एक ऑप्शन ये भी है कि सप्ताह में 90 घंटे केवल पत्नी को निहारो , कोई काम मत करो , राज्य सरकारें कोई ना कोई स्कीम में 1500 से 2500 तक आपके खाते में फ्री में डाल ही देगी, केंद्र सरकार गेहूँ -चावल फ्री में दे ही रही है और इन सबकी भरपाई वो लोग कर ही देंगे जो सप्ताह में 90 घंटे काम करके टैक्स भरते रहेंगे !
2 dark secrets about Kissan Ketchup EXPOSED!
Kissan FRESH tomato ketchup is not FRESH. They have trademarked the word "fresh". If you turn around the ketchup pack, they've mentioned "this is only a brandname or trademark, and does not represent its true nature"
But what is even MORE SHOCKING is the second marketing strategy which I have explained in detail in this video!
I request Kissan to not fool innocent Indian customers, and I request Indians to read the label before buying anything!
Label Padhega India, tabhi toh swasth banega India!
Today I am giving a 6 month deadline to Saffola to change their misleading peanut butter packaging.
Saffola’s peanut butter says 31% protein RDA which clearly implies that people will get 31% of their daily protein needs from Saffola peanut butter.
But in tiny font in the back on the package, they write the protein requirements mentioned are for 7-9 year olds.
In order to make their protein content seem big, Saffola compares their protein content to a kid’s protein requirement since kids need lesser protein.
A low protein diet is one of the major causes behind several Indian illnesses. Companies must market their protein content honestly because many Indians opt to have peanut butter to increase protein in their diet.
I am giving Saffola 2 options:
Option 1: Don’t make any changes and I might take legal action
Option 2: Change your packaging and remove this 31% protein RDA claim and I will make a video praising you
It is time for Indians to stand fearless and united against misleading ads which prompt us to eat junk food and lead unhealthy livestyles.
#EndFalseMarketing
🚇 Mumbai Metro One welcomes Line-3 to the growing Metro network in Mumbai. Together, we'll create a seamless travel experience for all Mumbaikars.
Line 3 intersects with Line 1 at Marol Naka station, providing seamless connections for commuters. 🏙️✨
#MumbaiMetroOne #MetroLine3 #MumbaiTransport #SeamlessTravel #ConnectingMumbai
@TheVikasKhanna Economically India has grown bigger than these westerners and their presumptions. They were responsible for making once richest country poorer after centuries of exploitation pre-independence, conveniently forgotten by them @BBCNews@BBCBreaking@BBCWorld
Vikas Khanna, Michelin Star Chef, gives it back to BBC news anchor.
Anchor: In India, you were not from a rich family. So your sense of hunger must have come from there.
Vikas: No, I'm from Amritsar, everyone gets fed there in the langars. My sense of hunger came from New York!
अक्सर पूछा जाता है कि भगतसिंह का मुकदमा, मोहनदास करमचंद गांधी में क्यो नही लड़ा।
तो पहली फोटो उस बन्दे की है, जिसने भगतसिंह का केस लड़ा।
इनका परिचय दूं..
इसके पहले एक मजेदार घटना बताता हूँ।
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2020 में मैनें भक्तों की भीड़ पर रैंडम पत्थर फेंका। चार लोग चोटिल हुए। पूछताछ में पता चला,
उसमे से 3 इंजीनियर थे।
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यही रैंडम पत्थर अगर 1920 में देशभक्तों पर फेंका होता,
तो चार में से 3 वकील निकलते।
खराब एनॉलजी के लिए क्षमा, पर कवि कहना चाहता है कि जैसे आजकल सब लोग भरभरा के इंजीनियरिंग करते है..
तब लोग वकालत करते थे।
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मगर जैसे आज के इंजीनियरिंग पढ़े सारे लोग बिल्डिंग नही बनाते.
वैसे ही तब वकालत पढ़े सभी लोग, वकालत नही करते थे।
अब जवाहरलाल नेहरू को ले लो, महात्मा गांधी को ले लो। इनको न मानो, तो सावरकर को ले लो। ये लोग वकालत पढ़े, मगर जिंदगी में वकालत किये नही।
लेकिन उस दौर में पढ़े लिखे हर आदमी की डिग्री लॉ की ही मिलेगी। क्योकि उच्च शिक्षा का मतलब, बीए के बाद एलएलबी करना था।
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लेकिन ऐसे एलएलबी से आप मकान- दुकान- कत्ल का केस नही लड़वा सकते।
तो जैसे घर बनवाने के लिए जैसे कोई "प्रैक्टिसिंग इंजीनियर" चाहिए..
वैसे ही केस लड़ने के लिए एक "प्रैक्टिसिंग वकील" चाहिए।
और आसफ अली तो बहुतई प्रैक्टिसिंग वकील थे, एकदम राम जेठमलानी-कपिल सिब्बल, या दामिनी के सन्नी देओल टाइप।
उनका हाथ ढाई किलो का नही था, मगर लन्दन की प्रिवी काउंसिल के मेंबर रह चुके थे। तो कांग्रेस ने, बेस्ट क्रिमिनल लॉयर होने के नाते आसफ अली को ही भगतसिंग का केस लड़ने का जिम्मा दिया ।
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मगर भगतसिंह ने वकील लिया नही।
क्योकि उनको अपनी पैरवी खुद करनी थी।
उन्हें बचना नही था, बल्कि इरादा तो सीना ठोककर मरने का उद्यम करने का था। जब दिल में सरफरोशी की तमन्ना हो, तो वकील मददगार नही, रोड़ा होता है। उनको अपनी पैरवी खुद करनी थी।
क्योकि खुद खड़ा होकर, कोर्ट में फरफ़ारती स्पीच दें, तब तो रंग जमेगा। और उसके लिए स्पीच तगड़ी होनी चाहिए।
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तो वे, अपनी स्पीच के लीगल पहलू आसफ अली से ड्राफ्ट करवाते। पॉलीटिकल पहलू खुद तैयार करते। तब जाकर कोर्ट में झमाझम स्पीच निकलती।
अलबत्ता, बटुकेश्वर दत्त ने वकील लिया। आसफ अली ने उन्हें बचा भी लिया।
राजगुरु सुखदेव को भी आसफ अली ने रिप्रेजेन्ट किया। लेकिन हंसराज वोहरा की गवाही ने सब मटियामेट कर दिया। फिर इन लोगो मे भी भगतसिंह की तरह सीना ठोकना शुरू कर दिया।
कुछ लोग सर शादीलाल और शोभा सिंह को उनकी फांसी का दोषी बताते हैं। ये फालतू बात है।
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तो जब भगत की स्पीच ने देश भर में धुंआ धुआं कर दिया, सरकार की झुरझुरी छूट गयी। प्रेस का मजमा कोर्ट में मौजूद रहता, और एक एक शब्द रिपोर्ट करता। इस रिपोर्टिंग ने आग लगा दी।
सरकार झुलसने लगी तो उसे अब मुकदमा जनता की निगाह से दूर करना था। वह बिल लायी। ऐसा ट्रिब्यूनल बनाने का बिल, जिसमे आतंकी मामलों की बन्द कमरे में सुनवाई होती।
ये बिल, जब सेंट्रल असेम्बली में आया, वहां जिन्ना मौजूद थे। और जिन्ना भी, फ़ॉर योर काइंड इन्फो,
..वकील ही थे।
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मगर अब पोलिटीशयन थे।
और ये 1947 वाला जिन्ना नही था। अभी वे इंसान थे। बिल पर बहस में ब्रिटिश सरकार को जो खरी खोटी सुनाई, कि पूरी असेम्बली, इस बिल के खिलाफ हो गई।
बिल गिर गया।
पर सरकार अड़ी हुई थी।
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सरकारें जब सदन में फेल हो जाती हैं, तो ऑर्डिनेंस लाती हैं। तो यह ऑर्डिनेंस बनाकर लागू किया गया।
और बन्द दीवारो के पीछे, सजाये मौत मुकर्रर की गई। भगत, राजगुरु, सुखदेव शहीद हुए।
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बटुकेश्वर दत्त 1937-38 में रिहा हो गए। 1942 के आंदोलन में भाग भी लिया।
वे, और भगतसिंह वगैरह सब कम्युनिस्ट थे। तो बटुकेश्वर दत्त आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य हो गए।
60 के दशक में सरकार ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधानपरिषद का मेम्बर बनाया। पर वे त्यागी जीवन जिये, गरीबी में ही मरे।
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आसफ अली आजाद हिंद फौज के प्रकरण में भी डिफेन्स टीम में रहे। ये मामला POW और इंटरनेशनल लॉ से जुड़ा था, जिसमे नेहरू तगड़े वक्ता थे। तो INA केस में नेहरू भी करिया कोट डालकर गए।
मगर जिरह, आसफ अली और भूलाभाई देसाई ने अधिक की।
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उनकी पत्नी अरुणा आसफ अली 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की स्टार थी। जो अरेस्ट ऑर्डर के बाद अंडर ग्राउंड होकर भी आंदोलन चलाती थी, और पुलिस को छकाती रहीं। जो अंत तक गिरफ्तार न कर सकी।
आने वाले समय मे आसफ अली नेहरू की अंतरिम कैबिनेट में रहने के बाद, अमरीका में भारत के प्रथम राजदूत नियुक्त हुए।
इसके बाद स्विट्जरलैंड के राजदूत रहते हुए 1953 में उनकी मृत्यु हुई।
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आसफ अली साहब बिजनौर के रहने वाले थे।
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