जैसे उस लड़के की नौकरी गयी है इस महिला की नौकरी जानी चाहिए,
Sejal pawar ने तो अपने प्रोफेशनल मॉरल का मज़ाक उड़ाया है, कम से कम दो साल के लिए इनका सर्टिफिकेट रद्द हो @IMAIndiaOrg
Assam and Bengal are clear cases of the election being stolen by the BJP with the support of the EC.
We agree with Mamata ji. More than 100 seats were stolen in Bengal.
We have seen this playbook before:
Madhya Pradesh.
Haryana.
Maharashtra.
Lok Sabha 2024 etc
चुनाव चोरी, संस्था चोरी - अब और चारा ही क्या है!
மக்கள் தீர்ப்பைத் தலைவணங்கி ஏற்கிறோம். வெற்றி பெற்றவர்களுக்கு வாழ்த்துகள்!
கடந்த ஐந்தாண்டு காலத்தில் ஏராளமான திட்டங்களை உருவாக்கி, தமிழ்நாட்டு மக்களுக்கு நல்லாட்சியை வழங்கினோம். தமிழ்நாட்டை அனைத்து வகையிலும் உயர்த்தினோம். தேர்தல் களத்தில் எங்களது சாதனைகளைச் சொல்லியே வாக்குகளைக் கேட்டோம்.
மக்களுக்குச் செய்து கொடுத்த நலத்திட்டங்கள் தொடருவதற்கு வாக்கு கேட்டு நாங்கள் பரப்புரை செய்தோம்.
திராவிட முன்னேற்றக் கழகத்தின் தலைமையிலான மதச்சார்பற்ற முற்போக்குக் கூட்டணியை ஆதரித்து வாக்களித்த தமிழ்நாட்டு மக்கள் அனைவருக்கும் நான் எனது மனமார்ந்த நன்றியைத் தெரிவித்துக் கொள்கிறேன்.
வாக்களித்தவர்களுக்கு மட்டுமல்ல, வாக்களிக்க மறந்தவர்களுக்கும் சேர்த்தே ஆட்சி நடத்தினேன்.
அனைத்து மக்களுக்கும் உண்மையாக இருந்தேன். நான் எனது மனச்சாட்சிப்படியே செயல்பட்டேன்.
நான் எனது சக்தியை மீறி உழைத்தேன். என்னைப் போன்றே களத்தில் உழைத்த என் உயிரோடு கலந்திருக்கும் தலைவர் கலைஞரின் அன்பு உடன்பிறப்புகள் அனைவருக்கும் எனது நெஞ்சார்ந்த நன்றி!
எங்களோடு தோளோடு தோள் நின்ற தோழமை இயக்கத் தலைவர்கள், நிர்வாகிகள், தொண்டர்கள்
அனைவருக்கும் நன்றி !
எனது அரசியல் பொதுவாழ்வில் அதிகப்படியான வெற்றியையும் பார்த்துள்ளேன்; தோல்விகளையும் சந்தித்துள்ளேன்.
எனவே இலட்சியமும் கொள்கையும்தான் முக்கியமே தவிர, வெற்றி தோல்விகள் மட்டுமல்ல என்று செயல்படக் கூடியவன் நான்.
அதனால் திராவிட முன்னேற்றக் கழகத்தின் அரசியல் பயணம் தொய்வில்லாமல் தொடரும்.
இதுவரை மக்களுக்காகச் சிறப்பான ஆளும்கட்சியாகச் செயல்பட்ட தி.மு.க. - இனி சிறப்பான எதிர்க்கட்சியாகச் செயல்படும்.
This morning, I was reading Chapter 15 of the Bhagavad Gita. One thought stayed with me. “Have courage. Stay humble. Do your duty without attachment.” Life tested this.
Some years ago, Shri Jaiprakash Gaur, who built Jaypee Group, came to meet me in London. He had built an empire over his lifetime with hard work and vision. He reached out more than once. He wrote to me. His only wish was simple that what he had built should go into safe hands and be taken forward with the right intent. He even wrote me letters in Hindi, in his own words, expressing his trust. At that time, we could not proceed.
Recently, the asset went into a public auction by CoC in the IBC process. Many strong bidders participated. Suddenly, the sentiment and wishes of Jaiprakash Gaur ji came rushing back to me. One by one, everyone dropped out of the bidding. Finally, we were declared the highest bidder publicly.
It was a transparent process. We were informed in writing that we had won. But life is never so simple. After some days, the decision was changed. Don’t want to go into the details. That is for the right forum. But I want to share something from my heart.
We have no attachment to this asset. If it comes, it is God’s grace. If it goes, that is also his wish. But one thing we believe strongly. When something is promised in dharma, it should not be taken back. In our scriptures also, we see this again and again. Truth, commitment, and fairness are above everything.
So, what should one do? Gita gives a simple answer - do your duty, with courage, but without anger or attachment. That is what we will do. We will place the facts in the right way. We will follow the right path.
Rest, I leave to God.
Dear @ECISVEEP,
In a letter shared to by you to all states and UT the seal of @BJP4Keralam’s seal is found.
Are you operating out of BJP’s office? How did you get access to their seals?
Or is it BJP’s letter to all Electoral Officers with your letterhead? Can you explain this?
कुछ स्वार्थी मीडिया हाउस भी चाहते हैं कि परिवार टूट जाएं और लोग अकेले पड़ जाएं जिससे अकेले लोग अलग-अलग घरों में रहें और उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिले, हर किसी का अपना टीवी, फ्रिज और बाक़ी सामान हो जिसकी बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियाँ अपना विज्ञापन करें और इनको विज्ञापन के लिए पैसे देकर, इनका ख़ज़ाना भरें। ये मीडिया हाउस बताएं कि ‘प्रायोजित समाचार, फ़ेक न्यूज़, एजेंडा-प्रोग्राम चलाने की दानापोषी व विज्ञापनों से कमायी गई अपनी अरबों की कमाई में से इन्होंने कितना परिवार को दिया और कितना अपने एम्प्लॉयीज़ को।
इन मीडिया हाउस और उनके पोषकों के अंदर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिए कि जो लोग अब दुनिया में नहीं हैं उनको सम्मान के साथ प्रदर्शित करें। दिवंगतों के प्रति सम्मान की भावना रखना हमारी सांस्कृतिक परंपरा रही है। इन जैसे धनलोभी मीडिया हाउसों से पत्रकारिता के मान, मूल्य, मर्यादा और सैद्धांतिक सीमाओं की अपेक्षा करना तो व्यर्थ है लेकिन अपने देश की सांस्कृतिक पंरपरा की निरंतरता की रत्ती भर उम्मीद तो की जा सकती है या इनमें इतनी भी नैतिकता नहीं बची कि कम-से-कम गुज़रे हुए लोगों को तो अपनी ख़ुदगर्ज़ी का शिकार न बनाएं। सम्मान नहीं कर सकते तो अपमान भी न करें! क्या इस अपमान का आधार ये है कि ऐसे लोग शोषित-वंचित समाज से आते हैं?
अब पीडीए नहीं सहेगा, खुलकर कहेगा!!!
हर परिवारवाले के दुख, दर्द, तकलीफ़ को अपना माननेवाला… हर परिवार की तरक़्क़ी, ख़ुशहाली और परिवारों से मिलकर बननेवाले समाज में अमन-चैन चाहनेवाला…
आपका
अखिलेश
बदलाव के लिए ऐतिहासिक वोटिंग करने के लिए बिहार के हर मतदाता को बधाई और नयी प्रगतिशील नौकरी देनेवाली महागठबंधन सरकार बनने के लिए अग्रिम बधाई!
सत्ता पक्ष द्वारा पहले से तैयार कुछ झूठे एग्जिट पोल गुमराह कर रहे हैं। ‘जिनका दाना, उनका गाना’ के कारण जानबूझकर एग्जिट पोल से भ्रम फैलाया जा रहा है। जब चुनाव आयोग मतदान के कई दिनों तक वोटों का आँकड़ा नहीं दे पाता है तो ये चैनल कैसे एक घंटे में सब बता देते हैं। इनके झूठ के ग्राफ़िक्स कई दिनों पहले से तैयार हो जाते हैं, जहाँ से भोजन-पानी का इंतज़ाम होता है ये झूठे चैनल उसकी पंगत में जा बैठते हैं। जिनको लगता भी है कि ये एग्जिट पोल सही हैं वो उप्र के लोकसभा के चुनाव का एग्जिट पोल देख लें जहाँ बड़े-बड़े भाजपाई सूरमाओं की हार हुई और फ़ेक एग्जिट पोलों की भी।
दरअसल भाजपाई तंत्र भ्रम फैलाकर गिनती के समय दूसरों को हतोत्साहित करना चाहता है, जिससे लोग ज़्यादा ध्यान न दें और ये भाजपाई और उनके गुर्गे चुनावी गिनती में गड़बड़ी करनेवाली अपनी ‘चंडीगढ़ी चाल’ चल सकें।
महागठबंधन के हर दल, हर प्रत्याशी, हर कार्यकर्ता और हर समर्थक से हमारी ये अपील है कि आप सब पूरी तरह चौकन्ने रहें और किसी भी घपले-घोटाले को होने से रोकें। जहाँ मशीनें रखी हैं वहाँ चौकसी करें और चौबीसों घंटे निगरानी रखें। महागठबंधन जीत रहा है, इसीलिए जीत का सर्टिफिकेट लिए बिना चैन की साँस न लें।
याद रखें: हमने अवध में हराया था, आप मगध में हरा रहे हैं।
विजय का सूत्र : जब तक जीत का प्रमाण नहीं, तब तक विश्राम नहीं।
भाजपा जनता के लिए भारी बोझ बन गयी है। जिस दिन भाजपाई भ्रष्टाचार की पोटली को जनता तोल देगी, उस दिन भाजपा पटरी से उतर जाएगी… और अब वो दिन बहुत दूर भी नहीं।
रेल में यात्रियों के सामान को तोलने के नाम पर भ्रष्टाचार का एक और अध्याय खोला जा रहा है। ये फ़ैसला ग़रीबों के ख़िलाफ़ है, जो AC-1 में जा रहा है, उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है लेकिन उस ग़रीब से पूछो जो साल में एक-दो बार घर-गाँव जाता है और वहाँ से अपने साथ दाल-चावल-राशन बाँधकर लाता है। अब क्या ग़रीब मज़दूर-किसान की थाली का खाना भी भाजपा छीन लेना चाहती है। पैसे की भूखी भाजपा को जो वसूलना है वो AC-1 और AC-2 तक के लोगों से वसूले न कि जनरल, स्लीपर या AC-3 वालों से। अगर भाजपा सरकार के शासनकाल में रेलवे का ख़ज़ाना पूरी तरह खाली हो गया है तो वो अपने सांसदों-विधायकों से कहे कि वो लोग अपने मुफ़्त के पास छोड़ दें। भाजपा के भ्रष्टाचार ने रेलवे को खोखला कर दिया है।
ये फ़ैसला वापस नहीं हुआ तो जनता भाजपा की वापसी का टिकट वक़्त से पहले काट देगी।
जो गरीबों का बोझ न उठा सके ऐसे डबल इंजन पर धिक्कार है।
शर्मनाक निर्णय!
भाजपा जाए तो रेल पटरी पर आए।
Why is ECI refusing to share the voter list in digital, machine readable format ? Isn’t that a basic thing in #DigitalIndia ?!
Don’t be surprised if ECI flags ‘national security’ for not sharing digital, machine readable format of voter list !
इसका खंडन आएगा, तभी आएगा जब फोटो के लिए नया सूट सिल कर आ जाएगा। चुनाव आयोग की इस हालत को देख कर सारे कमेडियन को BLO बन जाना चाहिए। वे अपनी कॉमेडी से जितना हँसा नहीं पाए होंगे, उतना BLO बनकर हँसा पाएंगे।
चुनाव आयोग ने जिन 𝟔𝟓 लाख मतदाताओं के नाम विलोपित किए है उससे संबंधित हमारे कुछ वाजिब एवं तार्किक सवाल है। क्या @𝐄𝐂𝐈𝐒𝐕𝐄𝐄𝐏 इसका बिंदुवार जवाब देगा?
𝟏. इन 𝟔𝟓 लाख मतदाताओं को मृत, स्थानांतरित या अनुपस्थित घोषित करने का आधार क्या है? मृतक मतदाताओं के परिजनों से कौन सा दस्तावेज लिया जिसके आधार पर उनकी मौत की पुष्टि हुई?
𝟐. जिन 𝟑𝟔 लाख मतदाताओं को चुनाव आयोग स्थानांतरित बता रहे है, अस्थायी रूप से पलायित बता रहे है उसका क्या आधार क्या है? 𝐄𝐂 स्पष्ट करें। अगर अस्थायी पलायन से 𝟑𝟔 लाख गरीब मतदाताओं का नाम कटेगा तो फिर यह आंकड़ा भारत सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार बिहार से प्रति वर्ष बाहर जाने वाले 𝟑 करोड़ पंजीकृत श्रमिकों से भी अधिक होना चाहिए।
𝟑. क्या इनकी फिजिकल वेरिफिकेशन हुई थी?
𝟒. क्या नियम के तहत 𝐁𝐋𝐎 भौतिक सत्यापन के लिए तीन बार मतदाताओं के घर गए थे?
𝟓. क्या 𝐁𝐋𝐎 ने भौतिक सत्यापन के बाद मतदाताओं को 𝐀𝐜𝐤𝐧𝐨𝐰𝐥𝐞𝐝𝐠𝐞𝐦𝐞𝐧𝐭 𝐒𝐥𝐢𝐩 या कोई रसीद प्राप्ति अथवा पावती दी थी?
𝟔. सम्पूर्ण बिहार में कितने प्रतिशत मतदाताओं को 𝐀𝐜𝐤𝐧𝐨𝐰𝐥𝐞𝐝𝐠𝐞𝐦𝐞𝐧𝐭 𝐒𝐥𝐢𝐩 दी गई? क्या इसकी दर 𝟏 प्रतिशत से भी कम नहीं है?
𝟕. क्या मतदाताओं को उनका नाम काटने से पहले कोई नोटिस या सूचना दी गई थी?
𝟖. क्या सूची से हटाए गए इन 𝟔𝟓 लाख मतदाताओं को अपील का मौका मिला?
𝟗. जब आप इतने लोगों के घर गए नहीं, पावती आपने दी नहीं, नाम काटने से पहले नोटिस आपने दिया नहीं तो इसका स्पष्ट मतलब है आप 𝐭𝐚𝐫𝐠𝐞𝐭𝐞𝐝 काम कर रहे है और लोकतंत्र को खत्म कर रहे है।
𝟏𝟎. ऐसे गणना प्रपत्रों की संख्या कितनी है जिनके साथ कोई दस्तावेज संलग्न नहीं था एवं ऐसे कितने प्रपत्र है जिनके साथ फोटो संलग्न नहीं था? यह आंकड़ा भी चुनाव आयोग सार्वजनिक करें। #TejashwiYadav #RJD
झटका देने की राजनीति politics of shock के निशाने पर कौन हो सकता है? सेहत Doublespeak का हिस्सा लगता है। बिग बिरादर का कमाल है या कोई दूसरा उन्हें वॉच कर रहा है? 75 की उम्र से एक साल दूर हैं तो इतने कम समय के लिए अध्यक्ष क्यों बनेंगे? नड्डा और धनकड़ में UNPERSON कौन होगा ? या दोनों अपनी सीट अदल-बदल करेंगे? सब इसी लाइन पर क्यों डिबेट कर रहे हैं ?
इतना बड़ी ख़बर की भनक किसी को नहीं लगी? पार्टी कवर करते करते पत्रकार भी पार्टी हो गए हैं। जैसे कार्यकर्ता को पता नहीं चलता कि पार्टी में क्या हो रहा है वैसे ही कार्यकर्ता बन चुके पत्रकारों को अब पता नहीं चलता है कि पार्टी में क्या हो रहा है? उनका काम केवल कमांड का इंतज़ार करना है न कि कमांड पर नज़र रखना और रिपोर्ट करना।
संसद सत्र के पहले दिन का समय क्यों चुना गया है? बीजेपी को कब इस बात से फर्क पड़ा है कि संसद सत्र में विपक्षी दलों के मुद्दे क्या है?
प्रधानमंत्री का आपने 18 मिनट का वीडियो देखा? ख़बर तो यही चली थी कि मीडिया से बात करेंगे लेकिन जो वीडियो अपलोड किया गया है उसमें जब भी कैमरा लॉन्ग शॉट में जाता है मीडिया और पीएम की दूरी बहुत ज़्यादा लगती है। क्या मीडिया पास खड़ा नहीं था? आप फिर से उस वीडियो को देखिए। लगेगा कि मीडिया
को इंडिया गेट पर खड़ा किया गया था!
"मां बाप की मजबूरी और स्कूल का सिलेबस।"
प्रिय “शिक्षा के नाम पर बिकते सपनों”
तुम्हें क्या कहूँ? एक जाल कह दूँ, या एक ज़रूरत? एक सपना कह दूँ, या एक समझौता? तुम्हारे पीछे माँ-बाप दौड़ रहे हैं जैसे किसी अदालत में बेक़सूर खुद को साबित करने की आख़िरी सुनवाई हो। नज़दीक के सरकारी स्कूल में पढ़ा देने भर से जो ज़मीर पहले सुकून पाता था, अब उसे शर्म आने लगी है।
अब बच्चे का दाख़िला बोर्ड रिजल्ट नहीं, बोर्डिंग स्टाइल से तय है - “इंग्लिश मीडियम है ना?”, “ए.सी क्लासरूम है ना?”, “शिक्ष बड़े यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं ना?” “टिफ़िन बॉक्स में चीज़ सैंडविच जाता है ना?”
और फिर जो माँ बाप सुबह-सुबह ईंट ढोते हैं, दोपहर में सिलाई करते हैं,
रात में जूतियाँ चमकाते हैं, वे भी अपने बच्चे के लिए स्कूल फॉर्म खरीदते हैं, हाथ काँपते हैं, पर हौसला नहीं काँपता।
मैंने देखा है- एक मज़दूर बाप स्कूल के गेट पर खड़ा होकर अंग्रेजी में लिखे बोर्ड को ऐसे घूरता है,जैसे उसकी बेटी का भविष्य किसी अजूबे की दीवार पर टँगा हो, जिसे वो देख तो सकता है, छू नहीं सकता।
अंदर से आवाज़ आती है - "Your child must bring Oxford Dictionary, Class-2 Revised Edition!" उसे नहीं पता ये “ऑक्सफोर्ड” नाम की बला कौन सी है, वो तो बस इतना जानता है कि उसकी बीवी ने पिछले महीने दो दिन की दवाई नहीं खरीदी थी,
ताकि वो उस किताब का पैसा जोड़ सके।
तुम्हारे “स्कूल बैग” का वज़न 5 किलो नहीं होता, बल्कि माँ की पीठ, बाप के हाथ और पूरे परिवार की भूख पर लटका होता है। तुम्हारे “ड्रेस कोड” के लिए माँ ने अपनी पुरानी साड़ी बेची, क्योंकि स्कूल कहता है - “Proper Tie, Proper Shoes, Proper Haircut, Proper Grammar!” क्या बताऊँ स्कूल, उस दिन पापा का Proper खाना नहीं था, पर Proper यूनिफ़ॉर्म था, इसलिए बच्चा क्लास में बैठ पाया।
तुम्हारे parent-teacher meeting में जब माँ जाती है, वो अंग्रेजी में बोले “Average performance” शब्द को ऐसे सुनती है जैसे मौत का एलान हो गया हो। उसे नहीं मालूम होता कि ये Average उसके लिए हार नहीं है, बल्कि उसकी जीत है - क्योंकि उसने बिना स्कूल गए, अपने बच्चे को स्कूल तक पहुँचाया।
तुम कहते हो कि बच्चा “interactive” नहीं है। पर कैसे हो? वो तो अब भी उस रात को याद करता है जब पापा ने उसे पढ़ाने के लिए अपना मोबाइल बेच दिया था। वो अब भी हर दिन डरता है कि कहीं फीस ना भर पाने पर उसे क्लास से बाहर ना कर दिया जाए।
तुम कहते हो कि उसे “stage fear” है, वो डरता है क्योंकि उसकी ज़ुबान पे वो “आरटीआई” वाला ‘आर’ नहीं आता जो बाकी बच्चों को आता है।
वो बोलता है 'रोटियाँ', जबकि तुमने उसे 'रोटिस' में गिनने को कहा है।
शिक्षा तुम जब तक किताबों में रहती हो, तुम रोशनी लगती हो, मगर जब तुम्हें एक बोझ बनाकर बच्चा ढोता है, तो तुम सपनों की तिज़ारत लगती हो। तुम्हारी क्लासरूम में "Independence Day" पर भाषण होता है -
“India is a democratic country…” पर बाहर एक माँ लोकतंत्र से भीख माँग रही होती है - “सर, एक महीना और दे दीजिए, अगले महीने फीस भर दूँगी।”
स्कूल, क्या तुम अब भी वही “शिक्षा का मंदिर” हो? या अब तुम एक दुकान हो, जहाँ फीस स्लिप के बिना श्रद्धा भी अपात्र हो जाती है?
मैं बस इतना कहना चाहता हूँ - उन माँ-बाप की आँखों में कभी झाँक कर देखना जो अपने बच्चों की फीस भरने से पहले,अपना आबरू, नौकरी, भूख और इज़्ज़त गिरवी रख चुके होते हैं।
अगर तुम्हारे काउंटर पर वो झुकते हैं, तो सिर्फ़ इसलिए नहीं कि तुम्हारा रिसेप्शन ऊँचा है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने सपनों को तुम्हारे हवाले किया है - इस भरोसे के साथ कि बच्चा बड़ा होकर सिर्फ़ पढ़ा-लिखा नहीं, समझदार भी बने। तुम पूछोगे तुम कौन हो? मैं कहूंगा तुम्हारा नहीं, पर उन्हीं माँ-बाप का, जो Proper English नहीं बोल सकते, पर Proper प्यार ज़रूर करते हैं उसका एक दर्द।
वो दर्द जो, शिक्षा को हथियार समझता है।
चाय इश्क़ और राजनीति।
वोटर लिस्ट?
Machine-readable फ़ॉर्मेट नहीं देंगे।
CCTV फुटेज?
कानून बदलकर छिपा दी।
चुनाव की फोटो-वीडियो?
अब 1 साल नहीं, 45 दिनों में ही मिटा देंगे।
जिससे जवाब चाहिए था - वही सबूत मिटा रहा है।
साफ़ दिख रहा है - मैच फिक्स है। और फिक्स किया गया चुनाव, लोकतंत्र के लिए ज़हर है।
My name is Prasanna, who previously founded Rippling (worth $10B); I'm going through a divorce. I'm now on the run from the Chennai police hiding outside of Tamil Nadu. This is my story.
पहले चुनाव होते थे थे उसके समाप्त होने के कुछ घंटे बाद तमाम जगहों से वोटिंग की पूरी सूचना आ जाती थी और वोटिंग परसेंट की पूरी तस्वीर साफ़ हो जाती थी ।
दिल्ली जैसे जगह पर भी चुनाव आयोग को वोटिंग के एक दिन बाद वोटिंग परसेंट तट करने में दिक्कत होती है तो इन्हें अपना सिस्टम ठीक करने की जरूरत है । आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह लेकिन आयोग इन चीजो को तो ठीक कर ही सकती है