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गांव सर्फाबाद की गली नं-1/4 गंगाराम वाली गली में पिछले डेढ़ महीने से पानी नहीं आ रहा है कई बार शिकायत करने के बाद भी ऐसी भीषण गर्मी में ग्रामीण पानी के लिए तरस रहे हैं, कई बार मदन JE जी को भी बोला गया परंतु अभी तक सुनवाई नहीं हुई आखिर क्यों
मोदी के मंत्री हरदीप पुरी ने कहा 👇
तेल कंपनियां कच्चा तेल, गैस और LPG को महंगी कीमत पर खरीद रही हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को कम कीमत पर बेच रही हैं, जिससे कंपनियों को हर रोज 1,000 करोड़ रुपए का भारी नुकसान हो रहे हैं.
मोदी ने मंत्री ने ये नहीं बताया कि जब कच्चा तेल, गैस और LPG सस्ता था, तब ये कंपनियां कितना मुनाफा बना रही थीं.
सबको पता है रूस से सस्ता तेल खरीदकर, रिलायंस जैसी कंपनियों ने अपनी तिजोरी भरी, लेकिन जनता को इसका 1 पैसा फायदा नहीं मिला.
अब कंपनियों को नुकसान हो रहा है तो भूमिका बना रहे हैं. इतने हाव, भाव, छाव मत कीजिए.. सीधा बोलिए कि जनता की जेब काटना चाहता हूं.
इतना गणित कोई नहीं समझना चाहता है. सबको आदत हो गई है आपकी वसूली की.
ये सरकार सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के मुनाफे और नुकसान के बारे में सोचती है, जनता मरे तो मरे.
चुनाव ख़त्म होते ही, ‘संकट’ याद आ गया!
दरअसल देश के लिए ‘संकट’ सिर्फ़ एक है और उसका नाम है : ‘भाजपा’
इतनी सारी पाबंदियां लगानी पड़ीं तो ‘पंच ट्रिलियन डॉलर की जुमलाई अर्थव्यवस्था’ कैसे बनेगी? लगता है भाजपा सरकार के हाथ से लगाम पूरी तरह छूट गयी है। डॉलर आसमान छू रहा है और देश का रुपया पातालोन्मुखी हो गया है।
सोना न खरीदने की अपील जनता से नहीं, भाजपाइयों को अपने भ्रष्ट लोगों से करनी चाहिए क्योंकि जनता तो वैसे भी 1.5 लाख तोले का सोना नहीं ख़रीद पा रही है। भाजपाई ही अपनी काली कमाई का स्वर्णीकरण करने में लगे हैं। हमारी बात गलत लग रही हो तो ‘लखनऊ से लेकर गोरखपुर’ तक पता कर लीजिए या ‘अहमदाबाद से लेकर गुवाहाटी’ तक।
वैसे सारी पाबंदियाँ चुनाव के बाद ही क्यों याद आईं है? भाजपाइयों ने चुनाव में जो हज़ारों चार्टर हवाई यात्राएं करीं वो क्या पानी से उड़ रहीं थीं? वो क्या होटलों में नहीं ठहर रहे थे या सिलेंडर की फ़ोटो लगाकर खाना बनाकर खा रहे थे? भाजपाइयों ने चुनाव में ही वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग से ही प्रचार क्यों नहीं किया? सारी पाबंदियाँ जनता के लिए ही हैं क्या?
इस तरह की अपील से तो व्यापार-कारोबार-बाज़ार में मंदी या महंगाई की आशंका की वजह से डर के साथ घबराहट, बेचैनी, निराशा फैल जाएगी। सरकार का काम अपने अकूत संसाधनों का सदुपयोग करके आपातकालीन हालातों से उबारना होता है, भय या अफ़रातफ़री फैलाना नहीं।
अगर सरकार नहीं चला पा रहे हैं तो भाजपाई अपनी नाकामी स्वीकार करें, देश को बर्बाद न करें। वैसे भी इन हालातों की असली वजह विदेश नीति के मामले में देश की परंपरागत ‘गुट निरपेक्षता’ की नीति से भाजपा सरकार का हटकर कुछ गुटों के पीछे, कुछ ख़ास वजहों और दबावों की वजह से चलना है। इसका ख़ामियाज़ा देश की जनता को महंगाई, बेरोज़गारी, बेकारी और मंदी की मार के रूप में भुगतना पड़ रहा है। किसान-मज़दूर से लेकर हर युवा, हर गृहिणी, नौकरीपेशा, पेशेवर, कारोबारी मतलब हर कोई इसकी चपेट में आ गया है। सच तो ये है कि भाजपा विदेश नीति और गृह नीति दोनों में फ़ेल हो गयी है। ये अपील भाजपा सरकार की अपनी असफलता की स्वीकारोक्ति है। दरअसल वोट मिलते ही भाजपा का खोट सामने आ गया।
भाजपाइयों ने चुनावी घपलों से राजनीति को प्रदूषित कर दिया है; नफ़रत फैला कर समाज के सौहार्द को बर्बाद कर दिया है; अपने चाल-चलन से भाजपाइयों ने संस्कृति-संस्कार को कलुषित कर दिया है; साधु-संतो पर प्रहार और आरोप लगाकर धर्म तक को नहीं छोड़ा है और अब अर्थव्यवस्था का रोना रो रहे हैं। इस तरह तो सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हर क्षेत्र में भाजपा ने देश का बंटाधार कर दिया है। इस अपील के बाद देश की जनता में अचानक आक्रोश का जो उबाल आया है, उसका प्रबंधन भाजपा किसी चुनावी-जुगाड़ की तरह नहीं कर पाएगी, अब भाजपा हमेशा के लिए जाएगी।
देश कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!
पेट्रोल डीजल और सोना कम खरीदने की अपील से पहले आपको ये सब करना था -
1- आप कोई भी रैली नहीं करते
2- सभी राज्यों के मुख्यमंत्री विधायक को रैली के लिए नहीं बुलाते
3- सांसदों के फ्री विदेश यात्रा में रोक लगा देते
4- गंगा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन वर्चुअल करते, 3000 बसे नहीं बुलवाते
5- जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन वर्चुअल करते
6- विधायकों सांसदों को फ्री पानी बिजली सब बंद करते
7- सुधीर चौधरी का 14 करोड़ वाला पैकेज बंद करते
8- चुनाव में फ्रीबीज का वादा न करते
9-मुख्यमंत्रियों को हेलिकॉप्टर में उड़ने पर प्रतिबंध लगाते।
लेकिन नहीं, आप सोचते हैं कि बस जनता ही सारी कुर्बानी दे, नेता मौज काटें।
हमारे प्रदेश में मेहमान बनकर आए हैं, हम उनको मेहमान मानकर ही सम्मान सहित विदा करेंगे। जाने वालों की बात का बुरा नहीं माना जाता है। जब हार साक्षात् दिखने लगती है तो इंसान को न अपने पद का मान रहता है, न ही अपने कथन पर नियंत्रण।
उम्र और पद का मान करना हमारे संस्कार में है और हमेशा रहेगा।
सादर विदाई!
ये डील नहीं, ढील है।
इस देश में कोई भी डील जो 70% कृषि आधारित जनता के लिए हानिकारक है वो कभी लाभकारी साबित नहीं हो सकती है।
कृषि और डेयरी को बचाने का जो झूठ सदन के पटल पर बोला जा रहा है, उसका संज्ञान भविष्य में लिया जाएगा और झूठा साबित होने पर कार्रवाई की माँग भी की जाएगी।
जब डील की शर्तें निर्धारित और हस्ताक्षरित ही नहीं हुई हैं तो कोई पहले से दावे कैसे कर सकता है।
कोई भी ट्रेड लाभ-हानि की तराज़ू पर तोला जाता है। ऐसे में सवाल ये है कि फ़ायदे में कौन है और नुक़सान में कौन।
भाजपाई हानि का उत्सव न मनाएं। ये डील एक आपदा है, भाजपाई इसमें कमीशनख़ोरी के अवसर न तलाशें।
ये समझौता नहीं, समर्पण है।
लोग कह रहे हैं, ऐसा लग रहा है कि भारत से 500 अरब डॉलर की रंगदारी वसूली जा रही है।
जो ट्रेड डील को मील का पत्थर बता रहे हैं, उनकी अक्ल पर पत्थर पड़ गये है।
जो कह रहे हैं कि ये कूटनीति की जीत है दरअसल वो भी जानते हैं कि अमेरिका कूट नीति को कूट-कूट मन माफ़िक साँचे बना रहा है, जिसमें वो अपने मुनाफ़े का कारोबार ढाल सके।
जो इसे भाजपा सरकार के दबदबे की जीत बता रहे हैं, वो दरअसल दबा-दबा महसूस कर रहे हैं। उनकी जीभ भी दबी है और गर्दन भी।
भाजपा ने फिर किया ‘किसानों’ पर वार
भाजपा सरकार दे जवाब, क्या है दबाव
भारत के बाज़ार को अमेरिकी कृषि उत्पादों व खाद्यान्नों के लिए खोल देना, हमारे देश की खेती-किसानी पर रोज़ी-बसर करने वाली 70% आबादी के साथ धोखा है।
भाजपाई और उनके संगी-साथी आज़ादी से पहले भी विदेशियों के एजेंट थे, आज भी हैं।
आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की बात करनेवाले भाजपाई और उनके संगी-साथी जनता के बीच जाकर बताएं कि उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था के साथ धोखा करने के लिए कितना कमीशन खाया है।
इससे केवल किसान ही नहीं, निम्न मध्यवर्ग और मध्यम वर्ग भी बुरी तरह प्रभावित होगा क्योंकि इससे खाद्यान्न और कृषि उत्पादों की मुनाफ़ाखोरी व बिचौलियों की एक नयी जमात पैदा हो जाएगी, जिसकी वजह से खाने-पीने की सब चीज़ें और भी महंगी हो जाएंगी। साथ ही भाजपा इन कंपनियों से चंदा वसूली भी करेगी, जिससे खाद्य व कृषि उत्पाद और भी ज़्यादा महंगे हो जाएंगे।
इससे धीरे-धीरे हमारे किसानों की खेतीबाड़ी और आय कम हो जाएगी और वो मजबूर होकर अपनी ज़मीन अमीरों व कारपोरेट को बेचने पर मजबूर हो जाएंगे। ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना ही भाजपाई और उनके संगी-साथियों का आख़िरी मक़सद है।
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SEED BILL
भारतीय खेती के लिए घातक ‘सीड बिल’ उसी कृषि और किसान विरोधी भाजपा सरकार की दिमागी उपज है जो :
- भूअधिग्रहण और काले-क़ानून लाई थी।
- जो हर साल खाद की लाइन में लोगों को लगाकर उनको अपमानित करती है।
- ये भाजपाई पहले बीज कंपनियों से कमीशन खाएंगे फिर…
- पेस्टीसाइड कंपनियों से,
- फिर महाभंडारण के लिए बनने वाले साइलो की कंपनियों से,
- फिर फ़सल बीमा कंपनियों से,
- फिर कम क़ीमत तय करते समय,
- फिर फ़सल की ख़रीद-फरोख्त करने वाले बिचौलियों से,
- भारतीय वातावरण में ऐसे सीड से खेती-किसानी पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।
- इसका संगठित रूप से पुरज़ोर विरोध होना चाहिए।
- एमआरपी और छुट्टा मवेशियों से परेशान किसान अब भाजपा सरकार की ज़्यादतियों को और नहीं सहेगा।
- ये भाजपाई खेती-किसानी को बर्बाद करने के लिए सब कुछ करेंगे क्योंकि ये वो लोग हैं जो ज़मीन के उत्खनन से लेकर खनन व उसकी पैदावार, सब पर गिद्ध निगाह रखते हैं और साल-दर-साल किसी न किसी रूप में किसानों पर वार करते हैं।
भाजपा किसान विरोधी थी, है और रहेगी।
भाजपा हटाओ और खेत, किसानी, किसान बचाओ!
महा समाचार : स्वतंत्र बने बंधक!
समाचार : भाजपा के विधायक बृजभूषण राजपूत ने क्षेत्र की बदहाल सड़कों, गांवों में पेयजल संकट और जल जीवन मिशन के अधूरे कार्यों को लेकर मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को बंधक बनाया।
विचार : हमने तो पहले ही कहा था कि भाजपा के ‘डबल इंजन’ ही नहीं डिब्बे भी आपस में टकरा रहे हैं। पैसे कमाने और ज़मीन क़ब्ज़ाने में लगे भाजपा के मंत्री हों या विधायक, इनमें से कोई भी जनता या विकास का काम नहीं कर रहे हैं। इसीलिए जनता के गुस्से से बचने के लिए वो एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। भाजपा के ही विधायक द्वारा, अपनी ही भाजपा सरकार के मंत्री को बंधक बनाना दर्शाता है कि भाजपा सरकार के विधायक अब अगले चुनाव में हारनेवाले हैं। वैसे ये न सोचा जाए कि ये इन दोनों के बीच की ही लड़ाई है, दरअसल ये तो केवल सैम्पल या कहें नमूना है, हर विधानसभा क्षेत्र में यही हाल है। इस बार भाजपा को चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी ही नहीं मिलेंगे।
भाजपा की सत्ता पटरी से उतर गई है।
एक बेचारा “अभागा” सवर्ण दरबारी कवि की कहानी....
• खुद लेक्चरर रहा
• पिता प्रोफ़ेसर रहे
• भाई VC रहे
• पत्नी RPSC की सदस्य रही
• बेटी ने लंदन के King’s College से पढ़ाई की
• इसी “अभागे” सवर्ण की पत्नी पर पेपर लीक इंडस्ट्री चलाने का आरोप है, मामला फिलहाल न्यायिक प्रक्रिया में है।
• इसी व्यक्ति के भाई के ख़िलाफ़ BA First Year में एडमिशन लेने वाली 13 छात्राओं ने VC को लिखित शिकायत सौंपी
शिकायत में आरोप थे कि
• छात्रों के साथ पक्षपात किया गया
• अपनी कथित अश्लील किताबों को बढ़ावा दिया गया
• छात्रों पर वे किताबें खरीदने का दबाव डाला गया
• आधी रात को कॉल कर छात्राओं को परेशान किया गया
शिकायत के बाद VC ने जांच कमेटी का गठन किया
• लेकिन जांच का नतीजा यह निकला कि पूरा दोष छात्राओं पर ही डाल दिया गया
• तर्क दिया गया कि “इंटरनल और एक्सटर्नल परीक्षा में
अपने अंकों से असंतुष्ट छात्राओं ने आरोप लगाए
एक बेचारा सवर्ण दरबारी।
“UGC लाकर गधों को घोड़ा बनाओगे।
तुम्हारी नस्लों की नस्लें टूटकर बिखर जाएँगी,
फिर भी तुम सवर्णों का रोआँ नहीं उखाड़ पाओगे।”
UGC के नए प्रावधान का विरोध कर रहे सवर्णों को बस आप सुन लीजिए।
बाक़ी, समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है।
आसान नहीं है #अखिलेश_यादव हो जाना
विपक्ष में रहने के बावजूद भी आदरणीय श्री अखिलेश यादव जी को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानने वाली सुश्री मायावती जी को बधाई ही नहीं बल्कि उनके संघर्ष की भी सराहना कर रहे हैं अखिलेश यादव जी।
#धन्य_हैं_अखिलेश_यादव