट
लफ़ंगा- कांग्रेस मज़बूत होगी
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@Incognito_qfs O My servant, O Muslim, My follower,
Verily, I am a fan of Messi. Thus, I cannot approve your prayer against any team of Argentina.
Indeed, I'm the Best of Planners. Argentina will win by My decree. So do not waste your time watching the match hoping to celebrate their defeat.
Again MohitVerse in his Ramayana series rejected all the fake claims made by Dhruv Rathee On Lord Ram.
Mohit is the only Doctor who has the cure of Rabies infected German shepherd 🚬
वर्ष 1980
इंदिरा गांधी की वापसी हुई थी ।आते ही उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री शरद पवार को चलता किया और वहां के नये मुख्यमंत्री बने श्री अब्दुल रहमान अंतुले। अंतुले इंदिरा गांधी के कट्टर समर्थक थे , इमरजेंसी में इन्होंने अपनी नेता का साथ दिया था और कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा कांग्रेस अंतुले साहब ही मैनेज करते थे । मराठा लौबी नाराज थी मगर इंदिरा गांधी को इन सब की कभी परवाह नहीं थी । सरकार चलने लगी।
उस समय देश के सबसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे श्री अरूण शौरी । एक दिन जब शौरी साहब अपने चैंबर में बैठे थे तो उनसे मिलने एक नामी डाक्टर साहब आए। उन्होंने बताया कि वे एक अस्पताल खोलना चाहते हैं मगर फाइल सी एम के यहां अटकी पड़ी है । कारण पता चला कि 5 करोड़ रूपए एक ट्रस्ट को दान देने पर ही मंजूरी मिलेगी। और कुछ अन्य लोगों ने भी बताया कि बिना इसके कोई काम नहीं होता है ।
ट्रस्ट का नाम था इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान । अरूण शौरी ने पहली बार इस ट्रस्ट का नाम सुना था । उन्होंने डाक्टर साहब को विदा किया और अपने सहकर्मी गोविंद तलवलकर को इसके बारे में पता लगाने को कहा । खोजबीन शुरू हुई मगर किसी को पता नहीं था कि यह ट्रस्ट कहां है। फिर एक दिन सचिवालय बीट के एक पत्रकार ने पता कर ही लिया कि इस ट्रस्ट का कार्यालय कोयना बांध पुनर्वास औफिस के एक कमरे में है ।
खोजी टीम वहां पहुंची तो पता चला कि एक कमरे में दो लोग बैठते हैं ,एक कैशियर ,एक टाइपिस्ट बस । बाहर में एक छोटा सा बोर्ड है जो दिखता भी नहीं
यह भी पता चला कि दोनों स्टाफ लंच के लिए एक घंटे बाहर जाते हैं । बस उसी समय खोजी पत्रकार उस कमरे में घुसे । वहां उन्होंने पाया कि ट्रस्ट के नाम से करीब 102 चेक पड़े हैं जो विभिन्न श्रोतों से प्राप्त हुए हैं ।एक रजिस्टर में उनकी एंट्री भी है। सारे चेक नंबर और बैंक का नाम नोट कर लिया । समय हो चुका था इसलिए उस दिन ये लोग वापस आ गए।
जाकर शौरी साहब को बता दिया लेकिन वे खुश नहीं हुए ।उनका कहना था कि इन सब की फोटो कॉपी चाहिए ।
दूसरे दिन ये कोयना पुनर्वास औफिस गये और खुद को आडिट टीम का बताकर कुछ डाक्यूमेंट फोटो कौपी करने का जुगाड कर लिया । फिर लंच ब्रेक में रजिस्टर और चेक की फोटो कॉपी हासिल हो गई
अब भी अरुण शौरी खुश नहीं थे ।उनका मानना था कि चेक से कैसे प्रूफ होगा कि यह किसी काम के एवज में दी गई है ? तब नई सरकार में शंटिंग में पड़े एक वरीय आई ए एस अफसर की मदद ली गई। उन्होंने बताया कि जिस जिस तारीख का जिस बिजनेस मैन का चेक है उससे संबंधित कोई न कोई निर्णय कैबिनेट में पारित हुआ है । होटल के लिए जमीन दिए जाने के दिन होटल मालिक का चेक । बीयर बार एसोसिएशन का चेक और उसी दिन बीयर बार में डांस देखने की स्वीकृति । कड़ी से कड़ी मिलती गई । उस समय सीमेंट और चीनी का राशनिंग था। ये दोनों परमिट पर मिलते थे । सीमेंट और चीनी को फ्री सेल में बेचने का पारी पारी से कंपनियों को छूट मिलता था ।यही सबसे बड़ा घोटाला था। जिस कंपनी ने पैसे दिए उसे लगातार छूट । जिसने नहीं दिए उस की राशनिंग।
अब न्यूज बनाने की बारी थी। संपादक खुद रात में 11 बजे कंपोज करने बैठे ।उन्हें डर था कि लिक न हो जाए ।
और बात लिक हो गई। अंतुले साहब का फोन इंडियन एक्सप्रेस के मालिक श्री रामनाथ गोयनका को आया। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि मैं संपादकीय मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करता और फोन रख दिया।
दूसरे दिन न्यूज छपा .. इंदिरा गांधी के नाम पर व्यापार ।
हंगामा हो गया । संसद में सवाल उठा तब वित्त मंत्री आर वेंकटरमण ने कहा कि इंदिरा गांधी को ऐसे किसी ट्रष्ट की जानकारी नहीं है
दूसरे दिन न्यूज छपा... झूठे हैं आप वित्त मंत्री जी और साथ में ट्रस्ट के उद्घाटन समारोह की तस्वीर भी छाप दी गई जिसमें इंदिरा गांधी भी उपस्थित थीं।
हंगामा इतना बढ़ा कि अंतुले साहब बर्खास्त हो गये ।
बताया जाता है कि मृणाल गोरे ने इस पर मुकदमा दायर कर दिया था और डर था कि इंदिरा गांधी भी न फंस जाएं।
इसलिए अंतुले को बर्खास्त कर दिया गया।
यह खोजी पत्रकारिता कै स्वर्णिम काल की अनूठी मिसाल है।
आज की पत्रकारिता रसातल में गर्ग हो चुकी है।
“क्या कर रहे हो शाम को आज?” भगत सिंह के कंधे पर हाथ रखते हुए प्रोफेसर जयचंद्र विद्यालंकार ने भगत सिंह से धीरे से पूछा।
“ऐसा कुछ ख़ास नहीं गुरूजी।”
“मैं तुम्हे किसी से मिलवाना चाहता हूँ।”
“कौन है गुरूजी? कोई ख़ास व्यक्ति?”
“मेरे एक मित्र आये हैं। मुझे उम्मीद है कि तुम्हारे कई सवालों के जवाब, जिसके लिए तुम कई दिनों से बेचैन हो, तुम्हे मेरे मित्र से मिल जायेंगे।”
“जैसी आपकी आज्ञा गुरूजी।”
“तो आओ चलो मिलवाता हूँ।”
“अभी?”
“हाँ और क्या। काल करे तो आज करे भाई।”
“चलिए!”
“वैसे आपके मित्र आये कहाँ से हैं?” भगत सिंह ने चलते-चलते पूछा।
“बहुत उत्सुकता है भाई तुम्हारे अंदर।” जयचंद्र हँस दिए।
“खटखटाओ दरवाज़ा।” जयचंद्र जी ने भगत सिंह की ओर देखते हुए कहा।
दरवाज़ा खटखटाया गया।
एक बार, दो बार, तीन बार किन्तु कोई जवाब नहीं आया।
“अंदर तो कोई नहीं है गुरूजी।” भगत सिंह ने जयचंद्र जी की ओर देखा।
“आओ खिड़की से झांकते हैं।”
खिड़की से झाँका गया। घर के अंदर सन्नाटा छाया हुआ था।
“आपके मित्र शायद कहीं चले गए हैं। मैं कल आकर मिलता हूँ उनसे।”
“रुको!” जयचंद्र जी मुस्कुराए और दरवाज़े पर एक सांकेतिक भाषा में खटखटाया।
अंदर थोड़ी देर शांति रही और फिर दरवाज़ा खुला तो सामने एक भद्र पुरुष मुस्कुराते हुए खड़े थे।
उन्होंने भगत सिंह का हाथ पकड़ा और गले लगा लिया। भगत सिंह को कुछ समझ नहीं आया और वो नमस्कार कर एक कुर्सी पर बैठ गए।
“कैसा रहा आज का दिन दा?”
“सब ठीक ही है मास्टर जी। सच कहूँ तो अभी आग लगी नहीं है पूरी तरह से।”
“आपका कहना सच है।”
“यह भगत सिंह है दा।”
“मैं समझ गया था।”
भगत सिंह बड़ी असमंजस वाली स्थिति में थे कि क्या कहें और क्या पूछें।”
“और सुनाओ भगत सिंह, कैसे चल रही है पढ़ाई?”
“जी, यहाँ नेशनल कॉलेज में तो जैसे मेरी मन की मुराद पूरी हो गयी है।”
“ऐसे क्या मुराद थी?”
“मैं यहाँ नौकरी के लिए पढ़ाई करने नहीं आया था। मैं आया था कि विश्व में, भारत में जो आज स्थितियाँ हैं उनके बारे में मैं अपने गुरुजनों से जान सकूँ। यह समझ सकूँ कि जो ग़ुलाम देश हैं उनके देशवासी गुलामी से मुक्ति पाने के लिए क्या कोशिशें कर रहे हैं। जिन देशों को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिली है वो उन्होंने कैसे हासिल की है?” भगत सिंह की आवाज़ में जोश आ रहा था।
“तो जाना?”
“पढ़ाई चल रही है अभी भी महोदय।”
“क्या पढ़ना पसंद है तुम्हे भगत?”
“राजनीतिक एवं आर्थिक समस्याओं पर आधारित उपन्यास मुझे खास तौर पर पसन्द हैं। “टेन डेज देट शुक द वर्ल्ड” जिसे जॉन रीड ने लिखा है, रोपशिन का “रशियन डेमोक्रेसी” और मैक्सविनी की “प्रिसिपिल्ज आफ फ्रीडम” मेरी पसंदीदा किताबें हैं।”
“यह सब तुमने पढ़ रखीं हैं?” सामने बैठे सज्जन आश्चर्यचकित थे और जयचंद्र जी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
“अप्टन सिन्क्लेयर का “वोस्टन” “जंगल”, आयल” आदि भी पढ़ चुका हूँ। गोर्की, मार्क्स, चार्ल्स डिकेन्स भी मुझे बेहद पसंद हैं।
“आजकल क्या पढ़ रहे हो?”
“आजकल तो बर्नार्ड शा के साथ-साथ लेनिन को पढ़ रहा हूँ। कुछ किताबें रूसी क्रांति पर गुरूजी ने दीं थी वो पढ़ी मैंने लेकिन मैंने वेलां को पढ़ा तो बस ऐसा लगा कि मुझे मेरा मक़सद मिल गया है।”
“क्या पढ़ लिया ऐसा?”
भगत सिंह ने दोबारा से वही दोहरा दिया जो वो अपने सभी साथियों को सुना चुके थे।
“तुमने यह किताब पढ़ी है?” अचानक जयचंद्र जी ने भगत सिंह हाथ में “बंदी जीवन” रख दी।
“यह आपको कहाँ से मिली? यह आपने मुझे अभी तक क्यूँ नहीं दी मुझे?” भगत सिंह थोड़े नाखुश से थे।
“अरे तुम वो वेलां तो पढ़ रहे थे भाई।”
“अरे तो क्या? मैं इस किताब को जाने कितने दिनों से ढूंढ़ रहा था। शास्त्री जी को भी पूछा तो वो भी हँस कर टाल जाते थे।”
“तो अब पढ़ लो ना। पता नहीं क्या लड़का है दादा यह। पूरा पुस्तकालय लेकर चलता है। अभी इसका थैला देख लो तो दस किताबें मिल जाएँगी आपको।”
भगत सिंह हँसने लगे।
“कहाँ पुस्तकालय गुरूजी? अभी सावरकर साहब की किताब तो मेरे पास है नहीं।”
पास बैठे सज्जन मुस्कुरा दिए।
“अच्छा यह बताइए, यह किताब तो प्रतिबंधित है। आपके पास कहाँ से आयी?” भगत सिंह ने जयचंद्र जी से पूछा।
“मेरे मित्र लाये हैं।”
“आपको कहाँ से मिली?” भगत सिंह ने मुड़ कर साथ बैठे सज्जन से पूछा।
“यह मेरी प्रतियों में से एक है।”
“मतलब?” भगत सिंह कुछ चौंके।
“अरे भाई जिन्होंने लिखी है उनके पास तो होगी ही ना?”
भगत सिंह उछल कर खड़े हो गए।
“आप वो शचीन्द्र दा हैं?
सामने बैठे शचीन्द्र नाथ सान्याल ज़ोर से हँस दिए।
“क्या हुआ भगत? इतना क्यूँ चौंक गए?”
भगत सिंह कुछ नहीं बोले, पहले शचीन्द्र नाथ जी पैरों को हाथ लगाया और फिर गले लग गए।
“मेरा जीवन धन्य करा दिया आपने गुरु जी।” भगत सिंह जयचंद्र जी की ओर देखते हुए बड़े भावुक स्वर में बोले।
“अच्छा यह बताओ भगत सिंह, आजकल के हालात में तुमको लगता है कि अनुनय-विनय से आज़ादी मिले वाली है?” शचीन्द्र दा का स्वर गंभीर था।
“दादा स्वतंत्रता भीख नहीं हैजो हम गिड़गिड़ा कर मांगेंगे। स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए अगर शक्ति का परिचय देने की ज़रुरत हो तो हमें पीछे नहीं हटना चाहिये।”
“यह तो तुम्हारी सोच है भगत। जनमानस, तुम्हारे दोस्त, आम आदमी क्या सोचता इसके बारे में?”
“मुझे पूरा विशवास है कि आम आदमी भी आजकल हमारी ही तरह सोच रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय जनमानस एक ऐसे समुद्र की तरह है जो ऊपर से तो शांत है किन्तु भीतर एक भयंकर तूफान उफन रहा है।”
“ह्म्म्म!
“तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा भगत सिंह। तुमसे शीघ्र मुलाक़ात होगी।”
“जी मुझे भी। मेरे लिए कोई आज्ञा हो तो अवश्य बताइयेगा।”
“रुको ज़रा मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ।” कहते हुए शचीन्द्र अंदर चले गए।
लौट कर आये और उन्होंने भगत सिंह के हाथों में एक किताब रख दी। जब भगत सिंह की नज़र किताब पर गयी तो उनकी आँखों से आँसू निकल आये।
भगत सिंह के हाथ में रखी किताब का शीर्षक था-
“1857 का स्वातंत्र्य समर”
@HyundaiIndia I purchased a Hyundai Exter on 28th December 2025 from Dream Hyundai located at Sihani Chungi on Meerut Road Ghaziabad.
Dream Hyundai people haven't given me my RC yet, and I need to file an insurance claim.
प्रिय @CPDelhi इस बार इन जल्लादों के पैरों पर नहीं सीने पर गोली मारना।
देखिए कैसे दिल्ली के कृष्णा नगर के अंदर बच्चों को छोड़कर घर जाने के लिए माँ और बेटी को जल्लादों ने घेर कर लूटा,विरोध किया तो हथियार से मारा गया।
@LtGovDelhi@HMOIndia@DCP_SHAHDARA
जो कह रहे है कि ५० लोग इकट्ठे नहीं हुए उनकी आंखों के लिए..
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सामान्य वर्ग के योद्धाओं से आग्रह है कि इन पिल्लों को जम कर पेलो। प्रोटेस्ट की न्यूज़ और वीडियो जहाँ से मिले, जितनी बार मिले, एक कमेंट के साथ पोस्ट करते रहो। जब तक बाढ़ नहीं आएगी, इनका घमंड नहीं टूटेगा।