दिल्ली एम्स में एक मां अपनी 2 साल की बेटी की जानलेवा बीमारी का इलाज कराने पहुंची। बीमारी का नाम (SMA type 1) जिसके इलाज में 9 करोड रुपए का खर्चा था।
मां ऑटो में बैठी सिसक रही थी कि अपनी बेटी के इलाज के लिए इतना पैसा कैसे इकट्ठा करेगी तभी वहां इस मां पर कुछ मुसलमान लड़कों की नजर पड़ती है। लड़के डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन मांगते हैं
दूसरे दिन लड़के जामा मस्जिद जाते हैं ऐलान करते हैं, बच्ची की बीमारी का... नमाजी निकलते हैं और बच्ची के लिए पैसे डोनेट करते रहते हैं। 6 करोड़ 33 लाख रुपए इकट्ठा हो जाता है।
ना कोई धार्मिक नारा लगाया जाता है, ना नाम पूछा जाता है, ना आधार कार्ड मांगा जाता है... बस मुसलमान खड़े होते हैं एक हिंदू बहन की बिटिया की जिंदगी बचाने के लिए....यही मेरा हिंदुस्तान है।
Had a talk with a lady who has nothing to do with movies or bollywood (in my relatives, met me first time & Don't know anything about me that I'm a salman fan), she told while watching reels related to #SalmanKhan, "aapko pata hai salman khan dil ke kitne bade insaan hai, ye logo ki itni madad karte or batate bhi nhi" and I was like, accha mam, details mai bataaye please, and she keep telling about him for next 10 min untill her little daughter interrupted.
At last I showed her my phone's wallpaper, then she got to know and she asked- aapko salman khan pasand hai?? I said- pasand, I damm love this man from the core.
But whenever some random or neutral public praise Salman in front of me, I feel so proud to be a fan of him.
जंतर मंतर से वापस चले जाओ , सब लूट गया है। मोदी को अपना राजा मान लीजिए, इसी में सबकी भलाई है!
क्या एक सन्यासी बड़ी सच्चाई बयान कर रहा ? आपकी राय क्या है कमेंट में बताए।
मेरे घर में चोरी करने वाला हिन्दू था , मेरी जमीन को हड़पने वाला हिन्दू था , मुझे मारने वाला हिन्दू था , जब मेरे पिता जी बीमार हुए तो ताली बजाने वाला हिन्दू था , बीमारी की वजह से जब मेरे पिता जी मर गए तो दाह संस्कार कैसे करूंगा मैं ये सोचकर हंसने वाला हिन्दू था और इन सभी परिस्थितियों से बाहर निकालने वाला मुस्लमान था , मुझे उस समय सहारा देने वाला मुसलमान था अब आप बताइए मैं नफरत किससे करूँ और मोहब्बत किससे करूँ - एक आम भारतीय हिन्दू। इस भाई की बात पूरे देश में पहुंचनी चाहिए। जिंदा हो तो करो रिट्वीट
ट्रेन में सफर कर रहे एक मुस्लिम बुजुर्ग काफी देर से भीड़ में खड़े थे, लेकिन कुछ तंदुरुस्त युवक सीट पर आराम से फैले बैठे रहे। तभी वहां मौजूद रेलवे पुलिसकर्मी संतोष की नजर बुजुर्ग पर पड़ी। उन्होंने बिना किसी बहस के युवकों को प्यार से थोड़ा खिसकाया और बुजुर्ग को इज्जत के साथ बैठने के लिए जगह दिलाई।
आज के दौर में ऐसी छोटी-छोटी इंसानियत ही समाज को खूबसूरत बनाती है, जहां वर्दी सिर्फ कानून नहीं बल्कि मानवता का फर्ज भी निभाती नजर आती है।