बिहार के राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह बिहार विधान परिषद में 12 सदस्यों का मनोनयन कर सकता है. मगर इसके साथ क्लाउज है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171(5) के अनुसरा राज्यपाल सिर्फ ऐसे व्यक्तियों को ही मनोनीत कर सकता है, जिनकी साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन या समाज सेवा में विशेष ज्ञान या अनुभव हो. मकसद यह था कि विधान परिषद में ऐसे विशेषज्ञों और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जगह मिले जो चुनावी राजनीति के इतर(यानी उस दबाव से मुक्त होकर) अपने अनुभव के आधार कानून निर्माण की प्रक्रिया में योगदान दे सके. संविधान में यह भी जिक्र है कि राजनीति या किसी राजनीतिक दल में योगदान को मनोनयन का आधार नहीं माना जायेगा.
अगर कम शब्दों में समझें तो राजनेताओं से इतर समाज के बुद्धिजीवियों, कलाकारों को भी विधान परिषद में जगह देने की बात थी. शर्त यह भी रखी गई थी कि जिनका मनोनयन हो उसके आगे इनमें से किसी योग्यता का जिक्र हो.
कल मैं दीपक प्रकाश के मनोनयन को लेकर जारी गजट देख रहा था. उसमें कहीं इस बात का जिक्र नहीं था कि वे साहित्यकार हैं, कलाकार हैं, वैज्ञानिक हैं, सहकारिता आंदोलन से जुड़े हैं या समाज सेवी. हालांकि समाज सेवी ऐसा टर्म है, जिसके भीतर कोई भी आ जाता है. आपने गरीबों में कभी कंबल बांट दिया तो हो गये समाज सेवी. मगर दीपक प्रकाश समाज सेवी हैं, यह भी नहीं कहा गया.
सच यह है कि मसला सिर्फ दीपक प्रकाश का नहीं है. बिहार विधान परिषद में इस वक्त उन्हें मिलाकर जो 12 सदस्य हैं, उनमें छह जदयू के हैं और अब तक छह भाजपा के थे, मगर अब दीपक प्रकाश अपनी पिता के पार्टी के सदस्य हैं. इनमें अगर बहुत खींच तान कर निकाला जाये तो दो लोग मिलते हैं, जो संविधान की भावना के अनुरूप हैं. उनमें एक रामवचन राय हैं, जो साहित्यकार हैं और दूसरे डॉ. राज्यवर्धन आजाद हैं, जो एक ख्याति प्राप्त आंखों के डॉक्टर हैं. शेष खांटी राजनेता है. कैसे, यह नामों की सूची पढ़कर देख लें.
1. अशोक चौधरी
2. जनक राम
3. राज्यवर्धन आजाद
4. राम वचन राय
5. संजय कुमार सिंह
6. ललन कुमार सर्राफ
7. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता
8. संजय सिंह
9. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी
10. घनश्याम ठाकुर
11. निवेदिता सिंह
12. दीपक प्रकाश
अब इनमें कोई इन दोनों के अलावा साहित्यकार, वैज्ञानिक हो तो मुझे नहीं मालूम. मगर इतना समझ आता है कि मनोनयन के मामले में राजनीतिक दलों ने मिलकर संविधान की भावना का कचरा कर दिया है. 12 सीटों को सत्ताधारी दलों ने अपने हिसाब से बांट लिया है और अपने लोगों को उपकृत करने का जरिया बना लिया है. इनमें भी ज्यादातर पोलिटिकल लोगों को भरा गया है.
हैरत की बात है कि इसी विधान परिषद में बटुकेश्वर दत्त जैसे स्वतंत्रता सेनानी, बाबूलाल मधुकर जैसे मगही कवि और सियाराम तिवारी जैसे तबला वादक का मनोनयन हुआ था. मगर ये गिने चुने नाम हैं. इस कोटे का ज्यादातर इस्तेमाल सत्ताधारी दल ही करते हैं. अगर ऐसा ही है तो क्यों न इस कोटे को खत्मकर दिया जाये और इसे भी चुनाव के जरिये भरा जाये? अगर नेता ही आयें तो चुन कर आयें. उन्हें मनोनयन की सुविधा क्यों मिले?