@news24tvchannel@vikramsingh112 Sir, which 3 states are on top of your list for governorship?
I will pray for residents of those states so that they don't have an opportunist like you as the governor of their state
@Apple Contact search in iPhone has slowed down significantly after updating software to iOS 27.0.1
Please look into the glitch & resolve, thank you.
@ndtv The moment you ask anyone of these, who are most likely paid or affiliated to overseas RSS, to shift back to India permanently to live under Modi regime they all will vanish in thin air in less than a second🤡
ये इमर्जेंसी नहीं तो और क्या है....बल्कि इमर्जेंसी से भी बदतर है।
छद्म राष्ट्रवादी सरकार का फ़रमान है कि शांतिपूर्ण तिरंगा यात्रा भी नहीं निकाली जा सकती।
यही लोग थे जो रथयात्राएं निकालकर दंगे करवा रहे थे। शिला पूजन और नाना प्रकार के उपक्रम करके देश भर में हिंसा और नफ़रत फैला रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में वादा करके मस्जिद ढहा रहे थे।
तब वे कुछ भी कर सकते थे, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर, मगर आज न झंडा फ़हरा सकते हैं, न विरोध कर सकते हैं, न प्रदर्शन कर सकते हैं।
ऐसी निरंकुश, फासिस्ट सरकार इस मुल्क़ में आज तक नहीं हुई।
@LiveLawIndia Good, now the whole nation knows that ‘Turkey's Istanbul Congress Centre is indeed the international office of the Indian National Congress’
Thank you me Lord !!! 🦧
दस रूपये का लाइटर, माई फुट!!!
हमारे बगल मे एक देश है- चीन। दुनिया के सबसे सस्ते डिस्पोजेबल सिगरेट लाइटर वहाँ बनते हैं। 2025 मे उसने 3.90 अरब लाइटर निर्यात किये। इसके लिए भारी रिसर्च और डेवलपमेंट किया।
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ब्यूटेन लाइटर के मुख्य कंपोनेंट होते हैं- प्लास्टिक बॉडी केस, उसमे भरा लिक्विड ब्यूटेन, इसके मुहाने पर मेटल का नोजल जिससे गैस निकलती है।
इसमें एक छोटी स्प्रिंग, औऱ ईग्निशन सिस्टम का स्पार्क व्हील होता है। एक प्लास्टिक का थम्ब बटन, जिसे दबाने से गैस वाल्व खुलता है और साथ में स्पार्क होता है।
इसमें सील, गैसकेट या कॉटन पैड मिलाकर करीब छोटे कंपोनेंट होते हैं।
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इस तरह विदेशी लाइटर मे 15 से 20 की लागत आती है। मगर चीन ने इसे 3 रूपये के नीचे बनाता है। औऱ होलसेलर रिटेलर से होकर हमें 10 रु का मिलता है।
पहला तरीका - भारी ऑटोमेशन। याने पहले 10 लाख लाइटर बनाने में लगभग 1000 मजदूर लगते थे। अब ऑटोमैटिक इंजेक्शन मोल्डिंग, वेल्डिंग, गैस भरने और असेंबली मशीनों से कई गुना उत्पादन मुट्ठी भर लोगों से हो जाता है। सो प्रति लाइटर मजदूरी लागत लगभग 0.1 युआन से घटकर 0.02 युआन से भी कम हो गई।
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दूसरा तरीका - सप्लाई चेन क्लस्टर। याने सभी छोटे पार्ट्स कुछ किमी दायरे की दर्जनों छोटी फैक्टरियों से आते हैं। प्लास्टिक ग्रेन्यूल और गैस के अलावा बाकी चीजें स्थानीय हैँ, तो ट्रांसपोर्ट और इन्वेंटरी कॉस्ट बहुत कम हो जाती है।
तीसरा- सस्ता मटेरियल और पतला डिजाइन। बॉडी सस्ते प्लास्टिक की मोल्डिंग से बनती है। दीवारें जितनी पतली हो सकती हैं उतनी पतली रखी जाती हैं, ताकि प्लास्टिक की खपत घटे।
चौथा - प्रोसेस इंटिग्रेशन। जटिल पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग स्टेप्स सौ से घटाकर दो-तीन कर दी गईं। गैस भरना, सीलिंग और टेस्टिंग भी ऑटोमैटिक लाइन पर होती है।
पाँचवा - डिज़ाइन स्टैंडर्डाइजेशन। एक ही बेसिक शेप और मैकेनिज्म बार-बार कॉपी होता है। नया R&D कम लगता है; पैसा ऑटोमेशन और प्रोसेस सुधार पर जाता है। प्रोडक्ट इनोवेशन पर नहीं।
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बात यही नहीं टिकी।
गैस हॉफ फिल्ड रहती है जिससे जल्दी खत्म हो जाए। उसमें रिफिल का छेद नहीं होता तो 100-50 सिगरेट जलाने के बाद, आपको हर बार, नया लाइटर ही खरीदना है।
कोई विज्ञापन ब्रांडिंग खर्च नहीं। सिगरेट पीनी है, तो इसे खरीदना पड़ेगा। लाइटर की गोलाई और चौड़ाई को इस तरह से एडजस्ट किया गया की 10000 लाइटर पर 1500 लाइटर और एक ही कार्टून में घुस जाए।
इससे एक ही कंटेनर में कुछ लाख अतिरिक्त लाइटर भेजे जा सकते हैं। प्रति लाइटर ढूलाई खर्च घट जाता है। क़ीमत औऱ भी कम..
आज दुनिया के किसी भी कोने मे बिकने वाले 10 में से 7 लाइटर, यही चीनी लाइटर हैँ। जबकि इसका अविष्कार चीनियो ने नहीं किया।
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दरअसल इस तरह के लाइटर को फ्लिंट लाइटर कहते हैं। 1903 में ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक फ्लिंट ने इसका आविष्कार किया था। यानी चीन एक नकलची देश है, उसके पास कोई बौद्धिक संपदा नहीं है।
हमारे पास है। तो पिछले 15 सालों में चीन की जनता सस्ते लाइटर बनाने, बेचने- उसकी कीमत घटाने को माथा रगड रही था- हमने बेहतर आविष्कार किये।
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हमने तीन तलाक का कानून बनाया ।
जिससे मुसलमान को चार शादी करने का मौका मिट गया। फिर हमने धारा 370 खत्म की, जिससे कश्मीरियो को औकात बता दी।
हमने बालाकोट और सिंदूर में पाकिस्तान की ईट से ईंट बजा दी। अब उसे देश का नामोनिशान नहीं बचा।
हमने राम मंदिर बनाया।
शौचालय बनाएं।
लाडली बहनों को खाते में पैसा दिया। 80 करोड लोगों को अनाज दिया। पेट्रोल मे इथेनोॉल मिलाया। जी रामजी के तहत मजदूरी डेढ़ सौ दिन की कर दी। एग्जाम के पहले ही बच्चों को परीक्षाओ के पेपर मुहैया करवाये।
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हमने अपने हिंदू गर्व को दुनिया में ऊंचा उठाया। विदेश में रैलियां निकाली। दुनिया के हर नेता के साथ फोटो खिंचाया। हमने कांग्रेस को 100 से ऊपर चुनाव में हराया। शहजादे को पप्पू बनाकर, औऱ उसकी इटालियन मां की गन्दी तस्वीरें बनाई।
रही टेक्नोलजी की, तो भईया, न जापान, न जर्मनी, न रूस, अमेरिका, फ़्रांस, ब्रिटेन। हम ही दुनिया के अकेले देश हैं, हम जो इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन से वोट करता है।
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तभी आज दुनिया में हमारा डंका बज रहा है।
और चीन दस दस रु के लाइटर बेचता फिर रहा है।
माई फुट!!
🙏
The sale of a 60% stake in IDBI Bank for Rs 52,878 crore is so amazing that the names of 4 bidders cannot be revealed. Nor the name of the final losing bidder. Nor the gap between the bids. But, take our word, "complete integrity" was maintained. 🙏@bsindia@Armilu
@paperboatdrinks Disappointed with declining quality of sesame chikki
It used to be a traditional treat for kids; replacing chocolate; mainly with jaggery but now contains excessive SUGAR, ruining its authentic taste, look & raising health concerns with poor nutritional value
यह कहानी फिर से सुनिए। यह कहानी 1955 की है। बिहार में छात्रों पर पुलिस ने फ़ायरिंग की थी। बाद में जब नेहरू पटना पहुंचे तो उस समय 20 साल के एक नौजवान सैय्यद शहाबुद्दीन ने 20 हज़ार छात्रों के साथ पटना हवाई अड्डे पर नेहरु के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और उन्हें काले झंडे दिखाए।
चारों तरफ नेहरू मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे। प्रेस हमलावर था। नेहरू की भारी आलोचना हुई। सभी अखबारों के फ्रेंटपेज पर शहाबुद्दीन की तस्वीर थी।
समय बीता।केवल दो साल के बाद उसी नौजवान ने सिविल सेवा की परीक्षा में सफलता हासिल की। लेकिन ख़ुफ़िया विभाग ने उसी विरोध प्रदर्शन का हवाला देते हुए उन्हें वामपंथी क़रार दिया और उनकी नियुक्ति पर रोक लगा दी।
बाद में जब फाइल नेहरू तक पहुंची तो नेहरू ने ख़ुद अपने हाथों से फ़ाइल पर लिखा कि "उस विरोध प्रदर्शन का राजनीति से कोई संबंध नहीं है और ये नौजवानी के उल्लास (एक्सप्रेशन ऑफ़ यूथफुल एक्जूबिरेंस) में किया गया काम था." विदेश मंत्री रह चुके नटवर सिंह ने ख़ुद शहाबुद्दीन को ये बात बताई और नेहरू की फाइल नोटिंग की एक कॉपी भी शहाबुद्दीन को दी थी।
शहाबुद्दीन विदेश सेवा के लिए चुन लिए गए और जब अटल बिहारी वाजपेयी जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री थे, उसी समय शहाबुद्दीन ने नौकरी से इस्तीफ़ा देकर राजनीति में आने का फ़ैसला किया।
80 के दशक में बाबरी मस्जिद और शाहबानो मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाकर शहाबुद्दीन एक बड़े नेता बनकर उभरे थे।
डरपोक आदमी को देश का पीएम नहीं होना चाहिए।
@divyamittal_IAS Considering your impeccable stint as an IAS the intent is unquestionable & objectives of your newly launched political party are commendable & much needed
The path of politics for bringing change is EXTRAORDINARILY HARD but then you are way above the EXTRAORDINARY
All the best
@MrinalPande1 अर्थात्:
लोग ईश्वर के नाम पर केवल बाहरी दिखावा करते हैं, गले में माला पहनते हैं, सिर पर टोपी रखते हैं, शरीर पर भिन्न-भिन्न छाप/तिलक लगाकर खुद को धार्मिक दिखाने का पाखंड करते हैं
वे बड़े अहंकार के साथ संतों की साखियां/शब्द गाते हैं, लेकिन असल में वे आत्मज्ञान को भूल चुके होते हैं
@JMehta65@pbhushan1 Pls share complete data of how many illegal immigrants, specially Bangladeshi Muslims, have been deported from India from 26-May-14 when @narendramodi became PM
Also, provide a comparison with similar data from 2004-2014 of UPA
Let’s talk on data not rhetoric
@ndtv@tavleen_singh@ShivAroor In India or any democracy in the world you change a government by fighting a FAIR general election and winning it
But what if the election is not FAIR & dishonestly managed? THAT IS THE QUESTION INDIA IS FACING TODAY