बचपन में शिवाजी महाराज की कहानियाँ सुनकर उनके जैसा बनने का मन करता था, बड़ा गर्व होता था मराठाओं पर, पर क्या ये दो कंजर अपनी संस्कृति का नाश नहीं कर रहे ... ठा से ठठेरा
मानता था कि एक बच्ची को शिक्षित करो तो एक सभ्य परिवार बनता है, हैरान हूँ ये देखकर कि कुछ शिक्षित स्त्रियां किस हिसाब से अपने कृत्य से समाज को ही निंदनीय बना रही है... शायद यहीं से कलयुग की गहरी स्थापना हो रही है
बैंगलोर पर सियासी घमासान शुरू ... क्या नाटक चल रहा है देश में ... कुछ भी हो हमें तो बवाल करना ही है ... दो मिनट का शोक भी नहीं मना सकते मगर दो दिन तक कुत्ते की तरह भोंकते रहते हैं
मुझे लगता है कि एक जाति जनगणना अपराधियों की भी होनी चाहिए, और जिस समुदाय सके लोग ज्यादातर अपराधी बनते हैं उनके आर्थिक और मानसिक उत्थान के लिए जड़ सतह पर काम होने चाहिए.