मुदते बीती
हिजऱ कि बाते भी अपनी ,अंतिम राह पर थी|
खूबसूरती ,अदाएं ,तेरी इबादतों की इमारतें टूटने की आखरी सांस पे थी।
वो अंधी मुलाकाते मूदतो के सूरज से ,अंधेरे की तरह छिप सी रही थी।
तभी एक रोज़ उसी बाज़ार में खनकने की आवाज़ आई ,अब वो चूड़ी थी कि तेरी बुलावे की इसका तो अगास नहीं।
फसेगा पछतावे के बेड़ियों में
गुमसुम रहेगा इक्छाओ की यादों में।
जिंदगी आसान कटेगी
और बारिश फिर भी होगी पर तू भीगेगा नहीं।
सबेरा तेरे यहां भी होगा
पर तू बाहर निकलेगा नहीं।
तो फिर करजा काम वो
जो सोचता है काश हो।
मुझे लगता है और शायद ऐसा है भी
की मैं सबमें देर कर देता हूं
बात वो चाहें बीते हुए कल की या अभी की
कभी-कभी हवा में धूल सा मिलता हूं तो
कभी-कभी हवा सा लुप्त होजाता हूं
और हर प्रयास के बाद खुदको
उन रात के काले बादलों में चांद पाता हूं।
~सब बिन-मतलब की बातें
चयन करू हर बात मैं
दुर्लभता की आस मैं
तलाश करूं वो चोट मैं
खाई नहीं जो प्रयास मैं
कहानी बस शुरुआत की हैं
प्रयास के आगाज़ की है
चाहे दोनो कदम जाना एक दूसरे से आगे
लेकिन आलस की बेडियो से
शुरुआत के कदम लड़खड़ाए।
एक बात की राय थी मेरी
खड़ा था मैं उसी स्थान पर
जिस ढंग-ढंग की किताबे मिली
बदलता गया राय मैं।
तभी ध्यान आई बात एक, सही हो राह की राय
फिर किबाते पढ़ना छोड़ा मैंने
किबातो की राय को धकेला मैने
राह पर निकला अकेले, चलते-चलते राय मेरी माथे के लकीरों से बनने लगी।
डूबी हुई सी रात है
बेबुनियाद बात है
उस बात की हालत जीभ तक पहुचके
एकदम बेस्वाद है
नींद जो बीच रास्ते मे,आंखों तक पहुचने के आस मे
अंगड़ाई लेते हुए करवट बदलते हुए सोचा
आज क्या क्या हुआ,आज क्या क्या होगा।
इन दोनो आज में फ़र्क ज्यादा नहीं है बस उतना ही है जितना उस बात और असलियत में।
जीवन की शैली बिगाड़ के...
अभिलाषाओं की नाव का रास्ता भुला के
टिमटिमाते तारो को सत्या मान के
कुछ ना करने की इक्छा स्वार के
बहुरूपिए कल्पनाओं को ले के
दूसरो की बातें कटाक्ष सी लगती हैं....!
शायद एक बात ये भी है वो शैली नहीं, एक घिसा पिटा उपाय हो बस, जीवन जीने का ?
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~ मैं
बात कुछ ऐसी है..
इच्छुक हूं..
ठानने के प्रयास में हुं..
कल्पनाओं की सीढ़ियां चढ़ने लगा हूं..
और हां खुश तो खेर हू ही मैं
नहीं भी होता तो क्या ही बात थी..
बस करने ही जा रहा हूं।
अभी करता हु बस ये नया एपिसोड अभी आया, देख लूं..
इसके बाद पक्का करूंगा।
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•शुरुआत 🤝 अंत
- आलोक
एक बरस में एक बार ही
जगती होली की ज्वाला‚
एक बार ही लगती बाजी
जलती दीपों की माला‚
दुनियावालो किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो‚
दिन को होली‚ रात दिवाली‚
रोज मनाती मधुशाला!
– हरिवंश राय बच्चन (मधुशाला)
https://t.co/LI08goc3wv @SrBachchan
Incomplete information/knowledge always sucks...
आधी जानकारी , जानलेवा होती है।
If you're reading somthing or learning , do it at last , don't skip otherwise परिणाम घातक होगा ।
🦋#Peace