🚨घोषणा🚨
एक नाम बदला है,
मगर एहसास वही हैं।
ट्विटर साहित्य अब एक नई पहचान के
साथ आपके सामने है—
“शब्दकुंज साहित्य”
नाम नया है, मगर शब्दों से रिश्ता वही है।
वही कविता, वही शायरी, वही जज़्बात
बस एक नया आशियाना।
शब्दकुंज साहित्य
जहाँ शब्द सिर्फ़ पढ़े नहीं, महसूस किए जाते हैं।
अजब चिराग़ हूं दिन-रात जलता रहता हूं
मैं थक गया हूं हवा से कहो बुझाए मुझे
मैं चाहता हूं के तुम ही मुझे इजाज़त दो
तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे
—• बशीर बद्र
तुम देख रहे हो मुझको‚ जहाँ खड़ा हूँ
तुम देख रहे हो मुझको‚ जहाँ पड़ा हूँ
मैं ऐसे ही खंडहर चुनता फिरता हूँ
मैं ऐसी ही जगहों में पला–बढ़ा हूँ
—• भवानीप्रसाद मिश्र
इसी से जान गया मैं कि बख़्त ढलने लगे
मैं ��क के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे
मैं दे रहा था सहारे तो इक हुजूम में था
जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे
—• फ़रहत अब्बास शाह