@Xena79199685@rajuparulekar Goal of IAC 1.0 = EVERY ONE SHOULD BELIEVE IN LIE -MM SINGH/SONIA/CONGRESS IS CORRUPT
Goal of IAC 2.0/CJP = EVERY ONE SHOULD BELIEVE IN LIE- MODI/SHAH/BJP IS NOT CORRUPT, Only some ministers/beurocrats are.
@chetana_cg First and foremost, Congress needs a committee of experts to conduct elections. In India, a person with just 11% vote can win elections. BJP crossed 272 with 30% vote in 2014. SP crossed 200 mark with 30% vote in 2012 UP election. Must create a Governance Model.
@chetana_cg It will be dirty, ugly, bloody and unpleasant, But things are different, destiny picks the time, destiny picks the body. Destiny will play.
12 saal Natwar Bharat ko pele hain
Ab khud pilne ka waqt aaya to roley hain
P.S.
This was my first venture in writing Urdu poetry. So please give me 'daad' to inspire and motivate me to write more
आज दुनिया हाईटेक तकनीक में रेयर अर्थ मेटल्स के महत्त्व को समझ रही है। इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों के लिए ये बेहद ज़रूरी हैं। इनके खनन से लेकर प्रसंस्करण और मैग्नेट निर्माण तक चाइना मोनोपॉली है।
ऑस्ट्रेलियाई व्यवसायी Craig Tindale ने भारत पर एक विस्तृत लेख लिखा है। लेख के एक हिस्से में उन्होंने नेहरू जी की दूरदर्शिता और भारत को औद्योगिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उनके प्रयासों का उल्लेख किया है।
हर भारतीय को समय निकालकर यह लेख ज़रूर पढ़ना चाहिए।
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24 दिसंबर 1952 को जवाहरलाल नेहरू ने अलुवा स्थित रेयर अर्थ मेटल कारखाने का उद्घाटन किया।
1952 में कोचीन में भारत के कुछ प्रतिष्ठित दूरदर्शी नेता भारतीय रेयर अर्थ्स कारखाने के उद्घाटन के अवसर पर एक साथ एकत्र हुए। यह तस्वीर कारखाने के भ्रमण के दौरान ली गई थी। कारखाने का उद्घाटन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था।
इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड की स्थापना 18 अगस्त 1950 को हुई थी। उस समय इसका संयुक्त स्वामित्व भारत सरकार और त्रावणकोर-कोचीन राज्य सरकार के पास था। इसका प्रमुख उद्देश्य मोनाज़ाइट रेत का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक प्रसंस्करण करना था। इसके लिए अलुवा में इसकी पहली इकाई, रेयर अर्थ्स डिवीज़न (RED), स्थापित की गई, जहाँ थोरियम प्राप्त किया जाता था। थोरियम एक रेडियोधर्मी तत्व है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से परमाणु ईंधन संबंधी अनुप्रयोगों में होता है।
अलुवा की यह पहल एक सोची-समझी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा थी।
प्रसिद्ध सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने 1956 से 1961 की दूसरी पंचवर्षीय योजना की रूपरेखा तैयार की थी। उन्होंने लिखा था कि “एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भारत को यथाशीघ्र उत्पादन के साधनों से संबंधित विदेशी आयात पर निर्भरता से मुक्त करना है।”
इस योजना में सार्वजनिक व्यय में उद्योग और खनिजों की हिस्सेदारी 4.9 प्रतिशत से बढ़ाकर 24.1 प्रतिशत कर दी गई।
अप्रैल 1956 में घोषित औद्योगिक नीति प्रस्ताव ने इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया। इसमें बुनियादी धातु उद्योग, भारी विद्युत उपकरण और ईंधन निष्कर्षण जैसे क्षेत्रों को सार्वजनिक उद्यमों के लिए आरक्षित किया गया। 1956 की सूची में तांबा, सीसा, जस्ता, टिन, मोलिब्डेनम और टंगस्टन को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था।
टंगस्टन एक अत्यंत घनी धातु है, जिसका उपयोग आधुनिक टैंक के गोले के कवच भेदने वाले अग्रभाग में किया जाता है।
सात दशक पहले ही भारत के कानूनों में उन सामग्रियों का उल्लेख था, जिन्हें आज गणराज्य बीजिंग की निर्यात लाइसेंस व्यवस्था के अधीन रहते हुए ख़रीदता है।
यह इतिहास भारत और हर भारतीय को याद दिलाना चाहिए कि वह क्या भूल चुका है।
दिसंबर 1791 में अलेक्ज़ेंडर हैमिल्टन ने अपनी रिपोर्ट रिपोर्ट ऑन मैन्युफैक्चर्स में इस निर्भरता के ख़तरे पर चर्चा की थी। उनका तर्क था कि वास्तविक स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय रक्षा से जुड़ी सभी आवश्यक भौतिक वस्तुओं का घरेलू उत्पादन ज़रूरी है।
1841 में फ्रेडरिक लिस्ट ने अपनी पुस्तक द नेशनल सिस्टम ऑफ पॉलिटिकल इकॉनमी में इस विचार को और स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि ब्रिटेन ने अपने विनिर्माण उद्योग को विकसित करने के लिए सरकारी संरक्षण का इस्तेमाल किया, लेकिन बाद में मुक्त व्यापार का उपदेश देकर दूसरे देशों के लिए औद्योगिक विकास का रास्ता कठिन बना दिया। उन्होंने इस रणनीति को “सीढ़ी को लात मारकर हटा देना” कहा।
हा-जून चांग ने 2002 में अपनी पुस्तक किकिंग अवे द लैडर का शीर्षक इसी विचार पर रखा। उन्होंने दिखाया कि आधुनिक औद्योगिक शक्तियों ने विकास की दौड़ में आगे बढ़ते समय सरकारी समन्वय और संरक्षण का इस्तेमाल किया, लेकिन बाद में गरीब देशों को खुले बाज़ार के फ़ायदे गिनाने लगीं।
भारतीय नीति-निर्माताओं ने इस इतिहास को समझा था, क्योंकि उन्होंने पश्चिमी विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया था। महालनोबिस और उनके कई सहयोगियों के पास कैम्ब्रिज की डिग्रियाँ थीं। उन्होंने विदेशी तकनीकों से सीखा, विदेशों से मशीनें ख़रीदीं, लेकिन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्य को देश के भीतर ही केंद्रित रखा।
जब कोई विकासशील देश बुनियादी धातु उद्योग में पूँजी लगाता है, विदेशी तकनीकी डिज़ाइनों की मदद से भारी इंजीनियरिंग कारखाने स्थापित करता है और आयातित वस्तुओं की कीमतों के दबाव से अपने घरेलू प्रसंस्करण उद्योगों को बचाता है, तो वह वास्तविक भौतिक आत्मनिर्भरता की नींव रखता है। बाज़ार आधारित आर्थिक सिद्धांत अक्सर इस आत्मनिर्भरता का सही मूल्यांकन नहीं कर पाते।
'हमने हिरासत में लिए गए कई लोगों की मदद की और उन्हें घर तक पहुंचाया'
दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया और दूर दराज़ के इलाके में छोड़ा.
ये लोग अपने घर तक वापस कैसे लौटें, इनकी मदद एक लड़का तकनीक के ज़रिए कर रहा है.
वीडियोः सुमेधा पाल और शाद मिद्हत
@Saif_HDS@ankurwriter There is simple explanation.
Elitist Closet Sanghis are every where. Even in Congress. They want bigger piece of pie and are well interconnected
MMS was kind and not vengeful. It was culture even Atal was like that.
But To defeat evil you need to be the devil in that moment.
@FullTosss@IndianExpress Politicians and Press never say anything directly unless they are 100% safe
-Rahul Gandhi is an exception
-Hence BJP spent crores to show him as Pappu since 2014
- But now he Pappu is fearless Batman, and affirmed target names including Doval(most powerful man in BJP/RSS govt)