@jagramvermaasp@hardoipolice@Uppolice कुलदीप द्विवेदी जी एक सामाजिक व्यक्ति हैं एवं उनपर मुकदमा दबाव बनाकर राजनीतिक द्वेष के कारण कराया गया ताकि एक छवि को धूमिल किया जा सके जबकि प्राथमिक जांच एवं पोस्टमार्टम में आत्महत्या की पुष्टि हुई थी
"मुसलमान 99% मांसाहारी होता है वो शुद्ध कहाँ से आ गया। फिर भी अगर काम(कारोबार) नहीं चल रहा है तो मैं तो कहता हूं सनातन धर्म अपना लो"
-एक सुन्नी की आवाज
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न सर्जरी न दवाइयां...लकवे का मरीज 4 हफ्ते में ठीक: इंदौर में पैरालिसिस का नई तकनीक से इलाज; बुजुर्ग का हाथ-पैर में नहीं था कंट्रोल
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शहादत अली पुलिस जवान है, बिना नंबर की गाड़ी लेकर स्कूल की बच्ची का पीछा कर रहा था, हिन्दू संगठन की महिला ने इसे पकड़ा और लखनऊ पुलिस के हवाले कर दिया, उत्तर प्रदेश पुलिस ने इसे तत्काल सस्पेंड कर दिया है, इस पर FIR कर दी गई है। जब तक ये जेल न भेजा जाए इसके ख़िलाफ़ आवाज बुलंद रखें।
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
अर्थ : जनक की बेटी, जगत् की माता और करुणानिधान की अत्यन्त प्यारी श्रीजानकीजी के दोनों चरण कमलों को मनाता हूँ । ध्यान करता हूँ : जिनकी कृपा से निर्मल मति की प्राप्ति हो ।
व्याख्या : जनक सुता और जानकी ये दोनों शब्द एक अर्थ के बोधक मालूम पड़ते हैं, पर यह बात नहीं है । गायत्रीसहस्रनाम में पठित जानकी नाम सदा से ही गायत्री माता का है । अत: जानकी कहकर ब्राह्मणों की इष्ट देवता गायत्री देवी कहा । जनक सुता कहकर उनका दिव्य जन्म कहा । जगजननि कहकर उनका सावित्री होना कहा । यथा : "आदिसक्ति जेहि जग उपजाया । सो अवतरिहि मोरि यह माया" । "अतिसय प्रिय करुना निधान की" कहकर उनका जगत्पिता : सविता : से अनादि सम्बन्ध सूचित किया । यथा : "प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई । कहँ चन्द्रिका चन्द तजि जाई" । उस महामाया के दोनों चरणों का ध्यान ग्रन्थकार करते हैं। बोलने में तो केवल चरणकमल कहने से काम चल जाता है, पर ध्यान करने में तो बड़ी सावधानी की आवश्यकता है । अतः "जुग पद कमल मनावों" कहते हैं । ये ही बुद्धि की प्रेरणा करनेवाली देवी हैं । अतः निर्मल मतिप्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं । अथवा श्रेय और प्रेय दोनों की प्राप्ति के लिए दोनों चरणों का ध्यान करते हैं ।
उपासना करने से यही देवी बुद्धिरूप में परिणत होकर मृत्युजाल से छुड़ा देती है । जब यह देवी प्रसन्न होती हैं तब सूर्य की भाँति चित्ताकाश में विचाररूपता को प्राप्त होती हैं । सबके हृदय में निवास करनेवाली इस देवी की कृपा हो, यही सबसे अधिक परम साधन है ।
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥
राजीवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक॥
अर्थ : फिर मैं मन, वाणी और कर्म से सब लायक रघुनायक के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ। जो कमलनयन धनुष बाण धारण किये हुए भक्तों की विपत्ति को दूर करनेवाले तथा सुख के देनेवाले हैं ।
व्याख्या : रघुनायक पद से रघुकुल में अवतार कहा । सबलायक पद से सर्व- शक्तिमान् कहा तथा चक्रवर्तीजी की अत्यन्त प्रीति कही । यथा : "भये राम सब विधि सब लायक" । "राजिव नयन" से सुन्दरता तथा कृपालुता कही । "धरे धनु सायक" पद से काल का भी नियन्ता ब्रह्म कहा । यथा : "लव निनेष परमान जुग वर्ष कल्प सर चंड । भजसि न मन तेहि राम कहँ काल जासु कोदंड" । "भगत विपति भंजन" पदसे दुष्कृतों का विनाश कहा और "सुखदायक" पद से साधुपरित्राण तथा धर्म- संस्थापन कहा ।
इसी चौपाई में सातों काण्डों की कथाओं का बीज निहित है । यथा रघुनायक पद से जन्म, नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत तक की कथा इङ्गित की । सबलायक पद से मखरखवारी, अहल्योद्धार, पिनाकभङ्ग, सीता-परिणय, पिताजी के यौवराज्य देने तक की कथा द्योतित की। राजिवनयन से बनवास । यथा : "राजिव लोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नाईं "। तथा मुनियों पर कृपा कही । "धरे धनु सायक" पद से "निसिचर हीन करौं महि" ऐसी प्रतिज्ञा करना कहा । "भगत विपति भंजन" पद से सूर्पणखा-नासिकाछेदन से रावणवध तक द्योतित किया । सुख दायक पद से राज्य कहा अर्थात् "राम राज बैठे त्रैलोका । हर्षित भये गये सब सोका "। तक की कथा ध्वनित की । इसी चौपाई में अवतार के सब कारण भी कहे । यथा : असुर मारि : भगत विपति भंजन : थापहि सुरन्ह : सुख दायक : राखहि निज स्रुति सेतु : रघुनायक । जग विस्तारहि विसद जस: सब लायक : राम जन्म कर हेतु ।
दो. गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥
अर्थ : वाणी और अर्थ, जल लहर जैसे अलग-अलग कहे जाते हैं पर अलग- अलग नहीं हैं, वैसे ही सीताराम पद है उनकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनको दुःखी अत्यन्त प्यारे हैं ।
व्याख्या : सीताजी की उपमा गिरा से, रामजी की अर्थ से, फिर सीता जी की उपमा वीचि (तरङ्ग) से और रामजी की जल से है एवं एक वार सीता को पहिले कहा दूसरी बार राम को पहिले कहा । अभेदार्थ दृढ़ करने के लिए । सीता राम हैं और राम ही सीता हैं । गिरा(१) अर्थ से मानसिक अभेद कहा और जल वीचि से तात्त्विक अभेद कहा। सीताराम पद कहकर यह दिखलाया कि वह ब्रह्म पद एक है । उसीका राम नाम से पुंलिङ्ग में व्यवहार होता है और सीता नाम से स्त्रीलिङ्ग में व्यवहार होता है । इसलिए कहने मात्र में भेद है, भेद कुछ भी नहीं । अथवा यह दिखलाया कि चरण में भी भेद नहीं । जो चिह्न रामजी के दक्षिण पद में हैं वे ही चिह्न सीताजी के वाम पद में हैं और जो चिह्न सीताजी के दक्षिण पद में हैं वे ही चिह्न रामजी के वाम पद में हैं । जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न कहकर रुचि में भी अभेद दिखलाया ।
(१) "एकस्यैवात्मनो भेदी शब्दार्थवत्पृथक् स्थितौ ।
प्रकाशकः प्रकाश्यस्व कार्यकारणरूपता ।" ~ वाक्यपदीये ।
अर्थ : परमार्थं दृष्टि से शब्द और और आत्मा ही अर्थ है । ब्रह्म प्रकाशक है और ब्रह्म ही प्रकाश्य है।
अर्थं अभिन्न हैं । आत्मा ही शब्द । व्यावहारिक दृष्टि से शब्द और अर्थ प्रकाशक प्रकाश्य रूप से कार्यकारणभाव में उपलब्ध होते हैं । इसीलिए कहा
हैं कि :
"दाम्पत्यं नैव लोकेऽस्मिन् विद्यते नैव लभ्यते ।
अलौकिकं हि दाम्पत्यं विद्यते रामसीतयोः ।"
अर्थ : न ऐसा स्त्री पुरुषभाव न लोक में है और न पाया जाता है, रामसीता का दाम्पत्य अलौकिक है ।
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