लेकिन सवाल अब भी खड़ा है—
क्या हम इतने नफ़रती हो चुके हैं
कि एक झूठ, एक पहचान, एक धर्म
किसी की जान लेने के लिए काफ़ी है?
अगर हाँ…
तो सच में हमारा समाज
गोबर की नाव पर ही चल रहा है।
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थोड़ी देर बाद
उसी गाँव के कुछ लोग सामने आए—
जिनसे पहले झगड़ा हुआ था।
उन्होंने बीच-बचाव किया और पूरी सच्चाई बताई।
तब जाकर भीड़ को समझ आया—
जिसे वे मार रहे थे, वह गुनहगार नहीं था।