राजकमल प्रकाशन @RajkamalBooks से शाया हिन्दी-उर्दू के प्रसिद्ध अदीब #राही_मासूम_रज़ा के चार उपन्यास।
1. आधा गाँव
2. टोपी शुक्ला
3. कटरा बी आर्ज़ू
4. नीम का पेड़
#किताबें
कितना भी पुराना और पवित्र रहा हो राष्ट्र शब्द का इतिहास
पर आज पता नहीं क्यों बार-बार
यह शब्द एक भारी भरकम बनाई गई ऐसी अस्वाभाविक
डरावनी आवाज़ लगता है जो सत्ता और शक्ति के
अहंकार में न जाने किसको
ललकारने के लिए उपजी है।
|| भगवत रावत ||
#कविता#पंक्तियाँ@avinashonly
राहत ने ग़ज़ल के हाशिए में पड़ी भाषा और मुंहफट चरित्रों को सत्ता के सामने लाकर खड़ा कर दिया. राहत से पहले भी शायरी ने सत्ता का मुंह नोच लेने की कोशिश की, लेकिन राहत की ग़ज़लें ज़रा ज़्यादा मुंहफट साबित हुईं
फ़ैयाज़ अहमद वजीह @FaiyazWajeeh@rahatindori
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अगर उन्होंने बंदूक़ का आविष्कार न किया होता
तो कितने लोग, दूर से ही,
मारे जाने से बच जाते।
कई सारी चीज़ें आसान हो जातीं।
उन्हें मज़दूरों की ताक़त का अहसास दिलाना भी
कहीं ज़्यादा आसान होता।
कवि : सबीर हका
अनुवाद : गीत चतुर्वेदी @GeetChaturvedi@rekha_bhardwaj@avinashonly
राजकमल प्रकाशन @RajkamalBooks से शाया मुक्तिबोध सम्बंधी चार महत्वपूर्ण किताबें :
1. मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में (कृष्णा सोबती)
2. मुक्तिबोध के उद्धरण : (प्रभात त्रिपाठी)
3. प्रतिनिधि कविताएँ : (गजानन मा. मुक्तिबोध)
4. प्रतिनिधि कहानियाँ : (गजानन मा. मुक्तिबोध)
एक बराबरी वाले समाज में ही प्रेम अपने सच्चे रूप मे विकसित हो सकता है तथा इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया में तब्दील कर सकता है. प्रेम और शादी का अधिकार हमारा संवैधानिक हक है और व्यक्तिगत निर्णय.
|| सुजाता || @Sujata1978
प्रतिष्ठित वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता ग़ुलाम नबी हागरू 1972 के पहले चुने गए विधायकों को “मेड बाय ख़ालिक़” कहते थे–उस चुनाव अधिकारी का नाम अब्दुल ख़ालिक़ मलिक था जो विरोधियों के पर्चे खारिज़ कराने में माहिर था।
|| अशोक कुमार पाण्डेय || @Ashok_Kashmir
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अरसे बाद हिंदी में ऐसा ‘पीरियड नॉवेल’ आया है जो पठनीय है और वर्तमान-इतिहास से आंख मिलाकर देखने को मजबूर करता है। ऐसे समय में, जब हर तरफ सत्ता और बहुसंख्यकवाद के वर्चस्व का तमाशा हमारे सामने है।
|| प्रियदर्शन || @priyadarshanp@vandanarag@RajkamalBooks
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इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण, मनुष्य के जन्म, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण, दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है ।
हुंकार, विहान, स्वाभिमान, राष्ट्र, दहाड़
जैसी शब्दावली डराने लगी है
भाषा और संस्कृति के पेंच में फंसाकर
आप एक
आभासी भय की संरचना करेंगे
और एक दिन
दंगाई बना देंगे मुझे।
|| हरिओम राजोरिया || @Hariom_Rajoria#कविता#शब्दानुसार_पंक्तियाँ
क्या समय है कि
किसी के पास
अपने लिए समय ही नहीं,
दूसरों के लिए इफ़रात में अपना समय
गँवाए जा रहे हैं!
हम घण्टों खड़े रहते हैं
सिर्फ तालियाँ बजाने को।
वे हेलीकाप्टर से आते हैं
भेड़िए की तरह गुर्राते हैं
और बाज की तरह फुर्र से उड़ जाते हैं।
|| मानबहादुर सिंह ||
काफी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमंड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी।
|| वीरेन डंगवाल ||
परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वास और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है।
|| ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ ||
किताब : जब ज़ंजीरें टूटेंगी (क्रांतिकारी कवि पाश की श्रेष्ठ कविताएँ
संपादक : चमनलाल @ProfChaman
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हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए
#पाश
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@Ashok_Kashmir@Arjun_Mehar