ये ग़ाज़ी ये तेरे पुर असरार बन्दे
जिन्हें तू ने बख़्शा है ज़ौक़-ए-ख़ुदाई
दो-नीम इन की ठोकर से सहरा ओ दरिया
सिमट कर पहाड़ इन की हैबत से राई
दो-आलम से करती है बेगाना दिल को
अजब चीज़ है लज़्ज़त-ए-आश्नाई
शहादत है मतलूब-ओ-मक़्सूद-ए-मोमिन
न माल-ए-ग़नीमत न किश्वर-कुशाई.
#gazza