"अहम् बरह्मास्मि"
पानी नहीं, सम्मान की प्यास : "मनीषा पंचकम और आज का भारत"
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
(ईशावास्य उपनिषद् 1)
इस जगत का कण-कण ईश्वर से व्याप्त है। फिर अधिकार, शुद्ध-अशुद्ध, ऊँच-नीच का अहंकार किस आधार पर?
पानी न पीने देने का प्रश्न : प्यास नहीं, अपमान
भारत के इतिहास में जब “2000 साल से पानी नहीं पीने दिया गया” कहा जाता है, तो प्रायः यह तर्क दिया जाता है कि जल-स्रोतों की कमी तो थी नहीं, नदियाँ थीं, तालाब थे, कुएँ थे। यह तर्क आधा सच है, और आधा भ्रम।
समस्या पानी की नहीं थी; समस्या साथ बैठकर, एक ही मटके से पानी पीने के अधिकार की थी।
यह प्यास शरीर की नहीं, मानवीय सम्मान की थी।
अक्सर मैं पूछता हूँ, कुआँ तो शूद्र ही खोदता था, तो अपने लिए क्यों नहीं खोदा?
इस प्रश्न का उत्तर यही है कि प्रश्न संसाधन का नहीं, समानता के निषेध का था स्कूल, धर्मशाला, सार्वजनिक स्थानों पर अलग मटका, अलग गिलास, अलग स्पर्श।
जब अद्वैत के प्रणेता को मिला जीवित ज्ञान
वाराणसी की गलियों में एक सुबह, आदि शंकराचार्य गंगा-स्नान कर लौट रहे थे। तभी मार्ग में चार कुत्तों के साथ एक चांडाल आ गया। तत्कालीन छुआछूत की कुरीति के प्रभाव में शंकराचार्य के मुख से निकला,
“गच्छ गच्छ” (दूर हटो, दूर हटो)।
पर जो उत्तर मिला, वह केवल एक व्यक्ति का प्रत्युत्तर नहीं था, वह वेदांत का जीवित प्रश्न था:
“हे मुनिवर! आप किसे हटने को कह रहे हैं, इस अन्नमयी देह को? या उस चैतन्य को, जो सबमें एक है? क्या गंगा में दिखने वाला सूर्य का प्रतिबिंब और नाले में दिखने वाला प्रतिबिंब अलग-अलग हो जाता है?”
मनीषा पंचकम : भेद-भ्रम पर सीधा प्रहार
उसी क्षण वह प्रश्न श्लोक बन गया,
प्रत्यग्वस्तुनि निस्तरङ्गसहजानन्दावबोधाम्बुधौ
विप्रोऽयं श्वपचोऽयमित्यपि महान् कोऽयं विभेदभ्रमः।
(मनीषा पंचकम – भूमिका)
अर्थात्: शुद्ध चैतन्य के उस अथाह सागर में, “यह ब्राह्मण है, यह चांडाल है” यह भेद-भ्रम आया कहाँ से? क्या प्रकाश पात्र देखकर बदल जाता है?
शंकराचार्य स्तब्ध रह गए। वह जिन्हें स्वयं परब्रह्म, “अहं ब्रह्मास्मि” का पाठ पढ़ा रहे थे, उन्हें बोध हुआ कि “अहं ब्रह्मास्मि” के मूल सिद्धांत को जिया नहीं गया।
उन्होंने उसी क्षण उस चांडाल के चरणों में प्रणाम किया, और मनीषा पंचकम रूपी पाँच श्लोकों में अपना आत्मस्वीकार रखा।
शंकराचार्य की घोषणा : गुरु की जाति नहीं होती
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते…
चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥
"जो चेतना ब्रह्मा से चींटी तक सबमें व्याप्त है, वही मैं हूँ। जिसे यह बोध है, वह चाहे चांडाल हो या द्विज वही मेरा गुरु है। यही मेरी मनीषा है।
यह कोई भावुक क्षण नहीं था, यह सनातन दर्शन का नैतिक शिखर था।
कुरीति बनाम सनातन
जिस प्रकार सती प्रथा सनातन धर्म में हर विधवा के लिए अनिवार्य धार्मिक आदेश नहीं बल्कि, परन्तु क्षेत्रीय स्तर पर इसे कु प्रथा के रूप में जबरदस्ती अपनाया गया उसी प्रकार छुआछूत वैदिक दर्शन का धार्मिक आदेश नहीं ।
आज जब किसी दलित के गिलास से पानी पी लेने पर किसी “ब्रह्म” को क्रोध में उबलते देखते हैं, तो समझ लेना चाहिए,
यह सनातन नहीं, यह आत्मदंभ है।
यह वर्ण-व्यवस्था नहीं, मानवीय क्रूरता है।
यह राम के मानवीय मूल्यों का सीधा उल्लंघन है।
जो लोग स्वयं को श्रेष्ठ समझकर दूसरों को तिरस्कृत करते हैं, वे उसी संस्कृति की जड़ें काटते हैं जिसे बचाने का दावा करते हैं।
संसाधन, आरक्षण और असली समस्या
संसाधन और आरक्षण ये नीति, प्रशासन और संवाद के विषय हैं, समाधान संभव है।
लेकिन जब तक एक ही मटके से पानी पीने की समानता स्वीकार नहीं होगी, तब तक कोई कानून समाज को जोड़ नहीं पाएगा।
अंतिम आह्वान 🙏
इतिहास साक्षी है, जब समाज भीतर से टूटा, राष्ट्र कमजोर हुआ।
यदि जातिगत श्रेष्ठता का यह अहंकार यूँ ही चलता रहा, तो हम भौगोलिक विभाजन से पहले वैचारिक विखंडन का शिकार होंगे, और तब “56 देशों के बाद 57वाँ” बनना दूर नहीं।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
सनातन का अर्थ जड़ता नहीं, शाश्वत सत्य है।
और सत्य यही है कि हर घट में वही राम, वही ब्रह्म व्याप्त है।
आइए, मनीषा पंचकम को पढ़ें नहीं, जिएँ।
छुआछूत की इस मानसिक व्याधि से बाहर आएँ,
इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।
@InquisitiveS_ Mute कर के सही साबित नहीं होता।
अगली बार पर्सनल होने की जगह मुद्दे पर रहना।
जब चाहे डिबेट के लिए टैग कर देना मैं जरूर आऊंगा।
तुम जैसे थे 370 को कहते थे लिखा है तो छोड़ दो। बदला
आर्टिकल 30 भी बदलेगा, तुम जैसे पर्सनल होते रहना
mobbing.
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@X@elonmusk
X needs to change both its moderation behavior and its algorithm.
Today, coordinated mass-reporting by bot networks can get almost anyone suspended, regardless of whether they actually violated the rules. This is not community moderation; it is organized (1/2)👇
जाति जन्म से नहीं, कर्म से तय होती है। ब्राह्मण या शूद्र कोई जाति नहीं, बल्कि मानसिक और कार्मिक स्तर की एक 'अवस्था' है। आपका आचरण और आपकी बौद्धिकता ही तय करती है कि आप क्या हैं।
जैसा आचरण, वैसी पहचान।
@ArvindSinghUp मैं सूबे के निजाम से दरख्वास्त कार्य हु, कि, कौम की राह में कुर्बान हुए हमारे अजीज भाई की मजार मोईनुद्दीन चिश्ती की तरह किसी वक्फ की जमीन पर बना दी जाए।
और मुतवल्ली इनके बच्चों को बनाया जाये। चादर बेचने का काम मोहतरमा को दिया जाए।
औरंगजेब: टोपी सिलने वाला 'महान' बादशाह या क्रूर तानाशाह?
भारतीय इतिहास किस सबसे बड़ी विडंबना यह है कि, जब इसे राजनीति और तुष्टिकरण की स्याही से लिखा जाता है, तो सत्य सबसे पहले दम तोड़ता है।
भारत के मध्यकालीन इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास औरंगजेब 'आलमगीर' की वह छवि है, जिसे आधुनिक दौर के कुछ इतिहासकारों ने जबरन 'संत-बादशाह' (जिंदा पीर) साबित करने के लिए गढ़ा। हमें बचपन से एक नैरेटिव घुट्टी की तरह पिलाया गई, "औरंगजेब इतना सादा था कि शाही खजाने से एक पाई नहीं लेता था, वह अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए टोपियां सिलता था और कुरान की आयतें लिखता था।"
परंतु, इतिहास के पन्नों को पलटते ही यह तथाकथित सात्विक मुखौटा तार-तार हो जाता है। आइए, अकादमिक साक्ष्यों के प्रकाश में इस सफेद झूठ और तुष्टिकरण के नैरेटिव की धज्जियां उड़ाते हैं, साथ ही @rajkumarbhatisp जैसे व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी के ज्ञानी, इस्लामी वोट के लिए झूठे इतिहास को गढ़ने वाले नेताओं के लिए कुछ तीखे सवाल भी छोड़ते चलते हैं।
भाग 1: टोपी बनाम शाही हरम - "अयाशी और पाखंड का गणित"
सबसे पहला और बुनियादी सवाल उस आर्थिक पाखंड पर है जो औरंगजेब के 'निजी खर्च' के नाम पर बुना गया। मान लिया जाए कि वह स्वयं दो सूखी रोटियां और एक सादा कुर्ता अपनी सिली हुई टोपियों की कमाई से खरीदता था। लेकिन सवाल यह है कि:
शाही हरम का खर्च कौन उठा रहा था? दिलरास बानो बेगम, नवाब बाई, औरंगाबादी महल से लेकर हीरा बाई और उदयपुरी महल जैसी कनीजों, रखैलियों और हजारों दासियों का जो विशाल कुनबा महलों में पल रहा था, उसका खर्च कहां से आता था?
क्या यह टोपी सिल कर आ रहा था, या इसे औरंगजेब का निजी खर्च नहीं माना जाएगा, जो वो अपनी अय्याशी पर कर रहा था?
नौकर-चाकर किसे सेवा दे रहे थे?
हरम की सुरक्षा में तैनात अरबी, कजाकी, उजबेकी और अफ्रीकी महिला गार्ड्स, हिजड़े और सैकड़ों खानसामे क्या औरंगजेब के पड़ोसी के थे?
वे औरंगजेब के परिवार, उसकी बेगमों और उसकी शहजादियों को सेवा दे रहे थे। क्या वह औरंगजेब का 'निजी खर्च' नहीं था?
समकालीन इतिहासकार, साकी मुस्तैद खान की 'मासिर-ए-आलमगीरी' गवाह है कि औरंगजेब की बेटियों (जैसे जेब-उन-निसा) और बेगमों को सालाना लाखों रुपये का वजीफा (Allowance) और बड़ी-बड़ी जागीरें दी जाती थीं।
के ये प्रजा की सेवा में खर्च कहा जाएगा, या औरंगजेब का निजी खर्च?
असली सवाल तो ये है कि, जो बादशाह खुद को इतना सच्चा मुसलमान कहता था कि जनता के पैसे को हाथ नहीं लगाता, उसने अपनी कामुकता, अपनी पत्नियों, कनीजों और आलीशान महलों के रखरखाव के लिए शाही खजाने (बेत-उल-माल) के मुंह क्यों खोल रखे थे?
एक टोपी सिलकर महीने में कुछ आने कमाने वाले के हरम में सैकड़ों औरतें क्या कर रही थीं?
सौ टोपियां बेचकर भी उस दौर में एक बकरे का गोश्त नहीं खरीदा जा सकता था, तो महल के शाही बावर्चीखाने का खर्च क्या आसमान से टपकता था?
साफ है, यह केवल कट्टर इस्लामी कट्टरपंथियों को रिझाने के लिए किया गया एक राजनीतिक ढोंग था।
भाग 2: मजहबी उन्माद, मंदिरों का विध्वंस और मूर्तियों का वीभत्स अपमान
औरंगजेब कोई उदार शासक नहीं, बल्कि एक मजहबी आक्रांता था। अकबर और शाहजहां के दौर की बची-खुची धार्मिक सहिष्णुता को कुचलते हुए उसने जो तांडव मचाया, उसके प्रमाण खुद मुगल दस्तावेजों में दर्ज हैं:
काशी, मथुरा और सोमनाथ पर प्रहार: 9 अप्रैल 1669 को जारी एक शाही फरमान के जरिए उसने हिंदुओं के सभी स्कूलों और मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। 'मासिर-ए-आलमगीरी' के अनुसार, वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा का केशवदेव मंदिर (जिसकी भव्यता का लोहा विदेशी यात्री बर्नियर ने भी माना था) को जमींदोज कर दिया गया।
मूर्तियों का वीभत्स अपमान: इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि मथुरा के मंदिर को तोड़कर उसकी भव्य, रत्नजड़ित मूर्तियों को आगरा ले जाया गया और उन्हें 'जहानआरा बेगम मस्जिद' की सीढ़ियों के नीचे दफनाया गया, ताकि मुसलमान नमाज पढ़ने जाते समय अपने पैरों से उन हिंदू आराध्यों को रौंद सकें। क्या कोई 'संत' ऐसा घिनौना कृत्य कर सकता है?
भाग 3: जजिया कर और संगठित धर्मांतरण का घिनौना तंत्र
साल 1679 में औरंगजेब ने हिंदुओं पर दोबारा 'जजिया कर' (Jizya Tax) थोप दिया। यह केवल टैक्स नहीं था, बल्कि हिंदुओं को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ने का एक हथियार था।
खाफी खान अपनी किताब 'मुंतखाब-उल-लुबाब'* में लिखता है कि जब दिल्ली में हजारों हिंदू इस काले कानून के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए, तो औरंगजेब ने उन पर शाही हाथी चलवा दिए और उन्हें बेरहमी से कुचलवा दिया।
लालच और तलवार से धर्मांतरण: औरंगजेब के काल में धर्म परिवर्तन के लिए बकायदा 'इनाम' तय थे।
(1/2)
@khanumarfa@khanumarfa जिस 5000 साल की सभ्यता का मजाक बनाने की कोशिश की उसके धर्मग्रन्थ ये नहीं कहते, मतलब ये व्यक्तिगत अपराध है, सभ्यता का हिस्सा नहीं।
पर कुरान सुरा निसा आयात 24, सुरा मोमिन आयात 5-6, और कुरान 33:50 जैसी आयतों में अल्लाह ने औरतों को गुलाम बना कर हमबिस्तर होने की इजाजत दी
@khanumarfa@khanumarfa जिस 5000 साल की सभ्यता का मजाक बनाने की कोशिश की उसके धर्मग्रन्थ ये नहीं कहते, मतलब ये व्यक्तिगत अपराध है, सभ्यता का हिस्सा नहीं।
पर कुरान सुरा निसा आयात 24, सुरा मोमिन आयात 5-6, और कुरान 33:50 जैसी आयतों में अल्लाह ने औरतों को गुलाम बना कर हमबिस्तर होने की इजाजत दी
नॉर्वे में महिला पत्रकार ने PM मोदी से पूछा- आप विश्व के सबसे आजाद प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?
नॉर्वे प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नंबर 1 है.
मोदी ने महिला पत्रकार के सवाल को नजरअंदाज किया और वहां से निकल गए.
अगर ये पत्रकार भारत में होती तो क्या होता?
ये मात्र एक आम घटना नहीं है, ये 1400 साल पुरानी उस कुरीति से उपजा असंतोष है जिसे इस्लाम (मर्दों का मजहब) छोड़ना नहीं चाहता।
पूरी दुनिया से पर्सनल लॉ और शरीयत काउंसिल समाप्त कर एक देश एक कानून को लागू करना अत्यंत आवश्यक है।
#यूसीसी लागू करो।
#islam
अब इस बेवकूफ को कौन बताए कि कच्चा तेल जो कीचड़ का स्वरूप होता है, उसके संवर्धन की कॉस्ट क्या होती है, फिर ट्रांसपोर्टेशन, इंश्योरेंस प्रीमियम, डीलर कमीशन, राज्य और केंद्र अधिभार।
ये बेवकूफ अर्थशास्त्री बने घूम रहे हैं।
@CommonBS786OM मदरसे की पढ़ाई में नंबर्स तो दिखते हैं मगर गणित समझ नहीं आती।
इन सभी देशों में तेल के खुदरा दाम भारत से अधिक हैं।
भारत जो बेचता है वो राज्य के वैट और केन्द्रीय टैक्स अधिभार के बिना होता है।
कभी कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल सरकार से तेल के अधिक दाम की वजह पूछो
@CommonBS786OM मदरसे की पढ़ाई में नंबर्स तो दिखते हैं मगर गणित समझ नहीं आती।
इन सभी देशों में तेल के खुदरा दाम भारत से अधिक हैं।
भारत जो बेचता है वो राज्य के वैट और केन्द्रीय टैक्स अधिभार के बिना होता है।
कभी कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल सरकार से तेल के अधिक दाम की वजह पूछो
@CommonBS786OM उर्फ अब्दुल, ईरान में महंगाई 200% पार कर रही है, ईरान का सेंट्रल बैंक कह रहा।
खेमनई का नाम एपस्टीन में इस लिए नहीं है क्योंकि वहां छोटी बच्ची से निकाह की इजाजत है, वो इसे अपराध नहीं मानते
इस्लाम में छोटी बच्ची (लम यहीज़्न) से निकाह जायज (कुरान सुरा 65: 4)