VIDEO | On RJD leader Tejashwi Yadav's Lok Bhawan march over last month's police action against NEET paper leak protesters, Jan Suraaj founder Prashant Kishor says, “He (Tejashwi Yadav) is the Leader of Opposition (in Bihar Assembly), and he should do it. That is his job. Sometimes he does it, but he should do it more often... It is a matter of great happiness that, across Bihar, instead of talking about caste and religion or five kilograms of free grain, people are now talking about jobs and employment. What could be better news than this?”
नितिन गडकरी अब
(ऑन 27.06.2026)
“पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से मेरा कोई लेना देना नहीं”
नितिन गडकरी तब
(ऑन 14.06.2026)
“मेरे लिए आज ख़ुशी का दिन है कि कल रात 8 PM बजे, मैंने 100% इथेनॉल के इस्तेमाल को क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी देने के लिए नियमों को फ़ाइनल करते हुए फ़ाइल पर साइन किए…”
माउंटेन ड्यू ऐड : डर सबको लगता है, गला सबका सूखता है
Video Courtesy @ANI
उम्र के जिस पड़ाव पर लोग घर की सीढ़ियां चढ़ने में भी दस बार सोचते हैं, वहां इस 73 साल की जांबाज महिला ने 11,500 फीट की ऊंचाई पर बसे बाबा केदार के दर पर दस्तक दे दी, वो भी किसी पालकी या हेलिकॉप्टर के वीआईपी ठाट-बाट से नहीं, बल्कि अपने नन्हे-नन्हे कदमों के दम पर. सोशल मीडिया पर दादी के इस 'स्वैग' और अटूट विश्वास के चर्चे चारों तरफ हो रहे हैं. महाराष्ट्र की 73 साल की एक बुजुर्ग महिला ने अपनी हिम्मत और भगवान के प्रति गहरी आस्था से सबको हैरान कर दिया है.
वीडियो क्रेडिट : piyushhhrai/IG
#Kedarnath #Maharashtra #Courage #Uttarakhand | #ZeeNews
जब गवई जी के बयान पर किसी ने बिल्कुल ऐसे ही पोस्ट किया था, तो उसपर SC/ST एक्ट लगा था!
अब पूछना ये है कि इनपर भी वही कानून लागू होगा?
या "शोषित-वंचित" का टैग मिलने की वजह से इनको कानून में भी आरक्षण है?
@GujaratPolice@AhmedabadPolice
CJI के अपमान पर इस लड़के पर कार्यवाही होगी?
वाह! वो इतना धुत्त था कि गुरुग्राम से कार चलाकर नोएडा तक आ गया..इतना धुत्त था कि डूबती कार से निकल कर उसकी छत पर आ गया..इतना धुत्त था कि पिता को कॉल कर लिया..इतना धुत्त था कि मोबाइल की लाइट जला कर मदद माँगता रहा.. नशे में धुत्त वो था या नोएडा का प्रशासन और तुम जैसे लोग??? डरो ऊपर वाले के "सुदर्शन" से 🙏 युवराज की जगह कोई तुम्हारा अपना होता तो भी प्रशासन की ऐसे ही चाकरी करते???
Imagine a doctor about to perform your surgery who couldn’t even score zero marks in exams.
Now imagine that person becoming a specialist with "Minus -40" marks and treating patients.
This is something you’ll only see in India.
"अगर अंतर्राष्ट्रीय कानून सिर्फ कमजोरों के लिए मायने रखता है, तो यूएन को बंद हो जाना चाहिए"
◆ कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा
#Maduro | #DonaldTrump | #Venezuela | #ShashiTharoor
रज़िया सुल्तान का उदाहरण बार-बार दिया जाता है, लेकिन पूरा सच जानना ज़रूरी है।
रज़िया सुल्तान इस्लाम की वजह से शासक नहीं बनी थी, बल्कि अपने पिता इल्तुतमिश की राजनीतिक मजबूरी और योग्यता की वजह से बनी थी। और इससे भी ज़्यादा अहम बात ये है कि—
उलेमा और इस्लामी समाज ने रज़िया को कभी स्वीकार नहीं किया।सिर्फ इसलिए कि वो औरत थी।इतिहास में साफ लिखा है कि अमीरों और मौलवियों को “औरत का शासन” इस्लाम के खिलाफ लगा।
रज़िया को मर्दों की तरह कपड़े पहनने पड़े, दरबार में पर्दा छोड़ना पड़ा, ताकि उसे “कमज़ोर औरत” न समझा जाए।अगर इस्लाम औरत को बराबरी देता, तो ये सब करने की ज़रूरत क्यों पड़ती?
चार साल के अंदर ही उसे हटा दिया गया और मार दिया गया।क्या इस्लामी समाज ने उसके हक़ में खड़े होकर कहा — “यह हमारी जायज़ शासक है”?नहीं।
इस्लामिक ग्रंथों में आज भी लिखा है:“जिस क़ौम ने औरत को अपना शासक बनाया, वह कभी कामयाब नहीं होगी”
(सहीह हदीस – बुख़ारी)
अब ज़रा दूसरा पक्ष भी देखिए:
भारत में इस्लाम से पहले भी रानियाँ, रीजेंट्स और महिला शासक थीं —काकतीय, चोल, अहोम, मराठा परंपरा में।
दुनिया के कई गैर-इस्लामी समाजों में महिलाओं को सत्ता मिली, धर्म के खिलाफ जाकर नहीं, समाज के समर्थन से।
👉 एक अपवाद को दिखाकर किसी विचारधारा को महान नहीं बनाया जा सकता।
अगर इस्लाम सच में औरतों को बराबरी देता, तो आज भी मुस्लिम समाजों में महिला शासक, इमाम, क़ाज़ी आम होतीं —
लेकिन हकीकत इसके उलट है।
रज़िया सुल्तान इस्लाम की जीत नहीं थी —
वो इस्लामिक सोच के बावजूद खड़ी हुई एक असाधारण औरत थी।
यही फर्क समझना ज़रूरी है।
वो अल जज़ीरा के कैमरे में कभी ना आयेगा, वो BBC की डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं बनेगा, वो किसी फैक्ट चेकर की हेट ट्रैकर में नहीं जुड़ेगा, वो किसी GenZ की इंस्टा स्टोरी तक नहीं पहुंचेगा
क्योंकि वो गाजा का का अब्दुल नहीं, एक गरीब हिंदू मां का मजदूर दीपू चंद्र दास था।