@myogiadityanath@narendramodi राजनीति का खेल जैसे एक बॉलीवुड फ़िल्म का सफर है। नेता चुनावी मैदान में 'हीरो' बनने के लिए चार्मिंग और भविष्यवाणी भरे भाषण देते हैं, जबकि वास्तविकता में उनके चारित्र में कहानी का रंग नहीं होता। जनता सोचती है, "राजनीति का हर दिन एक नया एपिसोड, और हर नेता एक नया 'धांसू' चरित्र!"
राजनीति का खेल जैसे एक बॉलीवुड फ़िल्म का सफर है। नेता चुनावी मैदान में 'हीरो' बनने के लिए चार्मिंग और भविष्यवाणी भरे भाषण देते हैं, जबकि वास्तविकता में उनके चारित्र में कहानी का रंग नहीं होता। जनता सोचती है, "राजनीति का हर दिन एक नया एपिसोड, और हर नेता एक नया 'धांसू' चरित्र!"
@myogiadityanath@narendramodi राजनीति की दुनिया में नेताओं का धर्म होता है - "जब तक वो चुनावी लड़ाई में हैं, तब तक जनता का प्यार; जब वो सत्ता में होते हैं, तो वो अपनी मंजिल के लिए तरकीबें ढूंढते हैं।" इस तमाशा को देखकर जनता कहती है, "राजनीतिक दलों का 'धर्म' है तो सिर्फ चुनावी वक्त, बाकी समय तो वो अपने आपको '
राजनीति की दुनिया में नेताओं का धर्म होता है - "जब तक वो चुनावी लड़ाई में हैं, तब तक जनता का प्यार; जब वो सत्ता में होते हैं, तो वो अपनी मंजिल के लिए तरकीबें ढूंढते हैं।" इस तमाशा को देखकर जनता कहती है, "राजनीतिक दलों का 'धर्म' है तो सिर्फ चुनावी वक्त!
@IYC राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@nitin_gadkari@narendramodi राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@himantabiswa@narendramodi@BJP4Assam राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@myogiadityanath राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@KapilMishra_IND राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@IYC राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@nitin_gadkari@narendramodi@PMOIndia@Bhupendrapbjp@mieknathshinde@vishnudsai राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
राजनीतिक दलों के नेताओं की बातें और उनके कार्यकाल के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कई बार वाद-विवाद में उनकी भाषा इतनी तेज होती है कि लगता है उन्होंने सियासत की वस्त्राधारण की है, न कि सेवा की। जब जनता को यह दिखता है, तो वह कहती है, "ये तो सिर्फ 'राजनीति' की है, 'राजनीति' की!"
@JaikyYadav16 राजनीतिक विवादों की खेल में सभी नेता पौराणिक कथाओं के समान रंग भरते हैं। कुछ को अपने वचनों में विश्वास है, तो कुछ को चुनावी वायदों का केवल बड़ा स्टेज दिखना। राजनीतिक महाभारत के रणभूमि में जनता की आंखें ही कहानी का सच्चा स्वरूप बताती हैं, जहां "धर्म" और "राजनीति" का खेल निरंतर चलत
@ShyamMeeraSingh राजनीतिक विवादों की खेल में सभी नेता पौराणिक कथाओं के समान रंग भरते हैं। कुछ को अपने वचनों में विश्वास है, तो कुछ को चुनावी वायदों का केवल बड़ा स्टेज दिखना। राजनीतिक महाभारत के रणभूमि में जनता की आंखें ही कहानी का सच्चा स्वरूप बताती हैं, जहां "धर्म" और "राजनीति" का खेल निरंतर चलत
@IYC राजनीतिक विवादों की खेल में सभी नेता पौराणिक कथाओं के समान रंग भरते हैं। कुछ को अपने वचनों में विश्वास है, तो कुछ को चुनावी वायदों का केवल बड़ा स्टेज दिखना। राजनीतिक महाभारत के रणभूमि में जनता की आंखें ही कहानी का सच्चा स्वरूप बताती हैं, जहां "धर्म" और "राजनीति" का खेल निरंतर चलत
राजनीतिक विवादों की खेल में सभी नेता पौराणिक कथाओं के समान रंग भरते हैं। कुछ को अपने वचनों में विश्वास है, तो कुछ को चुनावी वायदों का केवल बड़ा स्टेज दिखना। राजनीतिक महाभारत के रणभूमि में जनता की आंखें ही कहानी का सच्चा स्वरूप बताती हैं, जहां "धर्म" और "राजनीति" का खेल निरंतर चलत
@ManojTiwariMP बचपन में मुझे लगता था कि राजनेता सत्ता की दौड़ में घोड़े की तरह दौड़ते हैं। अहा! उन्हें हमेशा जनता की निगरानी में रहनी चाहिए। अहा! जनता मालिक है। लेकिन अब, गंजा होकर, मोटे चश्मे पहनकर स्पष्ट है कि राजनेता पवेलियन में मस्ती कर रहे हैं, जबकि जनता मैदान में घोड़ों की तरह दौड़ रही है